बुधवार, 21 अगस्त 2019

वो अकेला बुजुर्ग पडोसी

वो अकेले बुजुर्ग पडोसी
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मेरे पड़ोस में रहते है

वो अकेले बुजुर्ग इंसान

बहुत दिनो क्या सालो से

जानता हूँ उन्हें मैं

और

बहुत अच्छी है उनसे पहचान

पहले उनका घर भरा भरा था

फिर

धीरे धीरे खाली होता चला गया

कुछ चाहे और कुछ अनचाहे

अचांनक अकेले हो गए वो
कभी बैठने लगे मेरे साथ

और बताने लगे

अपनी पूरी बात

पहले

उनके पास बहुत लोग आते थे

जब वो कुछ थे

और बहुत लोग

उनकी उंगली पकड़ कर

क्या क्या हो गए

तब तो हालत ये थी

किसी के घर मौत भी

हुयी हो

तो फोन करता था

की आप जल्दी आइये

अर्थी उठने वाली है

आप का ही इन्तजार है

शादी हो या कुछ

कितने लोग बुलाते थे

वो लोग जो कहते थे कि 

आप का ज्ञान रौशनी देता है

और आप के बिना तो

कार्यक्रम हो ही नहीं

सकता

पर दिन बदलते ही वो सब कही बिला गए

अब कोई नहीं आता
कोई नहीं बुलाता

सबको बना दिया

पर ये जहा के तहा रह

गए

जब कोई उनका अपना

धोखा देता या

कर देता पीठ पर वार

तो ये रहते थे बहुत दुखी

और बेक़रार

फिर झाड कर गम की धूल

लग जाते थे फिर उसी काम में

पर

तमाम झटको से भी नहीं टूटे थे वो

मैने देखा है

बहुत ही संघर्ष किया उन्होने

पर जब अपने साथ थे

क्या मजाल उनके चेहरे पर

शिकन भी आई हो कभी

लेकिन

बहुत उदासी पसर आई उनकी आंखो मे

जब से अकेले हो गए वो

उनके बच्चे भी चले गए दूर

अपनी अपनी जरूरी वजहों से

उनकी सहमती और ख़ुशी के साथ

बहुत प्यार करते है

उनके बच्चे उन्हे और उनकी चिंता भी

पर मजबूरिया अपनी जगह है

ढाल लिया इस बुजुर्ग ने खुद को हालात में

अक्सर देखता हूँ

उन्हें सुबह बाहर निकल कर
लान से

तुलसी की पत्तियां तोड़ते

बताते है

की उनसे अच्छी चाय

कोई नहीं बना सकता है

सेंक लेते है ब्रेड और

काट लेते है कोई फल

हो जाता है उनका नाश्ता

बताते है

की वो बहुत हेल्दी नाश्ता करते है

नौकर चाकर क्या खिलाएंगे ऐसा

अक्सर दिखते है कपडे फैलाते और उतारते

मैंने कहा
क्यों खुद करते है ये सब

और इस उम्र में

बोले कसरत भी है
और पैसे की बचत भी

मैंने पुछा की आप को क्या कमी

तो बस मुस्करा कर रह गए

मंगाते है खाना है कभी कभी

शायद दो दिन में एक बार

मैंने पूछा की आप को तो

ताज़ा और गर्म खाने की आदत थी

बोले खाना ज्यादा होता है

और

फेंकना सिद्धांत के खिलाफ है

कितनो को तो ये भी नहीं मिलता है

और

क्या बिगड़ता है खाने का फ्रिज में

अंग्रेज तो बहुत दिन तक फ्रिज का ही खाते है

मैंने पुछा की पहले तो आप कहते थे

रोज नए नए रेस्टोरेंट में जाऊंगा

और

नए नए पकवान खाऊंगा

तो बोले तबियत का भी ध्यान रखना है न

और

अकेले जाना अच्छा भी नहीं लगता

और रोज जाने मे खर्चा भी कितना हो जायेगा

कभी कभी बहुत खुश होते है

जब आने वाला होता है उनका कोई बच्चा

घर की सफाई ,बिस्तर की चादर

और सब तैयारी में लगे रहते है

कई दिन तक

फिर जब तक बच्चे साथ होते है

दिखते ही नहीं है बाहर कई दिन

बच्चो के जाने के बाद कई दिनों तक

कुछ गुनगुनाते रहते है

और

बच्चो के यहां से आने के बाद भी

कई दिन उदास होते है

तब पूछना पड़ता है क्या हुआ

बोले की एक तो अकेला होने के कारण

न आराम और न चैन से बाथरूम ही जा पाते है

बज जाती है तभी घंटी

कौन देखे की कौन है

और
हमेशा कुछ न कुछ हो जाता है

कभी दूध गर्म करते है

और बाहर कोई आ गया

और दूध गिर जाता है पूरा
चाय भी

कभी सब्जी जल जाती है

तो कभी रोटी खाक हो जाती है

पुछा की फिर क्या करते है आप

बोले अगर दिन में होता है
तब तो हो जाता है

पर जब रात में जल जाती है

तो खा लेते है मुट्ठी भर चना

या अगर ब्रेड है तो वो

नहीं तो एक कप दूध पीकर सो जाते है

और

बोले उस दिन सुबह बहुत ही अच्छा लगता है

हल्का हल्का

पर प्लीस मेरे बच्चो से कभी कह मत देना

की मैं भूखा भी सोता हूँ
वो सब वैसे ही मेरी बहुत चिंता करते है

परेशांन रहने लगेंगे

उन लोगो के खुश रहने

और मस्त रहने के दिन है

उस दिन बहुत दुखी थे

मैंने पुछा क्या हुआ

बोले

पता नहीं मैंने पिछले जन्म में

कितनो के साथ बुरा किया है

की जिनके लिए सब कुछ करता हूँ

वो सब पीठ पर वार कर चले जाते है

जाने दो पिछले जन्म का कर्जा ही चुका रहा हूँ

और

फिर जोर से ठठाकर हँसे

और चल दिए

मैंने कहा कहा चले

बोले किसी और को ढूढने

जिसका पिछले जन्म का कर्जा हो

कभी कभी जब बीमार हो जाते है

तो दिखलाई नहीं पड़ते

मिले तो पुछा क्या हो गया था

बोले कुछ नहीं

बताओ और क्या हो रहा है

बहुत कुरेदा

तो बोले मेरा दुःख तो

कोई बाँट नहीं सकता

लेकिन मैं अपने थोड़े से सुख

तो बाँट सकता हूँ

आइये कुछ अच्छी बाते करे

एक दिन कुच्छ ज्यादा परेशांन थे

मैंने पुछा आज क्या हुआ

बोले एक चिंता है

मुझे कुछ हो गया तो

दरवाजा तोडना पड़ेगा घर का

कितनी दिक्कत होगी न  बच्चो को
कितने परेशान हो जायेंगे मेरे बच्चे

और खुला रखना भी मुश्किल है

और

उनकी आँखों से टपक गया कुछ

बाँध जो रुका था काफी दिनों से

शायद टूटना ही चाहता था

कि

वो इधर उधर देखने लगे

और खांसने लगे

खुद को रोकने को

और मुझे भरमाने को

फिर धीरे से उठ कर चले गए

कई दिनों से नहीं दिखे है वो बुजुर्ग

मुझे भी उनकी आदत पड़ गयी है

मैं लगातार ढूढ़ रहा हूँ

और

झांक आता हूँ उनके घर की तरफ

लेकिन बस सन्नाटा ही सन्नाटा 

मिलेंगे तो पूछुंगा उनके इधर के नए अनुभव

और

सुनुगा उनका खोखला ठहाका

और फिर मैं भी सर झुका कर

कुछ छुपा कर चला जाऊंगा

अपने घर की तरफ

जहा मेरे अपने इंतजार में होते है ।

सोमवार, 19 अगस्त 2019

ट्रंक काल


ट्रंक काल

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पहले भी होता था फोन

पहले तो बड़ा सा काला सा

बात किसी से होती थी

सुनते सब थे पास बैठे हुए

बाद में आये नाजुक से रंग बिरंगे

और कार्डलेस भी

पर उससे पहले

लोगो के यहाँ फ़ोन भी नहीं होते थे

लोगो के यहाँ क्या

शहर भर में

कुछ गिने चुने लोगो के यहां

होते थे फोन

और

वो बहुत रईस होने की निशानी था

गाँव क्या ब्लोक और तहसील में भी

नहीं था कोई फोन

और बुक करनी होती थी ट्रंककाल

बहुत से लोग बुक करते

और बुक करने को लाइन में लगे होते

पूरा दिन निकल जाता और पूरी रात

नहीं मिलता था फोन तब

जिसका मिल जाता था

वो विजयी भाव ओढ़ लेता था

और बाकि उसे इर्ष्या से देखते थे

ड्यूटी लगती थी परिवार के लोगो की

एक इंतजार करता था काल लगने का

और खाने या सोने चला जाता था

जी हां ट्रंककाल लगना भी तब

ईश्वर की कृपा

और किस्मत की बात थी

जब मिल जाता था फ़ोन

तो चीखना पड़ता था

की आवाज वहा तक पंहुच जाये

कई बार तो हेलो हेलो

आप सुन रहे है न

कहता ही रह जाता था आदमी

और काल कट जाती थी

कई कई बार में बात हो जाती थी

और

नहीं भी हो पाती थी

जी हा ऐसा होता था ट्रंककाल

तुम क्या जानो बाबु ट्रंक काल

जिसके हाथ में है एंडोरायड फोन

और ४ जी तथा ३ जी

उस थ्रिल को बस

महसूस कर सकते हो

अतीत में जाकर

जरा जाकर महसूसो

और सोचो की

अपनो की जिंदगी

कितनी मुश्किल थी पहले

ट्रिन ट्रिन

मिल गया मेरा ट्रंक काल

तो मिलते है ट्रंक काल के बाद

त्योहार और व्यहार

जी हां
त्यौहार अब भी होते है
और पहले भी होते थे
अब गरीब है
तो
बस लोगो को को मनाते देख लेता है
या थोडा बहुत मना भी लेता है
मध्यम वर्ग है तो दिखावे के लिए
बजट बिगाड कर भी मनाता है
उच्च वर्ग है तो कहने ही क्या
किसी पद पर है
तो वो नही मनाता
लोग मनाते है उसका त्यौहार
और
लोगो के सामनो से
भर जाता है घर बार
जिनसे काम है
उनके अलावा
कोई किसी से नहीं मिलता
अब किसी भी त्यौहार में
थोक के मेसेज है न
मन गया त्यौहार
और
मान लिया गया उसे ही मिलना
लोगो का और शुभकामनाओ का
त्यौहार पहले भी होते थे
जो पैसे से नहीं
भावनाओ से मनाये जाते थे
गरीब हो या अमीर
सब खुद इन्तजाम करते थे
त्यौहार मनाने का
इतना फर्क था
की
अमीर के काम नौकर कर देते थे
पर बी अकी सब एक समान थे
होली हो तो रंग सबके पास था
और पिचकारी भी
चाहे पीतल की ,लोहे की
नहीं तो बांस को काट कर बनायीं
गरीब की खुद की
फूहड़ता नहीं
बल्कि सबको सबसे मिलने वाले
आनंद का त्यौहार था होली
गाँव में टी झुण्ड बना कर निकलते थे सब
उम्र के हिसाब से
अपनी अपनी भाभियों से होली खेलने
गुझिया बनाने में पूरा परिवार जुटता था
बच्चे भरते और मोड़ते या काटते थे
माँ बेलती थी तो पिता
बैठ कर सेंकते  थे गुझिया
बेईमानी की भी गुंजाइश थी
किसी किसी गुझिया में
ज्यादा मावा भर कर खुद खा लेने की
और
सेव झाड़ना सेंकना
कई दिनों तक चलता था त्यौहार
दीपावली में पतली डंडिया
जो आप्तौर पर नरगट
या अरहर की होती थी
तीन तीन को इस तरह बांधना
की उस पर दिया रख सके
और दरवाजे के सामने उन्हें सजाना
शहर में पहले तो छोटे छोटे दिए
और बाद में मोम्बत्तिया आया गयी
तब भी कई दिन पहले से
मिठाई जैसी चीजे
अपने ज्ञान और हैसियत के हिसाब से
कई दिनों तक तैयारी होती थी
पर
जो तब था और आज नहीं है
वो था समूह में मनाना या समाज में
तब फोन और मोबाइल नहीं थे
तो लोग मोबाइल रहते थे
खूब मिलते थे एक दूसरे से
त्यौहार में एक परिवार आकर मिला गया
तो इसका मतलब ये नहीं
की मिलन पूरा हो गया
अगले दिन ये पूरा परिवार
उनके घर जाता था
और चलता था कई दिनों तक ये क्रम
और फिर पूरा होता था त्यौहार
जी हां त्यौहार एक परिवार नहीं
पूरा समाज मनाता था
एक दूसरे के साथ 
जो कही खो गया
लील लिया नये ज़माने ने
और आर्थिक दिखावा
हीन भावना पैदा कर देता है आज
बहुतो में
देखा होगा आपने भी
जब आप बहां रहे होते है
सफ़ेद या काला धन
तो बहुत सी उदास आँखे
उसे बस टुकुर टुकुर
देख रही होती है
जो पहले के सादे त्योहारों में
नहीं होता था
और
तब केवल त्यौहार नहीं
सच्चा व्यवहार भी होता था

मेरा पहला फोन

जब लगा था मेरे घर नया नया फोन
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एक दिन फोन मंत्री मिल गए
और
पूछ लिया घर में फोन है
लागा जैसे कुछ अपराध
या हीनता है
घर में फोन नहीं होना
बहुत मुश्किल से मुह से निकला था
नहीं
हम कैसे रख सकते है फोन
हम तो साधारण आदमी है
कहा से देंगे उसका पैसा
उन्होंने जारी कर दिया एक आदेश
एक कमिटी का सदस्य बनाने का
और
जब आयी थी उसकी चिट्ठी
क्या ख़ुशी थी
जैसे
कितना बड़ा कुछ मिल गया
पिता जी ने
कई लोगो को जाकर बताया था
उसके बारे
कुछ दिन में लगा गया
वो लाल रंग का फोन
ये भी उन दिनों खबर थी
अख़बार के लिए
जानने वालो और
आसपास के मुहल्ले के लिए
मिलने लगी बधाइयाँ
और मांगे जाने लगे नंबर
अपने फोन तो शायद ही कभी आते हो
क्योकि अपनों के पास नहीं थे फोन
पर जब पहली बार घंटी बजी
तो सभी अजीब कशमकश में थे
की क्या करे
पिता जी ने
आगे बढ़कर उठाया था चोगा
बस इतना ही पुछा था
कौन साहब है आप
किसी अपने का फोन था
पूरा परिवार देख रहा था गर्व से
किसी आश्चर्यजनक चीज की तरह
मैंने जब पहली बार उठाया था
तो उठाने से पहले रटता रहा
की हेल्लो कहना है
पर दूसरो के तमाम फोन आने लगे
और बढ़ गयी थी रौनक घर में
कुछ दिन तो
गर्व की अनुभुती होती रही
पर फिर मुसीबत बन गया फोन
जब किसी ने चुपके से
कही बाहर का फोन मिला दिया
और आ गया बड़ा सा बिल
उस ज़माने के हिसाब से
तब ध्यान रखना पड़ता था
की सभी काल को लाक करके रखना है
पर
लोगो के फोन का कोई समय ही नहीं था
अपनी जिंदगी ही अपनी नहीं रह गयी
सुबह से रात तक कोई न कोई
आकार इन्तजार करता था
अपने फोन का
खाना पीना भी मुश्ल्किल
और
अपनी बात करना भी मुश्किल
जी हा
फोन
मुसीबत का सबब भी था तब फोन
पर स्टेटस का सिम्बल था
तो सब कुछ बर्दाश्त करते थे लोग

रविवार, 18 अगस्त 2019

चिट्ठियां

जी
पहले चिट्ठियां होती थी
सूचना
और
सुख दुःख जानने का साधन
चिट्ठियां भी कई तरह की होती थी
इतना खुला था हमारा जीवन
और हमारा समाज
कि
खुले पोस्ट कार्ड पर
सब कुछ लिख कर भेज देते थे लोग
किसी से कोई धोखा नहीं होता था
क्योकि ये सस्ता होता था
पैसा नहीं होता था लोगो के पास
बस भावनाए और जुडाव होता था
एक चिट्ठी ऐसी भी होती थी
जिस पर टिकेट नहीं लगा होता था
वो भेजने वाले तीन तरह ले लोग होते थे
या तो गरीब रिश्तेदार
या दूर पढ़ रहे छात्र
या फिर वो जो चाहते थे
कि
चिट्ठी हर हालत में मिल जाये उसे
जिसके लिए भेजा है
क्योकि डाक टिकेट का पैसा
उसी से लेना होता था
इसलिए डाकिये की मजबूरी थी
पाने वाले के हाथ में चिट्ठी देना
अंतर्देशीय भी था जो बंद रहता था
पर थोडा महंगा
इसलिए या तो
उसका खर्च वहनं कर कर सकने वाले
लिखते थे इसमें
या फिर कोई गोपनीय बात होने पर
लिखा जाता था ये पत्र
गाँव में तो डाकघर और डाकिया
दोनों वाही के होते थे
पर कोई नहु झांकता था
किसी के पत्र में
किसी का पत्र तभी पढता था
जब वो खुद पढने को कहता था
रजिस्टर्ड  डाक तो
खैर विरले ही भेजते थे
खास कारणों से
चिट्ठिय भी तरह तरह की होती थी
किसी के कोने पर थोड़ी सी हल्दी का रंग
तो किसी पर लाल रंग
हल्दी किसी शुख सूचना के लिए
तो लाल रंग
आशिक के दुःख की निशानी था
और ये बताने की कोशिश
की ये खून से लिखा है
गाँव की चिट्ठियों में
सबके हालचाल पूरे गाँव सहित के साथ
गाय बैल उसकी बीमारी
जो बीमार था ठीक हुआ या नहीं
फल गाय या भैस दूध दे रही या नहीं
और कितना दूध दे रही है
कौन कौन पीता है दूध
बाबा भी पीते है या नहीं
और जिसको बच्चा होना है
उसे मिलता है या नहीं
बगीचे का क्या हाल है
कौन कौन से फल कितना लगा है
किस किस खेत की जुताई हो गयी
किस खेत में पानी लग गया
धन रोपा गया या नहीं
और कौन सी फसल कितनी होगी
इत्यादि जरूर होता था
कोई बीमार था गाँव में तो क्या हुआ
किसका इलाज हो रहा है
और मर गया तो कैसे
और
सब सुख दुःख बताने के बाद
और ये बताने के बाद की फल मर गए
सुखा पड़ गया या बाढ़ में सब बह गया
भैस या गाय मर गयी
वो बच्चा पैदा होते ही मर गया
अंत में ये जरूर लिखा होता था
अपना ध्यान रखना 
यहाँ बाकि सब कुछ ठीक ठाक है
पति पत्नी की चिट्ठिय गोपनीय होती थी
इसलिए उनका ब्यौरा भी लिखना ठीक नहीं
सारे आशिक अंत में जरूर लिखते थे
लिखा है ख़त खून से स्याही न समझाना
शहर की चिट्ठिया इतनी मजेदार नहीं होती थी
इसलिए उन पर भी क्या लिखना
हां तार भी होता था
जो बहुत ही भयानक होता था
तार आने का मतलब ही होता था
की कोई जरूर मर गया
तार खोलते वक्त पढने से पहले ही
रोना धोना शुरू हो जाता था घर में
चाहे किसी ख़ुशी को जल्दी से बताने को
भेज दिया हो किसी अपने ने
तार आने की खबर पूरे गाँव में
और
उस समय के शहरी मुहल्लों में भी
बहुत जल्दी फ़ैल जाती थी
और लोग मुह लटकाए आने लगते थे
दुःख बांटने
चिट्ठिय सहेज कर राखी जाती थी
किसी कोने में या किसी संदूक में
एक और रिवाज था
चिट्ठी आने पर
पूरे परिवार को इकट्ठा कर पढने का
पढना भी तो गाँव में कोई कोई ही
जानता था
वही सबकी चिट्ठी बांचता था
अगर दूर रह रहे पति की चिट्ठी
पत्नी के लिए होती थी
तो कुछ पढ़ कर कुछ छोड़ देता था
और कह देता था
की बाकि बात
वो अपनी मेहरारू को बता देगा
और वो आकर बता देगी
तब कुछ ऐसी ही मर्यादाये होती थी
कोई दुःख का समाचार
चिट्ठी बांचने वाले की अचानक
हिलते हुए ओठो और आँखों से
ही पता लग जाता था
क्योकि कुछ पल वो चुप हो जाता था
दुःख दूसरे का था पर सब रोते थे
जसे
पहले लड़की किसी की भी विदा होती थी
पर रोता पूरा गाँव था
फिर रोना पूरा कर वो बांचता था चिट्ठी
कुछ चिट्ठिय छुपा कर भी रख देने का रिवाज था
कुछ घर में षड़यंत्र के कारण
और कुछ हंसी ठिठोली के लिए
इतिहास में तो चिट्ठियों ने
बड़ी बड़ी क्रांतियाँ करवाई है
तो ज्ञान का प्रसार की किया है
बहुत से जाने मने लोगो की चिट्ठिया
तो आज तक रौशनी का काम करती है
अगर प्रकाशित हो गयी है
या पाण्डुलिपि के तौर पर मौजूद है
क्या होता था जब कोई अपना
कही चला जाता था
तो रोज डाकिये का इन्तजार करना
और
अकसर डाकघर तक चले जाना
पूछने के लिए
की
हमारी कोई डाक है क्या
मिल गयी तो नेमत पाने की ख़ुशी
और नहीं तो उदस होकर लौटना
कितना रोमांच था जिंदगी में
बहुत सी चिट्ठिया
असली भावना का प्रवाह होती थी
मन भी भीग जाता था और भावनाए भी
मेरे पास भी है
सहेज कर रखी हुयी कुछ चिट्ठिया
एक अपने पिता की आखिरी चिट्ठी
और कुछ अपने हमसफ़र की
जिन्हें मैं अक्सर पढता हूँ
अक्श उभर आते है हमेशा उनके
जब भी वो चिट्ठियां पढता हूँ
तो काफी दिन का  दर्द
आँखों के रास्ते बह जाता है
जी हाँ चिट्ठिया क्या होती थी
आज के लोग क्या जाने
और क्या जाने
उनके आने के इन्तजार
और
उनको बार बार पढने
तथा सहेजने का मज़ा
हो सके तो चिट्ठिया लिखिए
और न
यी पीढ़ी को लिखना सीखाइए
मोबाइल और फोन अपनी जगह है
और चिट्ठिया अपनी जगह
वाह रे चिट्ठियां




गुरुवार, 15 अगस्त 2019

स्वतंत्रता दिवस की बधाई , जय हिंद जय हिंद जय हिंद

मैने #प्रधानमंत्री का आज भाषण तो नही सुना
पर अभी उसके कुछ अंश पढे --
उनमे से 4 बातो का समर्थन करता हूँ --
बशर्ते ये खुद उनके प्रति इमानदार हो --
1- जल संजय का अभियान बहुत महत्वपूर्ण है भविष्य के लिए ।
2- जन संख्या नियन्त्रण का अभियान जरूरी है सभी के लिए
यध्यपि दर लगातार घट रही है पर और घटनी चाहिये ।
3- एक्सपोर्ट बढ़ना चाहिये क्योकी इन 5 सालो मे बहुत घटा है और इम्पोर्ट बढा है जिससे असन्तुलन पैदा हो गया है और अर्थवयवस्था चर्मरायी है
4- आधारभूत ढांचा विकास की कुन्जी है बशर्ते भ्रष्टाचार रहित हो ।
#वाजपेयी जी का नदियो को जोडने का सपना भुला दिया गया जबकी वो प्राथमिकता पर होना चाहिये था ।
उससे जल संकट , सिचाई संकट और बाढ के संकट से काफी मुक्ति मिलेगी ।
बेरोजगारी इस समय पिछ्ले 5 सालो की नीतियो के कारण चरम पर है ।
उसके लिए युद्ध स्तर पर प्रयास और बड़े फैसलो की जरूरत है ।
पता नही #रुपया गिर रहा है या देश की सरकार की इज्जत गिर रही है की #डालर प्रधानमंत्री जी की उम्र को पार कर गया (यही कहा गया था मनमोहन सिंह जी के समय )
#आतंकवाद केवल कश्मीर सीमा के कुछ क्षेत्र तक सीमित हो चुका है ।
बल्कि 2014 तक ही और ज्यादा टूट चुका था जो इन 5 सालो मे फिर सर उठाया पर वही तक क्योकी पी चिदंबरम ने अपनी दृढता और सूझ बूझ से उसे उसकी औकात बता दिया था ।
इसलिये आतंकवाद को दिन रात रटने और उससे देश को आतंकित करते रहने की कोई जरूरत नही है ।
कब तक कोसेंगे पहले की सरकारो को ? और ये बतायेंगे की आप कोई बहुत महान और सुपर मैं है और कोई क्रांती कर रहे है ।
आज अगर कुछ उपलब्धियां भी है तो उन सरकारो के सकारत्मक और सुविचरित फैसलो के कारण है ।
नोटबंधी खुद एक समस्या बन गयी और उसकी आशंका पहले ही दिन मनमोहन सिंह ने व्यक्त किया था लेकिन ये भी कहा था की राष्ट्र को बचाने की आइये मिलकर बात करे और हल निकाले जो मोदी जी ने नही किया और ये जो आप ने पैदा भी किया और पाला पोसा भी इसका खमियाजा देश बहुत दिन तक भोगेगा ।उस पर आप ने बोलना बन्द कर दिया ।
कोई गुजरात माडल था उसका अब कोई जिक्र ही नही करते आप ।
कोई अच्छे दिन नाम की चीज थी उस भी मौन ।
100 दिन मे विदेश से काला धन आने वाला था पर न उसकी चर्चा और न उन नामो का ही खुलासा कर रहे है आप जो विदेश से मिल चुके है ।
भ्रष्ट नेताओ और अधिकारियो तथा व्यापारियो के लिए 100दिन मे विशेष अदालते बनने वाली थी और उनपर फास्ट ट्रैक कोर्ट की तरह कार्यवाही होनी थी उस पर भी मौन है बल्कि उन आरोपो से घिरे लोगो की खुद की पार्टी मे शामिल कर रहे है ।
पैट्रोल 30 रूपये देने के वादे का क्या हुआ जब बाहर से अब मनमोहन से के समय से एक तिहाई दर पर कच्चा तेल आ रहा है
15 लाख तो आप अध्यक्ष खुद ही जुमला बता चुके है
पर 2 करोड हर साल नौकरी पर भी आप चुप है
जी एस टी को भी आज़ादी के बराबर दर्जा दिया आप ने लेकिन उसने व्यापार की कमर तोड दी और रोज परिवर्तन करने के बावजूद अभी तक देश पटरी पर नही आ पाया है ।
विदेश नीति पर मैने 15 मई 2014 को ही आशंका व्यक्त किया था की कही सालो की मेहनत बर्बाद न हो जाये ।
ये आप का दिल और आप के लोग जानते ही है की इस मामले
मे हम कहा खड़े है ।
मुझे लगता है कि किसी भी प्रधान मंत्री को अपने भाषण मे अपने पूर्व मे किये गये जनहित तथा देशहित के वादो के पूरा किये जाने और कहा तक हो गया बताना चाहिये
और अन्त मे भविष्य की बडी योजनाओ की घोषणा कर उस बातो के लिए सम्पूर्ण देश का आह्वान करना चाहिये और सहयोग मांगना चाहिये जो बडी चुनौतिया है और जिसमे पूरी जनता और सभी पक्षो की भागीदारी की आवश्यकता है ।
और अन्त मे कम से कम 15 अगस्त और 26 जनवरी को राजनीती और तुच्छ राजनीती से दूर रहना चाहिये और लगना चाहिये की सम्पूर्ण देश का राष्ट्रपति या प्रधान मंत्री बोल रहा है ।
अन्त मे मीडिया के लिए -
मैं 2014 से हर साल इन्तजार करता हूँ की क्या टीवी के स्क्रीन को बराबर दो भागो मे बांट कर किसी प्रदेश के मुख्यमंत्री का भी लगातार पूरा भाषण दिखाया जायेगा जैसा उस वक्त किया गया था जब आधा आधा स्क्रीन पर प्रधान मंत्री मनमोहन सिंह और तत्कालीन मुख्यमंत्री मोदी जी की दिखाया गया पूरे टाईम बल्कि कई टीवी वालो ने प्रधानमंत्री से ज्यादा मोदी जी का भाषण दिखाया था
और तब न किसी को स्वतंत्रता दिवस की गरिमा दिखी थी और न प्रधानमंत्री की ।
इस बार नही तो अगले साल शायद ऐसा दृश्य दिखे और कोई विपक्ष का मुख्यमंत्री उसी तरह दिखे ।
खैर 45 साल की सबसे बडी बेरोजगारी दर ,घटी हुई विकास दर ,घटे एक्सपोर्ट , घटी कृषी दर , बढे भ्रष्टाचार , कारगिल युद्ध से भी ज्यादा शहीद हुये सैनिको , देश पर 52 लाख करोड से 84 लाख हो गये कर्ज ,बेरोजगार हो गये 1करोड 10लाख लोग ,प्रति मिनट होते एक बलत्कार और जुमले पर झूमते मेरे देश को इस स्वतंत्रता दिवस की भी हार्दिक शुभकामनाएं ।
अब मोदी जी है तो जो भी करेंगे या बोलेंगे वो अपनी तय राजनीती और संघ के भावी एजेण्डे के तहत ही करेंगे ।
पर हम सब याद रखे की जब संघ ,हिन्दू महासभा इत्यादि अंग्रेजो के साथ खड़े थे तो लाखो लोग जेल मे थे या फिर लाखो फाँसी घर नही थे तो पेड़ो पर फासी से शहीद कर दिये गये या अंग्रेजो की गोलिया से शहीद हो गये ।
और उनमे से कोई न तो हिन्दू राष्ट्र के लिए शहीद हुआ था ,न खालिस्तान के लिए और न भारत मे किसी अलग राष्ट्र के लिए और न फ़ासीवादी तानाशाही व्यव्स्था के और न एक पार्टी की तानाशाही के लिए ।
ये सब शहीद अपने मूल अधिकार की सुरक्षा संपन्न राष्ट्र के लिए , आजादी के लिये और लोकतंत्र के लिए शहीद हुये थे ।
और सम्पूर्ण भारत को ये लगातार याद रखते हुये हर हाल मे शहीदो के सपनो और शहादत की लाज रखना चाहिये और अपने लोकतंत्र,सम्पूर्ण आज़ादी , सम्पूर्ण अधिकार और अपने संविधान की रक्षा करना चाहिये
सरकार चलाने को बहुमत देती है जनता पर खुद को और और शहीदो की शहादत से मिली उपलब्धियो को छीनने को नही ।
बहुमत तानाशाही करने का लाईसेंस नही बन सकता है किसी भी लोकतंत्र मे ।
पर जिन लोगो ने स्वतंत्रता अन्दोलन की पीठ मे छुरा घोपा और आज़ादी मिलने से न खुश थे ,न इस झंडे से और न संविधान तथा लोकतांत्रिक व्यव्स्था से वो ताकते रौदने और छीनने की भरपूर कोशिश पर देश को महात्मा गांधी जी की दृढता और सत्याग्रह का रास्ता अपना कर इन ताकतो का रास्ता रोका ही होगा ।
हा अच्छे अच्छा कपड़ो और लच्छेदार भाषण तथा पूरे विश्वास के साथ बोले जा रहे असत्य और जुमलो के लिए प्रधान मंत्री मोदी और उनकी सम्पूर्ण जमात को बधाई और स्वतंत्रता दिवस की भी हार्दिक बधाई ।
और भारत के अपने भाईयो और बहनो के लिए -
महात्मा गाँधी जिन्दाबाद , सुभाष चन्द्र बोस जिन्दाबाद ,भगत सिंह जिन्दाबाद , अशफाक उल्ला खां जिन्दाबाद , सभी शहीद जिन्दाबाद जी आज़ादी की लडाई मे हुये या उसके बाद होते रहे ।
इंकबाल जिन्दाबाद ।
जय हिंद जय हिंद जय हिंद ।

मंगलवार, 13 अगस्त 2019

सब रामायण मिला दे

भारत मे शायद 200के आसपास #रामायण लिखी गयी है
क्या सबको जोड़कर कोई एक बनायी गयी है जिसमे जो सबमे एक समान है वो हो
और
वो भी हो जी सबमे अलग अलग है ।
और अभी तक नही हो तो इसके ज्ञनियो को ऐसा बडा काम करना चाहिये ।
कोई हो तो बताईये , पढ़ना चाहता हूँ और सबको पढ़ना चाहिये ।
ज्ञान की व्यापकता आयेगी ।

संविधान और लोकतंत्र बडा है

मेरा मानना है की भारत ने बहुत संघर्ष किया है और बहुत दूरी तय किया है तथा बहुत कुछ पाया भी है
पर हम भारत के लोगो के दिमाग मे हर वक्त सविधान , लोकतंत्र, अनेकता मे एकता तथा आज़ादी के प्रति प्रतिबद्धता और कर्तव्य करते हुये अपने अधिकारो के प्रति जागरूकता और समर्पण जरूर रहना चाहिये
यदि भारत चंद भटके हुये लोगो के साथ इन मूल चीजो के खिलाफत के बहाव मे बह जायेगा तो कही लिख कर रख लीजिये की हम बर्बाद हो जायेंगे ।

भारत मूर्तिपूजक देश

भारत मूर्तिपूजक देश है और बड़े पैमाने पर नही भी है
पर सभी मिलकर कभी कभी किसी इन्सान को मूर्ती मान लेते है
और भूल जाते है की सम्पूर्ण भारत मे कोई एक मूर्ती नही पूजी जाती ।यहा तक की क्षेत्र और गांव के भी अपने अपने देव और देवी है
इतने देव बना दिये है की नाम भले याद न रहे पर कोई एक देव जो चाहे वो न कर दे
हमारे धर्मग्रन्थ उनमे भी विवादो से भरे है
तो कोई एक इन्सान सर्वसम्मति मूर्ती बनने की कल्पना भी कैसे कर सकता है ?
यहा राम आये , कृष्ण आये ,महावीर और बुद्ध तथा नानक आये पर सबको तो कोई न बदल पाया न अपना बना पाया ।
कुछ इसी पृष्टीभूमि पर सोचने की जरूरत है आज ।

सोमवार, 5 अगस्त 2019

आशंकाए और भविष्य

आइए अपने बच्चों को मानसिक तौर पर तानाशाही और ग़ुलामी की ज़ंजीरो में जकड़ी ज़िंदगी के लिए तैयार करे
उन्हें बताए की वो एक मशीनी ज़िंदगी जीने की आदत डाले
उन्हें बताए की वो दिमाग़ का इस्तेमाल करना भी बंद करना सीखे
उन्हें बताए की वो ज़ुबान सिल कर जीना सीखे
उन्हें बताए की एक तरह का कपड़ा , एक तरह की बात , एक ही तरह का खाना और वो सब जो हुक्मरान बताए उसे ज्यों का त्यों स्वीकार करना सीखे
तभी ज़िंदा रह पाएँगे हमारे बच्चे ।

लोकतंत्र की परंपरा

हर लोकतंत्र की परम्परा रही है की बहुमत चाहे कितना हो पर सर्वानुमती बनाने की कोशिश करनी चहिये
और मूल मामलो मे देश को और सम्बंधित लोगो को विश्वास मे लेने की कोशिश करना चाहिये
पर
ये लोकतंत्र मे विश्वास करने वालो की परम्परा है ।

तानाशाही

इतिहास गवाह है की तानाशाही सबका शिकार करती है
पहले गैरो का
और
फिर अपनो का भी ।

रब्स्पियर

समय निकाल कर ये #इतिहास_का_एक_अध्याय_जरूर_पढिए --
#हिटलर से पहले “#राब्सपियर” हुआ था जिससे हिटलर ने कोई सबक़ नहीं लिया । सबक़ न लेना ....मुमकिन है
पर इसका परिणाम / दुखद अंत नामुमकिन नहीं !

“एक था रॉब्सपियर। फ्रांस में पैदा हुआ था। राजशाही के खिलाफ था। लोकतंत्र का समर्थक था। गुलामी और मौत की सज़ा के भी बहुत खिलाफ था। फिर वो मज़बूत होता गया। राजा की हत्या का हामी बन गया। उसने ये सज़ा दिलवाई भी। गुलोटिन मशीन से राजा का सिर कटवा दिया। रानी का भी सिर कटवा दिया। इसके बाद खुद शासन में आ गया। असहमत लोगों के सिर कटवाने लगा। उसके शासन को आतंक काल कहा गया।हालात यहां तक खराब हुए कि किसी ने अगर महंगाई का विरोध कर दिया तो भी गद्दार कहकर मार दिया जाता। विपक्षी दल के लोगों का कत्ल थोक के भाव किया गया। अदालतों में ट्रायल बंद हो गए। उसने कहा ट्रायल की ज़रूरत ही क्या है... गद्दार तो शक्ल देखकर पहचान लिया जाता है। उसने अपने बचपन के दोस्तों तक को मरवा दिया क्योंकि वो अपने अखबारों में उसकी नीति के खिलाफ लिखते थे। वो बहुत ताकतवर बन गया... इतना कि उसे कल तक लोकतंत्र का रक्षक माननेवाले डिक्टेटर कहने लगे। जो उसे तानाशाह कहता उसे ही वो मरवाता और फिर एक दिन ऐसा भी आया जब उसे उसके ही लोगों ने घेर लिया। वो समझ गए थे कि कि शेर के मुंह खून लग चुका है और अब वो सबके काबू से बाहर है। जिस राजा को सबने मिलकर मरवा दिया था दरअसल रॉब्सपियर उस राजा से भी बदतर निकला था, वो भी लोकतंत्र के नाम पर।

अंतत: उसने खुद को विरोधियों से घिरा देख अपने ऊपर गोली चला दी। किस्मत भी एक वक्त तक साथ देती है और अब वो समय बीत चुका था। वो खुदकुशी भी नहीं कर सका। उसे अब बेइज्ज़त होना था। लहूलुहान हालात में रॉब्सपियर को उसी मेज़ पर लाकर रखा गया जहां बैठकर वो मौत के परवाने लिखा करता था। आखिरकार शहर के बड़े हुजूम के सामने उसे गुलोटिन पर लाया गया। सूजे मुंह के साथ वो तब तक चीखता-चिल्लाता रहा जब तक कि उसका सिर कट कर गिर नहीं गया। पंद्रह मिनट तक माहौल तालियों से गूंजता रहा। छत्तीस साल का रॉब्सपियर जो चंद साल पहले क्रांति का प्रतीक था आज उसकी मौत फ्रांस में जश्न का कारण बन चुकी थी ।
तानाशाही भी लोकतंत्र के रास्ते आती है ।

अपनी बेटी उनकी बेटी

अपनी बेटियो के गैर जाती और धर्म मे शादी कर लेने पर कत्ल कर देने वाले लोग और अपनी बेटियो को अपनी संपत्ति मे पाई भी नही देने वाले लोग इस बात से  खुश है की कश्मीरी बेटी अब किसी से भी शादी कर सकेगी और उसको संपत्ति मे हिस्सा भी मिलेगा ।

आज़ादी क्या 2014मे

2014 मे भारत आजाद हुआ और अभी सब कुछ इन 5 सालो मे ही तो हुआ
आज़ादी और राज्यो के विलय की प्रक्रिया अभी चालू है
ये मत पूछ लीजियेगा की आज़ादी की लडाई मे किन किन लोगो ने क्या क्या किया
और
ये भी नही की 47वाली आज़ादी के बाद किन लोगो ने अदालत मे मामला जाने तक 50से ज्यादा साल राष्ट्रीय झंडे को झन्डा ही नही माना और फहराया भी नही
आज़ादी , लोकतंत और संविधान उन्हे मंजूर ही नही था
और है भी नही
नाम मैं क्यो बताऊं ?

लोकतंत्र

लोकतंत्र का मूल आधार है बहस , संवाद और असहमती का भी सम्मान
पर
अब असहमति और संवाद को खत्म किया जा रहा है
और
संवाद ,सवाल तथा असहमति को देशद्रोह करार दिया जा रहा है ।

तानाशाही की पदचाप सुनने के लिए साहस और असहमति का जज्बा चाहिये ।
बाकी सब बापू ,भगत और सुभाष को मुबारक ।

आपातकाल

आपातकाल लगाने और संगीनो से डराने के बाद पहले भी सत्ता ने जो चाहा सो किया था
और तब माफी मागते हुये उस सबका समर्थन कर ,संगीन नीचे होते ही उसके विरोध मे आकर सत्ता की मलाई चाटने वाले आज सगीनो के वैसे ही इस्तेमाल को जायज बता रहे है ।

बाकी भारत बदहाल क्यो

भारत मे जहा सबको जमीन खरीदने की आज़ादी है और बसने की आज़ादी है वो इलाके बदहाल क्यो ? वहा भुखमरी , गरीबी , बेरोजगारी क्यो ? किसान और लोगो की आत्महत्या क्यो ?
उत्तर प्रदेश मे आप दलित की जमीन नही खरीद सकते तो तमाम प्रदेश मे आदिवासी की और बहुत से प्रदेश मे किसी की भी ।
गुजरात की ही इतना खुशहाल बना देते की 40 फुट की सीढ़ी नही होने से 23 बच्चे नही मरते और गोरखपुर मे तथा जिस बिहार मे लम्बे समय स्वास्थ्य मन्त्री आप का रहा वहा आक्सीजन बिना सैकड़ो नही मरते ।

आज़ादी की लडाई

आज़ादी की लडाई और उसके बाद की जद्दोजहद से जिनका कोई वास्ता नही रहा
जो अंग्रेजो के पित्ठू बने रहे
वो क्या जाने
वैसे बंगला देश को इतनी सारी जमीन किस खुशी मे दान की गयी पिछ्ले दिनो ।

बंगला देश को जमीन

वैसे बंगला देश को इतनी सारी जमीन किस खुशी मे दान की गयी पिछ्ले दिनो ।

भीड के न्याय मे विश्वास

भीड के न्याय मे विश्वास करने वाले लोग लोकतंत्र नही भीड़तंत्र मे ही विश्वास करते है ।