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रविवार, 10 दिसंबर 2017

संघर्ष को समर्पित एक राजनीतिक कबीर की फकीरी जिंदगी का नाम था ; राजनारायण 

[ राजनारायण जी के जन्म शताब्दी वर्ष पूर्ण होते ही आ गया ठीक ३८ दिन बाद ३१ दिसम्बर उनकी पुण्यतिथि का दिन , मुझे याद है १ जनवरी १९८७ का बनारस ,ऐसा लगता था की पूरा बनारस या तो सड़क पर है या छतो पर और घाट पर भी वही नज़ारा पूरी नदी में नावो में भरे हुए लोग और पूरा घाट भरा हुआ  इतनी भीड़ मैंने नहीं देखा था अपनी जिंदगी में , लोगो का कहना था की मालवीय जी के लिए भी निकला था ऐसे ही बनारस और
तब मैंने लिखा था
= मिटटी ,मिटटी से यूँ मिली की सारा जहा रो पड़ा =]

 हमें  नफरत नहीं थी अंग्रेजो की कौम औ सूरत से ,

हमें  नफरत  थी  तो  उनके   अन्दाजे   हुकूमत से

 गर अपनों की हुकूमत  अपनी खातिर हो नहीं सकती 

तो अपनों की भी सूरत से मोहब्बत हो नहीं सकती | 

लोकबन्धु राजनारायण के लिए ये चार पंक्तियां दिशा निर्देशक का काम करती थी | तभी तो जहा देश की स्वतंत्रता के लिए नेता जी कुल चार बार जेल गए वही आज़ादी के बाद अपनों के शासन में कुल करीब १५ वर्ष जेल में बिताए | जब भी जहा भी उनको जनता का कष्ट दिखलाई पड़ता या आज़ादी के सपनो का खून होता दिखलाई पड़ता वही वो आन्दोलन का शंख बजा देते थे | इसी लिए आज के माहौल में में उनकी चर्चा और उनके संघर्षो की चर्चा और भी समीचीन हो जाती है जब लगता है की सत्ता निरंकुश हो रही है और विपक्ष नदारद दीखता है या किंकर्त्व्यवमूढ़ दीखता है या सी बी आई एयर इ डी नमक चीजों से डरा हुआ सहमा सा नजर आता है , तब सोचना पड़ता है की राजनारायण जी के पास कौन सी फ़ौज थी या ताकत थी जो लगातार सत्ता से सीधे टकराते रहे  ,हारे भी और जीते भी पर परवाह नहीं किया बस कर्तव्य पथ पर चलते रहे लगातार तभी तो आज़ादी की लड़ाई से लेकर आपातकाल उनके संघर्ष की कहनियाँ ही पसरी हुयी है भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में |अगर हर आन्दोलन का तारीखवार वर्णन करूँगा और विस्तार में जाऊँगा तो किताब बन जाएगी इसलिए बस इशारतन ही जिक्र करूँगा यहाँ | वो मजदूरों का आन्दोलन हो उत्तर प्रदेश से लेकर आसनसोल तक जहा उन्होंने नक्सलवादियो का किला तोड़ते हुए समाजवादी संगठन खड़ा कर दिया था मजदूरों का | वो किसानो का आन्दोलन हो अदलपुरा से लेकर अरदाया तक या लखनऊ की धरती पर विशाल प्रदर्शन जिसमे ; किसान जागा पन्त भागा ; के नारे लगे थे ,वह किसान आन्दोलन रहा हो जिसमे राजनारायण जी को बुरी तरह पीट कर बंद कर दिया गया और आचार्य नरेन्द्र देव की मध्यस्थता से समझौता हुआ | १९५३ में गोरखपुर में रेल मजदूरों पर गोली चलने के खिलाफ आन्दोलन हो ,१९५४ में नहर के पानी का रेट बढ़ने पर आन्दोलन हो ,मिर्जापुर में मजदूर आन्दोलन हो ,५५ में गोरखपुर हो या या लखनऊ का छात्र आन्दोलन ,;;और बहुत महत्वपूर्ण १९५६ में जब वो हजारो हरिजनों को लेकर कशी विश्वनाथ मंदिर में घुस गए थे और तब संघियों ने तथा फासिस्ट ताकतों ने न सिर्फ हरिजनो के मदिर प्रवेश का विरोध किया बल्कि राजनारायण जी पर घातक हमला भी कर दिया था | १९५७ के सिबिल नाफ़रमानी आन्दोलन के संचालक बने ,बिक्रीकर के खिलाफ आन्दोलन ,बिहार में सोशलिस्ट पार्टी के आन्दोलन का सञ्चालन ,;;; स्वतंत्र भारत में जगह जगह लगी अंग्रेजो की मूर्ती के विरोध में बनारस में मूर्ती तोड़ने पर गिरफ्तार हुए और स्वतंत्र भारत की सरकार में इसके लिए १९ महीने की सजा और ४०० रूपये का जुरमाना हुआ वही से मूर्ती भंजन प्रथा शुरू हुयी तथा सरकार को बाध्य होकर सभी अंग्रेजो की मूर्तियाँ हटानी पड़ी और काशी में किंग एडवर्ड अस्पताल का नाम बदल कर शिवप्रसाद गुप्त अस्पताल हुआ ,१९५८ में खाद्य आन्दोलन ,और सम्पूनानन्द की सरकार में समितियों का बहिष्कार का फैसला ,१९६० में राष्ट्रव्यापी आन्दोलन के संचालक बनाये गए ..देश भर में घूम घूम कर आन्दोलन ,लाल बहदुर शास्त्री के निवास पर पर्दर्शन जैसे हजारो आन्दोलन और उसमे सिद्धांत के साथ साथ अपने शरीर को विरोध का इस कदर हथियार बना देना की तमाम बार की पिटाई से पैर टूटे ,सर टूटा ,और जेलों में रहते रहते तमाम बीमारियों ने पकड़ लिया |
पहले लखनऊ रेलवे स्टेशन पर रिक्शा नहीं जा सकता था तो एक दिन राजनारायण जी वही विरोध पर अड़ गए ,,धीरे धीरे बड़ी संख्या में जनता एकत्र हो गयी तो मजबूर होकर रिक्शा जाने की इजाजत देनी पड़ी | ऐसा ही एक दिन उन्होंने राजभवन पर भी किया और उनका रिक्शा अन्दर गया |
वो चाहते तो जातिगत आधार पर सुरक्षित स्थान पर चुनाव लड़ कर हमेशा सासद रह सकते थे पर जैसे डॉ लोहिया ने कहा था नेहरु जी के खिलाफ चुनाव लड़ते हुए की मैं जनता हूँ की मैं पहाड़ से टकरा रहा हूँ और उसे गिरा नहीं सकता पर उसमे दरार पैदा कर कमजोर तो कर ही सकता हूँ ,,उन्ही के रास्ते पर चल कर अजेय ताकत बन गयी कांग्रेस और बलशाली नेता इंदिरा गाँधी के खिलाफ वो चुनाव लडे और ये भी इतिहास है की उनको कोर्ट में भी हराया और फिर वोट में भी हराया | उनका संघर्ष ही था की बहुत बड़ी संख्या में गर्रीब परिवारों के लोग जिन्होंने अपने शहर नहीं देखे थे वो प्रदेश और देश की राजधानियों में पहुंचे और स्थापित हुए | तो १९५२ से ६२ तक उत्तर प्रदेश विधासभा में विपक्ष के नेता के तौर पर भी उन्होंने विपक्ष को मायने दिया और काम संख्या होने पर भी कैसे लड़ा जा सकता है बहुमत से ये सिखलाया।
एक बार जब संसद में नेहरु मंत्रिमंडल की मंत्री तारकेश्वरी सिन्हा ने डॉ लोहिया से कहा की क्या आप पागलो को साथ लेकर घुमते है तो डॉ लोहिया नाराज हो गए और कहा की तारकेश्वरी अगर मुझे कुछ और राजनारायण मिल जाये तो मैं देश को बदल दूंगा और तुम लोगो को भी बेदखल कर दूंगा | इसी प्रकार एक मौके पर आचार्य नरेन्द्र देव विदेश जा रहे थे तो उस वक्त के आन्दोलन के बारे में पुछा गया की कैसे चलेगा तो आचार्य जी ने कहा की उसे नेता जी चलाएंगे और उनके नामकरण के बाद से राजनारायण जी को नेताजी कहा जाने लगा |
जब राजनारायण जी केंद्र में स्वस्थ्य मंत्री बने तो उन्होंने परिभाषा ही बदल दिया और जमीन पर बैठना तथा बिना ए० सी ० के रहना और उस समय रूस के अखबार प्रावदा ने लिखा की हिंदुस्तान में एक ही मंत्री है जो जनता का मंत्री है और समाजवादी फैसले कर रहा है | राजारायण जी ने चलित अस्पताल चलाये थे की वो गाँवो में जाकर गरीबो का इलाज करेंगे और बेयर फुट डाक्टर के नाम पर उस समय १५ लाख लोगो को नौकरी दे दिया था | पर आर एस एस की कुटिल चालो को देख कर वो विचलित हो गए तथा जिस तरह किसानो और गरीबो के मुख्यमन्त्रियो के खिलाफ साजिश हो रही थी उस पर वो मुखर हो गये तथा तत्कालीन जनसंघ के लोगो की दोहरी सदस्यता के सवाल पर सरकार टूट गयी |
उन्होंने किसानो की लडाई लड़ने वाले किसान नेता चौ चरण सिंह को प्रधानमंत्री बनाने का सपना देखा तो फिर उसे पूरा कर के ही रहे | एक दौर था जब देश का प्रधानमंत्री ,प्रदेशो के मुख्यमंत्री उन्होंने बनाये बिगाड़े पर खुद उनका परिवार कहा है | मनीराम बागड़ी ने एक दिन जब ज्यादातर लोग साथ छोड़ गए थे तथा पार्टी ख़त्म जैसी हो गयी थी राजनारायण जी का नगर निगम में क्लर्क बेटा आया हुआ था ,कहा की पार्टी का काम तो अब कुछ रहा नहीं इसलिए टाइप राईटर और फोटोस्टेट मशीन इसे दे दे ये अपने बच्चो के लिए कुछ कमा लेगा इन मशीनों से तो उन्होंने जवाब दिया की पार्टी का है पार्टी कोष में पैसा जमा कर दे और ले जाये जबकि दूसरी तरफ एक प्रमुख कार्यकर्ता नेत्री ने बताया की आज ही अचानक उनकी बेटी के लिए एक लड़का मिल गया है जो दो दिन बाद ही विदेश चला जायेगा तो उसी राजनारायण जी ने उनकी शादी की पूरी व्यवस्था कर दिया |
उनके साथ रहने पर न तो किसी पद की जरूरत महसूस हुयी और न कही किसी से डर लगा | ८० में एक दिन मैं छात्र आन्दोलन में लाठीचार्ज के बाद गिरफ्तार हो गया पता नहीं उन्हें कहा से पता चला दूसरे ही दिन सुबह दिल्ली से चल कर और पूरे प्रशासन के साथ वो आगरा की जेल थे | जब मेरी शादी की पार्टी थी उसी दिन उनके परिवार में भी और उन्हें १०० से ज्यादा बुखार था पर वो मेरी शादी में हाजिर थे ..उससे भी ज्यादा तो तब हुआ जब मेरी बेटी पैदा हुयी और कुछ कार्यक्रम था उसी दिन उन्होंने बिहार के दो पूर्व मुख्यमन्त्रियो कर्पूरी ठाकुर और सत्येन्द्र नारायण सिन्हा को दिल्ली बुलाया था उनका विवाद निपटाने को और मुझे मना कर दिया था आने को पर अचानक सभी को साथ लिए हुए घर पर आ खड़े हुए | जब केंद्र में मंत्री भी थे तो अचानक जब घर आ जाते थे तब पता लगता था | ये थी इतनी बड़े नेता की खासियत |
मानवीय पक्ष और राजनीती की ऊँचाइयाँ तथा रिश्ते निभाना भी उनसे सीखे जा सकते है ,एक दिन थोडी से परेशानी पर तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा जी पैदल तीन मूर्ती लेन वाले घर आ गयी तो इंदिरा जी और संजय गाँधी के निधन पर मैंने उन्हें बिलखते देखा | ऐसा क्या कहा था उन्होंने संजय गाँधी से की उसी दिन से वो सड़क पर संघर्ष करने वाला हो गया | लोगो की चुगली और कान भरने से चरण सिंह से दूरी हो गयी थी पर मैंने उन्हें उनके लिये परेशांन  रहते हुए देखा | जनेश्वर जी और ब्रजभूषण तिवारी साथ छोड़ गए थे पर लोकसभा चुनाव में मैंने उनकी सहायता करते और जीत की कामना करते हुए देखा था |
वो चाहे कितने भी कमजोर हो गए हो पर जीतनी भीड़ उनके आसपास रहती थी वो मंत्रियो के यहाँ भी नहीं होती थी | देश के सभी बड़े नेता दलों की सीमाए तोड़ कर उनसे मिलने आते थे तथा सलाह करते थे | ये बताना भी समीचीन होगा की जब चंद्रशेखर जी भारत यात्रा कर रहे थे तो उन्होंने ये रहस्य खोला की यदि राजनारायण जी उनकी जिंदगी में नहीं आये होते काशी तो वो तो नौकरी करना चाहते थे पर राजनारायण जी उन्हें राजनीती में ले आये |एक दिन जब नेताजी बहुत कमजोर हो गए थे लोगो के साथ छोड़ देने के कारण ,देश के सात ७ बड़े नेता बैठे थे नेता जी के यहाँ और खिचड़ी तथा लिट्टी चोखा खा रहे थे उस दिन नेता जी ने बड़ी वेदना से कहा की यह दिन देखने को मैं क्यों जीवित हूँ ? जब सत्ता मदांध है और विपक्ष रश्म अदायगी कर रहा है और वही हालत कुछ आज भी दिख रही है। क्या कानून की पढाई राजनारायण को पढ़े बिना पूरी हो सकती है ?क्या लोकतंत्र में विपक्ष को मायने देने वाले योद्धा को याद किया बिना लोकतंत्र को जिन्दा रखा जा सकता है |
आज जब सत्ता तथा उससे जुड़े लोगो की भाव भंगिमा ,बोल और कदमो से लोकतंत्र की हत्या होने और फासीवाद स्थापित करने के इरादे की बू आ रही है तो आज जरूरत है एक राजनारायण की और आज के दौर में कोई राजनारायण नज़ए नहीं आता है। समाजवादी आन्दोलन अगर गाँधी के विचार ,लोहिया की हुंकार ,जयप्रकाश की सम्पूर्ण क्रांति और राजनारायण के सतत और निरपेक्ष संघर्ष कर्पूरी ठाकुर जैसे लोगो की सादगी को अपना हथियार बनाएगा तभी देश के लिए सपने देखे गए वो पूरे होंगे और राजनारायण जी को सच्ची श्रधान्जली होगी | 

उनका एक और मूल वाक्य  था --- सभी का गर भला हो मेरी जान सस्ती है 

गुरुवार, 7 दिसंबर 2017

आज बहुत मजबूर होकर ये उन लोगो के लिए लिख रहा हूँ और उन बड़ी संख्या में अति उत्साही लोगो के लिए लिख रहा हूँ जिन्होंने कोई संघर्ष और तकलीफ देखा ही नहीं ।समाज के उंच नीच को झेला ही नहीं और इस तरक्की तथा वैज्ञानिक युग में पैदा होने के नाते जिनसे अपेक्षा होती है की वो जातियो को तोड़ेंगे तथा जातियो की बात करने से भी घृणा करेंगे पर जो पिछली शताब्दियों से भी ज्यादा जहरीले जातिवादी होते दिख रहे है । ऐसा लग रहा है कि कट्टरवादी आतंकवादी मुसलमानो की तरह कोई कट्टरवादी जातिवादी जेहाद छेड़ा जा रहा हो ।
हम तो बचपन से लड़ रहे थे की वंचितो को न्याय मिले पर किसी के साथ अन्याय न हो । वंचित में सभी जाति और धर्म की महिलाओ को भी शामिल किया डॉ लोहिया ने और हम लोगो से नारा लगवाया : संसोपा ने बांधी गांठ ,पिछड़े मांगे सौ में साठ : और इस साठ में सम्पूर्ण स्त्री समाज को शामिल किया गया ।
हमने सीखा की घृणा नहीं करना है किसी से पर जो आगे बढ़ गए है उनसे कहा जाय की थोडा धीरे चलो, पर पूरी तरह रुक जाने और मृतप्राय हो जाने को नहीं कहा और जो पीछे छूट गए है उन्हें रफ़्तार दिया जाये और सम्भव समानता लायी जाए ,पर समानता उन समाजो और जातियो तथा धर्मो के अंदर भी लायी जाये ।
पड़ी खड़ी लकीर को पड़ी लकीर बनाना केवल अगड़ी और वंचित जातियो के लिए नहीं सोचा गया था बल्कि वंचितो में भी सभी को और वंचित जातियो में भी सभी को सामान भाव से अवसर मिले ये चिंतन था ।ऊच नीच की खायी को कम किया जाए ये चिंतन था ।
पर घृणा किया जाए और अन्य को खत्म किया जाए या बिलकुल पीछे कर दिया जाए ये चिंतन की बुनियाद नहीं थी ।
पर अब तो दिख रहा है की सबको खत्म कर दिया जाए और हम कुछ लोग सब पा जाये ,सब कुछ पर कब्ज़ा कर ले । ये चर्चा बंद कमरो में होती रणनीति बनाने को तो भी अलग था ,खुले आम एलान देकर चट्टी चौराहे और हर सार्वजानिक फोरम पर डुगडुगी पीट कर हो रही है ।
ये तब है जब आज जो पहले दबंग थे अब डरे रहते है ,जो पहले शासक थे अब शोषण के शिकार और याचक बने है और समाज की प्रकृति पूरी तरह उलट चुकी है ।
क्या हम जैसे लोग छले गए ? क्या हमने अपने पैरो पर खुद कुल्हाड़ी दे मारी ?क्या हम सिद्धांतो की आड़ में लोगो का हथियार बन गए सिद्धांतो के ही खिलाफ नहीं बल्कि मानव जाती और सम्पूर्ण समाज के खिलाफ ? बहुत से प्रश्न यक्षप्रश्न बन कर खड़े है ।
और इस सच्चाई से भी नकारने और सिर्फ जाती के नाम पर बाकि सबसे घृणा करने की आत्मघाती कोशिश नहीं करनी चाहिए की समानता और वंचितो के लिए लड़ने वाले सभी महापुरुष अगड़े और सुविधा सम्पन्न लोग थे ,पुराने इतिहास में देखे या नए में महात्मा गांधी से लेकर डॉ लोहिया,जयप्रकाश ,आचार्य नरेन्द्र देव राजनारायण मधु लिमये सहित सैकड़ो लोग ।इन लोगों ने समाज में चेतना फ़ैलाने के लिए और वंचितो को जगाने के लिए अपने को दाव पर लगा दिया ।
इस देश में राजनारायण जी पहले व्यक्ति थे जिन्होंने जोतने वालो को खुद अपने खेत दे दिया और वही पहले थे जो हजारो दलितों को लेकर काशी विश्वनाथ मंदिर में घुसे और उसके से संघियो ,पंडो और पुलिस ने उन्हें मिल कर पीटा था पर वो रुके नहीं और जिंदगी के अंतिम दिन तक लड़ते रहे सिद्धान्तों के लिए । पर आज उनको साल में एक माला और उनके लोगो को गाली तथा उपेक्षा ।उनके लोगो को ठोकर मारी जा रही है और उनसे घृणा करते हुए खत्म किया जा रहां है तो मानव स्वाभाव का चिंतन का भाव और आत्मरक्षा तथा स्वाभिमान की रक्षा के प्रति चैतन्य हो जाना स्वभाविक ही है और आत्मरक्षा तथा आत्मसम्मान की रक्षा का अधिकार तो सनातन काल से दिया गया है ।
खैर भारतीय समाज की बड़ी विशेषता है की जब भी किसी ने भी समाज का संतुलन बिगाड़ा और अपनी मर्यादाये पार किया या तानाशाही और अहंकार पूर्ण व्यवहार शुरू किया इस सम्पूर्ण समाज ने उसे सबक देने और किनारे लगाने का काम किया ।ये कल भी हुआ था ,ये आज भी होगा और कल भी होता रहेगा ।
शायद कुछ लोग खुले आम गालिया देना और घृणा करना बंद करे ,शायद कुछ लोग सार्वजानिक तौर पर जातिगत जेहाद छेड़ना बंद करे इस उम्मीद के साथ ।
या फिर मुझे भी खुलेआम गाली दें जो वो कर ही रहे है सबके साथ ।
(आज के दर्द और चिंता तथा चिंतन से )
देश में बहुत से धर्मस्थल अगल बगल बने है है |
दुनिया का किसी भी धर्म का कोई सिद्ध या हिन्दुओ का कोई ठेकेदार मुझे कभी दिखा दे की किसी एक धर्मस्थल की किसी आवाज ,अजान ,कीर्तन ,गुरुवाणी ,या घंटे घड़ियाल से दूसरे धर्मस्थल की अगर कोई ईंट जरा भी हिलती हो तो मैं उसका गुलाम हो जाऊंगा |
अगर इन अलग अलग नाम से पुकारे जाने वाले भगवानो को आपस में कोई दिक्कत नहीं है तो फिर तुच्छ इंसानों को क्या दिक्कत है ??
सवाल अपने अपने धंधे का है केवल |
सच्चा इंसान ही सच्चा हिन्दू ,सच्चा मुसलमान ,सच्चा ईसाई ,जैन ,बौद्ध या सिख हो सकता है और इनमे से कोई भी कभी भी आपस में धर्म के नाम पर दुश्मन नहीं हो सकता और न एक दूसरे पर हमला कर सकता है | सारी लडाई नकली लोगो के बीच है जो धर्म को न तो जानते है और न ही असलियत में मानते है |
आपने बहुत से अहंकारियो को आसमानों में उड़ते और धूल में मिटते और खत्म होते देखा होगा ।
और 
आप जमीन पर अपने पैरों पर संघर्ष करते हुए मुस्कराते खड़े है या चल रहे है धीरे धीरे ।
पर 
अगर बडी महत्वकांक्षा नहीं है तो चैन से होंगे ।
बहुतो को दरवाजे की तरफ देखते हुए डींग मारते देखा होगा ,बहुतो को फ़टे कालीन पर शेर मारने की डींग हांकते और इतिहास में अहंकार को संतुष्ट करते देखा होगा ।
कुछ ऐसे ही और सही ।
आप खुश रहो और जमीन से आसमान को चुनौती देने की तैयारी करो अपनों जैसो के साथ ।
आज के चिन्तन से ।