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सोमवार, 13 अगस्त 2018

मैं हिन्दुस्तान हूँ ,१४ / १५ अगस्त १९४७ की रात को १२ बजे मैं आज ही पैदा हुआ था , बड़ी प्रसव पीड़ा के बीच , बहुत खून बहा था मेरे पैदा होने पर , चीख पुकार भी बहुत हुयी थी ,कितना बदकिस्मत पैदा हुआ मैं की डॉ ने गलती से मेरे दोनो  हाथ काट दिया और मैं पैदा होते ही अपाहिज हो गया ,मेरे सर पर भी चोट लगी और सर एक तरफ से टेढ़ा हो गया , आज तक मेरे सर में बहुत दर्द होता है , पर किसे चिंता थी मेरे अपाहिज  होने की या मेरी सर की चोट की और दर्द की बस मेरे बाबा के सिवाय जिसे मैं बापू कहता हूँ 
बापू ही तो थे की जब मैं चीख पुकार मची थी खून बह रहा था तो जब जब चीख निकली और खून बहा बापू सामने खड़े हो गए वाही तभी संबल बन कर , लोगो को जश्न की मची थी और बापू को इस बात की खून बंद हो और चीख हंसी में तब्दील हो पर जश्न मानाने वाले जश्न ही मनाते रहे और बापू बेचैन दौड़ते रहे अपने उद्देश्य में , मैं पैदा हुआ ही था और मेरी किसी से कोई अदावत नहीं थी पर पैदा होते ही मेरे ही अलग हुए हाथ से मेरे टेढ़े हुए सर को चोट लग गयी ,फिर बहुत चीखा मैं .सच्ची बहुत दर्द हुआ था 


गुरुवार, 21 जून 2018

तमाशो का देश

हिंदुस्तान क्या सचमुच तमाशे का देश है । लोगो से कहो की चलो बिजली पानी भुखमरी गरीबी नौकरी और हक़ के लिए लड़ें । कोई नहीं आता ।आपातकाल लगा लाखो बंद हो गए पर एक कुत्ता नहीं भूंका । 
तमाशे के लिए घंटो खड़े रहते है हजारो ।क्रिकेट मैच में देश भर में कर्फ्यू लग जाता है ।कई टीवी सीरियल में भी कर्फ्यू लगता रहा है । फ़िल्मी तमाशो को देखने को लोग सर फट जाये पर लाइन में लगे रहते है ।
कुछ लोग ये समझ गए है की इस देश में कोई गंभीर विमर्श पर बात मत करो , गंभीरता से कुछ मत करो बस तमाशे करो लोग भी खुश और हम भी खुश ।
कल भी होगा एक तमाशा और चुनाव से पहले एक सीमा पर भी होगा ।उसका खामियाजा गरीब उठाएगा तो उसके लिए दस लाख ,कुछ मालाये और फ़िल्मी डायलोग और देशभक्ति के फ़िल्मी गाने मौजूद है । 
हमने तो सुना था की भारत विश्व गुरु था । किस चीज का तमाशो का ??

योग का तमाशा

उपदेश है कि योग सेहत की चीज है ।
हा है । 
पंर हमारा विवाद दो मुद्दे पर है -
1- तमाशे पर 
2-सचमुच स्वास्थ्य की चिंता पंर क्योकि कही डॉक्टर नही है और है तो दवाई और उपकरण नही है 
ये सब भी है तो गरीब के पास पैसा नही है
और
आज भी गरीब और आदिवासी इलाकों में कुछ भी नही है ।

बुधवार, 20 जून 2018

अब देखते है की सलाहकार पकौड़ा बेचने वाला होता है या चाय बेचने वाला ?

बहुत विश्वास के साथ लाये गए भारत के आर्थिक सलाहकार भी बीच में ही विश्वास तोड़ कर चल दिए या फिर उनका ही विश्वास डगमगा गया ,जिन उद्देश्यों के लिए आये थे वे पता नहीं पूरे हुए या नहीं उनकी निगाहों में वो ही बता सकते है , बाकि बयांन तो बच बच कर ही ज़ारी होतेे है बचाते हुए आकाओ को ,
सवाल ये है की उन्होंने क्या किया इतने दिनों में और क्या छाप छोड़ी भारत के अर्थव्यवस्था पर ? क्या बदला उनके कार्यो से ? अगर कुछ नहीं ,कोई योगदान नहीं तो क्यों लाया गया था ?
मोदी जी ने भी क्या छांट छांट कर रखे लोग जिन्होंने ऐसी नोटबन्दी की कि आर्थव्यवस्था धराशायी हो गयी ,जी एस टी लागू किया तो व्यापारी आजतक कराह रहा है ,विदेश नीति ऐसी की लगता है पिछले इतने सालो का सब किया गया कूड़ेदान में जा रहा है ,रक्षानीति ऐसी की हम रोज अपने जवानों की बस लाशे गिन रहे है और चेतावनी दे रहे है , शिक्षा ,स्वस्थ्य ,रोजगार इत्यादि के लिए तो कोई उम्मीद ही नहीं की जा सकती है इन अज्ञानियों से ,
अब देखते है की सलाहकार पकौड़ा बेचने वाला होता है या चाय बेचने वाला ? 
जिस देश और समाज मे भी बड़ी आबादी छोटी आबादी को या ताकतवर कमजोर को किसी भी रूप में जितना डराता हैं उतना ही उसे सिर्फ अपने से बहुत दूर ही नही कर देता है बल्कि असुरक्षा की भावना के कारण उसमे एकता , कट्टरता और अपराध भावना भी पैदा करता है ।
समझदारों के लिए आज के चिंतन से ।