Google+ Followers

सोमवार, 24 जुलाई 2017

आज की राजनीती में खासकर सत्ता को महाभारत का केवल शिखंडी आदर्श भा गया है 

जब चाहते है किसी भी चीज को शिखंडी बना आगे कर देते हैं 

रविवार, 23 जुलाई 2017

इंतजार करता हूँ किसी समापन का संघर्ष या जीवन में


काफी दिनों से कुछ नहीं लिखा न विचार और न  कविता | लगता है विचार ही सूखा गए है या कलम की स्याही सूख गयी है या उँगलियाँ ही नहीं चलती अब की बोर्ड पर| कभी लिखा था की मन होता है की किताबे जला दूँ ,डिग्रियां और पुरष्कार जला दूँ ,कही उसी का असर तो नहीं ? या हालत ने बना दिया है मुझे ऐसा | संघर्ष तो किया है पूरी जिंदगी पर अब शायद जिदगी ही संघर्ष हो गयी है इसलिए जब तक संघर्ष करता रहा तब तक तो कलम दौड़ती रही पन्नो पर लेकिन जिन्दगी ही जब संघर्ष बन जाये तो क्या और कैसे दौड़े ,न दिमाग ही चलता हिया और न दिल ही हिलोरे लेता है न दुःख की ,न सुख की ,न चाहत की ,न संकल्प की न संबल की न संभावनाओ की और जब दिल ही मौन हो गया हो इस कदर तो भाव आये भी तो कहा से और कलम हो या कीबोर्ड चले भी तो कैसे |
पता नहीं कब जिन्दगी भवर से निकलेगी और संघर्ष अंतिम विराम लगाएगा जिंदगी में या जिन्दगी को | राजनीती तो मेरे खून के कतरे कतरे में थी पर वो भी सन्यास ले गयी है लगता है |
तो अभी वरम ही देता हूँ
और इंतजार करता हूँ किसी समापन का संघर्ष या जीवन में | 

मंगलवार, 4 जुलाई 2017

असंम में फिर बढ़ से तबाही

असंम में फिर बढ़ और लाखो लोग परेशानी में | हर वर्ष ही करेब करीब देश का बड़ा हिस्सा बाढ़ की चपेट में आता है वो चाहे बंगला देश की नदियों के कारन हो या अपने देश की नदियों के कारन ,वो भरी बारिश के कारन हो या बांधो के पानी छोड़ने के कारन पर तबाह तो हर साल vaइ लोग होते हैं |
कितने करोड़ लोग कुछ फिन बेघर हो जाते है तो कितने बंधो ,ऊचैयियो और सड़को पर प्लास्टिक के टेंट लगाकर कर तब तक की जिंदगी गिअरते है जब तक बाढ़ ख़त्म नहीं हो जाती है | बढ़ के बाढ़ यही लोग महामारियो और बीमारियों के शिकस होते है |
कभी कोइं जाकर तो देखे की कितनी मुश्किल और तबाह जिंदगी जीती है देश की ही बड़ी आबादी और इसमें बड़ी संख्या हिन्दू की ही होती है | ये अलग बात है की बाढ ही,आगजनी हो या कोई और आपदा मरता तो देश का गरीब ही है और ये आपदाए जाति और धर्म देख कर भी नही आती पर जाती और धर्म के गौरव का एहसास कर जबी वोट मिल जाता हो और पांच साल की सरकार बन जाती हो तो उनकी समस्याओ और जिंदगी के लिये कुछ करने की जरूरत भी क्या है |
आज़ादी के इतने साल बाद भी हम इन आपदाओ से अपनी जा नता को बचाने का रास्ता नहीं तलाश कर सके है | हमें फुर्सत ही नहीं है बड़े शहरो को और संवारने से और बड़ो को बनाने तथा बचने और बढाने से |
वक्त बहुत ध्यान से देख रहा है की ये उंच नीच की खाई ,उनसे ये दोहरा व्यवहार ,सत्तावो का ये दोहरा चरित्र ,कब तक चलेगा और देश सम्पूर्ण रूप से करवट कब लेगा जब उंच नीच की खाई कुछ कम हो सके और न्याय तथा सत्ता और सम्पत्ति तथा संसधानो बटवारा समानता से होगा |
फिलहाल तो मैं उन करोडो के प्रति संवेदना उअर दुःख ही व्यक्त कर सकता हूँ |
जय हिन्द |

मंगलवार, 27 जून 2017

कल अपने मित्र प्रोफ डॉ आर सी मिश्र नयूरो सर्जन जिन्हें मैं अपने क्षेत्र का जीनियस मानता हूँ से काफी दिन बाद मिलने गया | बहुत व्यस्त रहते है वर्ना तय तो ये था की वो मेरे घर आयेंगे और कुछ लम्बी चर्चा होगी बिना बाधा के |
पर उनकी मजबूरी है की उनका असमय उनका रहा ही नहीं | अच्छा भी रहा बहुत कुछ ज्ञान मिला और कभी मन में पीड़ा आ जाती है कई तरह की तो मैं लोगो से कहता रहां हूँ की कुछ देर किसी खतरनाक बीमारी के अस्पताल में बैठ जाओ और लोगो को देखो शायद अपनी पीड़ा बहुत छोटी लगने लगेगी |
यही मेरे साथ हुआ उन दो घंटो में जब तक वो मरीज देखते रहे और मैं तरह की मर्ज और पीडाएं देखता रहा |
और
सोचता रहा की इश्वर ने खुद मनुष्य को बनाया है अपनी कारीगरी से और पैदा किया है माँ पिता को माध्यम बना कर फिर सही सलामत क्यों नहीं पैदा किया है इतनी बीमारियाँ क्यों दे दिया है इन्सान को |
या तो पैदा ही मत करो इश्वर या फिर पूर्ण स्वस्थ ,पूर्ण सुखी ,सिर्फ अच्छाइयों के साथ सब पापा और बुराइयों से दूर क्यों अनहि रखते सभी इंसानों को ? क्यों दे दिए इतनी तरह के कष्ट की कष्ट भी शायद जार जार रो पड़ता होगा देख कर |
मुझे तो कुछ ऐसा ही लगा |
और मुझे अपनी दिक्कते बहुत छोटी लगने लगी फिर कुछ समय उनके साथ चाय पर अकेले थोड़ी सी अन्य चीजो पर चर्चा हुयी |
उनकी दी गयी जानकारियां और मेरी जानकारियां तथा वर्षो से बनी मेरी धरना बिलकुल विपरीत थी |
मुझे लगता है उसके लिए उनके साथ कुछ अधिक समय बैठने की जरूरत है |
क्योकि जरूरी नहीं की जो हम जानते है वही सत्य हो और वो नहीं सत्य कुछ और है तो स्वीकार कर लेने में बुराई भी क्या है |
देखते है क्या निकलता है और क्या होता है |
पर एक सच्चाई जरूर बता दूँ की उनकी कही काफी बाते सत्य साबित हुयी है पूर्व में |
ना ना ज्योतिष नहीं ज्ञान ,अनुभव और हजारो लोगो से मिलकर प्राप्त जानकारियों के कारण और इसके लिए उन्हें सलाम |

शुक्रवार, 19 मई 2017

गुरुवार, 11 मई 2017

अर्थ का अनर्थ

भाषा कितनी ताकतवर होती है और कैसे कोई एक शब्द अर्थ का अनर्थ कर देता है ।
ये समझने के लिए एक बहुत छोटी सी कहानी -
एक आदमी कही जा रहा था और रात देर हो गयी और रास्ता भी भटक गया तो सोचा को रास्ते मे पड़ने वाले गाँव मे किसी के यहाँ शरण ले लेगा और सुबह रास्ता पूछ कर निकाल जाएगा ।
एक गांव आया । उसने कुंडी खटखटाया । दरवाजा खुला तो अजनबी को देख हैरान घर वाले ने उसकी तरफ उत्सुकता से देखा और कुंडी खटखटाने का कारण पूछा
यात्री बोला कि देर हो गयी है और वो रास्ता भटक गया है । रात में शरण मिल जाये तो वो आभारी होगा और रात गुजार कर सुबह होने पर निकल जाएगा ।
घर के मालिक ने जवाब दिया कि
ये बहू बेटियो का घर है इसलिए आगे कोई घर देख ले ।
वो यात्री जो भी दरवाज़ा खटखटाता यही जवाब मिलता कि बहु बेटियो का घर है आगे देखो लो ।
गांव के अंतिम घर पर पहुच , दरवाज़ा खुला और घर का मालिक बाहर आया तो उसने दरवाज़ा खुलते ही घर के मालिक से पूछा -
आप के घर मे बहू बेटियां है क्या ?
घर के मालिक ने घूर कर उसे देखा और कहा , हा है क्यो पूछ रहे हो ।
यात्री बोला - रात गुजारनी है ।
अब समझ सकते है कि यात्री के साथ क्या हुआ होगा ।
शब्द इधर के उधर होते ही कितना अर्थ का अनर्थ कर देते है ।
इसलिए शब्दो से खेलना आता हो तभी खेलना चाहिए ।

मंगलवार, 9 मई 2017

क्या कोई राजनीतिक दल देश के किसी नागरिक को अपना सदस्य बनने से रोक सकता है ?
क्या सदस्यता की किताब देने से इंकार किया जा सकता है ?
सदस्यता देश का नागरिक का अधिकार है
या राजनीतिक दल की इच्छा और पसंद ?
मैं पूरी ताकत से मशीन द्वारा हराए जाने के आरोप से इनकार करता हूँ |
ये जनता के फैसले का और लोकतंत्र में वोट के अधिकार का अपमान है |
हमें पहले ही ये परिणाम दिख रहे थे
चमचो ठेकेदारों और दलालो को नहीं दिख रहे होंगे और घेर उन्होंने ही रखा था तो सच्चाई कहा से दिखती |
गलतियाँ सुधारो ,आत्मचिंतन और लोगो से चर्चा करिए
और भविष्य की तयारी करिए |
हलकी और और भौडी बाते कभी भी मददगार नहीं होंगी |
क्या #विकास और उससे जुड़े #सभी #विभाग और #मन्त्रालय एक नही हो जाने चाहिए अगर फाइल घूमने से बचाना है और जवाबदेही तय करनी है ।
और ऐसे ही अन्य विभाग भी ।
नाम हो #इंफ्रास्ट्रक्चर #डेवलपमेंट #विभाग और मंत्रालय जिसमें जुड़े हुए सभी विभाग हो ।
चाहे विभाग के अंदर अलग अलग चीज का इंचार्ज अलग अलग हो एक मंत्री और एक विभागाध्यक्ष के अंदर ।
मेरी बात मान कर चमत्कार देखिये ।
@मोदीजी @योगीजी ।

मंगलवार, 11 अप्रैल 2017

बहुत चिंतित हूँ कि क्या होगा भारत के लोकतंत्र का । जिस विचारधारा का भारत की आज़ादी की लड़ाई से कोई सम्बंध नहीं , जिनकी लोकतंत्र ,इंसान की आज़ादी और संविधान में आस्था नहीं वो जुमलों और अफ़वाह के दम पर लगातार मज़बूत होते जा रहे है और दूसरी तरफ़ अन्य राजनीतिक ताकते या तो व्यक्तिगत का शिकार हो या परिवार वाद का शिकार हो और नितांत निजी स्वार्थों में लिप्त हो सीमित दायरों  में क़ैद होती जा रही है या सीमित सोच में क़ैद है या अपने इन्हीं कारणों से अयोग्यता ,अदूरदर्शिता और अल्पज्ञानता  के बोझ तले दम तोड़ रही है और भविष्य का न तो चिंतन है उनके पास न ही वैकल्पिक संघर्ष का माद्दा ही ।
राष्ट्रीय आंदोलन से निकली कांग्रेस भी पहले ही अहंकार तले छिननभिन्न होती दिख रही  है और लगातार उसके स्तम्भ गिरते जा रहे है । जबरन अयोग्य नेतृत्व को थोपने की कोशिश और नितांत असुरक्षित लोगों का उसी को सुरक्षा कवच की तरह प्रयोग आत्मघाती बनता जा रहा है । दशकों से कांग्रेसी रहे लोग उसे छोड़ते जा रहे है और उन्हें सत्ता में बैठे  लोग लोग तो लपक ले रहे है पर कांग्रेस को कोई चिंता नहीं । कश्मीर से कन्यकुमारी तक , बंगाल से लेकर पंजाब तक और सुदूर पूर्व से लेकर गुजरात तक मजबूर मजबूर कांग्रेसियों को भगाया गया है कंफ्यूसिया कांग्रेसियों द्वारा ।
ऐसा लगता है की शतरंज के खिलाड़ी की कहानी दोहरायी जा रही है कांग्रेस में भी और बाक़ी कुछ अन्य वैसे ही नेताओं के यहाँ जिनकी आत्मप्रशंसा और सनक देश के प्रति कर्तव्यों पर भारी पड़ रही है ।
कुछ दिन पहले ही कर्नाटक के पूर्व मुख्यमंत्री ने कांग्रेस छोड़ और आज पता चला की गिरधर गोमांग भी सत्ता दल में है तो मैं हिल गया । कुछ और नामो के बारे में सुन रहा हूँ ।
पूर्व में ममता बनर्जी हो या मुफ़्ती मोहम्मद सईद या शरद पवार पूरे देश में अनगिनत लोगों को कांग्रेस ने खोया जो ख़ुद को साबित कर बड़े नेता सिद्ध हुए और उनके प्रदेश में उन्हें भगाने वाले बौने साबित हुए ।
पर लगता है की किसी आत्मचिंतन की ज़रूरत हीं नहीं समझती है कांग्रेस और आज़ादी के लिए तथा उसके बाद देश के लिए क़ुरबानी देने वाले अब देश ,लोकतंत्र , संविधान और आज़ादी की क़ुरबानी करने पर उतारू है ।
यही हालत अन्य नौजवान नेताओं की भी दिख रही है जो देश के पैमाने पर खड़े हो सकते थे ख़ुद भी और खड़ा कर सकते थे विकल्प भी लेकिन अयोग्यता या हीन भावना और प्रारम्भ में ही बुराइयों का शिकार होकर एक अंधेरे रास्ते पर चल पड़े है ।
समझ नहीं आता क्या होगा मेरे देश का ? क्या इसी सब को देखने के लिए लाखों लोगों ने क़ुरबानी दिया था ?
मन बेचैन है । क्या कोई बदलाव आएगा ? क्या कोई रास्ता निकलेगा ? क्या कोई विकल्प बनेगा ? 

सोमवार, 10 अप्रैल 2017

आज फिर पाकिस्तान ने एक भारतीय नौजवान की जान लेने की तैयारी कर ली ।
कुलभूषण जाधव नेवी का पूर्व अधिकारी था । पाकिस्तान ने सीमा से उसे पकड़ लिया ।
भारत के दूतावास को न उससे मिलने दिया और न उसे वक़ील करने दिया और फाँसी की सज़ा सुना दिया जिसपर आज वहाँ के सेनाध्यक्ष ने हस्ताक्षर कर दिया ।
इसकी कोई अपील वहाँ के किसी कोर्ट में नहीं है ।
एक जवान को पाकिस्तान फाँसी पर चढ़ा देगा और हमारी सरकार मौन है ।
प्रधानमंत्री और सभी कूटनीति के लोगों को कुछ भी कर के जाधव को वापस लाना चाहिए ।

बुधवार, 5 अप्रैल 2017

आखिर आतंकवादी कब हो गया मुसलमान

मुसलमान हमारा कवी और शायर था , मुसलमान भक्तिकाल का गायक था ,मुसलमान कबीर भी और नजीर भी , मुसलमान सेनापति और जर्नल था , मुसलमान आज़ादी की लड़ाई का सिपाही और सेनापति था , मुसलमान कभी बहादुर शाह जफर , कभी जर्नल शाहनवाज था , मुसलमान अशफाक तो  ब्रिगेडियर उस्मान था तो अब्दुल हमीद और हनीफ था , मुसलमान मुहम्मद रफ़ी तो दिलीप कुमार ,सलमान तो आमिर , मुसलमान गांव में एक होकर भी गांव की जरूरत था , मुसलमान हमारे लिए बनारस में साड़ी तो फ़िरोज़ाबाद में चूड़ी बनाता था , मुसलमान कभी जाकिर हुसैन और अबुल कलाम आज़ाद था तो डॉ कलाम भी , मुसलमान हमारी गाड़ी बनाता भी है और चलाता भी । दिन भर मेहनत से जूझता और मुल्क की तरक्की और अपनी जरूरत के लिए लड़ता मुसलमान , पंचर जोड़ता तो मिस्त्री और फिटर मुसलमान , कही बिरयानी कही कवाब तो कही मुगलाई बना कर खिलाता मुसलमान । गलत काम करने वाले बेटे की लाश ठुकराता मुसलमान ।
आखिर आतंकवादी कब हो गया ? और
सारे 15 करोड़ हो गए क्या ?

बुधवार, 22 फ़रवरी 2017

माँ ऐसी होती है ।

एक लघु कथा --
माँ ऐसी इसको कहते है ।---

वो पुराना घर
कहते थे की किसी राजा के कारिंदों कथा
कुछ लोग बताते थे की राजा के घोड़े बांधते थे
पर अब तो कुछ लोग रह रहे थे वहां
और
ऐसा घर पाना भी कितनी बडी सुविधा थी ।
बारिश कितनी बड़ी सजा था उस माँ के लिए और बच्चो के लिए
पिता तो सो जाता था
पर माँ कैसे भीग जाने देती अपने छोटे छोटे बच्चो को ।
पहले मच्छरदानी लगाया
फिर उस पर कुछ प्लास्टिक बिछाया
फिर भी बात नही बनी तो बच्चो को उस कोने में लिटाया जहा पानी नही आ रहा था और
पानी वाली जगह कही बाल्टी रखा और कही टब ।
पूरी रात जी पूरी पूरी रात
वो बैठी रहती थी बर्तन बदल बदल कर पानी फेंकने को कि एकमात्र बिस्तर भीग न जाये ।
कितनी राते नहीं सोती थी वो माँ अपने बच्चो के लिए औरअपने परिवार के लिए
पूरे दिन काम भी पूरा करती थी बिना चेहरे पर शिकन लिए
अभी कल की ही तो बात है
बेटी पैदा होने वाली थी । पैसे नहीं थी तो सरकारी अस्पताल के जर्नल वार्ड में कुछ अपनों के कारण इंतजाम हो गया था
और डॉ चार दिन कम से कम रोकते है और कुछ दिन आराम करने तथा शरीर के सामान्य हो जाने को समय देने को बोलते है पर गरीबी और घर की मजबूरी के कारण वो एक दिन में ही घर आ गयी थी और लग गई थी घर के हर काम में ।
मैं उस माँ को जानता था ।
हां मेरे आसपास ही थी वो माँ लेकिन कोई मदद नहीं कर पाता था मैं
और
आज भी वो उसके हालात को न बदल पाने और उसकी मदद न कर पाने का गुनाह मुझे डराता है और शर्मिंदा करता हूं ।
पर उसके बारे में ये लघु कथा लिख कर उसे श्रधांजलि तो दे ही सकता हूँ और लोगो को बता ही सकता हूँ कि
माँ ऐसी होती है ।

बड़े भाई
हां छोटे भाई
ये क्या कर रहे हो ? काम की बाते और विकास की बाते ?
क्या छोटे क्या ये ठीक नहीं
अरे क्या गजब कर रहे हो लोग गाँव घर के बाहर और अन्दर झांक कर देख रहे है और पिचले चुनाव के वादों को भी याद कर रहे है | हम दोनों कही के नहीं रहेंगे | क्या जवाब देंगे ?
तब क्या करें भाई ?
ये फालतू की बातें छोड़ो और कुछ और सोचो जिससे लोग गाँव और पड़ोस की सड़क ,नाली ,पानी ,सफाई ,नौकरी ,महंगाई ,देश के जवानों की हत्या १५ लाख ,काला  धन , नोट्बंदी सब भूल जाये | न आप का कुछ याद रहे और न मेरा |
बही तुमने तो चिंता में डाल दिया | ये तो जनता हम दोनों को सबक सिखा देगी और कोई विकल्प ढूढ़ लेगी |
कही ऐसा न हो की बिना पैसा खर्च करने वाले निर्दलीय इम्नादार लोगो को वोट देना सीखा जाये और हम लोगो की राजशाही ख़त्म हो जाये |
हां भाई बहुत बुरा हो जायेगा |
फिर
फिर क्या
वही पुँराना शुरू करते है | जातियों में जाती और गोत्र के गौरव का भाव जगाते है |
धर्म को धर्म का डर दिखाते है | धर्मस्थलो का सवाल उठाते है | धर्म की घृणा बांटते है |
हो गया काम
लेकिन ये हथकंडे तो जनता जानती है ,कही नहीं फंसी जाल में तो फेल हो जायेगा फार्मूला
तो नया शुरू करते है
कुछ नए शब्दों निकालते है की मजबूरी हो जाये लोग उसी के इर्द गिर्द चर्चा करने को |
अच्छा क्या ?
गदहा
आतंकवादी
चोर
गुंडा
जितनी गन्दी से गन्दी बात हो सके नहीं तो भद्दी भद्दी गलिया देने लगेंगे हम दोनों जोर जोर से दोनों एक दूसरे को
और इतना शोर करेंगे और करते ही रहेंगे की जनता बस तमाशबीन हो जाये
बस
इसी में वोट का टाइम निकल जायेगा
अच्छे लोग भी इस शोर में खो जायेंगे
और हम लोगो को गलियों की पसंद और नापसंद में एक बार और जनता को लामबंद करने में कामयाब हो जायेंगे ,
हम दोनों में से ही कोई जीतेगा |
हाथ मिलाओ
हां हां हां हां हां हां हां
जनता क्या हमसे ज्यादा दिमाग रखती है
जनता कही की
अरे पूरा पांच साल बचा है ,अपराध ,नाली ,पानी सड़क ,बिजली रोजगार विकास की चर्चा के लिए ,देश की सुरक्षा ,जवानों की हत्या ,आतंकवाद ,काला धन ,नोट ,रोजगार इत्यादि
कम से कम चुनाव में तो ये बाते जनता को भूल ही जाना चाहिए
बड़े बतमीज है ये जनता के लोग की एक डेढ़ महीना ये सब भूल कर केवल हम लोगो के जुमलो और झटको को सुनना चाहिए
चुनाव ख़त्म हो जाये तो फिर अपनी बैठक और चाय की दुकान और काफी हाउस में बैठ कर ,चौपाल पर खूब चर्चा करना इन  मुद्दों की और हमें खूब गालियाँ दे देना ,
वहा सुन ही कौन रहा है | तुम ही बोल रहे हो और तुम ही सुन रहे हो
सा ;;; चुनाव में याद करने लगते है | ये भी कोई तरीका है
जहा सी तमीज नहीं है इन कीड़ो मकोडो में
जाने दो भाई नाराज मत हो | अभी तो गधो को बाप बनाने का वक्त है \
एक महीना बना लो फिर इन गधो पर राज करो
अच्छा पैग बनाओ
इस नए झकास आइडिया पर ; चियर्स .
किसी ने हमें मिलते देखा तो नहीं
या बात करते सुना तो नहीं
तो तय रहा
यहाँ से निकलते ही एक दूसरे को गन्दी से गन्दी गलिया देनी है ,बिना संकोच ,बिना लिहाज
हां हां हां हां हां हा
लोकतंत्र की जय .भीडतंत्र जिंदाबाद |
इति कथा सम्पन्नम |