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गुरुवार, 11 अगस्त 2016

यदि वक्त हो तो पढ़िए ---

कृष्ण को फिर से आना ही होगा|                                                                                                                                                           आज कृष्ण को फिर से आना ही होगा| अब कब आयेंगे कृष्ण ?.वो कब मानेंगे की पाप का घड़ा भर गया ?कब मानेंगे की समाज व्यवस्था को गालियों  की संख्या सौ नही करोडो से ज्यादा हो चुकी है ?कब मानेंगे की एक द्रोपदी नही बल्कि रोज कही ना कही हजारो द्रोपदियों का चीरहरण हो रहा  है ?अब कब मानेंगे की चारो तरफ केवल पाँच  भाइयों का नही बल्कि करोडो  का अधिकार छीना जा रहा है ?केवल एक अभिमन्यू नही करोडो अभिमन्यू घेर कर धोखे से मारे जा रहे है |कब मानोगे कृष्ण की जमुना का पानी फिर जहरीला  हो गया है |तुम्हारे लोग उतने आजाद नही रहे की कही भी कुञ्ज गलियों में या उन खेतो और बागो में जब चाहे भ्रमण कर सके ,उन पेड़ो पर या उसके नीचे वैसे ही जा सके जैसें तुम्हारे साथ जाते थे  |तुम्हारी प्यारी नदी जिसके जहरीली हो जाने पर तुमने काली नाग का बध किया था ,वह और ज्यादा  जहरीली हो गयी है ,आदमी क्या पशु भी उसका पानी नही पी सकते है |तुम्हारा प्यारा दूध और मक्खन,उसमे भी लोग जहर मिलाने  लगे है |तुम तों सर्वज्ञ  हो तब तों निश्चित ही तुम्हे यह सब पता ही होगा |फिर भी संकट में घिरी द्रौपदी की तरह ही मै तुम्हे आवाज लगा रहा हूँ की अब तों आओ ना कृष्ण  |तुम सब जानते हो फिर भी आर्द्र स्वर पुकारेगा तों कुछ तों कहेगा ना ,कुछ तों शिकायत करेगा ना ,कुछ तों बताएगा ना और कुछ तों रूठेगा ना |कब आ रहे हो कृष्ण ?क्या तुम देख रहे हो उन लाखो लोगो को जो किसी भी उम्र के है ,पर तुम्हे बुलाने के लिए मीलो लम्बी परिक्रमा करते है ,कभी गोवर्धन की तों कभी वृन्दाबन और कभी बरसाने की |कुछ लोग तों पूरे ब्रज की परिक्रमा कर डालते है |ऐसे भी तों है लाखो जो तुम्हे बुलाने को जमीन पे लेटे लेटे ही पूरी परिक्रमा कर डालते है मीलो की |जो चलते है छाले तों उन सबके पैरो में भी पड़ते है ,पर कभी सोचा की वह छोटा सा बच्चा ,वह कमजोर या भारी  भरकम औरत या आदमी जो ठीक से चल भी नही पाते है ,जब जब वे लेटे लेटे ही पलटी मारते हुए तुम्हे बुलाने के लिए यह मीलो लम्बी परिक्रमा करते है तों उनका बदन कितना छिलता है और कितना दुखता है ?तुमने ही तों उस महाभारत के  मैदान में अपना विराट स्वरुप दिखया था और कही दूर आती हुई तुम्हारी आवाज ने कहा था की दुनिया में जो भी है  वह तुम हो या वह सब तुममे  ही समाहित है |सब तुम ही कर रहे हो |सब तुम ही हो तों जब इन सबके शरीर घायल होते है तों तुम भी तों घायल होते होगे |वह सारा दर्द तुम भी तों महसूस करते होगे फिर भी ???और कृष्ण  जब सब तुम्ही हो और तुम्ही करते हो तों तों यह बिलकुल अबोध बच्चो का अपहरण ,हत्या ?द्रौपदियो का केवल चीरहरण ही नही बल्कि बलात्कार ?ये सारी मिलावट ,जमाखोरी ,अन्याय ,जुल्म ,शोषण ,गैर बराबरी क्या यह सब तुम्ही करते हो ?नही तों तुम्हे अब  इन सब कृत्यों पर  क्रोध नही आता ?क्या तुम्हारा न्याय का संकल्प कुछ कमजोर हुआ है या तुमने उस युग में इतनी मेहनत कर दी की इस कलयुग में लम्बे विश्राम का फैसला कर रखा है |जरा एक बार देखो तों अपने ही विराट स्वरुप के इन हिस्सों को भी | अगर कही ऊपर रहते हो तों एक बार झांक कर देखो अगर नीचे रहते हो तों उठ कर देखो और अगर हर जगह रहते हो तों जाग कर देखो आँखें खोल कर देखो तुम्हारा भारत बिना तुम्हारे चाहे और रचे ही महाभारत में तब्दील हो चुका है |देखो हर घर  में महाभारत ,हर गाँव में महाभारत ,हर जाति  और धर्म में महाभारत |पहले एक महाभारत हुई था तों सब ख़त्म  हो गया था और युधिस्ठिर रोये थे की ऐसा राज्य लेकर क्या करूंगा ,तुम भी जरूर अन्दर अन्दर बहुत रोये होगे ,क्योकि चारो तरफ कटे फटे ,टुकड़े टुकड़े मरे और घायल तुम्ही तों पड़े थे |पर अब तुम्हारे भारत में चारो तरफ महाभारत हो रही है ,की चाहे कितने भी मर जाये पर राज हमारा हो ,चाहे कितने  भी मर जाये नकली दवाई  से लेकर तमाम तरह की चीजे खा  पी कर पर सारी दौलत हमारी हो |कितना बदल गया ना तुम्हारा भारत कृष्ण ?क्या तुम आओगे या आज के कंसो  ,आज के दुर्योधनो से तुम  भी डरने लगे हो ?कुछ तों बोलो कृष्ण !तुमने कहा था की मनुष्य केवल चोला बदलता रहता है और बदल कर फिर पृथ्वी पर जन्म लेता है |देखो जरा गौर से देखो कही तुम्हारी सबसे ज्यादा प्रिय राधा भी तों कही किसी रूप जन्म लेकर किसी मुसीबत में तों नही है ,कही उसके साथ कुछ बुरा तों नही हो रहा है |तुम्हारी जोगन मीरा ,तुम्हारा दोस्त जिसे उस युग में तुमने सब दे दिया था ,इस युग में किस हालत में है |देखो वह द्रोणाचार्य ,कृपाचार्य अपनी भूमिकाये बदल तों नही चुके |अर्जुन रक्षा के स्थान पर कुछ और तों नही कर रहे ?भीम की ताकत कही लोगो की मुसीबत तों नही बन गयी है ?उस युग में जूए में सब हर जाने वाले राजपाट और पत्नी तक वो युधिस्ठिर कही तुम्हारे भारत की पीठ में छुरा तों नही घोंप रहे है ?तुम्हे तों सब याद होगा कृष्ण क्योकि जब सब तुम्ही से आते है और सब तुम्ही में विलीन हो जाते है तों तुम तों हर समय सबको देखते ही रहते होगे कृष्ण ?कुछ तों बोलो कृष्ण ,एक बार फिर वही विराट स्वरुप  दिखाओ और बताओ की अब क्या होने वाला है ?ये सब जो हो रहा है ,इसका क्या मतलब है ?व्याख्या  तों करो कृष्ण !तुम्हारा गीता का उपदेश बहुत पुराना पड़ चुका है |वह अब भारत को दिशा नही दिखा पा रहा है कृष्ण |देखो सभी तुम्हारे तुमसे रूठ जायेंगे और तुम भी कैसे हो गए हो ?उस समय तों छोटी छोटी बातो पर प्रकट हो जाते थे कही भी ,किसी की भी मदद करने को किसी को भी उबारने  को |तों अब क्या हो गया है? कोई नाराजगी है तों वह बताओ ना !देखो सब अधीर है तुम्हारे लिए की तुम कब आओगे ,कब उबारोगे भारत को इन ना ख़त्म होने वाली महाभारतो से |तब तों एक दो मौको पर ही झूठ और छल का सहारा लिया गया था ,अब तों केवल झूठ और छल से ही सब हो रहा है |ऐसा लगता है कि तुम्हारे   बारे में  नई दृष्टि से देखने तथा नए ढंग  से सोचने की जरूरत  है . क्योकि  कृष्ण तुम्हारा  मतलब तों था की  वो जो सदैव दूसरो का था ,दूसरो के लिए था .जिसकी जन्म देने वाली माँ पीछे छूट गयी  और पालने वाली बाजी मार  ले गई  ,जिसके दोस्त की चर्चा कही बहुत ज्यादा हुई  और भाई पीछे छूट गया था ,जिसकी पत्नी या पत्नियों को उनकी दोस्त राधा  से बड़ी जलन हुई थी  और हो सकता है आज भी हो रही हो ,जो एक साथ सोलह हजार को अपना लेने की क्षमता  रखता था  ,जो सत्ता को चुनौती देने की क्षमता   रखता था  और जिसने उस युग में एक युद्ध छेड़ दिया था  की जो खा नही सकता उस भगवान को क्यों खिलाते हो ,शायद सूघ भी नही सकता ,इसलिए लाओ मै खा सकता  हूँ मुझे खिलाओ और उन सब को खिलाओ जिन्हें भूख लगती है .केवल चुनौती ही नही दिया था  वरन जब मुसीबत आई थी तों सभी की रक्षा में आगे आकर खड़ा हो गया था यह तुम्ही तों थे कृष्ण  | .मै सोचता हूँ की इन्द्र के प्रकोप से बचाने के लिए तुमने  कैसे अपनी छोटी सी उंगली पर इतना बड़ा पहाड़ उठाया होगा ,तुम्हारी  उंगली दुखी तों जरूर होगी और शायद आज भी दुख रही है कही इसोलिये तों नही तुम नही  आ रहे हो की उंगली पर पट्टी बांध कर बैठे हो  .लेकिन ऐसा लगता है की  उस पहाड़ के उठाने से ज्यादा तुम्हारे  नाम पर किये जा रहे पापो के बोझ से तुम्हारा  सर और पूरा शरीर दुख रहा है .कितना पैदल  चले थे तुम  कृष्ण ,नाप दिया पूरब से पश्छिम तक भारत को ओर दो छोरो को जोड़ दिया ,परिचय करा दिया इतने बड़े हिस्से का एक दूसरे से.कभी सोचता हूँ की यदि जूआ नही होता रहा होता तों क्या होता ,यदि द्रौपदी की साड़ी  भरी सभा में नही खींची गई होती तों क्या होता ,इतिहास कौन सी करवट लेता.भारत ,महाभारत होता या फिर भी भारत में तब भी  महाभारत होता ,सवाल बड़ा है जवाब आसान नही है .लेकिन कृष्ण तुम  आज मंदिरों में  फूल मालाओ ,भारी भारी  कपड़ो और बड़े बड़े मुकुटों के नीचे दब कर कराह रहे हो ऐसा लगता है कभी कभी | .कृष्ण तुम्हारा मतलब ही था  बड़े दिल वाला ,दूसरो को अपनाने वाला ,हर अन्याय से संघर्ष करने वाला आज अपने अस्तित्व के लिए कही तुम्ही  जूझ रहे हो कृष्ण |तुम्हे इस  संघर्ष से निकलना ही होगा और आकर फिर से कहना ही  होगा ;रे दुर्योधन मै जाता हूँ ,तुझको संकल्प सुनाता हूँ ,याचना नही अब रण होगा .जीवन जय या की मरण होगा ;तुम्ही बताओ की   कैसे तुम्हारी  दुखती उंगली का दर्द घटे ,कैसे तुम्हारे  सर और शरीर का बोझ हटे और सम्पूर्ण कलाओं का मालिक कृष्ण ,संघर्ष और न्याय का प्रतीक कृष्ण स्वतंत्र होकर फिर हमारे  सामने हो |विराट स्वरुप दिखाता हुआ ,आज के सन्दर्भ में गीता का ज्ञान देता  हुआ ,और इस सभी  तरह की महाभारतों से निकाल कर फिर से भारत को भारत बनता हुआ |अब तों आ रहे हो ना कृष्ण ,कृष्ण तुम आओ ना ,देखो सुनो मीरा कही अब भी गा रही है  और मीरा क्या उसके स्वर में स्वर मिला कर सब गा रहे है :मेरे तों गिरधर गोपाल दूजो ना कोय :

गुरुवार, 7 जुलाई 2016

ये लिखना मजबूरी जो गया

आज बहुत मजबूर होकर ये उन लोगो के लिए लिख रहा हूँ और उन बड़ी संख्या में अति उत्साही लोगो के लिए लिख रहा हूँ जिन्होंने कोई संघर्ष और तकलीफ देखा ही नहीं ।समाज के उंच नीच को झेला ही नहीं और इस तरक्की तथा वैज्ञानिक युग में पैदा होने के नाते जिनसे अपेक्षा होती है की वो जातियो को तोड़ेंगे तथा जातियो की बात करने से भी घृणा करेंगे पर जो पिछली शताब्दियों से भी ज्यादा जहरीले जातिवादी होते दिख रहे है । ऐसा लग रहा है कि कट्टरवादी आतंकवादी मुसलमानो की तरह कोई कट्टरवादी जातिवादी जेहाद छेड़ा जा रहा हो ।

हम तो बचपन से लड़ रहे थे की वंचितो को न्याय मिले पर किसी के साथ अन्याय न हो । वंचित में सभी जाति और धर्म की महिलाओ को भी शामिल किया डॉ लोहिया ने और हम लोगो से नारा लगवाया : संसोपा ने बांधी गांठ ,पिछड़े मांगे सौ में साठ : और इस साठ में सम्पूर्ण स्त्री समाज को शामिल किया गया ।

हमने सीखा की घृणा नहीं करना है किसी से पर जो आगे बढ़ गए है उनसे कहा जाय की थोडा धीरे चलो, पर पूरी तरह रुक जाने और मृतप्राय हो जाने को नहीं कहा और जो पीछे छूट गए है उन्हें रफ़्तार दिया जाये और सम्भव समानता लायी जाए ,पर समानता उन समाजो और जातियो तथा धर्मो के अंदर भी लायी जाये ।
पड़ी खड़ी लकीर को पड़ी लकीर बनाना केवल अगड़ी और वंचित जातियो के लिए नहीं सोचा गया था बल्कि वंचितो में भी सभी को और वंचित जातियो में भी सभी को सामान भाव से अवसर मिले ये चिंतन था ।ऊच नीच की खायी को कम किया जाए ये चिंतन था ।

पर घृणा किया जाए और अन्य को खत्म किया जाए या बिलकुल पीछे कर दिया जाए ये चिंतन की बुनियाद नहीं थी ।
पर अब तो दिख रहा है की सबको खत्म कर दिया जाए और हम कुछ लोग सब पा जाये ,सब कुछ पर कब्ज़ा कर ले । ये चर्चा बंद कमरो में होती रणनीति बनाने को तो भी अलग था ,खुले आम एलान देकर चट्टी चौराहे और हर सार्वजानिक फोरम पर डुगडुगी पीट कर हो रही है ।

ये तब है जब आज जो पहले दबंग थे अब डरे रहते है ,जो पहले शासक थे अब शोषण के शिकार और याचक बने है और समाज की प्रकृति पूरी तरह उलट चुकी है ।

क्या हम जैसे लोग छले गए ? क्या हमने अपने पैरो पर खुद कुल्हाड़ी दे मारी ?क्या हम सिद्धांतो की आड़ में लोगो का हथियार बन गए सिद्धांतो के ही खिलाफ नहीं बल्कि मानव जाती और सम्पूर्ण समाज के खिलाफ ? बहुत से प्रश्न यक्षप्रश्न बन कर खड़े है ।

और इस सच्चाई से भी नकारने और सिर्फ जाती के नाम पर बाकि सबसे घृणा करने की आत्मघाती कोशिश नहीं करनी चाहिए की समानता और वंचितो के लिए लड़ने वाले सभी महापुरुष अगड़े और सुविधा सम्पन्न लोग थे ,पुराने इतिहास में देखे या नए में महात्मा गांधी से लेकर  डॉ लोहिया,जयप्रकाश ,आचार्य नरेन्द्र देव राजनारायण मधु लिमये सहित सैकड़ो लोग ।इन लोगों ने समाज में चेतना फ़ैलाने के लिए और वंचितो को जगाने के लिए अपने को दाव पर लगा दिया ।
इस देश में राजनारायण जी पहले व्यक्ति थे जिन्होंने जोतने वालो को खुद अपने खेत दे दिया और वही पहले थे जो हजारो दलितों को लेकर काशी विश्वनाथ मंदिर में घुसे और उसके से संघियो ,पंडो और पुलिस ने उन्हें मिल कर पीटा था पर वो रुके नहीं और जिंदगी के अंतिम दिन तक लड़ते रहे सिद्धान्तों के लिए । पर आज उनको साल में एक माला और उनके लोगो को गाली तथा उपेक्षा ।उनके लोगो को ठोकर मारी जा रही है और उनसे घृणा करते हुए खत्म किया जा रहां है तो मानव स्वाभाव का चिंतन का भाव और आत्मरक्षा तथा स्वाभिमान की रक्षा के प्रति चैतन्य हो जाना स्वभाविक ही है और आत्मरक्षा तथा आत्मसम्मान की रक्षा का अधिकार तो सनातन काल से दिया गया है ।

खैर भारतीय समाज की बड़ी विशेषता है की जब भी किसी ने भी समाज का संतुलन बिगाड़ा और अपनी मर्यादाये पार किया या तानाशाही और अहंकार पूर्ण व्यवहार शुरू किया इस सम्पूर्ण समाज ने उसे सबक देने और किनारे लगाने का काम किया ।ये कल भी हुआ था ,ये आज भी होगा और कल भी होता रहेगा ।

शायद कुछ लोग खुले आम गालिया देना और घृणा करना बंद करे ,शायद कुछ लोग सार्वजानिक तौर पर जातिगत जेहाद छेदना बंद करे इस उम्मीद के साथ ।

या फिर मुझे भी खुलेआम गाली दें जो वो कर ही रहे है सबके साथ ।

सोमवार, 14 मार्च 2016

आज के सवालो का जवाब है डॉ लोहिया २३ मार्च उनकी जयंती पर

                                                    आज के सवालो का जवाब है डॉ लोहिया
                                                                 २३ मार्च उनकी जयंती
                                                                                                           डॉ०  सी ० पी०  राय
                                                                                             स्वतंत्र राजनैतिक चिन्तक और स्तम्भकार
                                                                                 
                                                        लोकतंत्र बहुत अच्छी व्यवस्था है पर बुरी भी | कल विजयी होकर सत्ता में बैठे लोग और ताकतवर हुए लोग अगर संतति और सम्पत्ति के मोह में पड गए तो धृतराष्ट्र बन जायेंगे और तब लोकतंत्र बुरा हो जायेगा और अपने मायने भी खो देगा ,अगर अवसर और सत्ता का बटवारा नहीं हुआ तो भी लोकतंत्र मायने खो देगा ,अगर सत्ता और फैसलों का केन्द्रीयकरण रहा और चार खम्भों यानि गाँव ,जिला ,प्रदेश और देश के स्तर पर सत्ता और फैसलों के अधिकार का बटवारा नहीं हुआ तो तो भी लोकतंत्र मायने नहीं रखेगा | यदि सभी तरह की गैर बराबरी से समाज मुक्त नहीं हुआ तो भी लोकतंत्र मायने खो देगा |कुछ यही अर्थ निकलते है डॉ लोहिया के चिंतन के |
डॉ लोहिया तो १९६७ में दुनिया से चले गए परअपने कदमो के ऐसे निशान छोड़ गए और चिंतन की ऐसी लकीर छोड़ गए जो मिटाए नहीं मिट रही रही है | ये अलग बात है की आज भी उनके सवाल अनुत्तरित है तो उनके सपने कही अधूरे तो कही पहले कदम की तलाश में |
आज हम जितनी भी समस्याओ से जूझ रहे है जब उनके बारे में सोचते है तो ४८ साल पहले दुनिया से चले गए और उसके पहले उनके लिखे या कहे शब्द हमारे कानो में गूजने लगते है |
सबसे पहले डॉ लोहिया ने कहा की हिमालय बचाओ और आज हम हिमालय की केवल चिंता और चर्चा कर रहे है | सबसे पहले उन्होंने ही भविष्य में पानी की भयावह स्थति की तरफ ध्यान खीचा और कहा की नदियों का संरक्षण और सफाई एक अभियान होना चाहिए और हम आज गंगा की केवल चिंता और पस्ताव कर रहे है |
उन्हीने जब कहा की चीन धोखा देगा और कभी साथी नहीं होगा तो तत्कालीन सत्ता ने उनको गंभीरता से नहीं लिया था और तब भी उनकी बात सही साबित हुयी थी और आज भी उनकी बात सही है की चीन से प्रभावित राष्ट्रों का एक गुट बनाना चाहिए पर आज नेपाल हमें आँख दिखा रहा , भूटान चीन की तरफ बढ़ रहा है और बाकि पडोसी भी दूर हुए है | जिम्मेदारी तो सत्ताधीशो की ही है |
लोहिया ही तो थे जिन्होंने कहा था की देश को चौखम्भा राज्य चाहिए यानि जिसमे केंद्र केवल विदेश नीति ,रेल , सुरक्षा डाक इत्यादि देखे ,बाकि  मामलों का फैसला प्रदेश ,जिला और गाँव सरकारे अपने स्तर पर करे तभी लोकतंत्र मजबूत होगा | यद्दपि हमने पंचायत व्यवस्था को लागू किया पर इतना बड़ा देश और प्रदेश आज केन्द्रीकरण की बीमारी से कराह रहे है और जो तरक्की की किरण अंतिम छोर तक पहुंचानी चाहिए थी नहीं पहुंची आज तक |
डॉ लोहिया का सबसे चर्चित लोकसभा का बयांन  जिसमे उन्होंने देश के अधिकांश लोगो की आमदनी के बहाने अत्यधिक गैरबराबरी की बहस छेडा था आज भी तो मूल बहस का मुद्दा है जब हम चर्चा करते है की देश की ६५ % आबादी आज भी २० रुपया रोज पर गुजारा करती है और आज ये बहस और भी सनसनीखेज हो जाती है जब हम बुन्देलखण्ड में लोगो को घास की रोटी खाते और देश भर में किसानो को आत्महत्या करते देखते है और जब हम चर्चा करते है की पूजीपति को माफ़ी उसको प्रोत्साहन है और किसान को कुछ माफ़ी या सहायता देश पर बोझ |
डॉ लोहिया ने जब कहा की राम की मर्यादा को समझो और रामायण मेला लगाना शुरू किया तो उनका इरादा था की राम की मर्यादा से समाज को बाँधा जाये पर उन्हें कहा पता था की राम लड़ाई का कारण बन जायेंगे हिंदुस्तान की धरती पर और जब उन्होंने कहा की क्रष्ण प्रेम के प्रतीक है तो वो चाहते थे की समाज उन्ही की भांति सत्य के साथ और अन्याय के खिलाफ खड़ा हो चाहे गलत होने पर अपनो के खिलाफ खड़ा होना पड़े और गैरो के साथ खड़ा होना पड़े |
कोई भी जुल्म हो अमरीका में या कही भी विश्व सरकार की कल्पना का चितेरा हर जगह इसलिए पहुंच जाता था क्योकि वो चाहता था की विश्व सरकार बने और फौजों तथा लड़ाइयो से विश्व मुक्त होकर आगे बढे और आज भी तो विश्व इसी चिता में है ,विश्व के नेता न हो पर मानवता तो है |
भारत और पड़ोसियों के ढीले ढाले महासंघ की चिंता आज इन सभी देशो की सिविल सोसाइटी के जेहन में भी है और चिंतन में भी पर सरकारों और राजनीतिज्ञों के मकडजाल में सर नहीं उठा पा रही है |
जब डॉ लोहिया चाहते थे की पार्टी सरकार का सञ्चालन करे और पार्टी का ताकतवर नेता सत्ता में बैठने के स्थान पर संगठन में रहे तथा जनता के साथ रहे तो उनको शायद आशंका हो गयी थी उसी वक्त की सत्ता में सबसे ताकतवर के बैठते ही लोकतंत्र मर जायेगा और बुराइयाँ असमान छूने लगेंगी और सत्य ही तो साबित हुआ | उनका मकसद था की ताकतवर नेत्रत्व जनता से जुदा रहे और सत्ता को विचलित और पथभ्रष्ट न होने दे | इसलिए वो चाहते थे की संगठन धकेल नहीं बल्कि नकेल का काम करे |
हम जी चीज की भी चिंता कर ले विदेश नीति की ,मानवता की ,पर्यावरण की ,लोकतंत्र की ,हर तरह की गैर बराबरी की ,देश की सुरक्षा के साथ विश्व की सुरक्षा की ,अर्थ व्यवस्था की ,किसान की ,जवान की हर जगह डॉ लोहिया एक सीख और एक दिशा देते हुए आज भी हमारे बीच खड़े है |
पर अब कोई लोहिया पैदा होगा जिसका दुनिया के देशो में इंतजार हो रहा होगा वहा के आन्दोलन के मुद्दों पर और ऐसा अभी तो नहीं दिखता | लेकिन उनकी चिन्ताओ और आज की चिन्ताओ पर अगर आज का नेत्रत्व उन्ही की ईमानदारी के साथ खड़ा हो जाये तो हम स्वर्णिम भविष्य की उम्मीद जरूर कर सकते है |

बुधवार, 2 मार्च 2016




देश के लुटेरों से वसूली पर --- खामोश क्यों हैं केन्द्रीय सरकार ... ?
क्या- यह 'लूट' भी 'राष्ट्रवादी कार्य-सूची' में शामिल है ... ?

निम्न समाचार के अनुसार - " सरकारी बैंकों के क़र्ज़ों का महाघोटाला कोई एक-दो लाख करोड़ का मामला नहीं है. क़रीब साढ़े आठ लाख करोड़ रुपये के क़र्ज़े ऐसे हैं, जिनकी वसूली की सम्भावना अब न के बराबर समझी जा रही है! यानी भारत की कुल जीडीपी का क़रीब 6.7 प्रतिशत हिस्सा चट किया जा चुका है या जिसके वापस मिलने की अब लगभग उम्मीद नहीं है! और इनमें से 87 फ़ीसदी हिस्सा अमीर कॉरपोरेट समूहों को दिये क़र्ज़ों का है ---"

आखिर, क्यों - इस लूट पर ख़ामोश है वे 'राष्ट्रवादी' --- जो JNU के बेगुनाह वामपंथी छात्रों को जबरन 'राजद्रोही' कराने में चीखते-चिल्लाते दिखाई दे रहे हैं ... ?

" ... कौन हैं ये बक़ायेदार? कोई इनका नाम बताने को तैयार नहीं है. तर्क दिया जा रहा है कि ऐसा करना बैंक और ग्राहक की गोपनीयता को भंग करना होगा, जो क़ानूनी तौर पर जायज़ नहीं है. वाह जनाब वाह! मान गये हुज़ूर! लेकिन एक सवाल पूछने की ग़ुस्ताख़ी कर रहा हूँ. यह तर्क 2011 में कहाँ था, जब कुछ बैंक ‘शर्म करो’ अभियान के तहत अपने उन बक़ायेदारों के नाम और फ़ोटो अख़बारों में विज्ञापन देकर और सड़कों पर होर्डिंग लगा कर छाप रहे थे, जो महज़ कुछ हज़ार या कुछ लाख का क़र्ज़ नहीं चुका पाये थे! यही नहीं, उन्हें धमकी यह भी दी गयी कि अगर अब भी उन्होंने क़र्ज़ नहीं चुकाया तो उनकी गारंटी लेनेवाले लोगों के नाम और फ़ोटो छाप कर उन्हें भी ‘लज्जित’ किया जायेगा!तो चार साल पहले ग़रीब और आम आदमी की इज़्ज़त से खुलेआम और मनमाना खिलवाड़ करनेवाले बैंक और सरकार आज ‘ग्राहक की गोपनीयता’ की दुहाई क्यों दे रहे हैं? इसीलिए न कि मामला बड़े-बड़े अमीरों की इज़्ज़त का है!

अगर अमीर क़र्ज़दारों के नाम बताने में इतना संकोच है, तो उनसे क़र्ज़ वसूलने के लिए बैंक क्या करते होंगे, यह आसानी से समझा जा सकता है. वैसे ग़रीबों से बैंक कैसे क़र्ज़ वसूलते हैं, यह आसपास कुछ लोगों से पूछ कर देखिए. किसानों की दयनीय हालत और उनकी लगातार बढ़ती आत्महत्याओं के बावजूद दस-दस हज़ार रुपये के बक़ाये वसूलने के लिए बैंक कैसे अमानवीय तरीक़े अपनाते हैं, यह किसे पता नहीं? लेकिन अब न बैंक बोल रहे हैं, न सरकार बोल रही है कि इन अमीर क़र्ज़दारों से बक़ाया वसूलने के लिए कुछ किया भी जायेगा या नहीं. सरकार एक ‘बैड बैंक’ बनाने की सोच रही है, जिसके ज़िम्मे सारा डूबा हुआ क़र्ज़ दे दिया जाये और जो उसे वसूलने की कोशिश करता रहे. वसूल पाये या न वसूल पाये, यह अलग बात है. बहरहाल, अब सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप के बाद स्थिति शायद कुछ बदले ... "

आज मेरे एक भाई ने कहा की सीमा पर और कश्मीर में शहीद होते जवानो का हिसाब मांगिये ।

लगातार तो मांग रहा हूँ पर सीमा पर जो मर रहे है जिस दिन उनकी मौत वोट और चुनाव् में काम आने लायक दिखेगी उस दिन क्षद्म हिंदूवादी और क्षद्म राष्ट्रवादी उसकी चर्चा जरूर करेंगे ।

जैसे लोक सभा चुनाव के ठीक पहले जवानो की शहादत के लिए तैयार रहिये । चुनाव के एजेंडे में युध्द होगा ।

पर उसके पहले जितने मरे मरने दो साहेब को सैर करने दो ,फैशन करने दो और कवाब तथा बिरयानी खाने और खिलाने दो ।

अगर थोडा भी गरीबो की चिंता है तो जवाब दे सरकार की कुछ कितने जवाब अभी तक शहीद हुआ और उस पर श्वेत पत्र जारी करे की क्या कर रही है सरकार ।
कितने किसान मरे उनका भी हिसाब।

फुटपथो पर सोते और कभी कभी किसी गाडी से कुचलते हुए लोग
चैराहों पर भीख मागते हुए बच्चे
अपना शरीर बेचने को मजबूर बहन ,बेटिया
आत्महत्या करते हुए बेरोजगार नौजवान या किसान
सीमाओ पर शहीद होते जवांन

शायद वोट को प्रभावित नहीं करते ।

इसलिए किसी भी नेता और सरकार तथा तंत्र को इनकी चिंता क्यों हो ?

दो सवाल जनता पूछ रही है ---

1- कांग्रेस में लाखो करोड़ के घोटालो पर इन दो सालो में मोदी ने क्या क्या कार्यवाही किया और किनको जेल भेजा तथा कितना पैसा सरकारी खजाने में जमा करवाया ?

२- वो काला धन जिससे इण्डिया के मैदान पर पता नहीं कितने सौ मीटर ऊंचा पहाड़ लगने वाला था और पूरा भारत टैक्स फ्री होने वाला था और पता नहीं क्या क्या
उसमे से इन दो सालो में आरएसएस ,मोदी ,बीजेपी , रामदेव सलवारी और रविशंकर इत्यादि इन दो सालो में कितना ले आये ।

क्या ये सवाल आप सबके मन में नहीं है ?

मैंने प्रारम्भ में जो कवितायेँ लिखी है उन्हें जला देना पड़ेगा वर्ना मुझे देशद्रोह में जेल भेज देगा संघ परिवार ।
आज़ादी और लोकतंत्र तथा शांति से जीने के लिए चाहिए आई एस और संघ मुक्त भारत ।

आज अनोखा नाटक था :सलाखों के पीछे : मेरे मित्र सुशिल सरित का लिखा हुआ । जेल में बंद कैदियों की कहानी और उनके अंदर की आवाज ,विसंगतियां भी और कानून ,न्याय तथा समाज और देश पर सवाल उठती हुयी । बिलकुल पहली बार अभिनय करने वाले कलाकार जबकि अधिकांश के साथ ऐसा लगा नहीं की पहला नाटक है ।
बल्कि उड़ीसा से आकर 20 साल के एक कैदी की भूमिका करने वाले एक वर्तमान ए आर टी ओ ने तो जब अपनी बेटी को याद करना शुरू किया तो मुझे तो इतना रुला दिया की जब मुझे नाटक के अंत में नाटक पर बोलने के लिए मुझे बुलाया गया तब तक भी मैं सम्हल नहीं पाया था ।
बहुत शानदार था नाटक और ये संदेश देता हुआ की पहली और आकस्मिक गलती पर सजा मत दो बल्कि सुधार का और नया जीवन जीने का मौका दो ।

पाकिस्तान की सीमा पर लाश पड़ी है अपने जवान की और कोई पाकिस्तान से गले मिल रहा हो और कोई पाकिस्तान पर वाद विवाद कर रहा हो ।
बड़ा गद्दार कौन ????

मोदी जी और बीजेपी के जुमलों और नारो की तरह आज का बजट भी छलावा और जुमला ही है और दिशाहीन बजट है ।
दो वर्ष से कुछ बड़े पूंजीपतियो की तिजोरी भरने वाली सरकार ने किसानो और मध्य वर्ग को जुमला देकर उस पाप से मुक्ति चाहा है ।
ये सरकार अभी तय ही नहीं कर पायी है की वह देश की अर्थ व्यवस्था को किस दिशा में ले जाना चाहती है ।
दो साल में विदेश व्यापार करीब 18 % घट गया तो कृषि उत्पादन वृद्धि जो पिछली सरकार में 4.1% रहती थी वो 1/2 % हो गयी है और इन्ही का आर्थिक सर्वे बता रहा है की किसान की आमदनी 20 हजार रुपया प्रति वर्ष है यानी करीब 1600 रुपया महीना उसे पाँच से में दोगुना करने का वादा किया गया है पर आधा प्रतिशत वृद्धि के ये दावा केवल छलावा है ।
गामीण सड़को के लिए 4000 करोड़ रखा गया है ।इतने कम पैसे से क्या होगा ।
दूसरी तरफ शिक्षा और स्वस्थ्य इत्यादि के बजट से कटौती जारी है ।
मनरेगा इत्यादि में भी बढ़ोतरी मामूली है ।
आयकर के छूट के अपने पुराने वादे से सरकार फिर पीछे हट कर वादाखिलाफी कर गयी है ।
जो छूट स्वाभाविक तौर पर जनता को मिलनी चाहिए थी और जिन पर विपक्ष में रहने पर बीजेपी हमलावर रहती थी वो जनता को नहीं देकर भी धोखा ही दे रही है जैसे पेट्रोलियम और जिंस के दाम अंतरराष्ट्रीय बाजार में लगातार घटने पर भी जनता को उसका लाभ नहीं दिया जा रहा है ।
ये बजट बस छलावा है ।