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गुरुवार, 31 जनवरी 2013

आदरणीय नेता जी उत्तर प्रदेश के अधिकारीयों से नाराज है क्यों न हो ,दो घटनाएँ इनका आइना दिखा देगी --1--एक पार्टी नेता ने अपने अच्छे बुरे वक्त के साथी लेकिन अच्छे और योग्य एक इंजीनियर जिनकी केवल कुछ माह की नौकरी शेष है का सरकार की डेढ़ साल वाली नीति के अंदर मुख्यमंत्री से उनके इच्छित स्थान पर स्थानांतरण का आदेश करवाया । जब यह आदेश उस विभाग के सबसे बड़े अधिकारी मिश्रा जी के पास पहुंचा तो उन्होंने आदेश दबा दिया ।नेता ये सोच कर चुप रहे कोई प्रशासनिक दिक्कत होगी । दो हफ्ते बाद मिश्र जी ने उस इंजीनियर को फ़ोन किया की नेताओ के चक्कर में क्यों पड़ गए ,काम करवाना है या नहीं ,और बुलाया ,एक बड़ी रकम लिया और आदेश कर दिया ।-----2----एक शर्मा जी है जिनकी जमीन अधिगृहित हुयी थी और नियमानुसार उन्हें कुछ जमीन मिलनी थी ।सांसदों ,मंत्रियों के चक्कर काट कर थक गए तो किसी तरह मुख्यमंत्री से मिले । मुख्यमंत्री के एक विशेष कार्य अधिकारी से आवास आयुक्त को फ़ोन करवाया । आवास आयुक्त ने कई दिन चक्कर कटवा कर अंत में सबसे नीचे पहुँच कर बात करने को । सबसे नीचे वाले ने पूछा की चक्कर काटना है और फाइल में कागज बढ़ाने है या काम करवाना है ? काम करवाना है तो तीन लाख रुपये दे दो ,एक घंटे में काम ख़त्म वर्ना हमें जो जवाब देना है लिख देंगे ।---- मुख्यमंत्री इमानदार है पर अधिकारी कोई भी विकास का पैसा जरी करने से पहले ही 5% ले लेते है । बाकि नीचे वाले अपना अपना लेते जाते है ।--- पिछली सरकार में कागजो पर ही काम करने के आदि अभी भी वाही सोच कर काम कर रहे है । मुख्यमंत्री शरीफ और सीधे सादे व्यक्ति है पर नेता जी की निगाह से कुछ छुपा नहीं है ।-- छोटे से सबसे बड़े तक सभी अधिकारियो की कार्य शैली यही है । ये जनता और राजनैतिक कार्यकर्त्ता से सीधे मुह बात नहीं करते है पर कुछ खास वर्ग के लोगो के सामने बिछे रहते है ।---केवल 2 --करोड़ के लिए सांसद --और डेढ़ करोड़ की निधि जिसकी केवल स्वीकृति ये लोग करते है ,काम कारवाना और उसका भुगतान करना अधिकारीयों का काम है उसके लिए ये जनप्रतिनिधि बदनाम कर दिए गए है पर हजारो लाखो करोड़ खर्च करने वाले नीचे से ऊपर तक के अधिकारी दूध के धुले मान लिए गए है । -- मध्यप्रदेश से लेकर जहा जहा तंत्र में बैठे कर्मचारियों और अधिकारियो पर छपे पड़े उनके घरो में करोडो नहीं सैकड़ो करोडो निकले । कुछ राजनैतिक लोगो के पास भी निकल सकते है पर 90% से ज्यादा राजनैतिक लोगो की अपने अस्तित्व के लिए इमानदार रहना ही पड़ता है । -- नेता को रोज इम्तहान देना होता है और चुनाव के मैदान में हर पांच साल बाद इम्तहान भी देना होता है पर अधिकारियो और कर्मचारियों को एक बार चयन के के बाद न तो कोई जवाब देना है ,न कोई अपने काम का हिसाब देना है और न दुबारा इम्तहान देना है और रिटायर होने पर भी बड़ी रकम मिलते रहने की गारंटी है ।---क्या इनकी भी कोई जवाबदेही होनी चाहिए ???? क्या इन लोगो की नौकरियां भी संविदा पर केवल कुछ समय के लिए होनी चाहिए ?? क्या इमानदार और परिणामदायक नहीं होने पर इन्हें भी प्राइवेट कंपनियों की तरह बाहर कर देना चाहिए ??? क्या भारत जैसे गरीबो के देश के अधिकारयो को पचासों बीघे वाले घरो में रहना चाहिए या इन घरो का जनहित में कोई और उपयोग होना क चाहिए क्योकि ये घर तो गुलाम रास्त्र के मालिको के थे न की जन सेवको के ??? ----- एक दिन एक बड़े और सीनियर मंत्री एक अधिकारी से बात करने को परेशान थे और उस अधिकारी ने घंटो क्या उस पूरे दिन फ़ोन नहीं उठाया । क्या होना चाहिए उनका । कुछ भी कह लीजिये सरकार के असली मालिक आज के राजा तो यही लोग है । जनता किसी राजनैतिक कार्यकर्ता को रात को दो बजे भी जग सकती है पर ये लोग क्रमशः मीटिंग या बाथरूम में ही मिलते है ।-----नेता जी ने चिंता जताई है ,आज़म खान साहब ने एक रास्ता बताया है ,मुख्यमंत्री जी ने भी तेवर दिखाया है तो हम भी इन मुद्दों पर बहस तो कर ही ले । क्योकि हम सब भी तो महान है पड़ोस में रहने वाले बड़े स्वतंत्रता सेनानी को नमस्ते नहीं करते ,परम वीर चक्र पाने वाले को नहीं पहचानते ,बड़े से बड़े साहित्यकार और विद्वान को कुछ नहीं समझते और दरोगा से डरते है ,अधिकारियो को माला पहनाते है और उनकी चापलूसी में सुख महसूस करते है । आइये इन मुद्दों पर बात ही कर लें ।