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बुधवार, 19 अगस्त 2015

पुराने ज़माने से हमें सिखाया गया की राजनीती और शासन में लोकलाज बहुत महत्वपूर्ण है और ये भी की जनभावना का आदर किये बिना नहीं चला जा सकता ।
जनभावना वाले सवाल पर मेरा एतराज था की लीडर को लीड कर करना चाहिए और चाहे जितना नुकसान हो जाये समाज के साथ भावना में बहने लगने के स्थान पर सही स्टैंड पर कायम रहना चाहिए ।

पर लोकलाज का मैं समर्थक हूँ ।

लेकिन बहुत अफ़सोस के साथ लिख रहा हूँ की बहुत से बड़े लोगो ने ही लोकलाज को ताक पर रख देने का जैसे बीड़ा ही उठा लिया है और वो समझ ही नहीं रहे है की आज का समाज कहा पहुँच गया है और उनका कदम और वक्तव्य आत्मघाती है ।

पर मुझे क्या । अदना सा आदमी हूँ । लिख कर कर्तव्य पूरा कर दे रहा हूँ ।

कोई खास सन्दर्भ नहीं बस यूँ ही ।

अंधभक्त कैसे भी हो राजनीतिक जातिगत धार्मिक या सामाजिक और किसी के भी हो वो लोकतन्त्र को बर्बाद करते है और विकास के रस्ते को भी अवरुद्ध करते है ।
सबकी बात कर रहा हूँ ।स्वस्थ और खुली बहस और गलत के खिलाफ जब चुनौतीपूर्ण अलीचना बंद हो जाती है तो आप जिसके भी भक्त है उसे तानाशाही पूर्ण व्यवहार करने की तरफ खुद धकेल रहे होते है ।
(आज के चिंतन से और चिंता से )

मंगलवार, 18 अगस्त 2015

हमें पता है भक्त अंधे है और नहीं होते तो आज़ादी की लड़ाई के खिलाफ गद्दारी ही क्यों किया होता ।

हमें पता है की अन्धो को आईना दिखाने का कोई फायदा नहीं पर सच और इन्साफ के लिए तथा इंसानियत और हिन्दुस्तानियत बचाने के लिए, लोकतन्त्र और संविधान की रक्षा के लिए हम चीखते भी रहेंगे और व्यवस्था के मेज पर हथौड़े भी पटकते रहेंगे ।

शायद अन्धो को एहसास हो ही जाये की वो गलत है ।

सोमवार, 17 अगस्त 2015

#मोदी साहेब आप #पाकिस्तान से #युद्ध करेंगे पर #चुनाव के फायदे के लिए ठीक उसके पहले और मैं आज ही निर्णायक युद्ध चाहता हूँ ।

मेरे जवान यूँ ही खड़े खड़े शहीद हो जाये मुझे मंजूर नहीं बल्कि वो लड़ कर शहीद हो और 100 /100 को मार कर शहीद हो ये मैं भी चाहता हूँ और देश भी चाहता है ।

पर आप जवानो को खड़े खड़े मारने दोगे और चुनाव का इन्तजार करोगे मैं जानता हूँ ।

गुरुवार, 13 अगस्त 2015

आर एस एस वाले डींग हांकते है की अगर वो अच्छे नहीं है तो नेहरू जी ने उन्हें 26 जनवरी में क्यों बुलाया ।

आज़ादी ली लड़ाई में गद्दारी गांधी जी की हत्या का जख्म बहुत गहरा था पर नेहरू जी प्रगतिशील डेमोक्रेट और बड़े दिल के आदमी थे ।

उन्होंने प्रयास किया की शायद संघ आज़ादी का और देश का अर्थ समझ सके और 26 जनवरी को देख कर उनका दिल बदल सके और वो अपना पुराना सोच और रास्ता छोड़ कर मुख्य धारा में शामिल हो जाये ।

पर अफ़सोस नेहरू की आत्मा आज रो रही होगी

शनिवार, 8 अगस्त 2015

जो सबको शिक्षा और सबक देते रहते है ईश्वर उनका भी सब देख रहा होता है ।

पता नहीं उनके लिए ईश्वर ने कब और कौन सा तथा कितना सबक तैयार रखा है ।

जो भी सबक मिलना हो जल्दी मिलना चाहिए वर्ना ईश्वर की सत्ता पर और न्याय पर प्रहनचिन्ह लगेगा ।

शुक्रवार, 7 अगस्त 2015

हिंदुस्तान क्या सचमुच तमाशे का देश है । लोगो से कहो की चलो बिजली पानी भुखमरी गरीबी नौकरी और हक़ के लिए लड़ें । कोई नहीं आता ।आपातकाल लगा लाखो बंद हो गए पर एक कुत्ता नहीं भूंका ।
तमाशे के लिए घंटो खड़े रहते है हजारो ।क्रिकेट मैच में देश भर में कर्फ्यू लग जाता है ।कई टीवी सीरियल में भी कर्फ्यू लगता रहा है । फ़िल्मी तमाशो को देखने को लोग सर फट जाये पर लाइन में लगे रहते है ।
कुछ लोग ये समझ गए है की इस देश में कोई गंभीर विमर्श पर बात मत करो , गंभीरता से कुछ मत करो बस तमाशे करो लोग भी खुश और हम भी खुश ।
कल भी होगा एक तमाशा और चुनाव से पहले एक सीमा पर भी होगा ।उसका खामियाजा गरीब उठाएगा तो उसके लिए दस लाख ,कुछ मालाये और फ़िल्मी डायलोग और देशभक्ति के फ़िल्मी गाने मौजूद है ।
हमने तो सुना था की भारत विश्व गुरु था । किस चीज का तमाशो का ??
अज़ब बौद्धिक दिवलिया हो गया है देश और गंवार को  कोई शक शुबहा नहीं सब ग़लतफ़हमी और आँखों पर चश्मे विद्वानों के ही है ।
हे मर्यादापुरुषोत्तम राम जिसने बाप के आदेश पर देश छोड़ दिया और एक देश जीत कर भी कब्ज़ा नहीं किया बल्कि वही के उचिट व्यक्ति को सौंप दिया ,हे बड़े दिन और दिमाग वाले कृष्ण जिसने कुछ अपने लिए नहीं किया सब दूसरो के लिए किया और बडी सत्ताओ से टकरा गया और जो समपूर्ण प्रेम का प्रतीक था और हे शिव शकर जिसका न आदि है न अंत है और जिसने प्रेम किये तो परवाह नहीं किया और क्रोध किया तो परवाह नहीं किया बल्कि हर चीज से सम्पूर्ण न्याय किया आप तीनो बताओ मैं इस हालात में मैं क्या करूँ ?
समझने वाले ही कमेंट करे प्लीज़ ।
पापियो से भगवांन भी डरने लगा है । उन्हें जमीन पर सजा नहीं और नर्क में भी उनके लिए हाउसफुल का बोर्ड लगाये है । अच्छे लोग इन्हें झेल कर परेशांन है ।
अपने आसपास देख लीजिये ।
कबीलों और जंगल के कानून को छोड़ दें तो दुनिया के किसी भी कानून में दादा परदादा के द्वारा किये गए अपराधो या उनके अन्य कर्मो का दोषारोपण पोते और परपोते पर नहीं किया जाता और न उसके लिए उन्हें सजा दी जाती है ।
तो फिर पता नही मेरे दादा और परदादा ने कुछ गलत किया भी था नहीं पर मुझे दोषी ठहरा कर उन दोषों की सजा क्यों दी जाये आज जबकि मैं तो कुछ भी गलत नहीं कर रहा हूँ ।
क्या इसी तरह सभी राजाओ के वारिसो और जिस जिस ने कुछ भी कभी गलत किया था उनके वारिसो को ढूढ़ कर उन्हें सजा देने का भी कभी मांग और अभियान चलेगा मेरे देश में पढाई का स्तर बढ़ने के साथ और सत्ता तथा प्रशासन में ताकत मिलने के साथ ।
किसी भी भ्रस्ताचार से बड़ा धर्म और जाति के आधार पर घृणा और नफरत तथा उपेक्षा का भ्रस्ताचार है क्योकि ये मानवता पर और मानव की स्वाभाविक स्वतन्त्रता पर जबरदस्त हमला है ।
हम अपना वोट आप को नहीं देंगे क्योकि आप हमारे धर्म या हमारी जाति के नहीं हो ।

आप शिक्षित हो ,ज्ञानी हो ,गुणी हो ,कोई गलत काम नहीं करते बल्कि केवल अच्छे काम ही करते हो और अपने गुणों के कारण हमारा ,समाज का और देश का बहुत भला कर सकते हो पर --

वाह रे लोकतंत्र और वाह रे आज़ादी । शायद भगत सिंह फांसी सिखों के लिए चढ़े और आज़ाद तथा बिस्मिल ब्राह्मणों के लिए शहीद हुए ।सुभाष कायस्थो के लिए और गाँधी जी बनियों के लिए लडे ।
क्यों न संविधान में संशोधन कर के सभी को जाति परिवर्तन करने की छूट दे दिया जाये अथवा पूरे देश को दलित घोसित कर दिया जाये ऊँच नीच और जातिवाद ख़त्म हो जायेगा ।नाम के आगे जातिसूचक शब्द लगाने पर पाबन्दी हो जाये और नाम के आगे अगर लगाना चाहे तो केवल हिंदुस्तानी लिखे ।
क्या इससे समस्या का हल हो सकता है । और एस सी एस टी एक्ट का आतंक भी खत्म हो जायेगा ।
देश के दलित समाज को इस विचार पर आपत्ति तो नहीं है ।
क्या रास्त्रगान गाते हुए बचपन से आजतक कभी आप के दिमाग में आया की उसके शब्द क्या है और अर्थ क्या है और इसी तरह से बहुत से धर्म ग्रंथो को पढ़ते हुए भी |
सर्वोच्च नयायालय में हलफनामा देकर उससे मुकरने वाला और देश भर में दंगे करवाने और लोगो की हत्याओ का जिम्मेदार आज़ादी के इतने दिन बाद आज संवैधानिक पद पर बैठ कर उस पर सवाल उठा रहा है |
मतलब तो आप लोग भी समझ रहे होंगे |
सरकार फेल तो देखो नए नए खेल |
बनारस में 100000000 रूपये पानी में धुल गए क्या ?

बड़ी महंगी धुलाई है उनके सूट और कपड़ो की तरह ।

माँ गंगा कुपित है असत्य और फेंकने से इसलिए आने नहीं दे रही है और आसमान वाला भी उनका ताकत से साथ दे रहा है ।

आत्मचिंतन करिए हुजूर ।

इसीलिए लिख दिया ।
60 साल तक लोगो की उपेक्षा ,अंहकार से चूर और केवल लूट में मस्त रहने वाले ये अफसर अवकाश प्राप्त करते ही फिर आयोगों का अध्यक्ष क्यों बना दिए जाते है ?

60 साल में भी पेट नहीं भरा की फिर नया चारागाह तलाश लिया और उनकी तलाश राजनीतिक तकते पूरी करती है ।

जबकि राजनीतिक लोगो में भी बहुत से बहुत ज्यादा योग्य और ईमानदार लोग भी है जो तथाकथित सिद्धांतो के लिए जीवन दाव पर लगा कर बैठे है ।

पता नहीं राजनीतिक नेताओ में से अपने और अपनों के प्रति हीनता का भाव कब निकलेगा और सिद्ध चोरो के मुकाबले अपनों की ईमानदारी पर विश्वास कब पैदा होगा ?~
किसी विद्वान साथी ने टिप्पणी किया कि यकीन मानिये कि आज के दौर में स्वामी विवेकानंद ,सर्वपल्ली राधाकृष्णन से लेकर ए पी जे कलाम तक अगर किसी राजनीतिक दल के बाकायदा सदस्य बन जाये तो रसीद कटाने के अगले पल ही उनकी औकात चपरासी से भी कम हो जाएगी ।

वो खुद राजनीती में नहीं है फिर इस टिप्पणी का क्या मतलब है ?

इस टिप्पणी पर क्या जवाब दूँ ? क्या सचमुच इतनी गिरावट आ गयी है ? क्या ये सभी दलों पर लागू होता है ?
क्या आप लोगो को याद है की अन्ना ,केजरीवाल और बेदी इत्यादि किसी लोकपाल ,सड़क पर कानून बनाने  ,सब सरकारी काम बेपर्दा करने इत्यादि के लिए लड़ रहे थे और आरएसएस तथा  बीजेपी इनके पीछे खड़ी थी ।

इन सब को सांप सूंघ गया और जनता भी भूल गयी ।

वाह रे देश और हम सब ।
केंद्र के अपराध के रिकार्ड बताते है की दिल्ली में रोज 5 महिलाओ के साथ बलात्कार होते है ।

 पर कैसे मान ले ? देश के टीवी उस पर चर्चा नहीं कर रहे और अखबार छाप नहीं रहे तो कैसे मान ले इसे सच ?

हा नहीं तो ।
अब ये भगवांन की गलती तो नहीं है की आप उनकी चौखट पर वर्षो से माथा रगड़ रहे हो और वो पत्थर ही बने हुए है ।
उन्होंने कब कहा माथा रगड़ने और हाजिरी देने को और ये भी कब कहा की वो पत्थर नहीं बल्कि दिल दिमाग वाले जीव है ।
बाकी भक्तो की मर्जी ।
मैं ये बिलकुल बर्दाश्त नहीं कर सकता । किसी भी हालत में बर्दाश्त नहीं कर सकता । तत्काल गूगल को प्रतिबंधित कर दूँ क्या ?

कैसे बर्दाश्त कर लूँ भारत के नागरिक के रूप में ?

देखिये गूगल की हिमाकत ----दो बाते लिख दिया -

1- मोदी जी को दुनिया के 10 टॉप अपराधियों में शामिल कर दिया ।

2- मोदी जी को दुनिया के 10 स्टुपिड प्रधानमंत्रियो में शामिल कर दिया ।

कोई भी भारतीय ये बर्दाश्त कर सकता है क्या ?
मुझे तो आज ही पता चला वर्ना कब का गूगल को @

सच में मैं सच बोल रहा हूँ कोई कटाक्ष नहीं कर रहा हूँ ।
वैसे एक बात तो मानना पड़ेगा की मीडिया में बैठे हुए कुछ संवेदनशील साथियों की वजह से भी बहुत लोगो को न्याय मिल जाता है ।

ऐसा देखा जाता है की जब मीडिया के किसी ऐसे संवेदनशील साथी की निगाह ऐसे लोगो पर पड़ती है जिन्हें कोई सुन नहीं रहा या जिन्हें वो लग नहीं जानते जो न्याय करने और सुनने के लिए है और उनके मुद्दे को वो साथी मीडिया में ठीक से जगह दे देते है तो अक्सर मजबूरन उस पीड़ित को तत्काल का न्याय देना ही पड़ जाता है व्यवस्था को ।

ऐसे संवेदनशील साथियों को मेरा और सभी का सलाम जो सरोकारों से सरोकार रखते है और सीने में दिल को इस चूहा दौड़ के युग में भी मरने नहीं दिया है ।
अब जान लीजिये की नेताओ को खलनायक बनाने का संगठित प्रयास क्यों हो रहा है ।

ऐसी तकते जो लोकतंत्र को खत्म का फसीवादी व्यवस्था कायम करना चाहती है वो धीमे जहर की तरह और हनेश जी को दूध पिलाने वाली रणनीति से यह फिजा बनाने में लगी है की लोकतंत्र बुरा है और लोकतंत्र चलाने वाले बुरे है ताकि जब लोकतंत्र को खत्म करना हो तो जनता मान चुकी हो की लोकतंत्र और नेता बुरे है और उस वक्त विरोध का सामना न करना पड़े ।

जबकि सभी तंत्रो को दुनिया आज़मा कर इस निष्कर्ष पे पहुच चुकी है की लोकतंत्र सर्वश्रेष्ठ है और जनता इसी में अपना फैसला जब चाहे खुद कर लेती है ।

केवल नेता वो जीव है जो जनता के साथ हर सुख दुःख में खड़ा रहता है तथा केवल नेता है की उसकी पिता की लाश भी सामने हो तो भी वह लोगो की सुनता और पहले उनका काम करता है ।

बाकी  लोगो से आप सभी का क्या अनुभव है सोच कर देखिये ।

और भ्रस्ताचार की बात है तो खुद अध्ययन कर के देखिये की कर्मचारी ,ठेकेदार ,,इंजीनियर ,व्यापारी सहित सभी में कितने प्रतिशत राजनैतिक कार्यकर्ता क्या और कितने सम्पन्न हुए और उसके मुकाबले बाकी लोगो की क्या स्थिति है ।

फिर अपने दिन पर हाथ रख कर खुद से पूछिए और सोचिये इस बड़ी साजिश के बारे में ।
नेताओ से इतनी नफरत होती तो नोप वाले बटन सैकड़ा तो छू लेते पर अफसोस अभी तक वो तकते अपना काम कर नहीं पाई ।

अब मेरी पोस्ट पढ़ कर समग्रता से सोच कर देखिएगा की क्या मैंने गलत लिखा है ?
दूसरा --

लगातार कहा जाता है की संसद में 168 अपराधी है ।
तो दोस्तों आप के लिए बिजली पानी या अन्य लड़ाइयाँ लड़ते हुए कौन पिटता है और कौन जेल जाता है ।

एक प्रस्ताव हो जाये की देश में कोई धरना प्रदर्शन और आन्दोलन नहीं होगा या कानून में व्यवस्था हो जाये की आन्दोलन के मुकदमे आई पी सी में नहीं लिखे जायेंगे क्योकि आई पी सी में आप अपराधी हो ही जायेंगे ।

यदि इन मुकदमो में ब्रैकिट में आन्दोलन लिखा जाता या कोई और कानून होता तो आन्दोलनकारी और छात्र नेता अपराधी नहीं कहलाते ।

और अपराधियों को तो आप पहचानते है की कौन कौन है ।

या आप ने इतनी बड़ी तादात में अपराधियों को चुन दिया या फिर आप के वोट को और चयन को अपराधी बता कर आप सब को अपराधी बताया जा रहा है ।

बिचार जरूर करियेगा । या सरकार को कानून को बदलने को कहिये की आन्दोलनकारियो के लिए अलग कानून बने ।

समझ गए न ।
कितने भी जवान शहीद हो जाये हम जवाब नहीं देंगे बल्कि बातचीत ,बिरयानी और भेट का आदान प्रदान जारी रहेगा ।

जवाब देंगे जब हमारा जनता की अदालत में इम्तहान होना होगा या शरीफ जी का फ़ौज की अदालत में ।

अभी नहीं समझ में आएगी मेरी बात !
जापान में सुनामी आई लाइट तो क्या बहुत कुछ उजड़ गया पर १ - वहा कोई छाती पर हाथ मार कर दहाड़ मार कर रोता नहीं दिखा ,२ - वहा कोई बुराई करता नहीं दिखा -३ - वहा के दुकानदारो और रेस्टोरेंट वालो ने कीमतें कम कर दिया -४- वहा लोग खुद पानी नहीं होने पर कम खर्च कर एक दूसरे की मदद करते दिखलाई पड़े -५- वहा लोग सरकार या व्यवस्था को कोसने के स्थान पर जो खुद कर सकते थे देश के लिए वो कर रहे थे -६- वहा मीडिया न तो बुराई कर रहा था ,न किसी को कोस रहा था न कोई अप्रिय दृश्य दिखा रहा था -७ - वहा सिस्टम फेल होने पर लोग पैदल या साईकिल पर चल रहे थे और एक दूसरे को सहारा दे रहे थे ,जिनकी गाड़ियाँ ठीक थी वो लोगो को उनके स्थानों पर पहुंचा रहे थे -8- दुकानों में लाइट चली गयी तो लोग सामान लेकर भागने के स्थान पर सामान वही छोड़ कर बाहर आ गए और फिर लाइन में लग गए -9-परमाणु संयत्र पर बीस लोग रुक गए बाकी सबको भेज कर ये जानते हुए की वे नहीं बचेंगे पर दिमाग में ये था की वे शायद देश को और लोगो को बचा लेंगे -१०- वहा की व्यवस्था लोगो की मदद में अपनी किसी नयी कोठी की जुगाड़ नहीं देखा रही थी। और जापान फिर खड़ा हो गया और पता नहीं कितनी बार बर्बाद हुआ और खड़ा हुआ । हम टीवी पर और देशो में भी तबाही आते और बिजली जाते देखते है वो भी जापान जैसा ही व्यव्हार करते है । ये सभी देश महान कहलाते है । कोई देश नहीं वहा की जनता और उसका चरित्र ,व्यव्हार और कार्य महान होता है । जरा सोचिये हम क्या करते है ???? क्या हम केवल भारत के निवासी है जैसे कोई किसी सराय या होटल का निवासी होता है या हम भारत के सचमुच नागरिक भी है । क्या हम सब दिल पर हाथ रख कर सोच सकते है और फैसला कर सकते है ?/ जरा सोचिये जरूर ???????????? ????????????????????/
# कितने लोगो को याद है की जिस दिन पिछले लोकसभा का परिणाम घोसित हो रहा था और मैं भाग नही बल्कि लगातार 13 घण्टे तक मुकाबला करता रहा उस मैंने लाइव कार्यक्रम में टीवी पर क्या कहा था ?

याद दिला देता हूँ ----

1- ये राजनीती शास्त्र के विद्यार्थी के रूप में देश को बता रहा हूँ न की किसी दल के नेता के रूप में कि अगर अहंकार अहमदाबाद से दिल्ली आ रहा है तो --देश अब तक का असफलतं और अयोग्यतम प्रधानंमंत्री देखने जा रहा है ।

2- ये सरकार महंगाई कम नहीं कर पायेगी बल्कि बढ़ेगी क्योकि सारे मुनाफाखोर , जमाखोर और मिलावटखोर इनके कार्यकर्ता है और शाखा में जाते है तो सरकार उन पर लगाम नहीं लगा पायेगी बल्कि उनका फायदा देखेगी ---
इनके सामने दूसरी दिक्कत ये होगी की ये जिन लोगो ने इनके चुनाव पर हजारो करोड़ खर्च किया उनका हित देखे या जिस जनता ने वोट दिया उनका ?

3-- विदेश नीति इनके लिए अज्ञानता की चीज है क्योकि इनकी सोच वैसी नहीं है । ये तो हजारो साल पहले की सोचते रहते है जबकि जरूरत काफी आगे देखने की है ।

जिन्होंने सुना हो वो क्या कहते है आज और जिन्होंने नहीं सुना वो आज इन बातो पर क्या कहेंगे ।

मैं किसी पर व्यक्तिगत हमला नहीं कर रहा हूँ बस यूँ ही उस दिन की याद दिला रहा हूँ ।
यूँ ही ।
# Indian politics
दाल से लेकर प्याज आलू सब कई गुना महंगा हो गया ( एक महीने में महंगाई कम करने वालो के राज में ),, दुनिया से कच्चा तेल आधी से कम कीमत पर आ रहा है और मनमोहन सिंह के ज़माने से महंगा बिक रहा है ( पेट्रोल 40 से कम पर बिकने की बात करने वालो की सरकार में )डॉलर ने मोदी जी की उम्र पार कर लिया है ( कुछ ऐसा ही शक किया था इन्होंने सरकार बनाने से पहले ) सीमा से रोज शहीदों की लाशे आ रही है ( एक सर के बदले 10 लाने की बात करने वालो के समय में ) ।

आज के लिए काफी है ?
मैं राम और कृष्ण को अवतार और काव्य पुरुष दोनों मानता रहा हूँ और मानता रहा हूँ की वो दोनों सबके है और कण कण में है ।

पर संघ और बीजेपी ने बताया की वो केवल उनके है और कुछ वर्ग मीटर जमीन तक सीमित है ।

तो

कुछ जातियां बता रही है की वो तो केवल उनकी जाति के है । खबरदार जो किसी ने अपना कहा ।

बहुत भ्रम फ़ैल गया भाई । इस पर भी या तो कोई आयोग बने या फिर उन्हें ही दे दिया जाये उनका पेटेंट कर के ।

क्या विचार है ?????
जिस दिन मोदी ने संसद की सीढ़ियों पर सर झुकाया था मैंने कहा था की ये जिन के सामने सर झुकाते रहे जो उनके साथ किया वही संसद के साथ करेंगे ।
भक्त से लेकर मीडिया भक्त तक अलाप रहे है की जो कभी नहीं हुआ वो हो गया एक समझौते में ।

या तो नए है या अज्ञानी नादान है ।

लालड़ेंगा और लोंगवाल शब्द सुना ही नहीं होगा ।ऐसे कई समझौते इतिहास में हुए है और उन लोगो से जिनसे संभव नहीं दीखता था और वहां जहा जीवन दूभर था ।

सोचा दुन्नो का थोड़ा ज्ञान बढ़ा ही दे ।

हो सके की भोंपू बंद हो जाये । पर संघी भोंपू तो बस एक सुर में लगातार बजना जानता है जब तक नागपुर से ट्रैक न बदला जाये ।
समाज का असली चरित्र ----------

आप के बहुत ख़ास अपनी जाति के सम्मलेन या किसी आयोजन में लाखो खर्च कर देते है ।

किसी धार्मिक आयोजन या स्थल के लिए 25 लाख से करोडो तक दे देते है ।

पर ---आप के लिए और आप की तकलीफ के लिए वो गरीब बन जाते है या खुद परेशानी में पड़ जाते है ।

सड़क पर कोई इंसान मर रहा हो तो बगल से निकल जाते है पर जाती धर्म या गाय सुवर के लिए मारने मरने पर उतारू हो जाते है ।

पार्टी में लाखो की दारु बहा देते है और लाखो का खाना फेंक देते पर प्यासे को एक बोतल पानी देने के बजाय दुत्कार देते है और भूखे को भगा देते है ।
धर्म स्थल पर केवल फूल चढाने पर लाखो खर्च कर देते है पर मंदिर के बाहर हाथ फैलाये खड़े लोगो को अपशब्द कहते है ।

रेस्टोरेन्ट में वेटर को सैकड़ो टिप देते है पर मोची से चार आने के लिए लड़ते है ।

क्या क्या लिखूं ? पोथी लिखना पड़ेगा ।

ऐसी ही कुछ बाते जानकारी में आई और कुछ बातो से प्रभावित हुआ और संबंधो का मोल इसी कसौटी पर जाना तो लिख दिया ।

दोस्तियां झूठ और फरेब का पुलंदा है बस अभिनय देखो और अभिनय करो ।
पता नहीं भारतीय राजनीती का क्या दुर्भाग्य है की भारी जन समर्थन प्राप्त हर नायक और बड़ा बनने या युगांतकारी परिवर्तन करने का अवसर खो देता है अल्प दृष्टि और छोटे सोच के लोगों के चक्कर में ।

पता नहीं जनता के साथ ये छल कब तक होता रहेगा और कार्यकर्ताओ के साथ भी ।