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शुक्रवार, 22 मार्च 2013

                                 लोग मुझे याद करेंगे मेरे मर जाने के बाद [ डॉ लोहिया ] ????
                                            [12 अक्टूबर उनकी पुण्यतिथि पर  ]
     
                                                                                                                                                                                            इस देश के अनोखे नेता डॉ राममनोहर लोहिया को आज याद करने का दिन है | वही डॉ लोहिया जिसने उस वक्त जर्मनी से अर्थशास्त्र में पी एच डी किया जब हिटलर उभर रहा था और उनके अपने विचारो के कारन उनके प्रोफ़ेसर ने उनका पी एच डी का इन्टरवियू समय से पहले करवा दिया की हिटलर के सत्ता में आने के पहले वे जर्मनी छोड़ दे । वही डॉ लोहिया जो जर्मनी गए तो जर्मन नहीं जानते थे और जर्मन जाने बिना वहा छात्र नहीं बन सकते थे तो उन्होंने अपने प्रोफ़ेसर से केवल दो महीने का समय माँगा और जब दो माह बाद वो दुबारा अपने प्रोफ़ेसर से मिले तो जर्मन बोलते हुए मिले | वाही डॉ लोहिया जो देश के करो या मरो नारे के मुख्या चिन्तक थे और गाँधी जी को इस हद तक ले जाने के लिए उन्हें पूरे एक हफ्ते तक उनके साथ रह कर तर्क करना पड़ा था | वाही डॉ लोहिया जिन्होंने १९४२ में जब सारे नेता जेल चले गए थे तो भूमिगत रह कर देश की आजादी की लड़ाई को धार दिया | वाही डॉ लोहिया जिनको लाहौर की जेल में आजादी की लड़ाई के लिए भरी यातनाएं डी गयी थी और फिर भी नहीं झुके थे | वाही डॉ लोहिया जिनको गाँधी जी ने कलकत्ता बुला लिया था जब देश आजादी का जश्न मना रहा था उस वक्त रक्तपात से डूबे कलकत्ता को शांत करने के लिए ,ये अलग बात है की उनका जिक्र नहीं होता है | वाही डॉ लोहिया जिनको गाँधी जी ने पहले देश के सरकार में मंत्री बन कर जिम्मेदारी लेने को कहा पर लोहिया जी की दृष्टि और चिंतन को सुनकर उन्हें ३० जानवरी की शाम को राजनीतिक चर्चा के लिए बुलाया था ,पर उस दिन जब लोहिया वहा पहुचने वाले थे तो कुछ दूर पहले उन्हें पता लगा की बापू की फासीवादी ताकतों ने हत्या कर दिया ,वर्ना कोई राजनीतिक तस्वीर उभर सकती थी |
देश के वणिक समाज के लोग अपने कार्यक्रम में उनकी फोटो लगाते है और उनको अपने समाज का गौरव बताते है और वे ये भूल जाते है  तथा इसका जिक्र भी नहीं करना चाहते  की उसी डॉ लोहिया ने इस देश में जाति तोड़ो अभियान चलाया था और तमाम लोगो ने अपने नाम से जाती का नाम हटा दिया था । ये लोग ये भी याद नहीं रखना चाहेंगे की उसी डॉ लोहिया ने कई लाखो जनेऊ तुड़वा कर जलवा दिया था । ये तो बिलकुल याद नहीं रखना चाहिए कि उसी डॉ लोहिया ने ; संसोपा ने बाँधी गांठ - पिछड़े पाए सौ में साठ : का नारा दिया था । जिसने मण्डल कमीशन की बुनियाद रखा । पर उनके नाम के साथ उनकी जाती चिपकाते हुए बताया जाता है की डॉ लोहिया भी दर असल बनिया थे और डॉ लोहिया को शायद इससे बड़ी गाली दी भी नहीं जा सकती जो उन्हें अपने कद से बहुत छोटा बना देती है  ।
कुछ दूसरे हम जैसे लोग भी उन्हें शायद याद  करेंगे जो उनके चित्र से अपने ड्राइंग रूम या ऑफिस सजाते है । हम जैसे लोग उनके इतिहास को याद करने की कोशिश करेंगे ,उन्हें याद करने की कोशिश करेंगे केवल एक व्यक्ति के रूप में ,एक नेता के रूप में और थोडा सा स्वतंत्रता सेनानी के रूप में भी शायद याद कर लें ।  पर उनकी बातो पर ध्यान नहीं देंगे ,उनके विचारो को अपनी अलमारियों के सबसे पीछे खाने के लिए छोड़ देंगे । डॉ लोहिया अगर चाहते तो पूरी जिंदगी सांसद रह सकते थे । वे चाहते तो नेहरु जी की सरकार से लगातार केंद्र का महत्वपूर्ण मंत्री रह सकते थे । वे चाहते तो दिल्ली के एक शानदार बंगले का सुख उठा सकते थे ।
पर फिर इतिहास चक्र कौन लिखता ,कौन  सीता और सावित्री और द्रौपदी  के बहाने औरतो की स्वतंत्रता की चर्चा छेड़ता । फिर चित्रकूट में रामायण मेला  लगा कर संस्कृति को सहेजता कौन ? देश विभाजन के गुनाहगार की चर्चा नहीं कर सकते थे वे । राम ,कृष्ण ,शिव या केवल कृष्ण लिख कर इनके बहाने जीवन संस्कृति ,जिम्मेदारियों ,मर्यादाओ ,और न्याय की चर्चा नहीं कर पाते वे । तब कहा सगुण और निर्गुण की बात हुयी हुयी नए संदर्भो में । तब नहीं हुयी होती चर्चा संसद में अमीरी और गरीबी की इतनी बड़ी खाई की तीन आना बनाम छ आना की बहस के साथ । तब कौन भारत को चीन के आक्रमण से आगाह करता । कौन होता जो तिब्बत की लड़ाई लड़ता । तब शायद गोवा की आजादी और लम्बी हो जाती और नेपाल में जागरण का सूरज देर से पहुँचता । कौन दहाड़ कर कहता की हिमालय बचाओ और जिस पानी की आज चर्चा है उसकी बुनियाद किसने  रखी होती गंगा बचाओ का अभियान चला कर और उसके बहाने सभी नदियों को बचाने  की आवाज लगा कर । तब कौन कहता की दुनिया को सात क्रांतियों की जरूरत है वो रंग भेद के खिलाफ हो ,यानि चमड़ी की हो ,वो स्त्री पुरुष के बीच भेद की हो ,वो जाती के आधार पर भेदभाव के खिलाफ हो ,वो धर्म के आधार पर भेदभाव के खिलाफ हो ,गरीबी अमीरी के भेदभाव के खिलाफ हो इत्यादि । तब कौन इबारत लिखता चौखम्भा राज की जिसके आधार पर आज का भारत गाँव से देश तक चार सरकारों से संचालित होता है ।
यदि डॉ लोहिया ने सब सुख स्वीकार कर लिया होता तो कौन तोड़ता आज़ादी के बाद भी हमें मुह चिढाती अंग्रेजो की मूर्तियों को और महीनो इसके लिए जेल काटता  राजनारायण जैसे साथियों के साथ और मूर्तियाँ आज भी हमारे सीने पर मूंग दल रही होती । तब कौन लड़ाई छेड़ता अंग्रेजी हाय हाय की जिसकी एक परिणिति अभी दिखलाई पड़ी है जब आई ए  एस के इम्तहान से अंग्रेजी की बाध्यता समाप्त कर दी गयी है । तब कौन लड़ता नौजवानों के लिए विश्वविद्यालयो और कालेजो में जा जा कर और उन्हें आने वाले समय में लोकतंत्र का मजबूत हथियार बनाता । कौन  कहता की किसान को उसकी उपज का मूल्य दो और गरीब को उसका हक़ । वे नहीं कह पाते ; संसोपा ने बांधी गांठ और पिछड़े मांगे सौ में साठ ; और आज का सामाजिक न्याय का परिदृश्य भी शायद  दिखलाई नहीं पड़ता या अभी शैशव अवस्था में घुटने पर चल रहा होता । यदि उन्होंने मंत्री पद स्वीकार कर लिया होता तो कौन बताता इस देश को की पहाड़ जैसे सत्ता में बैठे लोगो से कैसे टकराया जा सकता है और कौन अहसास करवाता की विपक्ष भी कुछ होता है । कौन गैर कांग्रेसवाद का सिद्धांत देकर अजेय कांग्रेस की देश में नौ सरकारें गिरा  कर रास्ता दिखाता की कांग्रेस की सरकार हटाई भी जा सकती है । कौन लड़ता नेहरु जी जैसे बड़े नेता से और ये कहने का सहस करता की मै जानता हूँ की पहाड़ से टकरा रहा हूँ पर टकराते टकराते मैं दरार तो पैदा कर ही दूंगा जिसे कल कोई गिर भी देगा ।
हाँ जो सब छोड़ने को तैयार होते है वही नए समाज की रचना करते है ,वही देशी की आजादी के योद्धा होते है ,वही सामाजिक और आर्थिक क्रांतियाँ करते है । वही समाज को रास्ता दिखाते है । वही उंच नीच के भेदभाव से लड़ते है । ऐसे लोग ही होते है क्रांतिदूत ,समाज परिवर्तक ,और महामानव  । मुझ जैसे लोग लोग जो उन्हें पढ़ कर और जान कर राजनीती में आ गए पता नहीं उनके अभियान को कुछ इंच भी सरका पाए या नहीं । पता नहीं समाज को बदलने की बात करते करते खद ही बदल गए या नहीं । पता नहीं लोगो को न्याय दिलाते दिलाते खुद अन्याय का शिकार तो कही नहीं हो गए । लोगो को खुशहाल बनाते बनते खुद तो बर्बाद नहीं हो गए । पर आज मुझ जैसे उनके तमाम दीवानों का उस चिन्तक और त्यागी डॉ लोहिया को सलाम ।हाँ आज भी मुलायम सिंह यादव तथा अखिलेश यादव जैसे लोग उनके सपनो को याद कर कर के जमीन पर उतारने की कोशिश कर रहे है ,और कोशिश कर रहे है की डॉ लोहिया सदा जिन्दा रहे और उनके सिधान्तो की लौ जलती रहे ।  आइये कुछ उनके विचारो पर हम भी  विचार भी कर ले । उन्हें पूरे देश का सलाम ।




                                                                      
                                                                                       

                                                                                                

                                                                                            


बुधवार, 20 मार्च 2013

अथ बेनी कथा सम्पन्न्तः

अरे बेनिया तो बहुत ही चर्चा में हुई गवा । कौनो नहीं पूछ रहा था वोका पर केहू को ढंग से बस गरिया दिया और चारो ओर वाही की बात हुई रही है । कुल अखबार में वोका तमाम जगह मिल गयी जो जिनगी में नहीं मिली थी । कुल टी वी वाले अपना धंधा पानी का खियाल किये बिना बेनिया ,बेनिया ही रट रहे है और तमाम चेहरा चमकाऊ लोगन को बुला बुला ,घेर घेर कर बस बेनिया बेनिया ही बतिया रहे है । बस यही बात नहीं हुई रही है खुल कर की बेनिया का बोल ,चर्चा केवल उकी भाषा और गाली की हुई रही है ।
वह रे बेनिया तू तो बड़ा ही तेज निकला ,खूब दाव चला और सबकी निगाह में आ गया । वर्ना चुपचाप धंधा पानी में बीजी था । कभी कभी बात तो हुई बेनिया के बारे में पर या तो धंधा और घोटाले की हुई या फिर जुबान फिसलने की हुयी । इस ससुर जुबान हुई की पोखरी या नल किनारे की कई हो गयी की जब चाहो फिसल जाओ । खैर बेनिया  को फिसलने से कौनो फर्क नहीं पड़ता ।जौन  ससुर को पड़े वो नाला और पोखरी के किनारे न जाये और बेनिया फिसल गया तो आंख बंद कर ले ।
पर बेनिया चर्चा में खूब है बस यही चर्चा है । हम जैसे लोग तो जल भुन कर खाक हुई गए है की आखिर हमारी जुबान कहे नहीं फिसलती है और हमार दिमाग बेनिया की तरह काम कहे नहीं करता है की कब फिसल जाएँ पूरा नंगा होकर की खूब फोटो छपे और खूब चर्चा हुई जाये । धिक्कार है ऐसे सभी हम जैसन को जो चर्चा में आना नहीं जानते । वैसे बेनिया से पूछेंगे जरूर की यार कोई कोचिंग कहे नहीं खोल लेते जुबान फिसलने की सही टाइमिंग और सही शब्द का इस्तेमाल करने की । वैसे तुम्हारी बोली भाषा थोड़ी क्लिस्ट है तो शब्दार्थ ,भावार्थ की एक कुंजी भी छाप दो बहुत धंधा होगा । ये भी खूब विचार आ गया हम जैसे अज्ञानी के दिमाग में की गाली और सही समय दी गयी गाली और उसकी कुंजी से भी धंधा हो सकता है ।
पर बेनिया दोस्त हमारी राय को हम पर ही मत अजमा देना । हम बहुत कमजोर है सदमे से मर जायेंगे । वैसे हमें अभी याद आया की एक दिन हम अस्पताल में थे तो तुम्हारा एक फोन आया था किसी माँ को ऐसी ही गाली देते हुए तुमने उसके लडके को भी कुछ कुत्ता पिल्ला टाइप कहा था । खैर तुम महान हो और दुनिया के सारे अज्ञानी और गली तथा उसकी टाइमिंग नहीं जानने वाले तुम्हे सलाम करते है । और ऐसे अपने बेनिया की कथा को हम आज भरे मन से आज इतने पर ही विराम देते है क्योकि ज्यादा कह देंगे तो बहुत भावुक हुई जायेंगे और बेनिया के दोस्त भावुक हो इ अच्छा थोड़े लगेगा ।भावुकता तो इंसानों में होती है और इंसान न्न्न्न्न्न्न्न
।नहीं बिलकुल नहीं । अथ बेनी कथा सम्पन्न्तः ।