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शुक्रवार, 23 नवंबर 2012

                                             महामानव  लोकबन्धु राजनारायण                                 [ डॉ सी पी राय ]
                                                                                                    प्रदेश महासचिव सपा एवं राज्यमन्त्री
नेताजी के नाम से प्रसिद्द राजनारायण जी हर वक्त केवल जन और जनतंत्र की सोचते थे जागते हुए और मुझे लगता है की सोते हुए भी । लखनऊ की दो घटनाये उनके आम जन की चिंता और उसकी लड़ाई को दर्शाने के लिए काफी है । पहली -एक समय तक लखनऊ रेलवे स्टेशन के अन्दर रिक्शा नहीं जा सकता था । नेताजी अन्दर रिक्शे से जाने की जिद कर बैठे और मना होने पर उसी रिक्शे पर खड़े होकर भाषण देने लगे । मजमा जुटने लगा हजारो की भीड़ लग गयी रास्ते  बंद हो गए ,लोगो की ट्रेन छूटने लगी पर नेताजी कहा मानने वाले थे । जब सरकार ने रिक्शे को अन्दर जाने की इजाजत दे दिया तभी उनका वो तात्कालिक आन्दोलन समाप्त हुआ और आज सभी स्टेशन में रिक्शे से जा सकते है ।दूसरा - ऐसा ही उनका रिक्शा आन्दोलन राजभवन में प्रवेश को लेकर हुआ और फिर सरकार को झुकना पड़ा तथा वे राजभवन में रिक्शे से ही गए ।
इस तरह के आन्दोलनों के वर्णन से पूरा ग्रन्थ तैयार हो सकता है ।उन्हें आज की तरह अच्छाई ,बुराई ,फायदा ,नुक्सान सोचने की आदत नहीं थी । जहा भी जन तकलीफ में दिखा या कोई बात जन के खिलाफ दिखी ,जहा भी जनतंत्र को खतरा दिखा या कोई कमजोरी दिखी राजनारायण जी वहा स्वतः मौजूद दिखते थे और जहा वो खड़े हो जाते थे वही आन्दोलन अपने आप पैदा हो जाता था ।
गडवाल का बहुगुणा जी का चुनाव हो या बाबू  बनारसी दास जी का  ,माया त्यागी कांड हो या चौधरी चरण सिंह जी के खिलाफ उनका चुनाव ,पंडित कमलापति त्रिपाठी जी के खिलाफ उनका बनारस का चुनाव हो या इंदिरा जी के खिलाफ रायबरेली का चुनाव राजनारायण जी की संघर्ष क्षमता ,नेतृत्व क्षमता ,आदर्श राजनैतिक सोच ,विरोधी के प्रति भी मर्यादा का पालन ,जीत और हार को सहज भाव से स्वीकार करने का गुण ,तमाम ऐसी बाते है जिनका आज अभाव दीखता है और लोग उनसे बहुत कुछ सीख सकते है ।
वे केंद्र सरकार के मंत्री बने तो सादगी की मिसाल ही नहीं पेश किया बल्कि ऐसा काम किया की रूस के प्रावदा ने लिखा की भारत में एक ही मंत्री है जो सचमुच समाजवादी फैसले कर रहा है । बेयर फूट डॉक्टर की उनकी योजना के द्वारा दूरस्त गाँवो में प्रारंभिक चिकत्सा की सुविधा पहुचाने के साथ लाखो को रोजगार देने का काम भी हुआ । चलते फिरते पूर्ण अस्पताल वाली गाड़ियाँ भी उनकी गरीबो और गाँवो को चिकित्सा सुविधा देने के उनकी चिंता और चिंतन को दर्शाती है ।
पंजाब के बटवारे के समय संसद में दिया गया उनका भाषण और उसमे आने वाले समय में आतंकवाद और अलगाववाद के सर उठाने की चिंता उनके दूर तक देख सकने वाली क्षमता  दिखती है ।जनता सरकार बन जाने पर इंदिरा जी को पूर्व प्रधानमंत्री होने और स्वतंत्रता सेनानी होने के नाते उचित सम्मान और निवास तथा सुरक्षा देने के बारे में मंत्रिमंडल में कही गयी बातें उनके बड़े दिल और लोकतंत्र के प्रति आस्था को को दिखाती है जब उन्होंने कहा की न्यायलय इंदिरा जी के साथ क्या करेगा ये उसका काम है पर हमारी सरकार को उनके साथ वो करना चाहिए जो हम अपने लिए सही समझते है । उन्होंने यहाँ तक कह दिया था की यदि उन्हें दिल्ली में निवास नहीं दिया तो उन्हें तो केवल एक कमरे की जरूरत है ,वे अपना मंत्री वाला बाकी  घर इंदिरा जी को दे देंगे । ये एक बडा सोचने और आगे का राजनीतिक व्यव्हार तय करने वाले नेता का वक्तव्य था ।उनकी बात नहीं मानी गयी और तत्कालीन गृहमंत्री अपने काम पर ध्यान देने के स्थान पर केवल इंदिरा जी के पीछे पड़  गए और उसका जो परिणाम सामने आना था आया ,वर्ना जानने वाले जानते है की राजनीती की दशा और दिशा कुछ और होती ।
एक किसान नेता और सचमुच जनाधार वाले नेता को प्रधानमंत्री बनाने का उनका सपना और संकल्प जूनून तक चला गया जब बिना जनधार वालो ने जनधार वालो को अपमानित करना शुरू किया और देश अपने तरीके से हांकने का प्रयास किया । उनका विद्रोही स्वाभाव और उग्र हो गया जब षड़यंत्र द्वारा गरीबो के नेतृत्व को प्रदेशो में पदस्थ करने की मुहीम चली । उन्होंने आगे आने वाले समय की गुप्त चुनौतियों को देखा उसकी जड़ पर हमला करना शुरू कर दिया जब आधे लोग सत्ता में आये और दल में आये आधो को आने वाले षड़यंत्र के लिए अलग छोड़ दिया गया ।
क्या क्या लिखूं ? क्या लिखूं की कैसे उनको जरा सा बीमार जान कर इंदिरा जी पैदल ही उनके घर तक चली आई थी प्रधानमत्री होते हुए ,क्या लिखूं की संजय गाँधी को उन्होंने संघर्ष का क्या मंत्र दिया ,क्या लिखूं की उन्होंने ऐसे तमाम लोग जिन्होंने अपने शहर नहीं देखे थे उन्हें प्रदेश और देश की राजधानी दिखा दिया ,क्या लिखूं की देश के कानून की पढाई करने वाले और अदालत में जाने वाले राजनारायण जी को पढ़े बिना काम नहीं चला पाएंगे ? क्या लिखूं की अपने को संसदीय दल का नेता चुन लिए जाने के बाद एक दिन पहले तक उनकी लानत मलानत करने वाले को उन्होंने नेता चुनवाया और प्रधानमंत्री बनवा दिया ? क्या ये लिखूं की उनकी बात मान ली गयी होती और इस्तीफ़ा नहीं देकर सदन चलाया गया होता तो राजनीती कुछ और होती ? क्या ये लिखू की वो भी जाति की राजनीती कर रहे होते तो जिंदगी भर संसद में रहे होते पर इतिहास नहीं रचा होता । क्या ये लिखूं की इतने बड़े नेता जिसने दिल्ली को पलटा  ,प्रदेशो के नेतृत्व तय किया उनके बच्चो को कोई नहीं जानता  था ,या ये लिखू की जब उनका दल कमजोर हो गया था और उनके एक बेटे ने मनीराम बागड़ी से कहलवाया की टाइप और फोटोस्टेट मशीन उसे दे दिया जाये तो उसका खर्च चल जायेगा तो नेताजी ने जवाब दिया की पार्टी का है पैसा जमा कर दो ले जाओ ,क्या क्या बताऊ ?
जहा तक व्यक्तिगत अनुभव का सवाल है तो नेताजी की केंद्रीय मंत्री होने के बावजूद बिना स्थानीय प्रशासन की जानकारी के मुझ जैसे किसी भी कार्यकर्ता के घर अचानक पहुँच जाते थे की चाय पिलाओ और चलो कही चलना है । आन्दोलन में 20 जानवरों को लाठी चार्ज होता है शाम को जेल जाते है और 21 जनवरी को सुबह 10 बजे नेता जी दिल्ली से चल कर आगरा की जेल में हाजिर है ।104 बुखार में दवाई लेकर मेरी शादी की पार्टी में खड़े है और लोगो से मिल रहे है । मेरी बेटी के पैदा होने पर निमत्रण देने पर कहते है की मै  व्यस्त हूँ कर्पूरी ठाकुर और सतेन्द्र नारायण सिन्हा की पंचायत की जिम्मेदारी चंद्रशेखर जी मुझे दिया है और पार्टी वाले दिन केवल आधे घंटे के लिए दलबल को लेकर वो पहुँच जाते है । कभी नहीं लगा की उनसे कोई पद मांगे ,वैसे ही बड़ी ताकत महसूस होती थी । देश में कही भी हो लगता था की राजनारायण जी साथ खड़े है किसी से डरने की जरूरत नहीं है । ऐसा हुआ भी जब हैदराबाद में कोई दिक्कत आई पर बस एक फ़ोन किया और समस्या ख़त्म । इतने बड़े संबल ,इतने बड़े लड़ाके  ,इतने बड़े और सच्चे समाजवादी ,इतने बड़े दिल वाले ,इतने बड़े राजनैतिक भविष्यवक्ता ,लोकतंत्र और सिधान्तो के इतने समर्पित इंसान और भारत के लोकतंत्र को मायने देने वाले महामानव को मेरा शत शत नमन ।

गुरुवार, 1 नवंबर 2012

क्यों कुछ लोग ऐसे होते है

क्यों कुछ लोग ऐसे होते है की उन पर विश्वास करें या नहीं करें कुछ समझ में नहीं आता है । पर इसके लिए जिम्मेदार भी तो वही होते है, अपने अनिर्णय के कारण और कभी कह कर मुकरने के कारण । क्यों कुछ लोग होते है जिनके लिए कभी बहुत सम्मान पैदा होता है मन में पर दूसरे ही पल घृणा होने लगती है उनसे । जब कोई ऐसी स्थिति से लगातार गुजर रहा हो तो कैसी उथल पुथल भरी होती है उसकी जन्दगी में ,उसके मन में और उसके खून के कतरे कतरे में ।
कुछ लोग बहुत बड़े हो जाते है लोगो को इस्तेमाल कर और सीढियां बना कर ,तमाम लोगो के साथ फरेब कर ,तमाम लोगो के साथ कसाई बन कर उसकी उम्मीदों उसके भविष्य और उसके दिल पर छुरियां चला कर बार बार । न जाने कितनो की क़ुरबानी होने और उनकी जिंदगियों को मिटा कर और उन्हें पावडे बना कर उसे खूबसूरत कालीन समझ उस पर चल कर बुलंदियां पाते है ये लोग । घायल कितने पड़े है पीछे उन्हें वैसे ही भूल जाते जाते है जैसे चलते हाथी को पता ही नहीं होता की कितने कीड़े मकोड़े शहीद हो गए उसके पैरों के नीचे । सच है ऐसे लोगो को लोग कीड़े मकोड़े से ज्यादा महसूस ही नहीं होते कभी भी ।
ये किसकी कहानी है क्या बताऊ । ऐसी तमाम कहानियां बिखरी पड़ी है चारो तरफ और ऐसे चरित्र कोई कहानी के काल्पनिक पात्र नहीं बल्कि चारो तरफ फैले हुए । इनके शिकार भी भरे हुए है चारो तरफ । नाम लेना जरूरी नहीं है और ऐसे लोग नाम नही बस बड़े होते है और हजारो साल पहले ही किसी ने कह दिया था की ; समरथ को नहीं दोष गुसाई ;। बाकी लोगो के भी नाम नहीं बस वे इस्तेमाल होने और गर्त में खो जाने वाले कीड़े मकोड़े है ।
ऐसा मंथन सचमुच समुद्र मंथन से कम नहीं होता है । समुद्र मंथन में तो विष निकला था तो अमृत के साथ बहुत सी अच्छी चीजें भी निकली थी ,पर इस समुद्र मंथन में तो केवल विष ही निकलना है और निकल भी रहा है ।
इस विष की कहानी से दूर बड़े मस्त है अपने वैभव ,अपनी आभा ,अपनी सत्ता और अपने गुरूर में । उन्हें परवाह ही नहीं  है की कोई जीए या मरे । कोई  रहे या न रहे । कोई अपमानित हो या सम्मानित । उन्हें तो बस अपनी और अपनों की चिंता है और चिंता है लाखो साल आगे तक की सत्ता और वैभव की । पता नहीं इन्हें राम ,कृष्ण ,बुद्ध ,महावीर ,नानक ,ईशा ,रावण ,कंस ,जदीज और तमाम राजाओं ,नवाबो की उठती और डूबती जिंदगियो से कुछ सीखने को मिला है या नहीं । पता नहीं दुनिया के सिद्धांतो से ऊपर उठकर इन्हें अमरत्व मिल गया है क्या ? क्या इन्हें कोई वरदान मिल गया है की ये और इनके अपने लाखो साल तक सत्ता और वैभव भोगेंगे ,बिना किसी बीमारी के ,बिना किसी पतन के । इन्हें ये अमरत्व मुबारक ,इन्हें ये वैभव मुबारक ,इन्हें ये सत्ता मुबारक ,इन्हें लोगो की हत्या मुबारक ,इन्हें लोगो को दिए धोखे मुबारक ,इन्हें आगे भी इनके हाथ से चलने वाली छुरियां मुबारक ,इन्हें इनकी चालबाजियां मुबारक । ये कौन है ---- ये मै क्यों बताऊँ ? आप सभी आँखें खोलिए और देख लीजिये ऐसे किसी एक को या बहुतों को । आप को ये ज्ञान मुबारक जो आप को ऐसे लोगो से बचा सके ।

बुधवार, 26 सितंबर 2012



                                  कागज पर न हो पर दिलो में लिखा है रास्ट्रपिता                    डॉ 0 सी 0 पी 0 राय
                                                                                                                    स्वतंत्र चिन्तक एवं स्तम्भकार

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          पिछले दिनों एक समाचार ने पूरे हिंदुस्तान ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया का ध्यान अपनी तरफ खींचा और सभी को सोचने को मजबूर ही नहीं किया बल्कि महात्मा गाँधी को महापुरुष मानने वालों और दिलो में रास्ट्रपिता पिता मान चुके लोगो की आस्था को हिला कर रख दिया । मुझ जैसे करोडो लोग बचपन से बापू को रास्ट्रपिता मानते आये थे और ये समझते थे की आजाद भारत ने सर्वसम्मति से उन्हें इस उपाधि से नवाजा होगा जसे अन्य बहुत से देशो अपने देश के महापुरुषों को ;फादर ऑफ़ द नेशन;जैसे शब्दों से समय समय पर नवाजा है । पर जब कुछ लोगो ने पता नहीं किन कारणों से सूचना के अधिकार के द्वारा भारत सरकार से ये जानकारी माँगा कि क्या महात्मा गाँधी को रास्ट्रपिता की उपाधि से भारत ने नवाजा है ? यदि हाँ तो किस आदेश या प्रक्रिया द्वारा और कब ?इस सवाल का भारत सरकार द्वारा दिया गया जवाब ही इस चर्चा का कारण बना ,जब भारत सरकार ने जवाब दिया की ऐसा तो कुछ भी और कभी नहीं हुआ । ऐसा कोई अभिलेख भारत सरकार के संज्ञान में नहीं है । आश्चर्य तो इस जवाब पर नहीं है बल्कि इस बात पर है की इस जवाब के बाद भी न तो कांग्रेस की सरकार जो अपने को महात्मा गाँधी को मानने वाली कहती है उसने इस भूल का सुधार करने की तरफ कोई कदम बढ़ाने की कोशिश किया और न देश भर में बापू के नाम की रोटी खाने वालो ने ही इस पर कोई मुद्दा बनाने की कोशिश किया ।
          क्या मुश्किल हो जाती भारत सरकार को यदि वो अब से ऐसा कर देती और संसद तथा सभी विधान सभावो में सर्वसम्मति प्रस्ताव पास कर देती की पुँरानी गलती सुधारते हुए महात्मा गाँधी को देश रास्ट्रपिता स्वीकार करता है । जबकि ऐसा दुनिया के अन्य देशो ने अपने देश के दुनिया में कम चर्चित लोगो के साथ किया है ।1- अहमद शाह दुर्रानी [अफगानिस्तान  ]2- डान जोश डी सैन मार्टिन [ पेरू ] 3- सर लिंडन पिडिंग [ बहमास ] 4-शेख मुजीबुर्रहमान [ बंगला देश ] 5 -जोर्ज केडल प्रायिस [ बेलायिस ] 6- साइमन बोल्वियर [बोलविया ] 7-डोम पेड्रो [ ब्राजील ] 8 - बर्मान्दो ओ हिंस [ चिली ] 9 - सू यां चेन [ चाइना ] 10 - साइमन बोल्वियर [ कोलंबिया ] 11- कार्लोस मैनुअल [क्यूबा ] 12 -सुकर्णो [ इंडोनेशिया ]13 - विकटर इमैनुअल[ इटली ] 14 - थिओडोर हर्जिल [इज़राइल ] 15 -टुंकु अब्दुल रहमान [ मलेशिया ] 16-शिवसागर रामगुलाम [ मारीशस ] 17 -सैम नुजोमा [ नाम्बिया ] 18 - विलयम द साइलेंट [ नीदरलैंड ] 19 - इनर गर हर्द्सन [ नार्वे ] 20 - मोहमद अली जिन्ना [ पाकिस्तान ] 21 -डोन स्टीफन सर् नायके [ श्री लंका ] 22- जुलियस न्यरेरे  [ तंजानिया ]23 -मुस्तफा कमाल अता तुर्क [टर्की ] 24 - जोर्ज वाशिंगटन [ अमेरिका ] सहित ऐसे  कई महापुरुष हुए कई देशो में जिन्हें उन देशो ने अपने देश में फादर ऑफ़ द नेशन स्वीकार किया । जब की ये  तमाम नाम अपने देशो की सीमाओं में कार्यों की दृष्टि से बंधे रहे और हमारे बापू ने देश की सीमाओं \ को तोड़ कर दुनिया को रास्ता दिखाया और अपने सिद्धांतो का मुरीद बनाया ।
          मार्टिन लूथर किंग से लेकर वर्तमान राष्ट्रपति ओबामा तक ने उन्हें अपनी लड़ाई और जीवन का प्रेरणा श्रोत माना और आज भी मान रहे है । बापू की रोशनी ने ऐसी ताकत दी की नेलशन मंडेला ने पूरी जिंदगी जेल में बिता दिया और तभी वापस बाहर आये जब दक्षिण अफ्रीका में बापू द्वारा छेड़ा गया युद्ध जीत लिया ।आज संयुक्त रास्ट्र संघ ने बापू के जन्मदिन को वर्ड पीस डे मान लिया और मनाना शुरू कर दिया । दुनिया के तमाम देशो ने इन वर्षो में बापू के अहिंसा को हथियार बना कर उसी तरह अपनी लड़ाइयाँ जीत लिया जैसे बापू जिसका सूरज अस्त नहीं होता था उसके खिलाफ बिना हथियार उठाए जीता था । जहा स्वतंत्रता और गैर बराबरी की लड़ाइयाँ बची है ,वे लगातार बापू के हथियार को मांज रहे है और बस कदम उठाने की देरी है ।
             सरकार किसी कागज पर लिखे या न लिखे पर जिस  दिन सिंगापूर में आजाद हिंद रेडियो को पहली बार संबोधित करते हुए महान रास्त्रभक्त नेता जी सुभाष चन्द्र बोस ने बापू को रास्ट्रपिता कह कर संबोधित किया भारत ने और करोडो भारतीयों ने तो उसी दिन अपने दिलो पर लिख दिया रास्ट्रपिता महात्मा गाँधी ।दुनिया ने भी मान लिया की दुनिया को रास्ता दिखने का दावा करने वाले हिंदुस्तान ने दुनिया के बीसवी सदी के आश्चर्य [ जैसा की महान वैज्ञानिक आइन्सटीन ने महात्मा गाँधी के बारे कहा था जब ये कहा था की शायद आने वाली पीढियां विश्वास ही नहीं कर पाएंगी की कभी पृथ्वी पर ऐसा हाड़ मांस का कोई पुँतला भी चला था । तभी उन्होंने कहा था की बीसवी सदी में दो आश्चर्य हुए है 1- अणु बम्ब और 2- महात्मा गाँधी ।] को ये छोटी सी उपाधि दे दिया है ।
               पर सच्चाई में ये नहीं हुआ । जैसा की हमेशा होता है सत्ता की चकाचौंध कुछ मतिभ्रम पैदा कर देती है और उसकी चमक घेर लेती है सभी को ,वो भूल जाता है उन लोगो को जिनके कारण वो सत्ता के दरवाजे तक पंहुचा होता है । भारत में भी यही हुआ और बापू को सामान्य सा सम्मान देना भी भूल गया भारत का शासन ।
सवाल ये है की क्या अब इस भूल का सुधर तुरंत नहीं होना चाहिए । क्या बापू को दुनिया ने याद रखा और मान्यता दिया पर वो अपने देश में ही बेगाने हो गए । क्या बहुत छोटे छोटे स्वार्थो को लेकर संसद और विधान सभाओ में हंगामा मचाने वाले लोग एक दिन कुछ मिनट खर्च कर सर्वसम्मति से बापू के रास्ट्रपिता होने का प्रस्ताव पास नहीं कर सकते । उस दिन का इंतजार है मुझे भी ,दुनिया को भी और कही दूर से देखते हुए महात्मा गाँधी को भी और उनके मानने वाले दुनिया के करोडो लोगो भी । देखे ये दिन कब आयेगा ।

                                                                                                   डॉ 0 सी 0 पी 0 राय
                                                                                        स्वतंत्र चिन्तक एवं स्तम्भकार
                                                                                     13/1 एच आई जी फ़्लैट संजय प्लेस आगरा
                                                                                                  094122 54400
                                                                                          [ cprai1955@yahoo.co.in


                                                                                      


शुक्रवार, 21 सितंबर 2012

क्या भारत में 1- बंद को बंद कर देना चाहिए ? 2- क्या सभी तरह के रास्ते रोकना बड़ा अपराध घोषित होना चाहिए ? 3 - क्या रास्ट्रीय दिवस को छुट्टी के स्थान पर पूरे समय मौजूद रह कर उसकी याद और उस पर चर्चा होनी  चाहिए ? 4- क्या महापुरुषों के दिवस पर छुट्टी के बजाय  ज्यादा कार्य दिवस कर देना चाहिए जिसमे आधा समय उस महापुरुष पर चर्चा और आधे समय में ज्यादा  काम हो । हाँ तीज त्यौहार भारत की आत्मा है उनके लिए छुट्टी भी हो और हर स्तर पर पूरी तरह मनाया भी जाना चाहिए । क्या देश और देशवासी सहमत है 
प्रधानमंत्री जी की बातो पर भरोसा करना चाहिए और उन्हें समय तथा विश्वास भी देना चाहिए ।1991 यदि उन्होंने दोहराया तो निश्चित ही देश हित में चमत्कार होगा ।ऐसा लगता है की उनमे इतिहास के प्रति जवाबदेही का जबरदस्त अहसास पैदा हो गया है । जब किसी में इतिहास के प्रति ये अहसास पैदा होता है तो वो इतिहास बनाता है ऐसा इतिहास बताता है ।

गुरुवार, 20 सितंबर 2012

क्या भारत की संसद को एक सर्वसम्मति से प्रस्ताव पास कर बापू यानि महात्मा गाँधी को नेताजी द्वारा दिया गया रास्ट्रपिता का दर्जा दे देना चाहिए । दुनिया ने जो मान लिया उसे सांवैधानिक स्वरुप देना क्या अपने देश को गौरवान्वित करना नहीं होगा । वैसे कुछ नासमझ भी यहाँ बोलने की कोशिश करेंगे । उचित ये है की वे दुनिया के महानतम को मान न दे सके तो यहाँ कुछ न कहे ,अन्यथा मै उन सभी को ब्लोक कर दूंगा । ये मेरे सहित दुनिया के करोडो लोगो की भावना का सवाल है ।

रविवार, 26 अगस्त 2012

देश के सबसे बड़े घोटाले --ब्रेकिंग न्यूज़ ----- अगर भारत का कारगिल नहीं होता तो 2 लाख करोड़ बचाता ,ब्रेकिंग न्यूज़ ,बड़ा घोटाला ,अगर बंगला देश का युद्ध नहीं होता तो तीन लाख करोड़ बचाता ,अगर 1965 का युद्ध नहीं होता तो चार लाख करोड़ बचता ,,ब्रेकिंग न्यूज़ बड़ा घोटाला ,अगर देश में स्कूल ,अस्पताल ,दफ्तर सड़के ,पुल बेराज बिजलीघर और सभी कुछ प्रधानमंत्री खुद खड़े होकर बनवाते और सारे मंत्री ,एम् पी ,एम् एल ए सारे अधिकारी और कर्मचारी खुद खड़े होकर बनवाते और खुद भी मजदूरी करते तो करोडो ख़रब बच सकते थे ,,ब्रेकिंग न्यूज़ ,देश का सबसे बड़ा घोटाला ,सब चोर है हम भी और आप भी और बाकी सब भी ---- चलो रामलीला मैदान या जंतर मंतर
वैसे आज मै सिकंदरा { आगरा } शहर का ही हिस्सा गया था वहा से सेब खरीदा 50 रुपये किलो ,थोडा और शहर के अन्दर आया तो 100 और थोडा और अन्दर 120 से 150 हो गया आज ही ,ये भ्स्ताचार है या नहीं ? लडके और लड़की में फर्क भ्रस्ताचार है या नहीं है ? औरत आदमी का फर्क भ्स्ताचार है या नहीं ? जाती के आधार पर धर्म के आधार पर नफ़रत भ्स्ताचार है या नहीं ? अपने बच्चो को केवल घूस वाली नौकरी दिलाने की कोशिश भ्रस्ताचार है या नहीं है ? बिना दहेज़ के शादी नहीं करना भ्रस्ताचार है या नहीं है ,टीचर द्वारा नम्बर बढ़ाना ,या गुस्से में फेल कर देना ,डॉ द्वारा महँगी दवाई लिखाना ,महंगे जाँच करवाना ,कमीशन खाना भ्स्ताचार है नहीं ,व्यापारी द्वरा लूट और मिलावट ,जमाखोरी ,मुनाफाखोरी भ्स्ताचार है या नहीं ?गलत तरीके से सड़क पर चलन ,कानूनों का पालन नहीं करना ,कही भी थूक देना और कुछ भी करने खड़ा हो जाना ,कूड़ा कही भी फेंक देना ,दूसरो की बहन बेटियों को छेदना और मौका लगता ही कुछ भी कर बैठना ,रिश्तों को गन्दा करना क्या भ्स्ताचार है नहीं ? दोस्तों बहस पूरी करे । जरा अपने गिरेबान में झांक कर देखें की आप खुद कितने इमानदार है और देश के लिए समाज के लिए सचमुच क्या करते है है और जब वोट डालने जाते है तो क्या सोच कर वोट डालते है बस फिर तय हो जायेगा की लड़ाई कहा से शुरू हो यदि सचमुच हम देश और समाज बदलना चाहते है ।बाकि जिसके जो चस्मा चमड़ी में ही चिपक गया है तो कोई बात नही गाली गाली खेलते रहे और देश और समाज जाये भाड़  में ।

गुरुवार, 9 अगस्त 2012

क्या कभी आगरा करवट लेगा ?

                            न जाने कितने करोडो खर्च होने के बाद भी आगरा में जब बरसात होती है तो तमाम प्रमुख चौराहे औए अच्छी कालोनी से लेकर बस्तियों तक बाढ़ जैसा दृश्य उपस्थित हो जाता है । जीवन नरक हो जाता है । इससे पहले गर्मी तेज होने पर पीने का पानी या तो नहीं मिलना या बहुत गन्दा बीमार करने वाला मिलता है । रोजमर्रा सड़क पर जाम की स्थिति है । जब बच्चो की छुट्टी होती है तो वे भी घंटों फंसे होते है ,दिल्ली की तरह उस समय कही भी ट्रैफिक पुलिस वाला व्यवस्था करता नहीं दीखता है । सडकों पर खड़े ट्रैफिक पुलिस वाले सड़क पर निर्बाध लोग चलते रहे इसके बजाय  थोड़े से रुपये के लिए खुद जाम लगवा देते है ।उनकी रूचि ट्रैफिक को चंलने से ज्यादा किसी गाड़ी को पकड़ने में होती है जाम लगी सड़क पर । दुनिया में अन्य स्थानों पर टूरिस्ट प्लेस पर बाहर से आये लोगो से अच्छा व्यव्हार करना उन्हें मदद करना व्यवस्था का कर्त्तव्य होता है पर आगरा के पुलिस वाले से लेकर तरह तरह के दलाल टूरिस्ट को रुला देते है । बच्चे औरते परेशान  हो या किसी को उसी दिन घूम कर कही और जाना हो पर जब तक वसूली पूरी नहीं हो जाती यहाँ का पुलिस वाला गाड़ी रोके रहता है ।बिजली करोडो रूपया लेकर प्राइवेट कंपनी को दे दी गयी पर वो पहले से ज्यादा रुला रही है बिल से भी और अनुपस्थिति से भी ।आप अगल बगल किसी बड़े शहर में चले जाइये चीजें सस्ती है पर आगरा का व्यापारी सभी को और उनके पैसे को अपना मानते हुए प्यार से खूब मुनाफा कमाता है और आगरा की जनता बड़े दिल से मानते हुए की आखिर ये मुनाफा हमारे ही किसी भाई के घर में जा रहा है ,कोई बहस नहीं करता । सहर्ष स्वीकार कर लेता है सब कुछ ।
                             नेता बयान देकर या एकाध दिन प्रदर्शन कर सौदा पट जाने पर मस्त है । एम् पी ,एम् एल ए ,किसी के पास आगरा के लिए न तो दूरगामी सोच है न योजना है और न सपने है और जब ये सब नहीं है तो संकल्प की तो कल्पना ही नहीं की सकती है ।मेरे एक मित्र कहते है की आगरा की जनता बत--द है और उसका नेता बनाना है तो गंभीर न तो बाते करो और न प्रयास बल्कि विशुद्ध बत --दे बनो । अब ऐसा लगता है इतने सालो में की यही सच है । बड़ी बात ये है आगरा कभी गुस्सा नहीं होता है अपने जरूरी मसलों पर, हाँ होता है गुस्सा किसी धार्मिक मामले पर ,जातिगत मामले पर ,कुछ खास नाम वालों की मूर्तियों या तस्वीरों को कुछ हो जाये तो देखिये गुस्सा । थोड़ी ज्यादा हो जाये फिर देखिये गुस्सा ,सड़क पर कोई छू जाये फिर देखिये गुस्सा । बस इंसानी जरूरतों पर ,विकास के अधिकार पर अपने पैसे के हिसाब पर ,नेताओं ,अधिकारीयों ,कर्मचारियों के दुर्व्यवहार और बेईमानी पर उसे गुस्सा नहीं आता । आगरा बड़ी ख़ुशी से इन सबको झेलता ही नहीं है बल्कि इन सबका रोज स्वागत करता है ,माला पहनाता है ,दावते देता है और फोटो खिंचवा कर गौरवान्वित होता है ।
                              बिजली नहीं आती कोई बात नहीं अपनी व्यवस्था के अनुसार ,हाथ का पंखा ,जेनरेटर ,इन्वेर्टर इत्यादि लगाव लेता है ,पानी नहीं या गन्दा आत्ता है तो हैण्ड पम्प ,जेट ,आर ओ लगवा लेता है या पानी के बोतल लेने लगता है ।अपनी सुरक्षा के लिए या तो गार्ड रख लेता है नहीं तो कट्टा खरीद लेता है और ये भी नहीं तो घर की छत पर बोतले और इंटें इकट्ठी कर लेता है । कितनी सहनशक्ति है आगरा में ।जी हाँ आगरा में जो अधिकारी गलती से भी आ जाता है वो इस शहर से इतना प्यार कर बैठता है की फिर जाना ही नहीं चाहता ।आगरा के लोग भी उसके प्यार में अभिभूत हो जाते है और उसका गुणगान करते है । नेता कुछ न करे बस मन की बात करता रहे वो सर पर बिठा लेते है उसको । है न मेरा आगरा महान ?
                               क्या मेरा आगरा कभी सचमुच अंतरास्ट्रीय शहर बन पायेगा ? क्या कभी यहाँ के एम् पी ,एम् एल ए ,जिला परिषद के अध्यक्ष ,मेयर ,अन्य ऐसे लोग जो विभिन्न समाजों और वर्गों या संस्थानों  के ठेकेदार है अपनी पार्टी ,जाती धर्म ,अहंकार सब छोड़ कर इकट्ठे होकर आगरा के लिए खड़े हो पाएंगे ? क्या कभी आगरा सर उठा कर कह सकेगा ;मै आगरा हूँ जो सम्पूर्ण भारत की राजधानी रहा हूँ ,मै आगरा हूँ जहा दुनिया का एक आश्चर्य ताजमहल है ,मै आगरा हूँ बड़े बड़े शायरों ,लेखको,कवियों को पैदा करने वाला ,मै आगरा हूँ दुनिया में भारत की एक मजबूत पहचान ,जी हाँ मै आगरा हूँ और मुझे अपने होने पर गर्व है । मेरे शहर के नेता और अफसर और हम भी केवल बत --दी नहीं करते है बल्कि देखो हमने कर के दिखा दिया ,आगरा के अधिकारों को छीन  कर दिखा दिया ,हमने आगरा को अंतररास्ट्रीय शहर बना कर दिखा दिया । देखो इसके चारो  ओर हरियाली से घिरा हुआ चौड़ा रिंग रोड ,देखो स्वच्छ पानी की व्यवस्था ,देखो अनुशासन से बिना रुके चलता हुआ ट्रैफिक ,चारो ओर सफाई खूब सारी हरियाली । कोई लूट नहीं बस सबमे सुरक्षा का अहसास ।बाजार में लूट के बजाय  सही दामो पर बिकता सामान ,शहर के बाहर बड़ी बड़ी बिल्डिंगे जिनमे तमाम अंतररास्ट्रीय कम्पनियाँ है और उनसे मिला  हुआ लाखो को रोजगार । अब आगरा के लोग पढ़ने और नौकरी के लिए बाहर नहीं जाते बल्कि प्रतिभाएं आगरा आ रही है । जी हाँ ये देखो सर उठा कर बोलता हुआ मै हूँ आगरा ।

गुरुवार, 14 जून 2012

क्या किसी ऐसे व्यक्ति को महान हिन्दुस्तान का राष्ट्रपति होना चाहिए जिसे पूरी दुनिया में लोकप्रिय  कहा जाये ,ये माना जाये की पूरी दुनिया उसे जानती है और उसकी इज्जत करती है और उस व्यक्ति को अमरीका में दो बार जाँच के नाम पर जलील किया जाये और वो बेशर्मी से अमरीका में फिर भी चला जाये बजाय इसके की भारत की प्रतिष्ठा के नाम पर एयर पोर्ट से ही वापस आ जाते । क्या कहता है हिंदुस्तान ?

शनिवार, 9 जून 2012

पी डी टंडन के बाद सबसे शानदार जीत के लिए मुलायम सिंह जी ,अखिलेश और डिम्पल को हार्दिक बधाई ,उत्तर प्रदेश को बदलने और सही दिशा में बदलने के सपने देखते चलो ,सपनो को सिद्धांतों की कसौटी पर कसते चलो ,और सपनो को पूरा करने का संकल्प करते चलो फिर भविष्य आपका है । यदि विचलित हुए ,कान के कच्चे हुए ,चापलूसी पसंद हुए ,साथियों पर अविश्वाश करने का रोग पाल लिया ,सारा कुछ अपने ही कंधो पर ले लिया ,सारी  जिम्मेदारियां अकेले कंधे पर उठाने का अवगुण पाल लिया ,,गलत लोगो से घिरे ,गलत सलाहे मानी ,सही लोगो को पहचान कर सही स्थानों पर प्रयोग नहीं किया ,अपने साथियों के बजाय नौकरशाही पर ज्यादा विश्वाश करने का कम किया तो फिर अंधकार  ही अंधकार है .।पर मेरी स्वर्णिम भविष्य के लिए शुभकामनाये ।

बुधवार, 6 जून 2012

क्या करे इस कांग्रेस का रोज घोटाले दर घोटाले ,लोगो को
जवाब देना मुश्किल हो गया है ,मुह भी नहीं छुपा सकते ,ये
अर्थशास्त्री प्रधानमंत्री भी फेल हो गया ,जो देश दिवालिया हो गए उनके
सामने हम जो मजबूत है उसका रूपया गिरता जा रहा है । कैसे बचाव करे ?
कुतर्क से ?बेशर्मी से ? क्या करे इस कांग्रेस का ? क्या इसे अलविदा कह दे ?
और कह दे अगर मजबूत कदम नहीं उठा सकते ,अगर तुरंत फैसला नहीं कर सकते
अगर देश को मजबूत नेतृत्व नहीं दे सकते तो ये देश कह देगा भाड़ में जाये कांग्रेस !
पर हम जैसे लोग क्या करे ? क्या दोस्त कोई राय देंगे ? बड़ी कृपा होगी ।

मंगलवार, 17 अप्रैल 2012

अखिलेश जी को मायावती के बनाये पार्कों के बारे में कुछ इस तरह के निर्णय लेने चाहिए ---१- ये सभी पार्क ऊतर प्रदेश की जनता की जमीन पर और जनता के पैसों से बने है अतः जहा मुख्यमंत्री पत्थरों के रूप में पर्स लटकाए खड़ी है वहा वर्तमान मुख्यमंत्री नहीं पर सभी पूर्व मुख्यमंत्रियों की मूर्तियाँ लगवाने का अधिकार उनके परिवारों और दलों को दे देना चाहिए और उन सभी के लिए वरिष्ठता के क्रम में स्थान निर्धारित कर देना चाहिए । २-- जहा काशीराम की मूर्ती लगी है उस हर जगह पर सभी दलों के अब तक के अध्यक्षों की मूर्तियों के लिए स्थान वरिष्ठता के क्रम में निर्धारित कर उनके परिवारों और दलों को अधिकार दे देना चाहिए । ३-- जहा जहा अन्य महापुरुषों की मूर्तियाँ लगी है वहा उत्तर प्रदेश के सभी महापुरुषों और उत्तर प्रदेश में रहने वाले सभी समाजों और धर्मों के महापुरुषों के लिए स्थान तय करते हुए उन महापुरुषों को मानाने वालों को लगाने का अधिकार दे देना चाहिए । ४-- महात्मा गाँधी की बड़ी और साथ ही नेताजी सुभाष चन्द्र बोष ,भगत सिंह ,चंद्रशेखर आजाद ,रामप्रसाद बिस्मिल ,अशफाक उल्ला खान इत्यादि की मूर्तियाँ सरकार को अपने खर्चे पर लगा देना चाहिए । ५-- इसके बाद बची हजारों एकड़ जमीन और वहा बने भवनों में विश्वविद्धालय ,मेडिकल कॉलेज ,हॉस्पिटल ,खेल विश्वविधालय . कृषि शोध विश्वविद्धालय ,जनता लाइब्रेरी ,महिला अस्पताल ,और फुटपाथ पर सोने वालो को आसरा इत्यादि बनवा देना चाहिए । पर ये सारे फैसले तुरंत लेकर जमीन निर्धारित कर उसकी दीवारें बनवा देना चाहिए जिससे जिन लोगो को अपनों की मूर्तियाँ लगवानी हो वो लगवा सके जैसे बिजली पासी ,झलकारी बाई महर्षि बाल्मीकी इत्यादि इत्यादि और अन्य जो जिन वर्गों के लिए हो । हा जो लोग भी मूर्तियाँ लगवाएं वे उनके स्थापना के समय अखिलेश जी और मुलायम सिंह जी को जरूर बुलाएँ । जहा तक लोहिया पार्क का सवाल है तो वो तो सचमुच ही केवल पार्क है जहा हजारों लोग रोज टहलने और स्वास्थ्य लाभ करने आते है । इस पार्क में तो केवल कुछ फुट में डॉ लोहिया जो स्वतंत्रता सेनानी थे ,जो चिन्तक थे ,जिन्होंने गरीबों को जगाया ,जिन्होंने सरकार में शामिल होना कबूल नहीं किया ,जिन्होंने जाती तोड़ो अभियान के लिए जीवन लगाया ,जिन्होंने सत्ता के विकेंद्रीकरण का पहला चिंतन दिया चौखंभा राज की अवधारणा द्वारा ,जिन्होंने पहली बार पिछड़ें मांगें सौ में साठ की अवधारणा दिया जिसमे दलित पिछड़े और सभी समाज की औरतों को न्याय देने की बात किया उनकी एक बहुत साधारण मूर्ति लगी है ।इस पार्क को बनवाने में हजारो करोड़ का घूस भी नहीं खाया गया है और शहंशाह बनने और दिखने की सनक भी नहीं दिखती । जब लगने लगेंगी सभी समाज के महापुरुषों की मूर्तियाँ तब मायावती का विरोध और देश में आग लग जाने का भाषण सुनने का इंतजार रहेगा मुझे भी और उत्तर प्रदेश की जनता को भी । जब इन जमीनों का उपयोग होने लगेगा आम आदमी की खुशहाली के लिए ,उनके बच्चों की पढाई के लिए या सभियो के इलाज के लिए तब क्या कह कर विरोध करेंगी विकास से और जनता से दुशमनी रखने वाली मायावती ये देखना और सुनना दिलचस्प रहेगा । जय हिंद ।

मंगलवार, 27 मार्च 2012

                                        कांग्रेस की हार और समाजवादी पार्टी की जीत ?                                                                                                                                                                 ( डॉ सी पी राय )                                                                                                                             राजनैतिक चिन्तक और स्तंभकार 
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                पांच राज्यों में चुनाव हुए जिसमे गोवा ,मणिपुर की तरफ किसी का ध्यान ही नहीं था सिवाय उन प्रदेशों के लोगो के लेकिन उत्तर प्रदेश में कांग्रेस किसी चमत्कार की उम्मीद कर रही थी या कम से कम ये तो मान ही रही थी की दलितों के घर रुकने और खाना खाने से राहुल गाँधी बहुजन समाज पार्टी के प्रति उनके जातिगत रुझान को बदल देंगे। शायद ये भी उम्मीद थी कि केवल राहुल गाँधी की शक्ल पर सरकार बनाने के लिए जरूरी संख्या बन जाएगी । उत्तराखंड और पंजाब के बारे में भी आश्वस्त थी कि हर पांच साल बाद सरकार बदलने वाला फार्मूला जारी रहेगा और कई नेता अपनी पीठ ठोंक सकेंगे ।पर पंजाब ने जहाँ  नए तरीके से सोचा वही उत्तराखंड ने भी कांग्रेस पर पूरा भरोसा नहीं दिखाया या अपनी पुरानी परंपरा को मजबूती से पकडे हुए कांग्रेसी नेताओं ने एक दूसरे को हराने के लिए पूरी शिद्दत के साथ काम किया और अपने नेता और पार्टी के प्रति पूरी वफ़ादारी का परिचय दिया ।ले देकर खुश होने को एक उत्तराखंड मिला था पर तथाकथित हाई कमान और योग्य पर्यवेक्षकों के कारण ,किसी सचमुच जमीनी नेता को न पनपने देने कि परंपरा और आसमान से आदेश और नेता देने कि परम्परा ने खुश होने और अपनी पीठ ठोकने का मौका ही नहीं दिया । ये अलग बात है कि जमीनी नेता का जमीर विद्रोह तक जाने को तैयार नहीं हुआ और सरकार बन गयी ।पर बहुत दिनों बाद एक नेता ने हाई कमान और पर्यवेक्षकों को आइना दिखाने का काम कर दिखाया ।
                                           पर मै उत्तर प्रदेश पर सीमित करना चाहता हूँ जो भारत का ह्रदय प्रदेश है और जो रोगग्रस्त हो गया है । इस प्रदेश में मायावती जी की सरकार पार्कों और पर्तिमाओं में दलित विमर्श ढूढती रह गयी दलितों कि झोपड़ियों में अँधेरा ही रह गया ,उसका बच्चा स्कूल भी नहीं जा पाया और दवा से भी वंचित रह गया ।गरीबों कि बस्तिया और गाँव विकास के उजाले को तरसते ही रह गए पर वाह रे जाति के गौरव का जूनून ,पूरी ताकत से फिर भी जातियां खड़ी रह गयी अपने को छलने वालों के साथ पर निर्णय केवल एक जाति नहीं करती है बल्कि तठस्थ लोग करते है जो लगातार अच्छे कि तलाश में है ।बहन जी  बेईमान अधिकारीयों की कठपुतली बन कर रह गयी । अधिकारीयों ने बर्खास्त हुए यादव सिपाहियों के डर का ऐसा हौवा दिखाया कि बहनजी  परछाइयों से भी डरने लगी और कल्पना लोक में विचरण ,किसी तानशाह की तरह की सनक और नवाबों ,राजाओं की तरह जीने और भव्यता दिखाने इच्छा ने उन्हें जनमानस से दूर कर दिया । ये तो पूरी तरह तय हो गया था कि वो जा रही है और सौ का आंकड़ा नहीं छू पायेंगी ।मायावती भी उसी सिद्धांत का शिकार हो चुकी थी कि किसी नेता या दल का एक चेहरा और पहचान होती है और उससे थोडा बहुत विचलन तो कार्यकर्ता और समर्थक तथा तठस्थ लोग पचा लेते है पर १८० डिग्री पर उनका बदल जाना कभी भी नहीं पचा है और किसी का नहीं पचा है ,वो चाहे कांग्रेस हो ,भा ज पा हो या सपा, सभी ने इसका खामियाजा भुगता है और इस बार मायावती की बारी थी ।नेता सत्ता पाते ही पता नहीं क्यों भूल जाते है कि राजनीती पहाड़ कि चढ़ाई है जो झुक कर चढ़ी जाती है ,चढने के बाद पैर जमा कर ही पहाड़ पर टिका जा सकता है वर्ना फिर बर्फ कि फिसलन है जिसे कोई नारा कोई सहारा खाई में जाने से रोक नहीं सकता और बर्फ कि फिसलन का शिकार नेता होते रहते है अपने अपने कारणों से सबक से दूरी बना कर रखना उनकी फितरत है ।  मुझे लगता है कि केवल मायावती और उनके कुछ अधिकारीयों को छोड़ कर कोई ऐसा नहीं था जो ये नहीं जानता हो कि जनता में उनकी सरकार के खिलाफ जबरदस्त अंडर करेंट है ये अलग बात है की कांग्रेस के कुछ हवाई नेता बसपा नामक डूबते हुए जहाज की सवारी करने की बात कर राहुल गाँधी के मिशन को पलीता लगा रहे थे ।
                           सवाल ये है की कुछ साल पहले जिस सपा को जनता ने बुरी तरह हरा कर हटाया था उसी को भारी बहुमत से जिताया क्यों और नयी छवि और नयी राजनीति की बात करने वाले राहुल गाँधी की पार्टी कांग्रेस को हराया क्यों ? ये भी देखना होगा की भाजपा का तमाम हथकंडों के बाद भी और कुशवाहा वोटो के लालच में बाबुराम कुशवाहा को गले लगाने और फिर से राम मंदिर को मुद्दा बनाने ,उमा भारती को आयात करने के बाद भी पहले से भी बुरा हाल क्यों हुआ ? जब ये सवाल चिंतन के धरातल पर खड़े होते है तो कोई शोध करने की जरूरत महसूस नहीं होती बल्कि सब कुछ किसी गाँव में बैठे हुए आदमी को भी साफ़ दिख रहा होता है दिल्ली में बैठे लोगो को दिखे या नहीं और वे आंकड़ों में कारण ढूढते रहे ।कांग्रेस ने एक दो नहीं कई गलतियाँ किया और कई लोगो के स्तर पर गलतियाँ हुयी ।सबसे पहले जिनके जिम्मे संगठन बनाने का काम था वे जीतने के लिए संगठन बनाने के स्थान पर पूरा संगठन या तो बेच रहे थे या अपने पैर दबाने वाले ,दरबान गिरी करने वाले जैसे तत्वों को भर रहे थे ।वे प्रधानमंत्री पद त्यागने वाली सोनिया गाँधी का खुद को सिपाही कह रहे थे पर जमीन और जमीर दोनों लगातार बेंच भी रहे थे ।वे राहुल के सिपाही थे पर उनके कुरते पर लगी धुल का सौदा कर अपने खजाने को भरना चाह रहे थे ।
                                    जब चुनाव के लिए टिकेट देने का सवाल आया तब फिर यही कहानी दोहराई गयी .फिर टिकेट या तो बेंचे गए या चमचो को बांटे गए । बेनीप्रसाद वर्मा जैसे लोग जो कांग्रेस में आने के पहले विधान सभा चुनाव में जमानत जब्त करा चुके थे और किसी तरह कांग्रेस के टिकेट पर लोक सभा चुनाव जीत गए थे गाँधी परिवार सहित कुछ नेताओं को बहकाने में कामयाब हो गए कि वो चुनाव जिताऊ काम कर सकते है और हर तरह का फायदा उठाने में कामयाब रहे ,परिणाम सबके सामने आ गया कांग्रेस में ही चर्चा होने लगी कि बेनी बाबू इमानदार भी नहीं  है और जनाधार भी नहीं है । ऐसा ही काम अन्य नेताओ ने भी किया और खूब फायद उठाया । चुनाव के या संगठन बनाने के तीन नियम होते है कि १- जहा आप चुनाव में जा रहे है वहा हर स्तर के दर्द का पता होना चाहिए और उनको ध्यान में रख कर ही दोनों काम हो सकते है ।२-जिनके मुकाबले में आप को जाना है उनके सभी कमजोर पहलू पता भी होना चाहिए और उनपर केन्द्रित पूरा फैसलाकुन  हमला होना चाहियें ।३-अगर आपके पास वहा के लोगो को हर स्तर पर दिखाने के लिए कसौटी पर कसे हुए सपने नहीं है तो भी आप सफल नहीं हो सकते और इसी के साथ जरूरी ये भी है कि आप वहा कि मिटटी कि सुगंध में रचे बसे दिखे और वहा के लोगो कि भाषा में बात करते हुए  दिखे ।                                        
                                                    इन सभी मोर्चों पर कांग्रेस और भा ० जा ० पा ० फिसड्डी दिखाई पड़ी जहा अटल बिहारी वाजपयी जैसे नेताओं के आभाव में हवा हवाई बन गयी  भा जा पा २० साल पुराने मुद्दों और तरीकों के साथ आत्मविश्वास के आभाव से जूझती दिखलाई पड़ी और नेता ,नीति और सिद्धांतों पर बंटी हुयी दिखलाई पड़ी , वही कांग्रेस के रणनीतिकार भी द्वन्द ,अविश्वाश ,और एक दूसरे को पटखनी देने के लिए जूझते दिखलाई पड़े । उनका जबरदस्त अहंकार ,आत्मप्रलाप ,मुद्दाविहीन और चिंतनविहीन सोच अंग्रेजी भाषा और विचार तथा दिल्ली के कमरों की शेख्चील्ली चिंतन  ,इवेंट मैनेजमेंट और कार्यकर्ताओं के बजाय किराये के लोगो और पैसे से चुनाव जीतने या हर वक्त कुछ कमा लेने कि चिंता में दुबले होते लोग ही कांग्रेस के सेनापति थे । जहा सबसे बड़े नेता ने खुद को दाव पर लगा दिया पर ये हिम्मत नहीं कर पाए की सीधे दाव पर लगते और कह देते की चुनाव जिताओ तो मै खुद मुख्यमंत्री बनूँगा। ये बुरा भी नहीं था की इतने बड़े प्रदेश का मुख्यमंत्री पद सम्हाल कर फिर कुछ अनुभव के साथ दिल्ली जाते पर समझाने वालों ने समझा दिया होगा की छोटे हो जायेंगे । उनको भाषण की राय देने वाले उन्हें पूरे चुनाव में केवल इंडिया शाइनिंग के आस पास और अडवाणी जी के पीछे घुमाते रहे और उन्हें फिल्मों का एंग्री यंग मैन बनाते रहे जो फिल्मों में चलता है असल जिंदगी में नहीं । जहा वो जनता से कुछ साफ़ साफ़ कहने के बजाय चीखते रहे और कागज फाड़ते रहे वही अखिलेश यादव ने केवल इतना कहा की पहले बाहें चढ़ाई ,फिर कागज फाड़ा ,देखना अगली बार कही मंच से न कूद जाये और उन्हें बहुत बौना कर दिया और खुद को उनसे बड़ा बना दिया ।
                                           जहाँ कांग्रेस के नेता किसे समर्थन देंगे ,किसकी सरकार बनवायेंगे या राष्ट्रपति शासन लगवाएंगे में उलझे रहे वही मुलायम सिंह और अखिलेश यादव केंद्र के घोटालों ,मंहगाई और उत्तर प्रदेश की सरकार के भ्रस्ताचार पर कुछ शब्द बोल कर बाकी पूरे समय जनता के दर्द को सहलाते और फिर समाज के किस वर्ग के लिए क्या करेंगे ये सधे शब्दों में बताते रहे ,उन्हें जीतना ही था । जहा कांग्रेस इवेंट मैनेजमेंट की तरह काम करती रही और हर चीज को हल्के से लेती रही वही मुलायम सिंह अपने अनुभव और तमाम लोगो की राय को महत्व देते हुए तत्काल फैसले लेते रहे और अपने कार्यकर्ताओं को उतसाहित कर रहे थे ।जहा कांग्रेस में कोई किसी से बात करने में हेठी समझता है वही मुलायम सिंह दूर हो गए साथियों सहित सभी काम के लोगो को जोड़ रहे थे । किसी भी तरह अपने सबसे मजबूत साथी रहे आज़म खान को वापस लेने का उन्होंने जो प्रयास किया वो रंग भी लाया और आज़म कि घर वापसी के साथ ही समाजवादी पार्टी एक बार फिर सत्ता के करीब दिखाने लगी थी और परिणामों ने उनकी उपयोगिता सिद्ध भी कर दिया। आज़म खान की घर वापसी समाजवादी पार्टी का टर्निंग पॉइंट था। जहा कांग्रेस एक के बाद एक पर्यवेक्षक भेज रिपोट मंगाना ,फिर कई तरह की कमेटियों में कई हफ़्तों कसरत करती रही( जिससे अच्छा टिकेट वितरण शायद तब हो जाता जब कांग्रेस हर सीट के उम्मीदवारों कि पर्ची किसी डिब्बे में डाल कर एक एक निकाल कर टिकेट बाँट देती ),  मुलायम सिंह यादव अपने ज्ञान से लखनऊ में बैठे बैठे संगठन और टिकेट बांटना दोनों काम करते रहे क्योकि वो हर जिले और शहर में कई दर्जन लोगो को सीधे नाम और काम से जानते है जबकि कांग्रेस में नेता कोटरी से बाहर निकलना ही नहीं चाहते और स्वयं को सर्वज्ञानी समझ बैठे है ।मुझे तो लगता है कि यदि कांग्रेस बदली नहीं ,बड़े लोग अपने बाड़े से बाहर नहीं निकले और बेनी ,रीता जैसे सैकड़ों लोगो को ऊपर से नीचे तक बाहर कर नए सिरे से संगठन, संगठन की तरह  नहीं बनाया गया ,पर्यवेक्षक प्रणाली के बजाय सीधे जिलों को जानने और कार्यकर्ताओं को जानने और उनसे सीधे संपर्क रखने की व्यवस्था नहीं बनाई गयी तो कांग्रेस का लगातार पतन होना है और मृदुभाषी अखिलेश हो या नितीश कुमार उनके नेतृत्व में उनके दल बढ़ते जायेंगे ।अगले लोक सभा चुनाव में मेरी बात सही साबित हो जाएगी ।चाहे तो बदल जाये नहीं तो जनता बदल जाने को मजबूर कर देगी पर तब तक बहुत कुछ ख़त्म हो चूका होगा ।
                              पिछले चुनावों ने कुछ  बातें साफ़ कर दिया है की १- जनता अब किसी एक को पूर्ण बहुमत देना चाहती है ,२-जनता नेता की छवि और भाषा तथा भूषा को ध्यान से देख रही है ३- जनता नेता और उसकी छवि को देख रही है जो  मुलायम सिंह ने अखिलेश और ईमानदारी की पहचान आज़म खान को आगे कर, कर दिखाया ४-जनता किसी से चमत्कार की उम्मीद नहीं करती पर ये जरूर चाहती है कि नेता या दल जो कहे वो करते दिखलाई दे और प्रयास करते दिखे की वो करना चाहते है ये विश्वास मुलायम सिंह ने जीता है  ५- जनता घमंड ,अहकार को बर्दाश्त नहीं करती है बल्कि कोई राजनीती में रहना चाहता है तो उसको सौम्य और विनम्र होना ही पड़ेगा ।6- कुछ नया कहना है या करना है तो चुनाव से ठीक पहले कहने और करने पर विश्वास नहीं होता ,कुछ पहले कहे और करें । क्या कांग्रेस और कांग्रेसी नेता ये समझ पाएंगे ? क्या अखिलेश अपनी विनम्रता और सौम्यता को बरक़रार रख पाएंगे ? क्या पहले दिन शपथ लेते ही सभी का  एक बड़े व्यवसायी के यहाँ चले जाने पुरानी छवि बदल पाएंगे ? क्या खुद को नया उत्तर प्रदेश बनाने वाला सिद्ध कर पाएंगे ? क्या समाजवादी पार्टी को पुराने तरीकों से निकाल पाएंगे ? ऐसे पहाड़ जैसे सवाल मुह बाये हुए खड़े है जिनका उत्तर समय देगा और अखिलेश तथा उनकी पार्टी को भी देना पड़ेगा । बहुमत नशा न बन जाये इसके लिए हर वक्त चौकन्ना भी रहना होगा और हर वक्त कुछ करने ,नया करने के लिए चैतन्य  भी रहना होगा चाहे इसके लिए कुछ टोकने वालों  को बर्दाश्त क्यों न करना पड़े ।वर्ना पहली बार ही छवि बिगड़ गयी तो ============= ।राजनीति और वक्त सबका हिसाब करते है ।
                                    
                                                                                                                             डॉ ० सी ० पी ० राय 
                                                                                                           राजनैतिक चिन्तक और स्तंभकार 
                                                                                                                    १३/१ संजय प्लेस आगरा       
                                                                                                                       मो ०   09412254400          
                                                                                                                    cprai1955 @yahoo.co.in  

शनिवार, 11 फ़रवरी 2012

भा ज पा ऐसी निकलेगी ? संघ कहाँ है ?

भा ज पा का ये चेहरा क्या किसी ने सपने में भी सोचा था ? खुद को अलग चाल ,चरित्र और चेहरे वाली पार्टी कहने वाली भा ज पा ,खुद को संघ के पता नहीं किन आदर्शों में तली भुनी कहने वाली भा ज पा का ये चेहरा और ऐसे चेहरे ? १-पहले रास्ट्रीय अध्यक्ष का बंगारू लक्ष्मण का कैमरे के सामने पैसा लेना ,२-फिर दिलीप जूदेव का ये कहते हुए दिखाना की पैसा भगवान तो नहीं है पर भगवान से कम भी नहीं है और इसी सिद्धांत को मन कर भगवान को धोखा देना ,३-फिर एक संगठन मंत्री का नंगा एम् एम् एस ,४- फिर उत्तराखंड में भ्रस्ताचार के कारण बार बार मुख्यमंत्री बदलना ,४- फिर आखिरी तक बचाते हुए भी यदुरप्पा नामक मुख्यमंत्री का जेल जाना और उसकी सरकार पर तरह तरह के आरोप ,५-और राम को छोड़ कर उसी बाबु राम कुशवाहा को माला पहना कर पार्टी में लेना जिस पर सरे आरोप इन्होने लगाये थे ,और सबसे पवित्र कम अब कर दिया जब पार्टी में महान आदर्शवादी मंत्री विधान सभा के पवित्र सदन में महान पवित्र काम करते हुए और धार्मिक [ इनके अनुसार ] फिल्म देखते हुए पूरे देश ने देखा । शायद मुह छुपा कर कुछ दिन तक चुप रहना चाहिए था इनके नेताओं को पर वाह रे आदर्शवादी मित्रो सीना तन कर खड़े है देश के सामने अपने आदर्श का वर्णन करने को ।क्या संघ ने शाखाओं में यहिओ सिखाया है ? क्या कुछ लोगो के सवाल और आरोप सही है ? इन सूरमाओं को जवाब जरूर देना चाहिए ।देश भूला नहीं होगा की इन्होने सेना के जहाज से सबसे बड़े आतंकवादी को कहा पहुचाया था ,देश भूला नहीं होगा की पाकिस्तानी सेना घर में घुस आई और ये सत्ता के नशे में चूर थे ,देश भूला नहीं होगा की चार छोकरे तमंचे लेकर संसद में चले आये और ये सोते रहे और दोनों ही मौको पर देश के उन गरीब परिवारों के नौजवानों ने जान देकर देश और संसद को बचाया जिनके ये विरोधी है ,क्योकि ये सिर्फ जमाखोर ,मुनाफाखोर और मिलावटखोरों के साथ खड़े दिखाते है और उन्ही के लिए लड़ते है । अब देश तय करे की इनकी असलियत क्या है ? इनका भविष्य क्या होना चाहिए ?
उत्तर प्रदेश में चुनाव हो रहा है अब फैसला आप का की आप को ऐसे पवित्र लोगो के साथ क्या सलूक करना है ? फैसला आप का की आप सिर्फ बड़ी बड़ी बातें करते है सचंमुच जातिवाद ,धर्मवाद ,गुंडागर्दी .सम्पूर्ण चोरी करने वालों के साथ क्या करंगे ? जय हिंद ।

मंगलवार, 3 जनवरी 2012

दोस्तों बी जे पी खुद को पार्टी विद डिफरेंस या अलग चाल ,चरित्र और चहरे की पार्टी कहती है | पर आजकल उसका चरित्रं सारी जनता देख रही है ,पहले सुखराम को कांग्रेस ने निकला था तो बी जे पी ने गले लगा लिया था | पिछले कुछ दिनों से जिन्हें यह पार्टी अपराधी और महाभ्रस्ट कह रही थी दो दिनों में उन्हें ही गले लगा लिया और कहना ये है की बी जे पी तो गंगा है जो सबको पवित्र कर देती है | बाबू सिंह कुशवाहा से लेकर पता नहीं कौन कौन | अभी पता नहीं कौन कौन और पवित्र किया जायेगा ? आप जानते है न की ये वाही लोग है जो भ्रस्ताचार के खिलाफ लड़ाई का भाषण देते है रेड्डी ,यदुरप्पा ,जूदेव और बंगारू लक्ष्मन के साये तले,यही लोग है जिनके सबसे बड़े आका यानि संघ के प्रमुख और बाकी लोग अन्ना साहब को आन्दोलन शुरू करवाने का श्रेय भी ले रहे है और और सारे इंतजाम के साथ भीड़ जुटाने का भी | उनका दोहरा चरित्र तो फिर से चार दिन में ही सामने आ गया | अब देश की जनता और उत्तर प्रदेश की जनता इनके बारे में फैसला करे और इनके संगठनों में मौजूद वे लोग भी जो इन्हें सिद्धांतवादी और किसी तरह का विचारवादी समझ कर इनसे जुड़े है ,उन्हें भी रुक कर सोचना चाहिये ,विचार करना चाहिए और इनका साथ देने और इनके साथ होने पर मंथन करना चाहिए | सत्य सामने है | हाथ कंगन को आरसी क्या पढ़े लिखे को फारसी क्या ? जय हो अलग चल चरित्र और चहरे की | जय हो ऐसी भ्रस्ताचार विरोधी लड़ाई की | जय हिंद |