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मंगलवार, 30 दिसंबर 2014

          संघर्ष को समर्पित एक राजनीतिक कबीर की फकीरी जिंदगी का नाम था ; लोकबन्धु राजनारायण ;

                                                                                                                                [डॉ ० सी ०पी ० राय ]

हमें नफरत नहीं थी अंग्रेजो की कौम औ सूरत से ,हमें नफरत थी तो उनके अन्दाजे हुकूमत से
गर अपनों की हुकूमत अपनी खातिर हो नहीं सकती तो अपनों की भी सूरत से मोहब्बत हो नहीं सकती |

लोकबन्धु राजनारायण के लिए ये चा र पंक्तियां दिशा निर्देशक का काम करती थी | तभी तो जहा देश की स्वतंत्रता के लिए नेता जी कुल चार बार जेल गए वाही आज़ादी के बाद अपनों के शासन में कुल करीब १५ वर्ष जेल में बिताए | जब भी जहा भी उनको जनता का कष्ट दिखलाई पड़ता या आज़ादी के सपनो का खून होता दिखलाई पड़ता वही वो आन्दोलन का शंख बजा देते थे |
आज़ादी की लड़ाई से लेकर आपातकाल उनके संघर्ष की कहनियाँ ही पसरी हुयी है भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में |अगर हर आन्दोलन का तारीखवार वर्णन करूँगा और विस्तार में जाऊँगा तो किताब बन जाएगी इसलिए बस इशारतन ही जिक्र करूँगा यहाँ | वो मजदूरों का आन्दोलन हो उत्तर प्रदेश से लेकर आसनसोल तक जहा उन्होंने नक्सलवादियो का किला तोड़ते हुए समाजवादी संगठन खड़ा कर दिया था मजदूरों का | वो किसानो का आन्दोलन हो अदलपुरा से लेकर अरदाया तक या लखनऊ की धरती पर विशाल प्रदर्शन जिसमे ; किसान जागा पन्त भागा ; के नारे लगे थे ,वह किसान आन्दोलन रहा हो जिसमे राजनारायण जी को बुरी तरह पीट कर बंद कर दिया गया और आचार्य नरेन्द्र देव की मध्यस्थता से समझौता हुआ | १९५३ में गोरखपुर में रेल मजदूरों पर गोली चलने के खिलाफ आन्दोलन हो ,१९५४ में नहर के पानी का रेट बढ़ने पर आन्दोलन हो ,मिर्जापुर में मजदूर आन्दोलन हो ,५५ में गोरखपुर हो या या लखनऊ का छात्र आन्दोलन ,;;और बहुत महत्वपूर्ण १९५६ में जब वो हजारो हरिजनों को लेकर कशी विश्वनाथ मंदिर में घुस गए थे और तब संघियों ने तथा फासिस्ट ताकतों ने न सिर्फ हरिजनो के मदिर प्रवेश का विरोध किया बल्कि राजनारायण जी पर घटक हमला भी कर दिया था | १९५७ के सिबिल नाफ़रमानी आन्दोलन के संचालक बने ,बिक्रीकर के खिलाफ आन्दोलन ,बिहार में सोशलिस्ट पार्टी के आन्दोलन का सञ्चालन ,;;; स्वतंत्र भारत में जगह जगह लगी अंग्रेजो की मूर्ती तोड़ने पर गिरफ्तार हुए और स्वतंत्र भारत की सरकार में इसके लिए १९ महीने की सजा और ४०० रूपये का जुरमाना हुआ वाही से मूर्ती भंजन प्रथा शुरू हुयी तथा सरकार को बाध्य होकर सभी अंग्रेजो की मूर्तियाँ हटानी पड़ी और काशी में किंग एडवर्ड अस्पताल का नाम बदल कर शिवप्रसाद गुप्त अस्पताल हुआ ,१९५८ में खाद्य आन्दोलन ,और सम्पूनानन्द की सरकार में समितियों का बहिष्कार का फैसला ,१९६० में रास्त्रव्यापी आन्दोलन के संचालक बनाये गए ..देश भर में घूम घूम कर आन्दोलन ,लाल बहदुर शास्त्री के निवास पर पर्दर्शन जैसे हजारो आन्दोलन और उसमे सिद्धांत के साथ साथ अपने शरीर को विरोध का इस कदर हथियार बना देना की तमाम बार की पिटाई से पैर टूटे ,सर टूटा ,और जेलों में रहते रहते तमाम बीमारियों ने पकड़ लिया |
पहले लखनऊ रेलवे स्टेशन पर रिक्शा नहीं जा सकता था तो एक दिन राजनारायण जी वही विरोध पर अड़ गए ,,धीरे धीरे बड़ी संख्या में जनता एकत्र हो गयी तो मजबूर होकर रिक्शा जाने की इजाजत देनी पड़ी | ऐसा ही एक दिन उन्होंने राजभवन पर भी किया और उनका रिक्शा अन्दर गया |
वो चाहते तो जातिगत आधार पर सुरक्षित स्थान पर चुनाव लड़ कर हमेशा सासद रह सकते थे पर जैसे डॉ लोहिया ने कहा था नेहरु जी के खिलाफ चुनाव लड़ते हुए की मैं जनता हूँ की मैं पहाड़ से टकरा रहा हूँ और उसे गिरा नहीं सकता पर उसमे दरार पैदा कर कमजोर तो कर ही सकता हूँ ,,उन्ही के रस्ते पर चल कर अजेय ताकत बन गयी कांग्रेस और बलशाली नेता इंदिरा गाँधी के खिलाफ वो चुनाव लडे और ये भी इतिहास है की उनको कोर्ट में भी हराया और फिर वोट में भी हराया | उनका संघर्ष ही था की बहुत बड़ी संख्या में गर्रीब परिवारों के लोग जिन्होंने अपने शहर नहीं देखे थे वो प्रदेश और देश की राजधानियों में पहुंचे और स्थापित हुए |
एक बार जब संसद में नेहरु मंत्रिमंडल की मंत्री तारकेश्वरी सिन्हा ने डॉ लोहिया से कहा की क्या आप पागलो को साथ लेकर घुमते है तो डॉ लोहिया नाराज हो गए और कहा की तारकेश्वरी अगर मुझे कुछ और राजनारायण मिल जाये तो मैं देश को बदल दूंगा और तुम लोगो को भी बेदखला कर दूंगा | इसी प्रकार एक मौके पर आचार्य नरेन्द्र देव विदेश जा रहे थे तो उस वक्त के आन्दोलन के बारे में पुछा गया की कैसे चलेगा तो आचार्य जी ने कहा की उसे नेता जी चलाएंगे और उनके नामकरण के बाद से राजनारायण जी को नेताजी कहा जाने लगा |
जब राजनारायण जी केंद्र में स्वस्थ्य मंत्री बने तो उन्होंने परिभाषा ही बदल दिया और जमीन पर बैठना तथा बिना ए सी के रहना और उस समय रूस के अखबार प्रावदा ने लिखा की हिंदुस्तान में एक ही मंत्री है जो जन का मंत्री है और समाजवादी फैसले कर रहा है | राजारायण जी ने चालित अस्पताल चलाये थे की वो गाँवो में जाकर गरीबो का इलाज करेंगे और बेयर फुट डाक्टर के नाम पर उस समय १५ लाख लोगो को नौकरी दे दिया था | पर आर एस एस की कुटिल चलो को देख कर वो विचलित हो गए तथा जिस तरह किसानो और गरीबो के मुख्यमन्त्रियो के खिलाफ साजिश हो रही थी उस पर वो मुखर हो गये तथा तत्कालीन जनसंघ के लोगो की दोहरी सदस्यता के सवाल पर सरकार टूट गयी |
उन्होंने किसानो की लडाई लड़ने वाले किसान नेता चौ चरण सिंह को प्रधानमंत्री बनाने का सपना देखा तो फिर उसे पूरा कर के ही रहे | एक दौर था जब देश का प्रधानमंत्री ,प्रदेशो के मुख्यमंत्री उन्होंने बनाये बिगाड़े पर खुद उनका परिवार कहा है | मनीराम बागड़ी ने एक दिन जब ज्यादातर लोग साथ छोड़ गए थे तथा पार्टी ख़त्म जैसी हो गयी थी राजनारायण जी का नगर निगम में क्लर्क बेटा आया हुआ था ,कहा की पार्टी का काम तो अब कुछ रहा नहीं इसलिए टाइप राईटर और फोटोस्टेट मशीन इसे दे दे ये अपने बच्चो के लिए कुछ कम लेगा इन मशीनों से तो उन्होंने जवाब दिया की पार्टी का है पार्टी कोष में पैसा जमा कर दे और ले जाये जबकि दूसरी तरफ एक प्रमुख नेत्री ने बताया की आज ही अचानक उनकी बेटी के लिए एक लड़का मिल गया है जो दो दिन बाद ही विदेश चला जायेगा तो उसी राजनारायण जी ने उनकी शादी की पूरी व्यवस्था कर दिया |
उनके साथ रहने पर न तो किसी पद की जरूरत महसूस हुयी और न कही किसी से डर लगा | ८० में एक दिन मैं छात्र आन्दोलन में लाठीचार्ज के बाद गिरफ्तार हो गया पता नहीं उन्हें कहा से पता चला दूसरे ही दिन सुबह दिल्ली से चल कर और पूरे प्रशासन के साथ वो आगरा की जेल थे | जब मेरी शादी की पार्टी थी उसी दिन उनके परिवार में भी और उन्हें १०० से ज्यादा बुखार था पर वो मेरी शादी में हाजिर थे ..उससे भी जायदा तो तब हुआ जब मेरी बेटी पैदा हुयी और कुछ कार्यक्रम था उसी दिन उन्होंने बिहार के दो पूर्व मुख्यमन्त्रियो कर्पूरी ठाकुर और सत्येन्द्र नारायण सिन्हा को दिल्ली बुलाया था उनका विवाद निपटाने को और मुझे मना कर दिया था आने को पर अचानक सभी को साथ लिए हुए घर पर आ खड़े हुए | जब केंद्र में मंत्री भी थे तो अचानक जब घर आ जाते थे तब पता लगता था | ये थी इतनी बड़े नेता की खासियत |
मानवीय पक्ष और राजनीती की ऊँचाइयाँ तथा रिश्ते भी उनसे सीखे जा सकते है ,एक दिन थोडी से परेशानी पर तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा जी पैदल तीन मूर्ती लेन वाले घर आ गयी तो इंदिरा जी और संजय गाँधी के निधन पर मैंने उन्हें बिलखते देखा | ऐसा क्या कहा था उन्होंने संजय गाँधी से की उसी दिन से वो सड़क पर संघर्ष करने वाला हो गया | लोगो की चुगली और कान भरने से चरण सिंह से दूरी हो गयी थी पर मैंने उन्हें उनके लिये परेशां रहते हुए देखा | जनेश्वर जी और ब्रजभूषण तिवारी साथ छोड़ गए थे पर चुनाव में मैंने उनकी सहायता करते और जीत की कामना करते हुए देखा था | मुलायम सिंह यादव जी के बारे में वो कहते थे की ये आगे जाकर बड़ा नेता बनेगा और हमारे आन्दोलन को आगे बढ़ाएगा जो सच भी हुआ कुछ मायनो में |
वो चाहे कितने भी कमजोर हो गए हो पर जीतनी भीड़ उनके आसपास रहती थी वो मंत्रियो के यहाँ भी नहीं होती थी | देश के सभी बड़े नेता डालो की सीमाए तोड़ कर उनसे मिलने आते थे तथा सलाह करते थे | ये बताना भी समीचीन होगा की जब चंद्रशेखर जी भारत यात्रा कर रहे थे तो उन्होंने ये रहस्य खोला की यदि राजनारायण जी उनकी जिंदगी में नहीं आये होते काशी तो वो तो नौकरी करना चाहते थे पर राजनारायण जी उन्हें राजनीती में ले आये |एक दिन देश के सात ७ बड़े नेता बैठे थे नेता जी के यहाँ और खिचड़ी तथा लिट्टी चोखा खा रहे थे उस दिन नेता जी ने बड़ी वेदना से कहा की यह दें देखने को मैं क्यों जीवित हूँ जब सत्ता मदांध है और विपक्ष रश्म अदायगी कर रहा है | क्या कानून की पढाई राजनारायण को पढ़े बिना पूरी हो सकती है क्या लोकतंत्र में विपक्ष को मायने देने वाले योद्धा को याद किया बिना लोकतंत्र को जिन्दा रखा जा सकता है |
आज जब सत्ता तथा उससे जुड़े लोगो की भाव भंगिमा ,बोल और कदमो से लोकतंत्र की हत्या होने और फासीवाद स्थापित करने के इरादे की बू आ रही है तो आज जरूरत है एक राजनारायण की और आज के दौर में एक काम केवल मुलायम सिंह यादव ही कर सकते है | समाजवादी आन्दोलन अगर गाँधी के विचार ,लोहिया की हुंकार ,जयप्रकाश की सम्पूर्ण क्रांति और राजनारायण के सतत और निरपेक्ष संघर्ष कर्पूरी ठाकुर रामसेवक यादव जैसे लोगो की सादगी को अपना हथियार बनाएगा तभी देश के लिए सपने देखे गए वो पूरे होंगे और राजनारायण जी को सच्ची श्रधान्जली होगी |