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गुरुवार, 30 जून 2011

                                       [ लोकतंत्र में पार्टी बड़ी या सरकार  ]               डॉ ० सी ० पी ० राय                                                                                              [स्वतंत्र राजनैतिक चिन्तक एवं स्तंभकार]                      भारतीय लोकतंत्र में तरह तरह की बहसें चल रही है | इस समय  एक बहस की बहुत जरूरत है कि लोकतंत्र में पार्टी बड़ी है या सरकार ? सरकार पर पार्टी का अंकुश होना चाहिए ,पार्टी को सरकार के लिए नकेल कि तरह काम करना चाहिए ? क्योकि चुनाव पार्टी लड़ती है और फिर अपने में से कुछ लोगो को सरकार चलाने कि जिम्मेदारी देती है | पर जवाब तो पार्टी को ही देना पड़ता है ,अगले चुनाव में जनता के सामने फिर पार्टी को ही जाना होता है | पार्टी लगातार जनता से जुडी होती है जबकि  सरकार अपने दायित्वों के कारण दूर हो जाती है | जनता का रुझान कब क्या है ये पार्टी ज्यादा जानती है जबकि अधिकारियों पर आश्रित सरकार उससे बहुत दूर होती है | या फिर सरकार का पिछलग्गू यानि धकेल संगठन केवल होना चाहिए पार्टी को | पार्टी को सरकार को निर्देश देने का हक़ है या सरकार को पार्टी को निर्देश देने का हक़ है |
                                         कुछ समाजवादी लेखको ने लिखा है कि पंडित जवाहर लाल नेहरू नहीं चाहते थे कि डॉ लोहिया जो उनके बहुत अच्छे दोस्त भी थे और आजादी कि लड़ाई वाली कांग्रेस में विदेश विभाग के प्रभारी भी थे ,जयप्रकाश नारायण जो आजादी से पहले बड़े समय तक कांग्रेस के महामन्त्री रहे थे और आचार्य नरेन्द्र देव जैसे चिन्तक और नेता आजादी के बाद बनने वाली सरकार से दूर रहे | नेहरू जी बहुत बड़े इन्सान और बड़े नेता थे ,वे बड़े दिल वाले व्यक्ति थे ,वे सभी को शामिल कर देश चलाना चाहते थे | पर बात बनी नहीं क्योकि डॉ लोहिया चाहते थे कि पंडित जी खुद प्रधानमंत्री नहीं बल्कि पार्टी के अध्यक्ष बने रहे  और लोकतंत्र की  मजबूती के लिए पार्टी को निर्देशित करे | इस स्थिति में लोहिया जी भी नेहरू जी के साथ सरकार में नहीं बल्कि पार्टी में काम करना चाहते थे | बात टूट गयी और दोनों के रस्ते अलग हो गए | पर लोहिया जी ने जो  बात कहा था वह बहस तो कभी चली ही नहीं | उस पर चर्चा हो ही नहीं पाई | 
                                            ये अलग बात है कि केरल कि सरकार को सोशलिस्ट पार्टी के संगठन के आदेश पर इसलिए जाना पड़ा क्योकि थानू पिल्लै कि सरकार ने जनता पर गोली चलवा दिया था | ये आजादी कि लड़ाई से निकले नेताओ के आदर्श थे कि अपनी ही सरकार और अपनी ही पुलिस जिस जनता के वोट से चुनी गयी और जिस जनता से तनख्वाह पाती है उनपर लाठी गोली न चलवाए | उसके बाद जब ज्योति बासु को तीसरी ताकतों ने प्रधानमंत्री चुन  दिया तब यह देखने को मिला कि पार्टी ने आदेश दे दिया तो ज्योति बासु जैसे बड़े नेता ने भारत के प्रधानमंत्री जैसा बड़ा पद छोड़ दिया | इसके आलावा शायद कोई मौका नहीं दीखता कि पार्टी सरकार के ऊपर दिखे | वर्त्तमान में जरूर पार्टी सत्ता से बड़ी दिखलाई पड़ती है तो राजनीति शास्त्र और लोकतंत्र के प्रति अज्ञानी लोग इसे लोकतंत्र का सच्चा स्वरुप नहीं बल्कि कठपुतली और न जाने क्या क्या विशेषण से नवाजते है | क्या ये उचित है कि सरकारों को पूजीपतियों कि जमात ,दलाल या कोई और ताकतें संचालित करे ? क्या ये उचित है कि कुछ संगठन जो अपने को केवल गैर सरकारी और सांस्कृतिक संगठन कहते है और जिन लोगो को जनता का विश्वास नहीं हासिल होता है वे सरकार को कठपुतली कि तरह नचायें ? ये बहस बहुत गंभीर है और इसे बुद्धि के उपयोग से और अध्ययन से चलाने कि जरूरत है |
                                                सरकार चलाने वाले अगर खुद मालिक हो जायेंगे या दोनों शक्तियां किसी एक आदमी में समाहित हो जाएँगी तो तानशाह बन जाने का डर ही नहीं बना रहेगा बल्कि ऐसा तमाम देश में हो चुका है | इसीलिए कई खम्भों पर खड़ा किया जाता है लोकतंत्र कि बुनियाद को | फिर भी देखा गया है कि ये खम्भे भी इतिहास में मुख्य शक्ति के तानाशाह बन जाने पर अपने कर्तव्यों पर खरे उतरने में नाकामयाब साबित हुए है | फ़ौज को भी इसीलिए टुकड़ो टुकड़ो में रखा जाता है कि उसका हथियार कभी देशवासियों कि तरफ न मुड़ जाये और उन्ही देशो में फ़ौज सिर्फ अपने कम तक सीमित रहती है  | लेकिन जहा सरकार पर पार्टी के वर्चस्व कि व्यवस्था होती है वहा सरकार का तानाशाह बनना मुश्किल होता है और जनता के प्रति जवाबदेह और हर वक्त जनता से जुडी पार्टी उसे उन रास्तो पर चलने को मजबूर करती रहती है जो जनता को पसंद है या जो जनता के लिए जरूरी वो करने को मजबूर करती रहती है सरकार को | उचित तो यह भी होता है लोकतंत्र में कि जब भी सरकार कोई जन विरोधी कार्य करती नजर आये तो चाहे उसी पार्टी कि सरकार क्यों न हो पार्टी सरकार के खिलाफ जनता के साथ खड़ी नजर आये चाहे आन्दोलन ही क्यों न करना पड़े |
                                                 देश फिर एक ऐसी जगह खड़ा है जहा ये बहस बहुत जरूरी है कि लोकतंत्र उसमे भाग लेने वाले ,उसके लिए सैद्धांतिक आधार पर जनता के सामने जाने वाले दलों के द्वारा चलाया जायेगा या मौका पाकर सरकार में बैठ गए उसी दल के महज कुछ लोगो द्वारा या दोनों के द्वारा अपने अपने दायरे और जिम्मेदारियों के परिपेक्ष में |यह एक राजनीति शास्त्र कि बहस है | यह लोकतंत्र कि मजबूती कि बहस है | यह जनता के प्रति जवाबदेही कि बहस है | इस बहस में वे ही लोग शामिल हो सकते है जिन्हें राजनीति शास्त्र के सिद्धांतों और लोकतंत्र कि परिकल्पनाओं का ज्ञान हो | इसमें वे ही लोग शामिल हो सकते है जिन्हें खुले दिल दिमाग से सोचने कि आदत हो | बहस शुरू हुयी है अब जारी रहेगी जब तक कोई फैसलाकुन निष्कर्ष नहीं निकलता | देश के भविष्य ,लोकतंत्र के भविष्य और लोकतंत्र की संस्थाओं के भविष्य पर लगातार पैनी निगाह रखने वालों की निश्चित ही दिलचस्पी इस बहस में भी होगी और इस बहस के परिणाम में भी और वे भी इस बहस पर निगाह जरूर रखेंगे जो राजनीति में रूचि रखते है |


रविवार, 26 जून 2011

आज कई दिनों की चुप्पी के बाद गैंग से सलाह करने के बाद रामदेव यादव बोले पर बोले क्या खूब चीखे खूब गुस्साए | ये कैसा योगी ? रामदेव के अनुसार १- ३०००० लोगो के बीच उनकी हत्या की आशंका थी मीडिया भी था वहा फिर भी | लगता है की रामदेव ने भारत को कोई और देश समझ लिया | २- रामदेव यादव को आपातकाल लगा दिख रहा है, पर ये बहुत बहादुर है की फिर भी जो चाहे खूब झूठ बोल ले रहा है ये अलग बात है की पत्रकारों का जवाब देने को तैयार नहीं हुआ | ३- ये कायर की मौत नहीं मरना चाहता था ,उनके अनुसार उनके सामने बच्चो को घसीट कर मारा जा रहा था ,महलाओ के साथ बलात्कार का प्रयास किया जा रहा था ,इससे बड़ी कायरता और कायर की मौत क्या हो सकती है ? की कोई अपने समर्थन में आये लोगो को छोड़ कर भाग जाये | 
                            उन सवालो का जवाब आज भी नहीं दिया की १ - औरत का वेश का भेष धारण कर भगा क्यों २- पीटने वालो के सामने खुद को क्यों नहीं खड़ा कर दिया जानकी जिन नेताओ को ये गली दे रहा है वो अपने समर्थको को छोड़ कर भागते नहीं बल्कि खुद सामने खड़े हो जाते है २- ६ दिन में ही तथाकथित योगी मरणासन्न कैसे हो गया ? उसके दो महीने तक भूखे रहने के दावे का क्या हुआ ? ३ - दुनिया को अंग्रेजी इलाज छोड़कर अपना इलाज स्वीकार करने का उपदेश देने वाला रामदेव यादव खुद अंग्रेजी और बड़े अस्पताल में क्यों भारती हुआ ? अपने इलाज से खुद को ठीक करने की जिद क्यों नहीं किया | ४ - रामदेव की कितनी कम्पनियाँ है और किस किस चीज की है और उनमे कितना पैसा है ? पत्रकारों के इस सवाल पर अपनी पत्रकार वार्ता ख़त्म कर भाग क्यों जाता है ? 
                               रामदेव यादव अब तमाम सवालों के घेरे में आ गए है ,जिनका जवाब उनके पास नहीं है | अब वो जितना ज्यादा बोलेगा और बौखालायेगा उतने सवाल उठते जायेंगे | पहले भी लाखो लोग हुए है जो सरकारों के खिलाफ बोलते रहे सस्ते प्रचार की बाते करते रहे ,कम्पूटर इत्यादी का विरोध करते रहे ,पर जब उन लोगो को खुद सरकार में शामिल होने का मौका मिला तो वे सभी सारे भ्रस्ताचार का रिकार्ड तोड़ते दिखलाई पड़े और जो बड़ी बड़ी बातें करते थे सब भूल गए और निहायत अयोग्य साबित हुए | सत्ता से बाहर रह कर कुछ भी बोलना और सत्ता में होने हकीकत जान कर कारवाही करना अलग बात होती है | रामदेव यादव को भी अमर सिंह वाली बीमारी लग गयी है की उनके बिना दुनिया नहीं चलती और अगर किसी दिन मीडिया में नहीं आये तो बीमार पद जाना | जब मीडिया समाचारों के आभाव में ऐसे लोगो को कुछ ज्यादा जगह दे देता है तो सत्ता से भी बड़ा नशा चढाने लगता है ; पुरानी कहावत है की अधजल गगरी छलकत जाये |


शनिवार, 18 जून 2011

ना संसद ना संविधान अब अन्ना विधान

                                                 ना संसद ना संविधान से अब देश चलेगा अन्ना के विधान से और देश में केवल नकारात्मक बात करने वाले और भोजपुरी में कहे तो गलचौरी करने वाले इस विधान के लागू होने से पहले तक ताली बजायेंगें ,लेख लिखेंगे ,फेसबुक सहित सभी ऐसे स्थानों पर नयी आजादी की कहानियां लिखेंगे | ऐसा लगेगा कि महात्मा गाँधी ,सुभाष चन्द्र बोस,तिलक ,भगत सिंह ,आजाद सभी ये लोग ही है | सीमाओ पर कुर्बानियां इन्होने या इनके परिवारों ने ही दिया है और अब जीत का जश्न मना रहे है | इनकी बातो से ऐसा भी लगता है कि भारत के लिए कुर्बानियां देने वाले आजादी कि लड़ाई लड़ने वाले निहायत नासमझ थे | ऐसा भी लगता है कि संविधान सभा में जो लोग बैठे थे वे देशद्रोही ,बिना पढ़े लिखे ,और गैर जिम्मेदार लोग थे | बाबा साहब आंबेडकर से लेकर डॉ राजेंद्र प्रसाद हो या एच एन कुंजरू तक सभी को इस सूरमाओ से राय लिए बिना संविधान कि रचना नहीं करना चाहिए था |
                                                इस वक्त देश में जिस तरह कि बहसे चलाई जा रही है उससे दो बाते प्रचारित करने कि पूरी कोशिश कुछ लोगो द्वारा कि जा रही है १ - ६३ सालो में इस देश में कुछ हुआ ही नहीं ,देश बर्बाद हो गया और बहुत पिछड़ गया | २ - भारत में केवल भ्स्ताचार होता है ,काला धन का कारोबार होता है और कुछ होता ही नहीं है | ये लोग ये बताना चाहते है कि भारत ना तो विज्ञानं में आगे बढ़ा ,ना शिक्षा में ,ना चिकित्सा में ,ना शक्ति में और किसी भी क्षेत्र में नहीं  | इन्हें भारतियों के मिलने वाले नोबल पुरष्कारों से नफरत है ,इन्हें भारत कि एकता से नफरत है ,इन्हें ६५ ,७१ ,कारगिल कि जीत से नफरत है ,इन्हें असमान में छोड़े जा रहे केवल अपने नहीं दुनिया के दूसरे देशो के भी उपग्रहों कि सफलता से नफ़रत है | इन्हें दुनिया के चंद प्रगतिशील देशो में भारत के शामिल हो जाने से नफरत है | इन्हें दुनिया कि पहली या दूसरी ताकत बनते हुए भारत से नफरत है |तभी तो आत्मविश्वाश से लबरेज होते भारत में विश्वाश का बड़ा संकट खड़ा करने का प्रयास बड़े सोचे समझे तरीके से किया जा रहा है | किसी देश के जीवन में ६० साल ६० सेकण्ड के बराबर होता है और दुनिया के तथाकथित बड़े और विकसित देशो के मुकाबले हमारे महान भारत ने ज्यादा तेजी से तरक्की भी किया ,अपनी कमियों पर विजय भी पाया और जहा जो कमजोरियां दिखी उनको दूर भी किया | जहा दूसरे  एक बोली ,एक भाषा ,एक धर्म वाले देशो को भी एक साथ रखने में कामयाबी  नहीं  मिल पा रही है और गृहयुद्ध तथा आतंकवाद और विभिन्न समस्याओ के शिकार है और फ़ौज तथा तानाशाही से भी काबू में नहीं कर पा रहे है वहीँ तमाम भाषाओ,बोलियों ,संस्कृतियों ,जातियों और धर्मो वाले इस देश कि मजबूत एकता और दुनिया का सिद्ध हो चूका सबसे मजबूत लोकतंत्र कुछ लोगो को चुभ रहा है | कुछ तथाकथित बुद्धिजीवी भी पता नहीं कैसे बिना इतिहास और वर्तमान कि समीक्षा किये इस अभियान में शामिल हो जाते है तो जो अभी तक नासमझ है या देश और नागरिकता का अर्थ ही नहीं समझना चाहते है उनको क्या कहा जाये ?जनसंख्या १२० करोड़ से ज्यादा है पर नागरिक कितने है ?यह बहस का विषय है | जब जो धर्म अपने उपदेशो के द्वारा समाज को सही दिशा और त्याग कि शिक्षा देता था वही अनाप शनाप धन दौलत और तमाम बुराइयों का शिकार दिखलाई पड़ रहा है तो उस चर्च और राजा के सौ साल से ज्यादा चले युद्ध कि याद आ ही जाती है | किसी ने लिखा था कि ; बादशाहों से फकीरों का बड़ा था मर्तबा ,जब तक सियासत से उनका कोई मतलब ना था ;| 
                                                                  देश के चिंतनशील और जिम्मेदार लोग समझ ही नहीं पा रहे है कि ज्यो ही अमरीका के राष्ट्रपति ओबामा भारत आये और संसद को संबोधित कर भारत को महान स्वीकार किया तथा हर भारतीय सीना चौड़ा कर चलने लगा ,दुनिया के लोग भारत में आकर पैसा लगाने को तैयार होने लगे ,देश के विरुद्ध सोचने वाले और षड़यंत्र करने वाले ठिठक कर खड़े हो गए ,अचानक ऐसा क्या हुआ कि उस स्थित को भारत के लिए प्रयोग होने से पहले ही भारतं को बुरा रास्त्र घोषित करने कि मुहीम देश के अंदर से ही शुरू हो गयी | इतिहास इसकी समीक्षा करेगा जरूर और वे ताकतें  बेनकाब भी होगी | आजादी कि लड़ाई में भी तो इस देश कि बहुत सी ताकतें  या तो फिरंगियों के साथ सीधे सीधे खड़ी थी या स्वतंत्रता सेनानियों के खिलाफ मुखबिरी कर रही थी | कुछ वैसी ही ताकतें आज भी देश के खिलाफ खड़ी है | इनकी संख्या हजारों या लाखों में होती है और ये १२० करोड़ से ज्यादा के देश को आदेशित करना और तानाशाही पूर्ण तरीके संचालित करना चाहते है | 
                                            इस बात से किसे एतराज है कि देश से बुराइयाँ मिटनी चाहिए ,भ्रस्ताचार ख़त्म होना चाहिए ,काला धन  का कारोबार बंद होना चाहिए इत्यादि | बहुत सी बाते है जिनपर देश में चिता भी है और चिन्तन भी | यदि चिंतन नहीं होता तो सूचना का अधिकार बना ही नहीं होता | जो भी हजारो करोड़ कला धन वापस आया है वो आया ही नहीं होता | सत्ता में भागीदार लोग जेल में गए ही नहीं होते और जेल जाने वाले यदि कोई और भी उनके कामो में शामिल है तो अब तक मुह खोल चुके होते | कम से कम पूर्व की सरकारों की तरह ये सरकार जिन पर भ्स्ताचार प्रमाणित हो जा रहा है उन्हें बचा नहीं रही है बल्कि कानून को मजबूती से काम करने को प्रोत्साहित कर रही है | किसी का पैसा खो जाता है या चोरी हो जाता है तो हमारी अपनी व्यवस्था हमें तुरंत नहीं दिलवा पाती है बल्कि कानूनी प्रक्रिया पूरी होने पर वो काफी दिन में मिल पाता है | यहाँ तो काला धन उन देशो में है जिनकी अर्थव्यवस्था ही उसी पर निर्भर है | अन्तेर्रस्त्रीय कानूनों के अंतर्गत प्रावधानों से ही वह वापस आयेगा और उसमे लगने वाला समय लगेगा  या फिर इतनी हिम्मत हो कि हमारी सेनाएं उन देशो पर हमला कर धन वापस ले आये | अगर मनमोहन सिंह और सोनिया गाँधी इमानदार नहीं है तो किसी के इमानदार होने की कल्पना ही नहीं की जा सकती है |
                                                   देश को भ्रमित करने वालो का कहना है की ८० % लोग चोर है इन्हें छोड़ कर, चुनाव में जनता पैसे और शराब लेकर वोट देती है इन्हें छोड़ कर ,सारे लोग काला धन रखते है इन्हें छोड़ कर ,संसद और विधान सभाओ में अयोग्य लोग है और कोई भी कानून बनाना नहीं जनता है इन्हें छोड़ कर | देश में कोई भी देश के बारे ने नहीं सोचता और न देश भक्त है इन्हें छोड़ कर | ये देश चलने का जो तरीका चाहते है उसमे देश की राजधानी हो या प्रदेश की ,जिला मुख्यालय हो या कोई और इनका कहना है की जहा भी कुछ लोग इकट्ठे हो जाये और ये ऐलान कर दे की वही देश के मालिक या प्रतिनिधि है तो उस वक्त वे जो भी आदेश देते जाये वही संविधान और कानून मान लिया जाये तथा उनके आदेशो का पालन तुरंत हो वर्ना वे जो चाहेंगे करेंगे |इस अन्ना विधान में फ़ौज के दफ्तर में इकट्ठे लोग फ़ौज की नीति और युद्ध की योजना तैयार करेंगे ,जो साईकिल नहीं चलाना जानते वे एयर फ़ोर्स को कौन सा जहाज खरीदना चाहिए या कौन सी मिसाइल लेनी चाहिए ये बताएँगे | जिन्होंने तालाब नहीं देखा वे नेवी की नीति तैयार करंगे | १० डकैत या चोर मिल कर पुलिस को कानून बताएँगे | जब भी कुछ लोग किसी अदालत में इकट्ठे हो  जायेंगे वो निचली अदालत हो या सर्वोच्च न्यायलय उनसे पूछ कर ही फैसले होंगे | जब भी कोई भीड़ अखबार के या टी वी के दफ्तर को घेर लेगी वह तय करेगी की अख़बार में क्या छपे या टी वी में क्या दिखाया जाये | इसी तरह भीड़ या यूँ कहे कि कुछ लोगो कि भीड़ देश कि नयी व्यवस्था चलाएगी | यदि लाखो लोगो कि क़ुरबानी से आजाद हुए और बड़ी कुरबानियों से कायम रहते हुए तरक्की करते देश को ऐसे ही चलना है तो इन मुट्ठी भर लोगो तथा इन के चंद समर्थको को ये व्यवस्था मुबारक | पर ऐसा लगता  नहीं है कि महान हिंदुस्तान इतना कमजोर हो गया है कि कुछ लोगो कि साजिश कामयाब हो पायेगी ,वे उसी गति को प्राप्त होंगे जिसको आजादी कि लड़ाई में गद्दारी कर प्राप्त हुए थे | ये देश १२० करोड़ कि इच्छा और उनके द्वारा बनाये संविधान से चलेगा न कि किसी और विधान से |
                                                    
                                                                                                                               
                                                                                                                  डॉ सी पी राय
                                                                                                 
                                                                                              स्वतंत्र राजनैतिक चिन्तक और स्तंभकार





                                                   

 


शुक्रवार, 17 जून 2011

दोस्तों मै चाहता हूँ कि सरकार मुझसे तथा आप में से भी जो लोग राय देना चाहे उन सभी से लोकपाल , भ्स्ताचार, कालाधन तथा अन्य जो भी विषय है जिनसे देश कि जनता दुखी है पर सरकार बात करे ! क्योकि नागरिक के रूप में वे जिनसे सरकार बात कर रही और हम आप सब बराबर है | लोकपाल ,बाबा ,स्वामी ,धर्मस्थल ,एन जी ओ ,सभी व्यापारियों कि जांचा करने को भी एक सुपर लोकपाल कि जरूरत है | हमारे इस विचार के लिए सरकार हमसे बात करे ,हम लोगो को भी समिति में शामिल करे वरना क्या हम लोगो को भी दिल्ली में अनशन पर बैठने  को मजबूर होना पड़ेगा ? पर हम सब भारत के आम आदमी है इसलिए हमारे पास उतना तामझाम नहीं है और न इतना पैसा है ,न संघ या किसी संगठन का समर्थन है तो क्या मीडिया और सभी लोग ,सत्ता और विपक्ष में बैठे लोग हम लोगो पर ध्यान देंगे ? कही ऐसा तो नहीं होगा कि चमक दमक और बड़े घरानों तथा बड़े लोगो या संगठनो का हाथ नहीं होने के कारन मेरा और आप का भी हाल निगमानंद जैसा हो जाये और दिल्ली में हम ;लावारिश मौत मर जाये ? यदि ऐसा हुआ तो हमारे बच्चे तो लावारिश हो जायेंगे ! आप दोस्तों से दो सवाल है १ - क्या मै जिन लोगो के बारे में लिखा है उनकी जाँच करने को भी एक सुपर लोकपाल होना चाहिए जिसका चुनाव सीधे देश के १२० करोड़ लोग करे ? २- क्या आप दिल्ली में अनशन के लिये मेरा साथ देने को तैयार है ? क्या यदि सरकार न सुने तो हमें सर्वोच्च अदालत से अपना अधिकार मांगना चाहिए कि हम भी अन्ना से समान जागरूक नागरिक है इसलिए हमें भी समिति में शामिल किया जाये ? दोस्तों यदि आप लोगो का नैतिक और वास्तविक समर्थन मुझे मिला तो आप लोगो कि राय देश कि सरकार के पास पहुँचाने के लिए मै दिल्ली में अनशन पर बैठूँगा | अन्ना और रामदेव के लिए इतने लोगो ने साथ दिया तो उनसे भी आगे कि मांग के लिए मुझ साधारण आदमी के साथ कितने लोग आते है ? वर्ना वह शेर सही साबित हो जायेगा   ;सब लोग ही समझे बूझे है ,सब लोग ही देखे भाले है .बिगड़े का बहनोई कोई नहीं धनवान के लाखो साले है |

साईं बाबा के अपने कमरे से करोडो का सोना करोडो की चाँदी करोडो के हीरे जवाहरात

साईं बाबा के अपने कमरे से करोडो का सोना करोडो की चाँदी करोडो के हीरे जवाहरात और इतना रूपया जो पांच जीपों में भरकर बैंक गया मिला  | दोस्तों जो समाज से कहते है भगवन में ध्यान लगाओ बाकि सब मिटटी है फिर उन्ही को इतनी मिटटी अपने कमरे में इकट्ठा करने की क्या जरूरत पद गयी ? या ये दोहरे चरित्र और दो मुह ,दो जबान का मामला है ? क्या इन स्वामियों इनके मंदिरों और सभी धर्मस्थलो के लिए भी कोई लोकपाल बनाया जाये ? क्या इन्हें नंबर दो का पैसा देने वाले सारे व्यापारियों के लिए भी कोई लोकपाल बनाया जाये ? क्या इनका मुद्दा भी अन्ना और रामदेव जैसे लोग उठाएंगे ? क्या सरकार इनके मानने वालो के वोट की परवाह नहीं करते हुए इन स्थानों पर जमा काले धन को निकालने का भी कोई अभियान चलाएगी ? दोस्तों एक बार फिर बाबाओ के बारे में उनकी असलियत के बारे में सोचना जरूर| १- लोगो को २०० साल की जिंदगी देने का दावा करने वाला ५ दिन में ही अस्पताल चला गया और खुद अपने दावो के विपरीत आयुर्वेद का नहीं बल्कि अंग्रेजी दवाओ का इलाज करवा रहा है | क्या इससे बड़े बाबा मनमोहन सिंह नहीं जिन्होंने अपने गंभीर इलाज के लिए विदेश जाने और बड़े प्राईवेट अस्पताल में भारती होने से इंकार कर एम्स में इलाज करवाया | २ - अब ये जो अपनी भभूत से लोगो की जन बचाने का दावा करते थे अपनी जिंदगी के लिए साधारण मनुष्यों पर आश्रित हो गए और चले भी गए | जाने के बाद ये भी सामने आ गया की आम लोगो की तरह इन लोगो को भी धन दौलत की कितनी भूख है ? क्या ये दौलत इन्होने सरकारी विभागों के सामने प्रकट किया था ? क्या आयकर और अन्य कर दिया था ? यदि नहीं दिया तो इन लोगो को किस श्रेणी में रखा जाये ? क्या इन्हें भी हम उन्ही शब्दों से संबोधित कर सकते है जिससे अन्य लोगो को करते है ? आइये ईमानदारी से इस बहस में भाग लीजिये ,देखते है कितने लोग जागरूक है तथा हिस्सा लेते है ? ये भी देखना है की अन्ना की टीम इस विषय पर कुछ बोलती है या नहीं ? जय हिंद |

शनिवार, 11 जून 2011

तथाकथित योगी कहते थे की योग करो और निरोगी रहो और योग करने वाला महीनो बिना खाए पीये केवल सूर्य की रोशनी और योग के सहारे जिन्दा रह सकता है | भारत में योगी नहीं कहलाने वाले बहुत से लोग हुए है संघर्ष के इतिहास में भी और आज भी है समाज के लिए रोजमर्रा संघर्ष करने वाले जो बहुत दिनों तक भूखे प्यासे रहे पर अस्पताल जाने की नौबत नहीं आई | कुछ दिन पहले ८० साल के करीब के अन्ना भी कई दिन अनशन पर रहे पर अपने पैरों पर चल कर गए | लेकिन ४७ साल का ये कैसा योगी जो बड़े बड़े दावे करता है पर ५ दिन में ही मौत की कगार पर पहुँच गया | दोस्तों सभी संकीर्णता और लगाव से ऊपर उठ कर सचमुच एक  बार सोच कर देखे की तथाकथित योगी की असलियत और उसके योग की असलियत क्या है ?ये भी सोचे की उस दिन प्रेस कांफ्रेंस में ज्यो ही पत्रकारों ने इनकी कंपनियों के बारे और पासपोर्ट के बारे में पूछना शुरू किया ये प्रेस कांफ्रेस छोड़ कर भाग क्यों खड़े हुए ? वह सवाल तो अभी तक अनुत्तरित है की पुलिस देख कर कूद कर औरत के वेश में भागे क्यों ? फिर प्रेस से भागना और अब योग की ताकत नहीं दिखा पाना ? आखिर सच क्या है ? दोस्तों ये कोई राजनीती का सवाल नहीं है बल्कि एक नागरिक का स्वाभाविक चिंतन है | उम्मीद है की सभी लोग दिल पर हाथ रख कर एक बार दिमाग से सोचेंगे जरूर | जय हिंद |

सोमवार, 6 जून 2011

कुछ घंटे पहले क्रन्तिकारी भाषण से लोगो को उत्तेजित करने वाला और जान की कोई कीमत नही है ये देश के लिए जाये तो जाये कहने वाला तथा सभी के साथ १२० करोड़ लोगो की लड़ाई की बात करने वाला रामदेव यादव औरत का भेष धारण कर भागा क्यों ? ये तो शिखंडी से भी गया गुजरा निकला | शिखंडी तो युद्ध भूमि में डटा रहा अपने लोगो के लिए पर ये तो कायरों की तरह भाग निकला | रामदेव यादव ने खुद अपनी हरिद्वार की प्रेस कांफ्रेंस में दो बाते कहा जिस पर देश जवाब चाहता है १- उसने कहा की छोटे छोटे बच्चो को उसके सामने घसीट कर मारा जा रहा था ,सवाल ये है की यह देख कर उसका पुर्सत्व मर गया की वह मुह छिपा कर भाग गया जबकि कमजोर से कमजोर आदमी ऐसे मौके पर औरतो और बच्चो की ढाल बन कर खुद पिट लेता है लेकिन उनकी रक्षा करता है ,रामदेव ने ऐसा क्यों नहीं किया  | जो लोग इसके झूठे कार्यक्रम के लिए इसलिए इकट्ठे हो गए की शायद यहाँ बिना पैसे लिए ये योग सिखाएगा चाहे अपने स्वार्थ में ही सही उन्हें छोड़ कर ये भागा क्यों ? भागने के लिए इसने किस बहन बेटी के कपडे उतरवा कर पहने और उसे क्या पहनाया तथा वो कहा है ?खुद औरत बच्चो की ढाल बनने के स्थान पर इसने औरतो को ढाल क्यों बनाया ? जिस तरह ये पुलिस  को देख कर ऊंचे मंच से कूदा, देश जानना चाहता है की क्या पुलिस  को देख कर भागना इसकी पुँरानी आदत है ,आखिर इसने क्या किया है पूर्व में की पुलिस  को देख कर इसे भागना पड़ता था ? २ - इसने बयान दिया की यदि तीन दिन धरना चल जाता तो केंद्र की सरकार गिर जाती | इस बात का क्या मतलब है ? किन लोगो के साथ और आगे की क्या साजिश थी यह भी जनता जानना चाहती है |जनता यह भी जानना चाहती है की तीन दिन में इसने क्या क्या छुपाया ? यह भी जानना चाहती है कुछ घंटे पहले तक सरकार और प्रधानमंत्री की तारीफ करने और उनकी शान में ताली बजवाने के पीछे इसका क्या मकसद था ? जनता यह भी जानना चाहती है बार बार मंच से पीछे जाकर ये क्या खेल रच रहा था ? जनता यह भी जानना चाहती है की रामदेव जिन लाखो या करोडो लोगो को अपना शिष्य बताता है देश और विदेश में उनमे से कितनो को भ्रस्टाचार न करने ,घूस न लेने और न देने के लिए प्रतिबद्ध कर चूका है | अपने तथाकथित शिष्यों का कितना पैसा विदेश से देश में मंगा चूका है ? खुद को विदेश में तथाकथित तौर पर मिलने वाला मॉल विदेश में ही है या देश में वापस ले आया है ?
      पर सबसे पहले ये बता दे की शिखड़ी का भेस धारण कर भागा क्यों ?भारत तो बहादुरों का देश है क्या अब ये कायरो के पीछे चलेगा ? एक कायर खुद अपने मुह से खुद को महात्मा गाँधी तथा शिवाजी के बराबर रखेगा क्या ये देश इस बात को बर्दाश्त करेगा ?कोई कुछ हजार अपने व्यवसाय पर पलने वालो के परिवारों को तथा इसकी बातो में आ गए भोले भाले लोगो को इकठ्ठा कर महान हिंदुस्तान को ललकारेगा और देश ये बर्दाश्त करेगा ?क्या केवल रामदेव का मानवाधिकार है ? क्या दिल्ली में रहने वाले लोगो का कोई मौलिक अधकार और मानवाधिकार नहीं है ? क्या देश इसी तरह चलेगा की कुछ हजार लोग कही भी इकट्ठे हो जाये और तुरंत अपना मनचाहा  करवाने को मजबूर करे ? क्या यदि ऐसे  ही कुछ हजार लोग रामदेव के आश्रम को घेर कर तुरंत सब जानना चाहे  तो वह अपने और अपने लोगो के हिसाब तथा अपनी तमाम संपत्ति  का हिसाब तुरंत देने को तैयार है ? इसका समर्थन करने वाले भा जा पा,संघ ,नितीश कुमार ,मायावती नरेन्द्र मोदी सहित वे तमाम लोग अब इसी तरह की व्यवस्था चाहते है की कभी भी कुछ हजार लोग उनकी राजधानियों को घेर कर या जिला मुख्यालयों को घेर कर तुरंत मनचाहा आदेश और काम करवाए ? यदि ये सभी लोग अब से यही व्यवस्था चाहते है तो अपने अपने दलों  और सरकारों का प्रस्ताव पास कर भारत सरकार को भेज दे की अब संविधान में परिवर्तन कर ऐसी व्यवस्था बने जहा कोई विधान सभा और लोक सभा न हो ,कोई प्रशासनिक व्यवस्था न हो बल्कि जहा जिसकी लाठी उसकी भैंस की व्यवस्था देश में लागू की जाये | क्या महान भारत यही व्यवस्था चाहता है ?फिर वही सवाल पूरा देश जानना चाहता है की कायर सेनापति औरतो और बच्चो को ढाल बना कर शिखंडी बन कर भागा क्यों ?