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रविवार, 23 जुलाई 2017

इंतजार करता हूँ किसी समापन का संघर्ष या जीवन में


काफी दिनों से कुछ नहीं लिखा न विचार और न  कविता | लगता है विचार ही सूखा गए है या कलम की स्याही सूख गयी है या उँगलियाँ ही नहीं चलती अब की बोर्ड पर| कभी लिखा था की मन होता है की किताबे जला दूँ ,डिग्रियां और पुरष्कार जला दूँ ,कही उसी का असर तो नहीं ? या हालत ने बना दिया है मुझे ऐसा | संघर्ष तो किया है पूरी जिंदगी पर अब शायद जिदगी ही संघर्ष हो गयी है इसलिए जब तक संघर्ष करता रहा तब तक तो कलम दौड़ती रही पन्नो पर लेकिन जिन्दगी ही जब संघर्ष बन जाये तो क्या और कैसे दौड़े ,न दिमाग ही चलता हिया और न दिल ही हिलोरे लेता है न दुःख की ,न सुख की ,न चाहत की ,न संकल्प की न संबल की न संभावनाओ की और जब दिल ही मौन हो गया हो इस कदर तो भाव आये भी तो कहा से और कलम हो या कीबोर्ड चले भी तो कैसे |
पता नहीं कब जिन्दगी भवर से निकलेगी और संघर्ष अंतिम विराम लगाएगा जिंदगी में या जिन्दगी को | राजनीती तो मेरे खून के कतरे कतरे में थी पर वो भी सन्यास ले गयी है लगता है |
तो अभी वरम ही देता हूँ
और इंतजार करता हूँ किसी समापन का संघर्ष या जीवन में | 

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