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सोमवार, 10 सितंबर 2018

बताशे वाला बाबा

बताशे वाला बाबा
( जीवन के झरोखे से एक कहानी )

रविवार का दिन और जाड़े की सुबह नाश्ता हो चुका था ।अखबार अभी पिताजी के कब्जे में था ।माँ नाश्ते से निपटी ही थी कि खाने की तैयारी में लग गयी थी । उधर ये फरमाइश भी की पानी गर्म हो तो सब नहाए वर्ना धूप का इंतजार करें । सूरज अभी जवान नही हुआ था पंर पूरब वाले पेड़ की डालियों और पत्तियों में से झांक रहा था और कुछ गर्मी का सा एहसास करवा रहा था ।
सब अलसाये से बैठे कुछ इधर उधर की चर्चा में व्यस्त थे कि दरवाजे की कुंडी खटकी , क्योकि 80 के आसपास घण्टी किसी किसी के यहाँ बजती थी , अधिकतर घरों में कुंडी ही खटकती थी ।
दरवाजा खोला तो सामने मिस्टर कार ( नाम थोड़ा बदल दिया है ) खड़े थे ।
थोड़ा परेशान लग रहे थे । बोला अंदर आइये तो जल्दबाजी में थे और बोले कि कुछ परेशान हूँ और कही जाने की जल्दी है । आप को लेने आया हूँ क्योकि जहाँ जाना है सुरक्षित स्थान नही लगता । जल्दी से तैयार हो जाइए और चाय पानी कुछ नही , बस चलिए ।
फिर चाय पानी के लिए मैने नहीं बल्कि मेरे पिता ने पूछा तो टालने की गरज से बोले कि बस आकर पीते है । अभी कुछ जल्दी है ।
मैं भी जल्दी से तैयार होकर उनकी बिल्कुल नई ली गयी फिएट कार में बैठ गया । तब उन्होंने बताया कि खेरागढ़ इलाके में एक गांव में चलना है , कुछ जरूरी काम है । वहाँ एक बहुत पहुंचे फकीर रहते है और सब कुछ उनका बताया हुआ सही निकलता है ।
मैंने उत्सुकता से पूछा आप का अच्छा कारोबार है फिर आप को क्या जानने की जरूरत पड़ गयी ।
मिस्टर कार ने टालना चाहा बस इतना कह कर की बताऊंगा और दूसरी बाते शुरू कर दिया ।
बातो बातो ने खेरागढ़ इलाके का वो इलाका आ गया तो कई जगह उतर उतर कर वहाँ के लोगो से कार जी कुछ पूछते और फिर आगे बढ़ते जाते और अंततः एक सुनसान जगह पर रुके और मुझे भी उतरने का इशारा किया ।
पास ही एक खेत मे एक झोपड़ी में पहुचे तो देखा वहां एक दाढ़ी वाला व्यक्ति बैठा था और दो गांव के लोग बैठे उसकी कुछ किस्सेबाजी सुन रहे थे ।
कार जी ने उसका पैर छुवा और जमीन पर ही पालथी मार कर बैठ गए । गोर चिट्टे और अमीर से दिखने वाले शख्स को देखकर वो लोग कुछ असहज हुए ये साफ दिख रहा था ।
दाढ़ी वाले ने थोड़ा हिम्मत जुटा कर पूछा बोलो बच्चा कैसे आये ? किसने भेजा यहाँ ,या यहाँ के बारे में बताया ? कार विनम्र होते हुए और कुछ दयनीय से बनकर बोले बाबा बस एक सवाल था कि मेरा काम बनेगा या नही बनेगा ?
उस तथाकथित बाबा ने लोटे में पानी भरा और उसमे बताशे डालने लगा ।
मैं उसका खेल समझ गया पंर कार की श्रध्दा के सामने कुछ नही बोलने का फैसला किया । ये भी समझ मे आ गया कि ये थोक में पहले से बताशे लेकर रखता है । आखिर यही उसकी दुकानदारी का हथियार जो है ।
वही हुआ जो विज्ञान के अनुसार होता है कि कुछ देर बाद पानी पूरा गाढ़ा मीठा हो जाने डाला जाने वाला बताशा तैरने लगा ।
बाबा बोला बच्चा तेरा काम हो जाएगा । कार ने कुछ पैसे उसके पैर के पास रख दिया जो उस समय के हिसाब से काफी था । और हम फिर गाड़ी में बैठे आगरा शहर की तरफ चल पड़े ।
अब मिस्टर कार का परिचय भी जानना जरूरी है । ये अमरीका से एक नही बल्कि डबल इंजीनियरिंग पास कर के कुछ साल पहले आगरा आये थे और पंखे के कुछ हिस्से बनाने की फैक्ट्री शुरू कर दिया था । काम बहुत अच्छा चल रहा था । इनका काम मेरे एक करीबी जानने वाले के कारण जमा और ऊँचाई पर पहुचा था । कुछ समय पहले ये एक दिन मेरे घर मेरे उस जानने वाले के साथ ही आये और चाय पीते हुए मेरे पिता की मौजूदगी में मुझे अपने साथ काम करने का आमंत्रण दिया । काफी बातचीत के बाद उनका प्रस्ताव मैने स्वीकार कर लिया ।
काफी जोर देकर मैने उनसे पूछा कि ऐसा क्या मामला है कि एक निहायत गंवार और जाहिल के पास जाना पड़ा ?
तब उन्होंने बताया कि जब वो अमरीका में थे तो वहाँ की आमदनी वही लगा दिया था और अब कुछ काम बढ़ाना चाहते है तो उन्हें पैसे की जरूरत है । पता नही उनका पैसा मिलेगा या नही और जहाँ पैसा लगा है कही वो बेईमान तो नही हो जाएंगे । लंबे समय से भारत मे रहकर उनकी ये मान्यता हो गयी थी कि कोई काम अपने आप और नियम से नही होता , कानून कुछ नही होता ,सब सिफारिश और घूस से ही होता हौ ,क्योकि यही तो देखा इन सालों में उन्होंने भारत आने के बाद ।
जब उन्होंने ये बात अपने किसी स्थानीय रिश्तेदार को बताई तो उसी ने इस बाबा के पास जाने की राय दिया ।
तब मैंने पूछा कि वैसे जहाँ आप ने पैसा लगाया है वहा से आप को कुछ कागज तो दिया गया होगा और कोई तरीका बताया गया होगा कि पैसा अगर वापस चाहिए तो कैसे मिलेगा ।
वो बोले कि हां एक पेपर है उसी में एक जग दस्तखत कर वहां भेजना है ।
मैंने पूछा कि क्या आप ने भेजा तो बोले कि वही भेज दूंगा तो मेरे पास तो कुछ रहेगा नही और वो कम्पनी मुकर गए तो पैसे मर जाएंगे ।
मैंने कहा कि उसकी फोटो रख लीजिए और जैसे वहाँ से कहा गया उसी तरह भेज कर देखिये वर्ना अमरीका हो आइयेगा क्योकि पैसा अधिक है पंर पहले उनके हिसाब से कर के देख लेना चाहिए । तो बोले कि अच्छा अभी फोटोकॉपी करवा लेते है और भेज देते है पंर कुछ गड़बड़ हुई तो आप की मेरे साथ अमरीका चलना ।
मैने कहा कि कुछ घुमाए और दिखाए तो चला चलूंगा हफ्ता दस दिन को पंर ऐसी जरूरत शायद पड़ेगी नही ।
दूसरे दिन उन्होंने वही किया पंर रोज परेशान रहते और पैसे मर जाने की शंका व्यक्त करते तो उस तथाकथित बाबा को याद कर आश्वस्त भी करते ख़ुद को ।
एक बार मैंने बताशे की कहानी और उसके विज्ञान पर बात करते हुए और ये कहने पर की आप अमरीका से इतनी पढ़ाई कर के आये है और इन बातो पंर कैसे विश्वास करते है तो कुछ झुंझला गए । मैने ही बात बदल दिया ।
कुछ दिन बाद मैं घर मे बैठा था कि कुंडी खटकी और कार जी सामने थे मिठाई का डिब्बा हाथ मे लिए हुए और खुशी से उनका चेहरा दमक रहा था ।
कुछ पूछते उससे पहले उन्होंने खुद मेरे पिताजी का पैर छूते हुए खुशी का कारण बताया कि मेरी बात सही साबित हुई और सिर्फ उनका पैसा ही नहीं आ गया बल्कि उसका पूरा इतने साल का हिसाब भी आया है और पूछा कि हिसाब में कोई दिक्कत हो तो वो सूचित करें । वो बोले जा रहे थे मेरे दिमाग मे एक  तरफ तो उनके अमरीका से डबल इंजीनियरिंग पढ़ने पर शंका हो रही थी तो दूसरी तरफ उस गंवार के सामने उनका परेशान हाल जमीन पर बैठने का दृश्य घूम रहा था ।
पर वताशे वाला सही निकल ही गया ।

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