जिस दिन मोदी ने संसद की सीढ़ियों पर सर झुकाया था मैंने कहा था की ये जिन के सामने सर झुकाते रहे जो उनके साथ किया वही संसद के साथ करेंगे ।
समाज हो या सरकार, आगे तभी बढ़ सकते हैं, जब उनके पास सपने हों, वे सिद्धांतों कि कसौटी पर कसे हुए हो और उन सपनों को यथार्थ में बदलने का संकल्प हो| आजकल सपने रहे नहीं, सिद्धांतों से लगता है किसी का मतलब नहीं, फिर संकल्प कहाँ होगा ? चारों तरफ विश्वास का संकट दिखाई पड़ रहा है| ऐसे में आइये एक अभियान छेड़ें और लोगों को बताएं कि सपने बोलते हैं, सिद्धांत तौलते हैं और संकल्प राह खोलते हैं| हम झुकेंगे नहीं, रुकेंगे नहीं और कहेंगे, विजयी विश्व तिरंगा प्यारा, झंडा ऊँचा रहे हमारा|
शुक्रवार, 7 अगस्त 2015
भक्त से लेकर मीडिया भक्त तक अलाप रहे है की जो कभी नहीं हुआ वो हो गया एक समझौते में ।
या तो नए है या अज्ञानी नादान है ।
लालड़ेंगा और लोंगवाल शब्द सुना ही नहीं होगा ।ऐसे कई समझौते इतिहास में हुए है और उन लोगो से जिनसे संभव नहीं दीखता था और वहां जहा जीवन दूभर था ।
सोचा दुन्नो का थोड़ा ज्ञान बढ़ा ही दे ।
हो सके की भोंपू बंद हो जाये । पर संघी भोंपू तो बस एक सुर में लगातार बजना जानता है जब तक नागपुर से ट्रैक न बदला जाये ।
या तो नए है या अज्ञानी नादान है ।
लालड़ेंगा और लोंगवाल शब्द सुना ही नहीं होगा ।ऐसे कई समझौते इतिहास में हुए है और उन लोगो से जिनसे संभव नहीं दीखता था और वहां जहा जीवन दूभर था ।
सोचा दुन्नो का थोड़ा ज्ञान बढ़ा ही दे ।
हो सके की भोंपू बंद हो जाये । पर संघी भोंपू तो बस एक सुर में लगातार बजना जानता है जब तक नागपुर से ट्रैक न बदला जाये ।
समाज का असली चरित्र -------
समाज का असली चरित्र ----------
आप के बहुत ख़ास अपनी जाति के सम्मलेन या किसी आयोजन में लाखो खर्च कर देते है ।
किसी धार्मिक आयोजन या स्थल के लिए 25 लाख से करोडो तक दे देते है ।
पर ---आप के लिए और आप की तकलीफ के लिए वो गरीब बन जाते है या खुद परेशानी में पड़ जाते है ।
सड़क पर कोई इंसान मर रहा हो तो बगल से निकल जाते है पर जाती धर्म या गाय सुवर के लिए मारने मरने पर उतारू हो जाते है ।
पार्टी में लाखो की दारु बहा देते है और लाखो का खाना फेंक देते पर प्यासे को एक बोतल पानी देने के बजाय दुत्कार देते है और भूखे को भगा देते है ।
धर्म स्थल पर केवल फूल चढाने पर लाखो खर्च कर देते है पर मंदिर के बाहर हाथ फैलाये खड़े लोगो को अपशब्द कहते है ।
रेस्टोरेन्ट में वेटर को सैकड़ो टिप देते है पर मोची से चार आने के लिए लड़ते है ।
क्या क्या लिखूं ? पोथी लिखना पड़ेगा ।
ऐसी ही कुछ बाते जानकारी में आई और कुछ बातो से प्रभावित हुआ और संबंधो का मोल इसी कसौटी पर जाना तो लिख दिया ।
दोस्तियां झूठ और फरेब का पुलंदा है बस अभिनय देखो और अभिनय करो ।
आप के बहुत ख़ास अपनी जाति के सम्मलेन या किसी आयोजन में लाखो खर्च कर देते है ।
किसी धार्मिक आयोजन या स्थल के लिए 25 लाख से करोडो तक दे देते है ।
पर ---आप के लिए और आप की तकलीफ के लिए वो गरीब बन जाते है या खुद परेशानी में पड़ जाते है ।
सड़क पर कोई इंसान मर रहा हो तो बगल से निकल जाते है पर जाती धर्म या गाय सुवर के लिए मारने मरने पर उतारू हो जाते है ।
पार्टी में लाखो की दारु बहा देते है और लाखो का खाना फेंक देते पर प्यासे को एक बोतल पानी देने के बजाय दुत्कार देते है और भूखे को भगा देते है ।
धर्म स्थल पर केवल फूल चढाने पर लाखो खर्च कर देते है पर मंदिर के बाहर हाथ फैलाये खड़े लोगो को अपशब्द कहते है ।
रेस्टोरेन्ट में वेटर को सैकड़ो टिप देते है पर मोची से चार आने के लिए लड़ते है ।
क्या क्या लिखूं ? पोथी लिखना पड़ेगा ।
ऐसी ही कुछ बाते जानकारी में आई और कुछ बातो से प्रभावित हुआ और संबंधो का मोल इसी कसौटी पर जाना तो लिख दिया ।
दोस्तियां झूठ और फरेब का पुलंदा है बस अभिनय देखो और अभिनय करो ।
मंगलवार, 2 जून 2015
कभी नहीं भुलाई जा सकती है ये वाणी कबीर की
कभी नहीं भुलाई जा सकती है ये वाणी ------------ कबीर जिन्दा खड़े है अपने क्रान्तिकारी विचारो के साथ और उस युग की असंभव वैचारिक और सामाजिक क्रांति के साथ हमारे अन्तः में चाहे हम अभी स्वीकारे या कल स्वीकारे पर आइये आज उस फ़कीर को सर झुका कर सलाम करे -----------------
बड़ा हुआ तो क्या हुआ जैसे पेड़ खजूर
पंथी को छाया नहीं फल लगत अति दूर ।
कांकर पाथर जोर के मस्जिद लयी बनाय
ता चढ़ी मुल्ला बांग दे बहिरा हुआ खुदाय ।
माला फेरत जग फिरा फिरा न मन का फेर
कर का मनका डार दे मन का मनका फेर ।
ऐसी बानी बोलिए मन का आपा खोय
औरहु को शीतल करे आपहु शीतल होय ।
माटी कहे कुम्हार से तू क्या रोंदे मोय
एक दिन ऐसा आएगा मैं रौंदूंगी तोय ।
गुरु गोविन्द दोवू खड़े काके लागू पाय
बलिहारी गुरु आपनो गोविन्द दियो बताय।
साई इतना दीजिये जामे कुटुंब समाय
मैं भी भूखा न रहूँ साधू न भूखा जाए ।
बड़ा हुआ तो क्या हुआ जैसे पेड़ खजूर
पंथी को छाया नहीं फल लगत अति दूर ।
कांकर पाथर जोर के मस्जिद लयी बनाय
ता चढ़ी मुल्ला बांग दे बहिरा हुआ खुदाय ।
माला फेरत जग फिरा फिरा न मन का फेर
कर का मनका डार दे मन का मनका फेर ।
ऐसी बानी बोलिए मन का आपा खोय
औरहु को शीतल करे आपहु शीतल होय ।
माटी कहे कुम्हार से तू क्या रोंदे मोय
एक दिन ऐसा आएगा मैं रौंदूंगी तोय ।
गुरु गोविन्द दोवू खड़े काके लागू पाय
बलिहारी गुरु आपनो गोविन्द दियो बताय।
साई इतना दीजिये जामे कुटुंब समाय
मैं भी भूखा न रहूँ साधू न भूखा जाए ।
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