रविवार, 1 मई 2022

बिजली कब आएगी

 एक छोटी सी हास्य नाटिका कुछ यूँ हो सकती है न ---


दृश्य - एक डाक्टर का क्लिनिल है
बिजली कब आएगी

एक परिवार डाक्टर उसमे प्रवेश करता है और सभी बस एक ही बात रट रहे है --
बिजली कब आएगी ? बिजली कब आएगी ?
डाक्टर पूछता है की क्या बींमारी है
पर कोई जवाब नहीं मिलता है
तब डाक्टर कहता है - कंपाउंडर जरा इनकी नब्ज देखो
कंपाउंडर ने एक की नब्ज पकड़ा ही था की वो भी बोलने लगा की
बिजली कब आएगी बिजली कब आयेगी
तब डाक्टर उठता है और वो कंपाउडर की नब्ज पकड़ता है की इसे क्या हो गया
और फिर वो भी बोलने लगता है की बिजली कब आएगी बिजली कब आएगी
और यही बोलते बोलते सब दृश्य से बाहर चले जाते है
{ यह किसी भी चीज पर बन सकता है ,मसलन १५ लाख कब आयेंगे अच्छे दिन कब आएँगी ,सामान सस्ता कब मिलेगा इत्यादि }

मंगलवार, 1 मार्च 2022

गुट निरपेक्ष आंदोलन की प्रासंगिकता

गुट निरपेक्ष आंदोलन की सार्थकता ।

आज जब उक्रेन मे मौत तांडव कर रही है और सिर्फ उक्रेन की जनता ही नही बल्कि सम्पूर्ण विश्व उसके साथ अमरीका सहित नाटो के देश के न खडे होने से हतप्रभ है कि इन बड़ो के चक्कर मे क्या मिला सिवाय बर्बादी के । आज तक हजारो सौनिक तथा आम नागरिक जिसमे मासूम बच्चे भी है ,उसमे एक भारत का छात्र भी हौ शहीद हो चुके है तब फिर से ये सवाल उठ खड़ा हुआ है की क्या विकासशील या कम विक्सित और छोटे देशो को बड़े देशो की आपसी लड़ाई और प्रतिस्पर्धा का हिस्सा बनने के बजाय फिर से गुटनिरपेक्ष आंदोलन जैसा कुछ बना लेना चाहिये इसकी बुनियाद पंचशील सिद्धांत और पुराने इस आन्दोलन के मकसद के साथ युद्ध विहीन ,शोषण विहीन और मानवता पर केन्द्रित सिद्धांत हो और आपसी सभी जरूरतो के लिये परस्पर पूर्ण सहयोग का उद्देश्य हो । आपसी गठबंधन से बाहर तभी जाये जब वो चीज चाहिये हो जो इनके पास नही हो और इस संगठन के आदर्श महात्मा गाँधी को जो दुनिया मे स्वीकार्य है ।
आज के हालात मे जब प्रधानमंत्री मोदी अलोचना के केन्द्र मे है तब उनको आगे बढ़ कर इस उद्देश्य को आगे बढ़ाना चाहिये वरना पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को आगे रख कर और सभी दलो के अनुभवीं नेताओं को जोड़ कर राजनीतिक और दलीय रूप से कांग्रेस को इस मुद्दे पर तत्काल लीड लेनी चाहिये और पूर्व गुट निरपेक्ष आंदोलन के सभी देशो से सम्पर्क कर एक बैठक बुला कर युद्द की निन्दा का प्रस्ताव करना चाहिये और मानव की सहयता के लिये डाक्टरो की टीम दवाईया , खाद्द्य सामग्री इत्यादि से मदद करने की शुरुवात करना चाहिये ।
हो सकता है की ये आन्दोलन तत्काल सत्ताधीशो को न समझ मे आये पर दुनिया की जनता इससे जरूर जुड़ेगी । जो रूस आक्रमण कर रहा है उसकी जनता वहा तानाशाही व्यवस्था के बावजूद सडक पर युद्ध का विरोध कर रही है और उक्रेन के राष्ट्रपति के आगे खडे रहने पर बड़ी संख्या जहा लोग पलायन कर रहे है वही  हजारो मौतो के बाद भी वहा के आम नागरिक जिसमे बच्चे बच्चियाँ और हर उम्र की महिलाओ तक ने हथियार उठा लिया है ।एक बात याद रखना चाहिये की कोई सत्ता हार सकती है ,कोई देश हार सकता है पर अगर जनता खडी हो गयी है तो जनता कभी नही हारती और ऐसा इतिहास मे दर्ज है ।अगर इस आन्दोलन के पक्ष मे दुनिया के लोग खडे होते है तो यद्द्पि याद तो जवाहर लाल नेहरू आएँगे पर मान भारत का बढ़ेगा और स्थापित होगा की भारत ने हमेशा सही रास्ता चुना ।साथ हो हम नारो ,हथियारो से तो बिश्वगुरु नही बन सके पर मानवता के अलमबरदार बन कर वो दर्जा हासिल कर सकते है ।
अब देखना ये है की इसकी अगुवाई प्रधानमंत्री मोदी करते है जिसमे शक इसलिये है की वैचारिक रूप से उनका मूल संगठन शायद इसे स्वीकार नही करेगा या फिर जिसका मूल स्वभाव ही यही है वो कांग्रस करती है ।
कोई बडा और ताकतवर देश सिर्फ कमजोर देशो पर हमला करता है द्वितीय विश्वयुद्ध को छोड दे तो यही हुआ है अमरीका प्रतिबंध प्रतिबंध खेलता रहता है जो उसका प्रिय खेल है 
अमरीका के झांसे मे आने वाले देशो का सदा नुक्सान ही हुआ है ।
चीन बडा व्यापारी देश बन चुका है और वो उतना ही सुरक्षा का इन्तजाम कर रहा है जो उसके लिये और दुनिया की बड़ी ताकतो से निपटने के लिये जरूरी है  और रूस तथा चीन दोनो 100 साल आगे की कल्पना कर अपनी तैयारी मे लगे है जबकि कुछ देश मंदिर मस्जिद बुर्का हिजाब जैसी चीजो को ही भविश्य मान बैठे है ।
छोटे देश लाख कोशिश कर भी बड़ी ताकतो के हमलो को झेल नही सकते है हा बर्बाद होकर भी लड़ सकते है ।
दुनिया तेजी से बदली है और इसके युद्ध के नियम तथा हथियार भी बदले है ।
जीतने के लिये जरूरी है मजबूत होना और मजबूत होने की पहली शर्त है देश का अन्दरूनी विवादो से ऊपर होना , देश मे एकता होना , आपसी सद्भाव तथा विश्वास होना ,सरकार पर विश्वास होना तथा इसकी शर्त है सरकार का पारदर्शी होना ,समझदार और दूरदर्शी होना और सम्पूर्ण जनता मे ये विश्वास पैदा करना की वो सब कुछ सबके लिये कर रहे है तथा सबके भविश्य और सुरक्षा के लिये कर रहे है।
अन्दर से टूटा हुआ देश आर्थिक प्रगति नही कर सकता तथा यदि अंदर झगडे है और कभी भी हालात बिगड़ने का अवसर है तो कही का भी इन्वेस्टर नही आयेगा और अन्दरूनी व्यापार भी प्रभावित होगा जबकि देश की मजबूती के लिये जरूरी है की देश आर्थिक रूप से बहुत मजबूत हो ,शैक्षणिक स्तर उच्च हो और स्वास्थ्य की गुणवत्ता भी उच्च कोटि की हो , बेरोजगारी ना के बराबर हो ,कृषि से लेकर व्यापार तक सब सम्पन्न हो और वैज्ञानिक आत्मनिर्भरता हो सभी क्षेत्रो मे स्वाथ्य ,भविश्य की आवश्यकताओ तथा सैन्य जरूरतो के क्षेत्र मे तथा भविश्य मे आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस से लेकर पृकृति संरक्षण और आवश्यक चीजो के असम्भव निर्माण तक ।
इन सब चीजो के लिये वातावरण तभी बन सकता है जब नेतृत्व करने वाले सभी लोग दूरदर्शी हो और अपने ,अपनी पार्टी तथा सत्ता नही बल्कि आने वाली पीढियो के लिये सपने देखे ,सिधांत गढ़े और सन्कल्पित हो ।
वरना स्वस्थ लोकतांत्रिक प्रतिस्पर्धा और भविश्य की पीढियो के लिये सपनो की पतिस्पर्धा के बजाय तू तू मैं मैं तो किसी भी देश को पीछे ही ले जाता है ।
इतिहास के सपनो मे जीना या इतिहास की नफरत को ढोना और भविश्य की पीढियो को भी देकर जाने का इरादा सिर्फ और सिर्फ बर्बादी ही लाने वाला होता है ।इराक हो ,सीरिया हो ,उक्रेन या अन्य ऐसे कोई भी देश वो कितना भी फौजी साजो सामान इकट्ठा कर ले पर अगर वो किसी बड़े को खटक गये तो उसकी बर्बादी तय है और इस गलतफहमी मे रहना की उसको हथियार बेचने और अपने हितो के लिये इस्तेमाल करने वाला कोई दूसरा देश उसके लिये लड़ने आयेगा गलतफहमी ही साबित होता रहेगा क्यो कोई भी देश खुद को दूसरे के लिये बर्बाद नही करता क्योकी युद्ध बहुत महंगा शौक है । इसलिये छोटे , आर्थिक ,जनसांख्यिकी से कमजोर और विकासशील देशो के लिये सबसे अच्छा है की वो किसी बड़े की कठपुतली न बने और अपने हित अहित के साथ सबसे सम्बंध रखे और किसी बड़े के राजनीति का मैदान न बने ,चुनौती ही दे ।पहले और दूसरे विश्व युद्ध की विभिषीका कोई भी अभी भूला नही है ।
किसी भी देश का अपना निर्माण खास माहौल और ऐतिहासिक परिस्थितयो और कारको से होता है और उन्ही हालातो मे सुखी होता है तथा तरक्की करता है ।कुछ समाज हमेशा से तानाशाही व्यवस्था मे रहे और उसके आदी है तो वहा उसी फ्रेम मे कोई भी व्यवस्था हो जनता को फर्क नही पडेगा जब तक की लोकतंत्र की हवा का एहसास उसके अन्दर घर न कर जाये और वो तब होता है जब पूरी जनता उसका खुद अनुभव करती है या उसे सहज जानकारी होती है । भारत उन्मुक्त वातावरण का समाज रहा है यहा का समाज थोडे कम मे भी जी लेता है और संतुष्ट रहता है पर उसका उन्मुक्त वातावरण और उन्मुक्त हंसी उससे नही छिननी चाहिये इसलिये तानाशाही जैसा कोई कदम या सोच भारत के लिये आत्मघाती होगी । भारत को धर्म और जातीय झगड़ो वाले समाजो और देशो से सबक लेने की जरूरत है और जितनी जल्दी समझ लेगा उतना ही देश मजबूत हो जायेगा तथा वैज्ञानिक दृष्टिकोण और तरक्की भारत को दुनिया के सामने शान्ती तथा सद्भाव की चुनौती देने लायक हो जायेगी तथा ये दुनिया मे शान्ती का सन्देश देने लायक हो जायेगा महात्मा गांधी को सामने रख कर ।
ये वक्त फिर से विचार करने का है कि जवाहर लाल नेहरू द्वारा शुरु किया गया गुट निरपेक्ष आंदोलन कितना सार्थक था और वो खुद मे तीसरी धुरी था जी बाकी दो को बैलेंस करता था ।
पहले अमरीकी स्वार्थो ने काफी देशो को बर्बाद किया है और अब उक्रेन पूरी दुनिया के छोटे और कम बिकसित या विकासशील देशो के लिये नये सिरे से एक्जुट होकर नई रणनीति बनाने का वक्त है और भारत इन सबकी अगुवाई कर सकता है पर उसके लिये पहले भारत मे पूर्ण एकता और विश्वास जरूरी है ।
उक्रेन तो एक हफ्ते मे निपट जायेगा परंतु ये अन्तिम साबित नही होगा बल्कि ये नये तरह के युद्ध का प्रारंभ है ।
चीन की चुनौती भारत के लिये कम नही है और वो चुनौती खुद की वैचारिक और रणनीतिक गल्तियो से पैदा हुयी है ।इन गल्तियो को तुरंत स्वीकार कर उसका परिमार्जन और अनुभव का उपयोग करते हुये उससे बाहर निकलना वक्त की मांग है चाहे वह राजनीतिक विरोधी के  पास ही क्यो न हो ।
युद्ध से बचना है तो युद्ध को महंगा करना होगा और बंटा हुआ देश तथा अज्ञानी नेत्रत्व नही कर सकता ।

उक्रेन और गुट निरपेक्ष आंदोलन

उक्रेन का सबक और गुट निरपेक्ष आंदोलन की सार्थकता ।

आज जब उक्रेन मे मौत तांडव कर रही है और सिर्फ उक्रेन की जनता ही नही बल्कि सम्पूर्ण विश्व उसके साथ अमरीका सहित नाटो के देश के न खडे होने से हतप्रभ है कि इन बड़ो के चक्कर मे क्या मिला सिवाय बर्बादी के । आज तक हजारो सौनिक तथा आम नागरिक जिसमे मासूम बच्चे भी है ,उसमे एक भारत का छात्र भी हौ शहीद हो चुके है तब फिर से ये सवाल उठ खड़ा हुआ है की क्या विकासशील या कम विक्सित और छोटे देशो को बड़े देशो की आपसी लड़ाई और प्रतिस्पर्धा का हिस्सा बनने के बजाय फिर से गुटनिरपेक्ष आंदोलन जैसा कुछ बना लेना चाहिये इसकी बुनियाद पंचशील सिद्धांत और पुराने इस आन्दोलन के मकसद के साथ युद्ध विहीन ,शोषण विहीन और मानवता पर केन्द्रित सिद्धांत हो और आपसी सभी जरूरतो के लिये परस्पर पूर्ण सहयोग का उद्देश्य हो । आपसी गठबंधन से बाहर तभी जाये जब वो चीज चाहिये हो जो इनके पास नही हो और इस संगठन के आदर्श महात्मा गाँधी को जो दुनिया मे स्वीकार्य है ।
आज के हालात मे जब प्रधानमंत्री मोदी अलोचना के केन्द्र मे है तब उनको आगे बढ़ कर इस उद्देश्य को आगे बढ़ाना चाहिये वरना पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को आगे रख कर और सभी दलो के अनुभवीं नेताओं को जोड़ कर राजनीतिक और दलीय रूप से कांग्रेस को इस मुद्दे पर तत्काल लीड लेनी चाहिये और पूर्व गुट निरपेक्ष आंदोलन के सभी देशो से सम्पर्क कर एक बैठक बुला कर युद्द की निन्दा का प्रस्ताव करना चाहिये और मानव की सहयता के लिये डाक्टरो की टीम दवाईया , खाद्द्य सामग्री इत्यादि से मदद करने की शुरुवात करना चाहिये ।
हो सकता है की ये आन्दोलन तत्काल सत्ताधीशो को न समझ मे आये पर दुनिया की जनता इससे जरूर जुड़ेगी । जो रूस आक्रमण कर रहा है उसकी जनता वहा तानाशाही व्यवस्था के बावजूद सडक पर युद्ध का विरोध कर रही है और उक्रेन के राष्ट्रपति के आगे खडे रहने पर बड़ी संख्या जहा लोग पलायन कर रहे है वही  हजारो मौतो के बाद भी वहा के आम नागरिक जिसमे बच्चे बच्चियाँ और हर उम्र की महिलाओ तक ने हथियार उठा लिया है ।एक बात याद रखना चाहिये की कोई सत्ता हार सकती है ,कोई देश हार सकता है पर अगर जनता खडी हो गयी है तो जनता कभी नही हारती और ऐसा इतिहास मे दर्ज है ।अगर इस आन्दोलन के पक्ष मे दुनिया के लोग खडे होते है तो यद्द्पि याद तो जवाहर लाल नेहरू आएँगे पर मान भारत का बढ़ेगा और स्थापित होगा की भारत ने हमेशा सही रास्ता चुना ।साथ हो हम नारो ,हथियारो से तो बिश्वगुरु नही बन सके पर मानवता के अलमबरदार बन कर वो दर्जा हासिल कर सकते है ।
अब देखना ये है की इसकी अगुवाई प्रधानमंत्री मोदी करते है जिसमे शक इसलिये है की वैचारिक रूप से उनका मूल संगठन शायद इसे स्वीकार नही करेगा या फिर जिसका मूल स्वभाव ही यही है वो कांग्रस करती है ।
कोई बडा और ताकतवर देश सिर्फ कमजोर देशो पर हमला करता है द्वितीय विश्वयुद्ध को छोड दे तो यही हुआ है अमरीका प्रतिबंध प्रतिबंध खेलता रहता है जो उसका प्रिय खेल है 
अमरीका के झांसे मे आने वाले देशो का सदा नुक्सान ही हुआ है ।
चीन बडा व्यापारी देश बन चुका है और वो उतना ही सुरक्षा का इन्तजाम कर रहा है जो उसके लिये और दुनिया की बड़ी ताकतो से निपटने के लिये जरूरी है  और रुस तथा चीन दोनो 100 साल आगे की कल्पना कर अपनी तैयारी मे लगे है जबकि कुछ देश मंदिर मस्जिद बुर्का हिजाब जैसी चीजो को ही भविश्य मान बैठे है ।
छोटे देश लाख कोशिश कर भी बड़ी ताकतो के हमलो को झेल नही सकते है हा बर्बाद होकर भी लड़ सकते है ।
दुनिया तेजी से बदली है और इसके युद्ध के नियम तथा हथियार भी बदले है ।
जीतने के लिये जरूरी है मजबूत होना और मजबूत होने की पहली शर्त है देश का अन्दरूनी विवादो से ऊपर होना , देश मे एकता होना , आपसी सद्भाव तथा विश्वास होना ,सरकार पर विश्वास होना तथा इसकी शर्त है सरकार का पारदर्शी होना ,समझदार और दूरदर्शी होना और सम्पूर्ण जनता मे ये विश्वास पैदा करना की वो सब कुछ सबके लिये कर रहे है तथा सबके भविश्य और सुरक्षा के लिये कर रहे है।
अन्दर से टूटा हुआ देश आर्थिक प्रगति नही कर सकता तथा यदि अंदर झगडे है और कभी भी हालात बिगड़ने का अवसर है तो अर्थवयवस्था बर्बाद होगी ही जबकि देश की मजबूती के लिये जरूरी है की देश आर्थिक रूप से बहुत मजबूत हो ,शैक्षणिक स्तर उच्च हो और स्वास्थ्य की गुणवत्ता भी उच्च कोटि की हो , बेरोजगारी ना के बराबर हो ,कृषि से लेकर व्यापार तक सब सम्पन्न हो और वैज्ञानिक आत्मनिर्भरता हो सभी क्षेत्रो मे स्वाथ्य ,भविश्य की आवश्यकताओ तथा सैन्य जरूरतो के क्षेत्र मे तथा भविश्य मे आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस से लेकर पृकृति संरक्षण और आवश्यक चीजो के असम्भव निर्माण तक ।
इन सब चीजो के लिये वातावरण तभी बन सकता है जब नेतृत्व करने वाले सभी लोग दूरदर्शी हो और अपने ,अपनी पार्टी तथा सत्ता नही बल्कि आने वाली पीढियो के लिये सपने देखे ,सिधांत गढ़े और सन्कल्पित हो ।
वरना स्वस्थ लोकतांत्रिक प्रतिस्पर्धा और भविश्य की पीढियो के लिये सपनो की पतिस्पर्धा के बजाय तू तू मैं मैं तो किसी भी देश को पीछे ही ले जाता है ।
इतिहास के सपनो मे जीना या इतिहास की नफरत को ढोना और भविश्य की पीढियो को भी देकर जाने का इरादा सिर्फ और सिर्फ बर्बादी ही लाने वाला होता है ।इराक हो ,सीरिया हो ,उक्रेन या अन्य ऐसे कोई भी देश वो कितना भी फौजी साजो सामान इकट्ठा कर ले पर अगर वो किसी बड़े को खटक गये तो उसकी बर्बादी तय है और इस गलतफहमी मे रहना की उसको हथियार बेचने और अपने हितो के लिये इस्तेमाल करने वाला कोई दूसरा देश उसके लिये लड़ने आयेगा गलतफहमी ही साबित होता रहेगा क्यो कोई भी देश खुद को दूसरे के लिये बर्बाद नही करता क्योकी युद्ध बहुत महंगा शौक है । इसलिये छोटे , आर्थिक ,जनसांख्यिकी से कमजोर और विकासशील देशो के लिये सबसे अच्छा है की वो किसी बड़े की कठपुतली न बने और अपने हित अहित के साथ सबसे सम्बंध रखे और किसी बड़े के राजनीति का मैदान न बने ,चुनौती ही दे ।पहले और दूसरे विश्व युद्ध की विभिषीका कोई भी अभी भूला नही है ।
किसी भी देश का अपना निर्माण खास माहौल और ऐतिहासिक परिस्थितयो और कारको से होता है और उन्ही हालातो मे सुखी होता है तथा तरक्की करता है ।कुछ समाज हमेशा से तानाशाही व्यवस्था मे रहे और उसके आदी है तो वहा उसी फ्रेम मे कोई भी व्यवस्था हो जनता को फर्क नही पडेगा जब तक की लोकतंत्र की हवा का एहसास उसके अन्दर घर न कर जाये और वो तब होता है जब पूरी जनता उसका खुद अनुभव करती है या उसे सहज जानकारी होती है । भारत उन्मुक्त वातावरण का समाज रहा है यहा का समाज थोडे कम मे भी जी लेता है और संतुष्ट रहता है पर उसका उन्मुक्त वातावरण और उन्मुक्त हंसी उससे नही छिननी चाहिये इसलिये तानाशाही जैसा कोई कदम या सोच भारत के लिये आत्मघाती होगी । भारत को धर्म और जातीय झगड़ो वाले समाजो और देशो से सबक लेने की जरूरत है और जितनी जल्दी समझ लेगा उतना ही देश मजबूत हो जायेगा तथा वैज्ञानिक दृष्टिकोण और तरक्की भारत को दुनिया के सामने शान्ती तथा सद्भाव की चुनौती देने लायक हो जायेगी तथा ये दुनिया मे शान्ती का सन्देश देने लायक हो जायेगा महात्मा गांधी को सामने रख कर ।
ये वक्त फिर से विचार करने का है कि जवाहर लाल नेहरू द्वारा शुरु किया गया गुट निरपेक्ष आंदोलन कितना सार्थक था और वो खुद मे तीसरी धुरी था जी बाकी दो को बैलेंस करता था ।
पहले अमरीकी स्वार्थो ने काफी देशो को बर्बाद किया है और अब उक्रेन पूरी दुनिया के छोटे और कम बिकसित या विकासशील देशो के लिये नये सिरे से एक्जुट होकर नई रणनीति बनाने का वक्त है और भारत इन सबकी अगुवाई कर सकता है पर उसके लिये पहले भारत मे पूर्ण एकता और विश्वास जरूरी है ।
उक्रेन तो एक हफ्ते मे निपट जायेगा परंतु ये अन्तिम साबित नही होगा बल्कि ये नये तरह के युद्ध का प्रारंभ है ।
चीन की चुनौती भारत के लिये कम नही है और वो चुनौती खुद की वैचारिक और रणनीतिक गल्तियो से पैदा हुयी है ।इन गल्तियो को तुरंत स्वीकार कर उसका परिमार्जन और अनुभव का उपयोग करते हुये उससे बाहर निकलना वक्त की मांग है चाहे वह राजनीतिक विरोधी के  पास ही क्यो न हो ।
युद्ध से बचना है तो युद्ध को महंगा करना होगा और बंटा हुआ देश तथा अज्ञानी नेत्रत्व नही कर सकता ।
डा सी पी राय
स्वतंत्र राजनीतिक चिंतक एवं वरिष्ठ पत्रकार

गुरुवार, 24 फ़रवरी 2022

उक्रेन का सबक

उक्रेन का सबक और गुट निरपेक्ष आंदोलन की सार्थकता ।

कोई बडा और ताकतवर देश सिर्फ कमजोर देशो पर हमला करता है 
द्वितीय विश्वयुद्ध को छोड दे तो यही हुआ है 
अमरीका प्रतिबंध प्रतिबंध खेलता रहता है जो उसका प्रिय खेल है 
अमरीका के झांसे मे आने वाले देशो का सदा नुक्सान ही हुआ है ।
रुस का जरूर मित्र देश के साथ खड़ा रहने का इतिहास है ।
चीन बडा व्यापारी देश बन चुका है और वो उतना ही सुरक्षा का इन्तजाम कर रहा है जो उसके लिये और दुनिया की बड़ी ताकतो से निपटने के लिये जरूरी है  और वो तथा चीन दोनो 100 साल आगे की कल्पना कर अपनी तैयारी मे लगे है जबकि कुछ देश मंदिर मस्जिद बुर्का हिजाब जैसी चीजो को ही भविश्य मान बैठे है ।
छोटे देश लाख कोशिश कर भी बड़ी ताकतो के हमलो को झेल नही सकते है हा बर्बाद होकर भी लड़ सकते है ।
दुनिया तेजी से बदली है और इसके युद्ध के नियम तथा हथियार भी बदले है ।
जीतने के लिये जरूरी है मजबूत होना और मजबूत होने की पहली शर्त है देश का अन्दरूनी विवादो से ऊपर होना , देश मे एकता होना , आपसी सद्भाव तथा विश्वास होना ,सरकार पर विश्वास होना तथा इसकी शर्त है सरकार का पारदर्शी होना ,समझदार और दूरदर्शी होना और सम्पूर्ण जनता मे ये विश्वास पैदा करना की वो सब कुछ सबके लिये कर रहे है तथा सबके भविश्य और सुरक्षा के लिये कर रहे है।
अन्दर से टूटा हुआ देश आर्थिक प्रगति नही कर सकता तथा यदि अंदर झगडे है और कभी भी हालात बिगड़ने का अवसर है तो कही का भी इन्वेस्टर नही आयेगा और अन्दरूनी व्यापार भी प्रभावित होगा जबकि देश की मजबूती के लिये जरूरी है की देश आर्थिक रूप से बहुत मजबूत हो ,शैक्षणिक स्तर उच्च हो और स्वास्थ्य की गुणवत्ता भी उच्च कोटि की हो , बेरोजगारी ना के बराबर हो ,कृषि से लेकर व्यापार तक सब सम्पन्न हो और वैज्ञानिक आत्मनिर्भरता हो सभी क्षेत्रो मे स्वाथ्य ,भविश्य की आवश्यकताओ तथा सैन्य जरूरतो के क्षेत्र मे तथा भविश्य मे आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस से लेकर पृकृति संरक्षण और आवश्यक चीजो के असम्भव निर्माण तक ।
इन सब चीजो के लिये वातावरण तभी बन सकता है जब नेतृत्व करने वाले सभी लोग दूरदर्शी हो और अपने ,अपनी पार्टी तथा सत्ता नही बल्कि आने वाली पीढियो के लिये सपने देखे ,सिधांत गढ़े और सन्कल्पित हो ।
वरना स्वस्थ लोकतांत्रिक प्रतिस्पर्धा और भविश्य की पीढियो के लिये सपनो की पतिस्पर्धा के बजाय तू तू मैं मैं तो किसी भी देश को पीछे ही ले जाता है ।
इतिहास के सपनो मे जीना या इतिहास की नफरत को ढोना और भविश्य की पीढियो को भी देकर जाने का इरादा सिर्फ और सिर्फ बर्बादी ही लाने वाला होता है ।इराक हो ,सीरिया हो ,उक्रेन या अन्य ऐसे कोई भी देश वो कितना भी फौजी साजो सामान इकट्ठा कर ले पर अगर वो किसी बड़े को खटक गये तो उसकी बर्बादी तय है और इस गलतफहमी मे रहना की उसको हथियार बेचने और अपने हितो के लिये इस्तेमाल करने वाला कोई दूसरा देश उसके लिये लड़ने आयेगा गलतफहमी ही साबित होता रहेगा क्यो कोई भी देश खुद को दूसरे के लिये बर्बाद नही करता क्योकी युद्ध बहुत महंगा शौक है । इसलिये छोटे , आर्थिक ,जनसांख्यिकी से कमजोर और विकासशील देशो के लिये सबसे अच्छा है की वो किसी बड़े की कठपुतली न बने और अपने हित अहित के साथ सबसे सम्बंध रखे और किसी बड़े के राजनीति का मैदान न बने ,चुनौती ही दे ।पहले और दूसरे विश्व युद्ध की विभिषीका कोई भी अभी भूला नही है ।
किसी भी देश का अपना निर्माण खास माहौल और ऐतिहासिक परिस्थितयो और कारको से होता है और उन्ही हालातो मे सुखी होता है तथा तरक्की करता है ।कुछ समाज हमेशा से तानाशाही व्यवस्था मे रहे और उसके आदी है तो वहा उसी फ्रेम मे कोई भी व्यवस्था हो जनता को फर्क नही पडेगा जब तक की लोकतंत्र की हवा का एहसास उसके अन्दर घर न कर जाये और वो तब होता है जब पूरी जनता उसका खुद अनुभव करती है या उसे सहज जानकारी होती है । भारत उन्मुक्त वातावरण का समाज रहा है यहा का समाज थोडे कम मे भी जी लेता है और संतुष्ट रहता है पर उसका उन्मुक्त वातावरण और उन्मुक्त हंसी उससे नही छिननी चाहिये इसलिये तानाशाही जैसा कोई कदम या सोच भारत के लिये आत्मघाती होगी । भारत को धर्म और जातीय झगड़ो वाले समाजो और देशो से सबक लेने की जरूरत है और जितनी जल्दी समझ लेगा उतना ही देश मजबूत हो जायेगा तथा वैज्ञानिक दृष्टिकोण और तरक्की भारत को दुनिया के सामने शान्ती तथा सद्भाव की चुनौती देने लायक हो जायेगी तथा ये दुनिया मे शान्ती का सन्देश देने लायक हो जायेगा महात्मा गांधी को सामने रख कर ।
ये वक्त फिर से विचार करने का है कि जवाहर लाल नेहरू द्वारा शुरु किया गया गुट निरपेक्ष आंदोलन कितना सार्थक था और वो खुद मे तीसरी धुरी था जी बाकी दो को बैलेंस करता था ।
पहले अमरीकी स्वार्थो ने काफी देशो को बर्बाद किया है और अब उक्रेन पूरी दुनिया के छोटे और कम बिकसित या विकासशील देशो के लिये नये सिरे से एक्जुट होकर नई रणनीति बनाने का वक्त है और भारत इन सबकी अगुवाई कर सकता है पर उसके लिये पहले भारत मे पूर्ण एकता और विश्वास जरूरी है ।
उक्रेन तो एक हफ्ते मे निपट जायेगा परंतु ये अन्तिम साबित नही होगा बल्कि ये नये तरह के युद्ध का प्रारंभ है ।
चीन की चुनौती भारत के लिये कम नही है और वो चुनौती खुद की वैचारिक और रणनीतिक गल्तियो से पैदा हुयी है ।इन गल्तियो को तुरंत स्वीकार कर उसका परिमार्जन और अनुभव का उपयोग करते हुये उससे बाहर निकलना वक्त की मांग है चाहे वह राजनीतिक विरोधी के  पास ही क्यो न हो ।
युद्ध से बचना है तो युद्ध को महंगा करना होगा और बंटा हुआ देश तथा अज्ञानी नेत्रत्व नही कर सकता ।
डा सी पी राय 

रविवार, 19 दिसंबर 2021

#जिन्दगी के झरोखे से। समाजवादी पार्टी की स्थापना

#जिंदगी_के_झरोखे_से

#समाजवादी_पार्टी_की_स्थापना -

1992 की बात है मुलायम सिंह यादव जी 1991 की भयानक हार से उबर कर कभी कभी दिल्ली जाने लगे थे । चन्द्रशेखर जी की सरकार के जाते जाते मेरी सलाह पर अयोध्या काण्ड को आधार बना कर खतरे के आधार पर मुलायम सिंह यादव के उस वक्त बहुत करीबी और दिल्ली मे मीडिया सलाहकार डा बागची ने प्रधानमंत्री के नाम एक चिट्ठी टाइप करवाया और चन्द्रशेखर जी ने भी बिना देरी के मुलायम सिंह यादव जी के लिये एन एस जी जो एस पी जी के गठन से पूर्व उस बक्त तक प्रधानमंत्री की सुरक्षा देखती थी के ब्लैक कैट कमांडो की स्वीकृत कर दिया पर उस वक्त तक पूर्व मुख्यमंत्री सुरक्षा के लिये सरकारी वाहन नही मिलता था तो डा बागची ने मुझसे पूछा की सुरक्षा तो हो गयी अब गाडी की व्यवस्था कैसे होगी और मैने जिम्मेदारी ले लिये कि हो जायेगी । उसके बाद मैं अपने एक मित्र जो गृह मंत्रालय मे राजभाषा अधिकारी थे और टेनिस कोर्ट के सामने वाले आर के पुरम के सरकारी क्वार्टर मे रहते थे उनके घर गया क्योकी उनके घर के पास मैने एक टैक्सी स्टैंड देखा था ।हम दोनो वहा गये और स्टैंड के मालिक सरदार जी से तीन गाड़ियो के बारे मे गाड़ियो की क्वालिटी और रेट के बारे मे तय किया इस शर्त के साथ कि जब भी फोन किया जायेगा हमे तीन गाडी अवश्य मिलेगी जिसमे से तय समय पर दो एन एस जी कैम्प जायेगी कमांडो को लेने और एक मुलायम सिंह यादव जी के लिये तय समय पर एयरपोर्ट पर वी आई पी लाउंज पहुचेगी । सब तय हो गया ।
यहा यह बताना जरूरी नही है की सत्ता से सीधे 29 सीट पर आकर मुलायम सिंह जी बहुत निराश थे (यद्द्पि चुनाव के बीच ही जब मैं दिल्ली से सुब्रमण्यम स्वामी जो उस वक्त वाणिज्य और कपडा मंत्री थे के यहा से कुछ सामान लेकर लखनऊ वापस जा रहा था क्योकी स्वामी जी के एक व्यक्ति के अलावा मैं ही लखनऊ के दफ्तर मे बैठता था और रास्ते मे शिवपाल जी के घर पर मुलाकात मे बता चुका था कि मुझे 40 से ज्यादा आती नही दिख रही है ) तथा विचलित भी और एक साल तक कुछ भी करने को तैयार नही थे पर कैसे चुनाव के बाद तुरन्त चुनाव लड़े हुये लोगो की बैठक क्यो बुलाया ,फिर कुछ ही समय बाद मेरे द्वारा आयोजित आगरा मे विशाल मन्ड्लीय सम्मेलन के आयोजन मे क्यो आने को तैयार हो गये जिसमे 14 लाख की थैली भेंट की गयी तथा 50 ग्राम सोना या शायद मैं अलग अलग एपिसोड मे बताऊंगा ।
ये भी क्यो बताया जाये की एक साल तक घर से नही निकलने की बात करने वाले मुलायम सिंह यादव जी दिल्ली क्यो आये । दिल्ली मे रुकने की जगह सिर्फ यू पी भवन था जो विधायक के नाते मिलता पर मैं नही चाहता था की वो यू पी भवन मे रुके ।तब डा बागची ने हल निकाला और किसी से बात कर के सम्राट होटल मे उनके लिये सूईट बुक करवाया और यू पी भवन का कमरा मेरे लिये तय हो गया क्योकी जब भी उन्हे दिल्ली आना होता मुझे लखनऊ से फोन आ जाता था ,फिर मैं सरदार जी को गाडी के लिये फोन करता और खुद भी दिल्ली पहुच जाता था और यू पी भवन मे सामान रख कर समय पर एयरपोर्ट जाकर रिसीव करना ,रोज सुबह से शाम तक साथ रहना और फिर वापसी पर एयरपोर्ट विदा कर वापस जाना ये अगली सत्ता आने तक चलता रहा । पहली बार आने पर मैने कुछ लोगो से मिलवाया जिनके नामो की जरूरत नही है । शाम को वापस होटल मे आने पर मुलायम सिंह जी बोले कि अरे आप को तो दिल्ली मे बहुत लोग जानते है ,आप तो यहा बहुत काम के रहेंगे ,मैं आप को दिल्ली मे रखुँगा जो कभी भी नही हुआ क्योकी प्राथमिकता मे परिवार और खास जातियां आ गयी ।
खैर सम्राट होटल के बाद आशोका होटल का सूईट बुक होने लगा । एक दिन सूईट के कमरे मे खिडकी के किनारे दो कुर्सियो पर बैठे हम लोग चाय पी रहे थे वही जो मेरे मन मे काफी दिन से घूम रहा यहा मैने उनसे कहा कि फिर से समाजवादी पार्टी की स्थापना किया जाये तब तक हम लोग सजपा मे थे जिनके राष्ट्रीय अध्यक्ष पूर्व प्रधानमंत्री चन्द्रशेखर जी थे और मुलायम सिंह यादव जी प्रदेश अध्यक्ष थे तथा मैं प्रदेश का महामंत्री और प्रवक्ता था । मेरी बात पर उन्होने असहमती व्यक्त किया की मेरा तो केवल 2/4 जिलो मे असर है ,चन्द्रशेखर जी बड़े नेता है उनके साथ रहना ही ठीक है । उसपर मैने कहा की सजपा की जगह समाजवादी पार्टी कर दिया जाये क्योकी वो अजादी की लडाई के समय से एक वैचारिक आन्दोलन रहा है और उससे भावनात्मक रूप से देश भर मे काफी लोग जुडे है चाहे संगठन का स्वरूप यही रहे और चन्द्रशेखर जी रास्ट्रीय अध्यक्ष बने रहे ,पर आप राष्ट्रीय अध्यक्ष होंगे तो वो एक बडा सन्देश होगा और पहली बार कोई पिछड़ा राष्ट्रीय अध्यक्ष होगा ,आगे आप की मर्जी आप जो तय करिये ।पर उन्होने इस विचार को पूरी तरह से खारिज कर दिया लेकिन मन मे एक सपना तो मैने जगा ही दिया था ।
हम राज नारायणजी के लोगो का स्थायी अड्डा जनेश्वर जी का घर होता था ,बाकी दिनो मे वही नाश्ता खाना ,वही रुक जाना ,बल्कि देश भर के समाजवादीयो के लिये उनका घर सराय था इसलिये घर के बाहर ही लिख दिया गया था बाद मे लोहिया के लोग । थोडे ही दिन बाद मैं वहा था और बिहार वाले कपिलदेव बाबू भी वहा आये थे । हम तीनो जब साथ बैठे थे तो मैने अपना विचार बताया की मैने मुलायम सिंह जी से ये कहा है पर वो मान नही रहे है ।जनेश्वर जी बोले की ये तो अच्छा विचार है और देश भर मे खाली बैठे सभी समाजवादी साथ आ जायेंगे । कपिलदेव बाबू बोले की मुलायम से हमारी मुलाकात करवाइये हम भी कहेंगे और हमे कुछ नही चाहिए हमारे पास स्वतंत्रता सेनानी का भी पास और पेशन है और विधायक का भी और रहने को जनेश्वर का घर है ,अगर पार्टी बनेगी तो हम पूरा समय देंगे ।फिर जनेश्वर जी और कपिलदेव बाबू की भी बात हुयी और रमाशंकर कौशिक ,भगवती सिंह तथा रामसरन दास से भी चर्चा करने के बाद मुलायम सिंह यादव जी तैयार हो गये और तैयारी शुरू हो गयी । सवाल ये आया की देश भर मे सूचना कैसे हो तो अखबारो मे विज्ञापन दिया गया और मुलायम सिंह जी का फोन नंबर दे दिया गया ।देश भर से फोन आने लगे जगजीवन फोन उठाता था और फिर जिसका भी फोन आया होता था उनका नाम और फोन नंबर मुझे भी लिखवा देता था ।
आखिर 4/5 नवम्बर आ ही गया और बेगम हजरत महल पार्क मे स्थापना सम्मेलन हुआ जिसमे असम केरल बंगाल महाराष्ट्र बिहार मध्यप्रदेश,हरियाणा दिल्ली कश्मीर सहित कई प्रदेशो के लोग शामिल हुये जिसमे असम के पूर्व मुख्यमंत्री गोलप बोरबोरा , हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री हुकुम सिंह ,बंगाल की सोशलिश्ट पार्टी जिसके मंत्री प्रबाल चन्द्र सिन्हा और किरणमय नन्दा सहित विधायक ,बिहार से बड़े नाम वाले कई समाजवादी शामिल हुये ।पार्टी का स्वरूप राष्ट्रीय उसी दिन दिखने लगा ।ये अलग से लिखूंगा कि किसके और किन कारणो से आगे चल कर सब बड़े नेता साथ छोड़ गये ।
स्थापन सम्मेलन मेरी व्यस्तता का ये आलम था की मैं सिर्फ दो बार मंच पर गया एक बार राजनीतिक प्रस्तांव पर बोलने और दुबारा मुलायम सिंह जी के सर्वसम्मति से राष्ट्रीय अध्यक्ष चुने जाने पर । 5 को  सम्मेलन खत्म हुआ तो मुलायम सिंह जी बाहर से आये नेताओं से मिलने स्टेट गेस्ट हाउस आये तो सबसे मिलते हुये मेरे कमरा नंबर 47 मे पहुचे ।मैं कुर्सी पर ही बेसुध पड़ा था ।उन्होने धीरे से जगाया और बोले की चाय मगाइये ।दोनो ने चाय पिया तो बोले मैं जानता हूँ कि आप बाहर से आये लोगो की अगवानी और ब्यवस्था मे 3 दिन से ठीक से सोये नही है पर आज से जब तक सबको विदा करना है वो कर के खूब सो लीजियेगा फिर मेरे पास आइएगा तब समीक्षा किया जायेगा और आप का ही ये विचार था तो आगे की बात भी किया जायेगा ।
बाकी सब इतिहास मे दर्ज है और छूटा हुआ सब बाद के एपिसोड मे ।