शनिवार, 23 दिसंबर 2023

१९९१ मंडलीय सम्मेलन और १४ लाख की थैली

#जिंदगी_के_झरोखे_से 

#1991_मंडलीय_सम्मेलन_और_14_लाख_की_थैली 

बात 1991 के चुनाव के बाद की है पता नही वो घटना अभी तक मैने लिखा या नही जब रात भर चुनाव परिणाम देखने के बाद मैं सुबह ही मुलायम सिंह यादव जी के घर पहुचा था और इतने बुरे परिणाम से वो बेचैन थे ,जबकी पहले ही दिल्ली से लौटते हुये शिवपाल जी कर घर पर उन्हे मैं ऐसे परिणाम की आशंका जाता चुका था प्रदेश का चुनाव देखने के कारण पर सारे अधिकारी और इंटेलीजेंस एजेंसियां उन्हे 125 से 150 तक की रिपोर्ट दे रही थी ।
केवल 29 एम एल ए और चंद्रशेखर जी समेत केवल 4 एम पी सीट सत्ता मे रहते उनको विचलित कर गई थी ।
मिलते ही बोले कि अयोध्या के कारण ये तो सारी जनता नाराज हो गई है इत्यादि । मैने कहा कि छोटा हूँ पर एक बात कहना चाहता हूँ कि अब हमे इसी स्टैंड पर कायम रहना चाहिये । आप ने कुछ बुरा नही किया बल्की मुख्यमंत्री होने के कारण संविधान की रक्षा किया है और उस पर आप को गर्व होना चाहिये । ये ठीक है की संघ अभी जहरीला प्रचार कर कामयाब हो गया पर कल जब लोग समझेंगे की देश तो संविधान और कानून से ही चल सकता है न कि दंगो से तो यही प्रदेश आप को फिर वापस लाएगा ,और हम दोनो चाय पीने बैठ गये और उसी समय ये भी तय हुआ की मात्र 7 दिन मे चुनाव लड़े विधनसभा के 425 और लोक सभा के 85 लोगो की बैठक बुला लिया जाये (इसका किस्सा अलग से ) ।कल्याण सिंह की सरकार बन गई थी ।
पर सरकार जाने के बाद बडा संकट था और पार्टी चलाने मे दिक्कत हो रही थी क्योकि इस मुख्यमंत्री काल मे मुलायम सिंह जी ने पैसे के बारे मे सोचा ही नही था और जहा तक मुझे पता है सिर्फ एक मामले मे ओम प्रकाश चौटाला ने कुछ दिया था जो दिल्ली से टी सीरीज कैसेट के डिब्बो मे ले जाया गया था और जो आया भी वो चुनाव मे खर्च हो गया था । दो बार तो त्योहार के मौके पर भी हम दफ्तर के स्टाफ को तन्ख्वाह नही दे पाये तब मैने तपन दादा को कुछ रुपए दिये की वो जगजीवन और शरमा इत्यादि बराबर बराबर बांट ले और त्योहार मना ले ,तपन अब बुजर्ग हो गये है पर है और जगजीवन तो आज बहुत रईस भी है और एम एल सी भी । इसी तरह मुलायम सिंह जी के घर का फ़ोन कट गया और कई दिन बाद जुड़ा तब एक दिन मैने महामंत्री के रूप मे लोगो का आह्वान कर दिया की जितना मन हो चाहे 5/10 रुपया ही सही मुलायम सिंह यादव जी को मनी ऑर्डर करे ।जो भी पहुचा मैने पूछा नही ।
2 महीने बाद ही मुलायम सिंह यादव जी एक सामाजिक कार्यक्रम के लिये आगरा आये और जैसा की हमेशा होता था कि अन्त मे प्रेस से मुलाकात मेरे निवास पर होती थी । उस दिन भी हुयी ।
प्रेस के बाद इटावा जाना था तो बोले की आप भी चलिये रास्ते मे बात करते चलेंगे और आज ही ट्रेन पकड़ कर लखनऊ जाना है तो आप उसके बाद वापस आ जाईयेगा ,ऐसा अक्सर ही होता था उस दौर मे । मुझे ऐसा याद आता है कि उस दिन देश के जाने माने कवि और हमारे सांसद उदय प्रताप जी भी साथ थे जिन्होने बाद मे मुझसे शिकायत किया था कि रास्ते भर आप दोनो ही बात करते रहे और मैं तो महज श्रोता बना रहा ।
हम लोग इटावा सिचाई विभाग के डाक बंगला पहुचे जहा शायद मुलायम सिंह यादव जी के आने की खबर नही दी गई थी तो जिस सुईट मे ये रुकते थे पुलिस के किसी डी आई जी को आवंटित हो गया था । मैने वहा के व्यवस्थापक को हड़काया कि आवंटन किसी का हो पर जब प्रोटोकोल मे बडा व्यक्ति आ जाता है तो वो आवंटन अपने आप निरस्त हो जाता है ।खैर डरते डरते की साहब मेरे खिलाफ कुछ न हो जाये उसने कमरा खोल दिया ।मुलायम सिंह जी अंदर गये और बस बाथरूम होकर बाहर आ गये कि अच्छा मौसम है ,बाहर पार्क के चबूतरे पर बैठते है जबकी जून आखिर या जुलाई का आरम्भ था और तेज गर्मी थी ।
खैर हम लोग वही बैठ गये । मुलायम सिंह यादव जी का मानना था को कम से कम एक साल चुपचाप आराम किया जाये और राजनीतिक गतिविधिया बंद रखा जाये क्योकि अभी कही भी निकलने पर जनता का गुस्सा झेलना पड़ सकता है ।
मैने कहा की मैं इस बात से सहमत नही हूँ और वही मैने बीजेपी तथा आरएसएस के गढ आगरा से ही तत्काल कार्यक्रम शुरु करने को आमंत्रित किया । वो सहमत नही थे पर मेरे जोर देने पर मान गये की प्रदेश कार्यकारिणी और वरिष्ठ नेताओ की बैठक कर इसपर बिचार हो जाये तो मैने कहा की देर क्यो हो तत्काल बुला लिया जाये और शायद एक हफ्ते बाद ही वो बैठक बुला ली गई लोहिया ट्रस्ट के हाल मे ।वहां मैने सबसे पहले अपनी बात रखा और तर्क की क्यो तत्काल बाहर निकल कर सक्रिय हुआ जाये और आगरा से ही क्यो । तब कुछ लोगो ने कहा की आगरा मे पार्टी नही है और पार्टी का कोर वोटर नही है कार्यक्रम फ़ेल हो सकता है तब मैने आश्वस्त किया कि आगरा मंडल का कार्यकर्ता सम्मेलन रखा जाये और बाकी सब मुझ पर छोड दिया जाये और उसी मे मैने प्रस्ताव रख दिया कि पार्टी चलाने के लिये 5 से 10 लाख तक की थैली भेंट करने की कोशिश भी की जाये और कार्यक्रम तय हो गया सम्भवतः अगस्त की कोई तारीख तय हुयी ,हम लोग मई अन्त मे चुनाव हारे थे ।
मैं वापस आगरा आया और सबसे पहले कागज पर योजना और अनुमानित बजट तथा अपना कार्यक्रम बनाया और दूसरे दिन ही आगरा का सर्किट हाउस तथा सूर सदन हाल बुक कर दिया तथा बाहर पार्किंग मे लगाने के लिये पंडाल और बैठने का इन्तजाम की भीड ज्यादा हो तो अव्यवस्था न हो और अपने एक दोस्त के बात कर गैलरी से बाहर के पंडाल तक देश के किसी भी कार्यक्रम मे पहली बार क्लोस सर्किट टीवी का इस्तेमाल की व्यव्स्था भी । शाम को आगरा मे जो थोडी बहुत पार्टी थी जनता दल टूटने के बाद जिसमे अधिकतर मेरे द्वारा जोड़े गये 8/10 लडके थे उनकी मीटिंग किया और सबको काम अभी से बता दिया । अपने एक दोस्त के होटल मे आने वाले लोगो के लिये 5000 पैकेट खाना बनाने की बात तय कर दिया ।
आगरा के अन्य नेताओ से कह दिया की मुलायम सिंह के आगरा आने से लेकर जाने तक ठहरना , पूरे सम्मेलन का खाना, शहर भर मे स्वागत द्वार और स्वागत , वाल राइटिंग, गाडियाँ इत्यादि सब मेरी जिम्मेदारी और बाकी लोग थैली के लिये धन एकत्र करे ।
इसके बाद मैं मंडल भर के सभी जिलो के दौरे पर निकल गया सभी जिला अध्यक्षो को बता कर और तब तक मंडल बटा नही था अलीगढ़ भी इसी मे था । सभी जिलो मे मैं सम्मेलन और थैली के लिये माहौल बनाने मे कामयाब रहा ।
सम्मेलन से दो दिन पहले से पूरे महात्मा गांधी मार्ग पर वाल राइटिंग मैने खुद भी किया ,खम्भो पर चढ़ चढ़ कर झंडे और बैनर मैने खुद भी बाधे ताकी कार्यकर्ताओ मे उत्साह रहे क्योकि वो धन का नही जन का जमाना था और राजनीती के ये सब काम कार्यकर्ता ही करते थे और हम जैसे लोग तो छात्र राजनीति से ही करते आ रहे थे ।
कार्यक्रम के एक दिन पहले कई दिनो से आता मुलायम सिंह जी का फ़ोन फिर आया कि अभी भी कार्यक्रम रद्द कर दीजिये फेल जो जायेगा और मैने कहा की आप ट्रेन पकड़ लो रात को सुबह मैं स्टेशन पर मिलूंगा ।
उस दिन सुबह 4 बजे मैने कार्यक्रम स्थल की व्यवस्थाये देखा और खुद मंच के पीछे का बडा बैनर टंगवाया और फिर स्टेशन रवाना हो गया । मुलायम सिंह जी और साथ मे आज़म खान साहब आये थे । अपनी योजना के अनुसार पहले स्टेशन के सामने किले के गेट पर अम्बेडकर मैदान मे बाबा साहेब अम्बेडकर की मूर्ति पर इन लोगो से माल्यार्पण करवाया और फिर सर्किट हाऊस पहुचा कर ये कह कर घर आ गया कि आप लोग तैयार हो जाइये और लोगो से मिलिये 10 बजे  निकलेंगे हम लोग ।
घर आया थोडी देर लेटा पर नीद कहा तो उठ कर नहा धोकर तैयार हो गया और 9,45 पर फिर सर्किट हाऊस पहुच गया ।
हम लोग बड़े काफिले के साथ वहाँ से निकले और महत्मा गांधी तथा अन्य महापुरुषो की मूर्तियो पर माल्यार्पण करते हुये काफिला महात्मा गांधी मार्ग पर निकला जिसपर समाज के सभी समाजो तथा धर्मो की तरफ से अलग अलग चौराहो पर स्वागत द्वार पर स्वागत हुआ तथा दो स्थानो पर मुलायम सिंह जी को सिक्को से तौला भी गया और जब हम लोग कार्यक्रम स्थल पर पहुचे तो बाहर ही बडा हुजूम था । अंदर गये तो एक एक सीट पर किसी तरह अटक कर दो दो लोग बैठे थे और सारी सीढियां ही नही बल्की मंच के सामने का खाली स्थान भी भरा था और मंच पर भी तिल रखने को जगह नही थी क्योकि सारे पूर्व और वर्तमान सांसद , विधायक , सभी प्रमुख पदाधिकारी तथा अध्यक्ष इत्यादि मंच पर आ गये थे और मेरे तथा पड़ोस मे रहने वालो के बच्चे भी जबकी मेरे प्रोफेसर पिता तथा पत्नी इत्यादि भी नीचे कार्यकर्ताओ मे बैठे थे ।
दो बात का जरूर उल्लेख करना चाहूँगा कि  मैने अपने कार्यकर्ताओ से कहा था कि जिसकी जहा जिम्मेदारी है वही रहेगा यहा तक की मुलायम सिंह भी सामने आ जाये तो नही हिलना है और बाद मे मैं सबको मिलवाउंगा और साथ फोटो भी करवाउंगा , दूसरा मैने ऐसी व्यव्स्था किया था कि पानी के लिये बस इशारा करिए आप तक पहुच जायेगा और खाने के समय भी सब अपनी जगह ही रहे वही अधिक से अधिक 15 मिनट मे सबको खाना और पानी मिल जायेगा और वही हुआ भी किसी कार्यक्रता ने अपना काम नही छोडा और सारा वितरण मेरी योजना अनुसार ही हो गया ।
मुलायम सिंह जी चाहते थे की अपने स्वागत भाषण और राजनैतिक भाषण के बाद कार्यक्रम का संचालन मैं ही करू पर मेरी ये कमी है की कोई जिम्मेदारी लेने के बाद उसके हर पहलू पर निगाह रखना तथा समय पर व्यवस्थित रूप से चीजो करवा लेना मेरी बेचैनी मे शामिल रहता है इसलिए भाषण के बाद और पूरे कार्यक्रम का ब्योरा देने के बाद मैने पूर्व सिचाई मंत्री बाबू राम यादव से संचालन का आग्रह किया और फिर बाकी सब व्यवस्थित करने मे लग गया जिसका जिक्र ही अखबारो ने किया की सी पी राय मंच पर रहने के बजाय लगातार भाग दौड करते रहे ,करता भी क्यो नही कोई बडी और प्रशिक्षित तथा संपन्न पार्टी तो थी नही ,साधन विहीन ,कमजोर पार्टी थी और आगरा मे सब नये नौजवान थे मेरे जोड़े हुये तो लगता था कही परेशान न हो जाये ।
हा दो दिन पहले लगातार 2/3 घंटे बैठ कर मैने राजनीतिक प्रस्ताव , आर्थिक प्रस्ताव इत्यादि लिख कर प्रिंट करने भेज दिया था और फ़ाईल और कार्यक्रम के पहले वाली रात कई लोग फाइल बनाने मे लगे रहे मेरे घर के बाहर बनी झोपड़ी मे बैठ कर जिसमे कुछ लोग बाद मे बहुत महत्वपूर्ण हो गये और मेरे प्रोफेसर पिता रात को उन सभी को बना बना कर ट्रे भर भर चाय पिलाते रहे और साथ बैठ काम भी करवाते रहे और घर के अंदर मेरी पत्नी और बच्चे भी क्योकि 5000 फाइल बननी थी ।
कार्यक्रम के प्रारंभिक औपचारिकताओ के बाद थैली भेंट होनी शुरु हुयी । वादा किया था कि 10 लाख की कोशिश होगी पर 5 तो होगा ही और भेट किया सब लोगो ने मिल कर 14 लाख जिसके लिये मैने पहले खरीदी अटैची जिसकी दुकान पास ही थी वापस भेज कर बडी अटैची मंगवाया और मथुरा के पंडित राधेश्याम शर्मा ने 50 ग्राम सोना भेट किया ।
दिनभर तमाम नेताओ का भाषण हुआ और अन्त मे मुलायम सिंह जी का नम्बर आया ।वो बहुत भावुक हो गये थे ऐसे स्वागत और कार्यक्रम से तो बोले कि मैं पहले भी कई बार आगरा आया हूँ , चौ चरण सिंह के साथ भी आया जब तीन विधायक थे तो कार्यक्रम रतन मुनी जैन इंटर कालेज मे हुआ था । मैं कल तक सी पी राय से कहता रहा की कैन्सिल कर दीजिये पर इनका आत्मविश्वास था और बोले की बस आप आ जाइये और आज सर्किट हाऊस से यहा तक हर चौराहे पर स्वागत हुआ । यहा भी इतनी भीड हो गई है को अंदर ,बाहर गैलरी और उसके बाहर का पंडाल भरा है और पहली बार मै ये देख रहा हूँ की बाहर वाले लोग भी सब लोग बाहर लगे टीवी पर सब कुछ देख और सुन रहे है । सी पी राय ने उतने अच्छे सब प्रस्ताव लिखे है और बहुत अच्छा सारा इन्तजाम किया है और अनुशासन के साथ सारा इन्तजाम ।
मेरी निगाह मे  यह कार्यकम भीड से ,प्रस्ताव से अनुशासन से , व्यव्स्था से और राजनीती के लिये सर्वश्रेष्ठ कार्यक्रम है और इसका श्रेय केवल सी पी राय को जाता है ।मैने सोचा था 5 लाख नही तो कुछ तो मिलेगा ही पार्टी चलाने को पर यहा तो 5 क्या 14 लाख रुपया और सोना भी मिला है । सी पी राय ने ये कैसे सम्भव किया इनसे बाद मे पूछूंगा पर पार्टी आज से फिर चल गयी और इसके लिये सी पी राय को याद रखा जायेगा ।
नेता के सामने भीड हो और सब अच्छा हो तो जोश तो आ ही जाता है ।जबरदस्त भाषण दिया मुलायम सिंह जी ने और उनके पहले आज़म खान साहब ने भी । काफी बडी संख्या मे नेता लोग बोले ।
सम्मेलन के बाद मैने सूर सदन के बाहर पोर्च से सार्वजनिक सभा को संबोधित करने का इन्तजाम पहले से ही कर रखा था तो मुलायम सिंह को पोर्च पर ले गया । ये बात उनको पहले से नही बताया था ।शाम करीब 5 बज रहा था एम जी रोड पर भीड का समय था और सभा के कारण बडा जाम लग गया ।
सभा के बाद मेरे निवास पर प्रेस से वार्ता और भोजन था । अपने निवास पर मैने कार्यकर्ताओ से उनको मिलवाया ।मुलायम सिंह जी गदगद थे और मेरे सभी कार्यकर्ता भी पर जब स्टेशन उनको छोड़ने गया अपने निवास से तब तक मेरे गले की आवाज मेरा साथ छोड चुकी थी पर तसल्ली इतनी थी की पार्टी को मैने फिर से रफ्तार दे दिया था धन से भी और आत्मविश्वास से भी और खासकर मुलायम सिंह जी का आत्मविश्वास लौट आया था जो बहुत जरूरी था और फिर हम लोग निकल लिये पूरे प्रदेश मे ।
मैने तो बस इमानदारी से अपना कर्तव्य निभाया था ।
कुछ छूट गया होगा तो वो आत्मकथा मे मिलेगा ।

आंदोलन की निराशा

हमें याद है युवा आंदोलन और उसकी आवाजे क्योकि हम उसका हिस्सा रहे है ।
1967/68 अंग्रेजी हटाओ आंदोलन ( बहुत दिनों तक नारा लगता रहा - अंग्रेजी में काम न होगा फिर से देश गुलाम न होगा )
परिणाम ?????% अंग्रेजी बढती गयी और आंदोलन करने वाला छात्र और नौजवान छला गया ।
1975 जयप्रकाश आंदोलन , कुर्सी खाली करो की जनता आती है , संघर्ष हमारा नारा है ,भावी इतिहास हमारा है , और सत्ता नही व्यवस्था परिवर्तन करना है ।
परिणाम- बस सत्ता बदली और नौजवान फिर छला गया । पढाई और रोजगार का नुकसान हुआ ।
1989 राजा नहीं फ़कीर है देश की तकदीर है ।
परिणाम - एक और सत्ता परिवर्तन और नौजवान से बस छलावा ।
से लेकर 2014 - अच्छे दिन ,2 करोड़ रोजगार ,15 लाख ,गुजरात मॉडल तक 
कब तक नौजवान केवल लोगो को सत्ता दिलवाने का हथियार बनता रहेगा ? इस उम्मीद में की शायद अब उसके लिए अच्छे दिन आएंगे ।
नौजवान भावना में बह कर केवल अपनी जिंदगियां ख़राब करता रहा है ।
नौजवानों कब चेतोगे और एक फैसलकुन फैसला करोगे सचमुच के व्यवस्था परिवर्तन के लिए ,समाज परिवर्तन के लिए ,गैर बराबरी ,भ्र्ष्टाचार और धोखे से मुक्ति के लिए ।
नहीं चेते तो बस किसी न किसी के नारे लगाते रहोगे और अपनी जिंदगी में हारते रहोगे उन लाखो की तरह जो तुमसे पहले हार कर बूढा गए है भरी जवानी में ।
और तुम्हारी जगह फिर नए नौजवानो की फ़ौज तैयार हो जायेगी किसी का आंख बंद कर और जूनून के साथ नारा लगाने को और वो कुर्सियों पर बैठते रहेंगे ।
पर व्यवस्था कभी नहीं बदलेगी ,समाज कभी नहीँ बदलेगा और तुम भी कभी नहीं बदलोगे ।
या फिर खूब चिंतन कर एक बार खड़े हो जाओ और आने वाली पीढ़ियों को मुक्त कर दो इस छल से और उसका रास्ता सुगम बना दो ।
( एक  सफर का चिंतन पर पता नहीं क्यों और कितनी भृकुटियां तन जाएँगी मुझपर जिसकी मैंने कभी चिंता नहीं किया क्योंकि सच जिन्दा रहना चाहिए --- क्योकि मेरी आँखों में कुछ सपने है )
जय हिंद

#दरोग़ा जी आए है

#जिंदगी_के_झरोखे_से

ध्रुवलाल यादव दारोगा जी आये है कुर्सी छोड दो -

मुलायम सिंह यादव जी को दरोगा और पुलिस से बहुत प्यार रहा है ,उसी का एक किस्सा है ये ।
हम लोग सत्ता से बाहर थे और कार्यक्रम बहुत करने लगे थे और दौरे भी ।
ऐसा ही एक कार्यक्रम लगा फीरोजाबाद का, वहा जैन मन्दिर प्रांगण मे चौ हरिमोहंन सिंह यादव के स्वागत का कार्यक्रम था जिसमे मुलायम सिंह यादव जी मुख्य अतिथि थे । प्रदेश महामंत्री ,एक मात्र प्रवक्ता था और सब जगह साथ जाना होता था तो इस कार्यक्रम मे भी था ।
कार्यक्रम के बाद फीरोजाबाद के रईस जैन साहब ने अपने घर पर खाना रखा था और वही मैने प्रेस बुला लिया था ।प्रेस के बाद खाना हुआ और हम लोग बात करने तथा जो लोग मिलना चाहते थे उनसे मिलने के लिए वही बैठ गए ।उस जमाने मे दारोगा ध्रुव लाल यादव की बहुत चर्चा थी अलग अलग कारणो से ।बाद मे एक एनकाउन्टर मे वो मारे भी गए जो रहस्य ही रह गया ।क्योकी चर्चाये कुछ और भी हुई ।
अचानक कोई आया की ध्रुव लाल यादव आ रहे है ।
ये बात बताना जरूरी है कि मैने फीरोजाबाद एकमात्र शहर देखा जहा लोग कार्यक्रमो का मुख्य अतिथि उस जमाने मे किसी वी आई पी , साहित्यकार , डी एम, एस पी को नही बल्की दक्षिणी थाने के थानेदार को ही बनाते थे ।
ध्रुव लाल प्रकट हुये तो कोई कुर्सी खाली नही थी । मुलायम सिंह यादव ने ने मेरी तरफ कुछ इस तरह देखा की मैं उनके लिए कुर्सी छोड दूँ पर मैने अनदेखा कर दिया और बगल मे बैठे विधायक से बात करने लगा ।
2 मिनट ही उनको खड़ा रहना पडा होगा कि सेठ जी के एक रिश्तेदार सेठ और फीरोजाबाद के एक नेता ने कुर्सी छोड दिया और विनम्रता से अपनी अपनी कुर्सी पर बैठाने के लिए पूरी जद्दो-जहद कर दिया ।
इस पोस्ट का मतलब है भी और न समझे तो नही भी है ।

सोमवार, 13 नवंबर 2023

मेरी दीवाली

मेरी दीवाली :
10 को लखनऊ से चलकर आगरा आ गया था कि बंद घर खोल कर उसको हवा लगा दूं और सफाई करवा दूं क्योंकि जब तीन महीने के लिए अमरीका गया था तो लौटने पर पूरा घर घर नही था कुछ और बन गया था । चारो तरफ गंदगी और धूल । रसोई की सारी लकड़ी दीमक चाट गया था और मिट्टी बना चुका था उसे । मेरे कमरे की अलमारी के नीचे के हिस्से में रखी किताबे भी मिट्टी बन चुकी थी । बाद में पता चला की बड़ी बेटी की आलमारी के निचले हिस्से का भी वही हाल हुआ है । दीमक लग तो काफी जगह गई थी पर खा नही पाई थी और कपड़े इत्यादि धोकर ठीक निकल गए थे । जब बीमारी से जूझ रहा था दिल्ली में लंबे समय तक तब भी लौट कर यही नजारा था । 
इसलिए कोशिश करता हूं की हर 15/20 दिन में आकर घर साफ करवा दूं और सब खिड़की दरवाजे खोल कर हवा दिखा दूं तथा देख लूं की कही दीमक जो ने आगाज तो नही कर दिया है तो इनपर स्प्रे कर अपना बदला ले लूं ।
काफी दिनों घूमता रहता हूं कभी लखनऊ,कभी नोएडा और दिल्ली तो कभी बनारस से लेकर कुशीनगर ,देवरिया या कही भी । बचपन में किसी ने कहा था की मेरे पैर में चक्कर है इसलिए घूमता रहूंगा पर क्या मेरी पत्नी इतना पहले मुझे छोड़कर भगवान के पास नही चली गई होती तब भी मैं ऐसे ही  घूमता रहता ये बड़ा सवाल है । जवाब जो भी भी पर अकेला इंसान जो अकेले रहने के स्वभाव का नही है वो अकेलेपन से लड़ता रहता है और उसको दूर करने को भटकता रहता है कभी बेटा कभी बेटी तो कभी जानने वालो के यहां। हा मैं भटकता रहता हूं । पर कितनी मुश्किल से एक अदद घर यानी छत की व्यवस्था कर पाया था मैं तो वो घर मुझे खीचता रहता है अपनी तरफ है रोज और सच बात ये है की सबसे ज्यादा सुकून भी मुझे इसी घर में मिलता है ,मेहनत और संघर्ष से बने हुए घर में और सबसे अच्छी नीद भी मुझे इसी घर में आती है । इसी घर में मेरे अंदर विचार पैदा होते है अपनी कुर्सी मेज पर बैठ कर और कविता कहानी तथा लेख भी तथा नए नए राजनितिक विचार , भविष्य का आकलन सब । लेकिन ये घर कुछ ही दिन में मुझे बेजान दीवार और छत मात्र लगने लगता है और हाउस अरेस्ट वाली जेल भी ,बस भाग निकलता हूं में इसके बाहर कही भी । आजकल बेटा लखनऊ में रहता है और वहा मेरा राजनीतिक शौक भी पूरा हो रहा है तो वहा ज्यादा रहने लगा हूं । फिर भी 15 दिन होते होते फिर घर पुकारने लगता है । कोशिश किया की इसे बेचकर लखनऊ में ही घर ले लूं जहा व्यस्त रहता हूं ( क्योंकि आगरा में बिलकुल अकेला और खाली रहता है सत्ता और पद नही रहने पर ) या नोएडा में ले लूं जहा बेटियो का घर है और ईशान्वी जी रहती है पर बिक कर भी घर नही बिक पाया क्योंकि खरीदने वाले के व्यापार पर छापा पड़ गया तो एडवांस लौटा दिया मैने बुलाकर । फिर लोगो को लगा की मैरी गरज है बेचना तो लोग औने पौने में खरीदने की फिराक में पड़ गए । मुझे भी घर बेच कर इसी से घर खरीदना है इसलिए मैं जोखिम नहीं उठा सकता की एक छत जो अपनी है उसे भी गंवा दूं और बेघर हो जाऊं ।
इसी सब द्वंद में चल रही है जिंदगी ।
हर बार की तरह इस त्योहार पर भी घर आ गया की एक दिया भी अपने घर में जलाऊंगा । आमतौर पर बेटा त्योहार में घर आ जाता है और हम दोनो मिलकर जैसा भी होता है त्योहार को महसूस कर लेते है । हमारे घर खाना नही बनता तो पूडी वाली थाली के लिए मशहूर दुकान से सब मांगा लेते है और त्योहार वाले खाने का स्वाद ले लेते है । पर बच्चो का इस बार सामूहिक कार्यक्रम बन गया कही और जाने का फिर भी मुझे तो आना ही था तो घर आ गया ।
अकेले बैठा हूं ।आज भी कभी कभी कही से आज भी पटाखे की आवाज सन्नाटे को तोड़ देती है । कल तो कानफोडू शोर था की अकेलापन गुम हो गया था उस शोर में । एक दिन तो घर को घर बनाने और उसकी छुपी हुई गंदगी साफ करने में निकल गया और इतना थका दिया इस कसरत ने की कब नीद आ गई पता ही नही चला । ये अलग बात है की उसके लिए एक अदद कांबीफ्लेम और एक एलप्रेक्स,25 का सहारा लेना पड़ा । मुझे पूजा पाठ नही आता ,बचपन से ही कभी नहीं किया तो पड़ोसी शुक्ला जी से आग्रह कर लिया था की लक्ष्मी गणेश और दिया इत्यादि अपने सामान के साथ लेते आए वो ले आए ।उन्ही से मिठाई के डिब्बे मांगा लिए थे क्योंकि मैं कालोनी के सभी चकीदार ,स्वीपर और अपने यहां काम करने वालो को हर मौके पर देता हूं । शुक्ला जी से ही आग्रह कर लिया की बेटियो के साथ आकर पूजा कर दे और दिए जहा जहा रखे जाते हो रख दे । उन लोगो ने ये सब कर दिया और दीपावली की परंपरा पूरी हो गई । ये सब होते होते पटाखे छूटने लगे चारो तरफ और मैंने ध्यान ही नही दिया की आज टिफिन ही नही आया । रात को 10 बजे के बाद याद आया तब तक देर हो चुकी थी ।  पर मैं घर में भुने चने रखता हूं बस खा लिया वो हो गया दीपावली का खाना । बच्चो को गलती से बता दिया ये बात तो बेचैन हो गए और उस वक्त ऑनलाइन सिर्फ कुल्फी मिल रही थी तो वही भेज दिया तो त्योहार का मीठा भी हो गया । 
तो अकेला बैठा हूं । दिन में एकाध लोग मिलने आ गए थे । फिर तब से सन्नाटा तभी टूटता है जब पटाखे की आवाज आती है या मेरे घर के सामने बैठने वाले कालोनी की चौकीदारों की कोई आवाज आती है । दरअसल जिंदगी ही नही है अकेले व्यक्ति थी क्योंकि व्यक्ति समूह में रहने के लिए बना है और समूह की पहली इकाई परिवार है और त्योहार तो है ही बच्चो की चीज तथा उन्ही से गुलजार होता है घर और वो बांधे रहते है अपने चारो तरफ पूरे परिवार को ।परिवार और बच्चो के बिना बेजान दीवारों और छत के साथ व्यक्ति भी बेजान सा ही होता है निरीह सा बाद टुकुर टुकुर ताकता रहता है दरवाजे की तरफ और खिड़की के पार और सुनता रहता है बाहर का शोर तथा इसी में गुम कर देने की कोशिश करता है अपने अंदर का शोर । 
खैर मेरी दीपावली भी मन गईं । होंगे लाखो लोग और भी ऐसे ही जिनके त्योहार ऐसे ही मनते होंगे बल्कि सारे दिन ही ऐसे ही कटते होंगे । 
मैं तो भाग्यवान हूं की मेरे बच्चे मुझे प्यार करते है और मेरा हर तरह ध्यान रखते है और मेरा अधिकतर समय उन्ही के साथ गुजर जाता है । बेटा चाहता है की में कही नही जाऊं उसी के पास रहूं और बेटियां चाहती है की उनके आसपास रहूं। 
लेकिन कभी कभी का ये अकेलापन बहुत चुभता है और वो भी ऐसे अवसर का । 
में उन लोगो के बारे में सोच सोच कर परेशान हूं जिनकी जिंदगी का अकेलापन कभी खत्म हो नही होता या उनके बारे में जिनके पास कुछ भी नही होता है चना भी नही ।
जिंदगी इसी धूप छांव का नाम है ।

बुधवार, 8 नवंबर 2023

राजनीति में फंसा एक सच्चा कवि

राजनीति में फंसा एक सच्चा कवि 

राजनीति और कविता दोनों का साथ चलना मुश्किल है। राजनीति बहुत झूठी होती है, वहां छल-प्रपंच, षड्यंत्र का कारोबार चलता रहता है लेकिन कविता तो सच की पक्षकार होती है, वहां स्वप्न होते हैं, वहां उड़ानें होती हैं, वहां भविष्य के अनखोजे रास्ते होते हैं। इसके बावजूद हमने कई राजनेताओं को कविता लिखते देखा है। कुछ ने तो बहुत अच्छी कविताएँ लिखीं हैं। डा. सी पी राय भी उन्हीं में से एक हैं।  मैं कह सकता हूँ कि वे राजनीति में न होते तो बेहतरीन कवि होते। उन्होंने लम्बा समय राजनीति में दिया है। छात्र जीवन से ही उन्हें राजनीति लुभाती रही लेकिन कविता का दामन भी उन्होंने कभी नहीं छोड़ा। कविताएं भी लिखते रहे। लिखना, भाषण करना उनका शगल रहा है। आज भी वे इससे मुक्त नहीं हैं। उनके लेखन पर भी उनके इस व्यक्तित्व का असर दिखता है। चीजों को विस्तार से कहने की आदत।  गद्य में तो यह मदद करती है लेकिन कविता का यह स्वभाव नहीं होता। वह बहुत विस्तार में नहीं जाती, बहुत ब्योरे में दाखिल नहीं होती, वह कम से कम शब्दों में कहना चाहती है। डा. राय की कविताएँ बहुत विस्तार में चली जाती हैं। ऐसे में खतरा यह रहता है कि जिसके कहे बगैर काम चल जाता हो, वह भी वे कहते चले जाते हैं। फिर भी उनकी कविताओं में बार-बार ऐसी पंक्तियाँ आतीं हैं, जो उनके कवि व्यक्तित्व के प्रति विशवास जगती हैं। 
एक अच्छे वक्ता के लिए कल्पनाशीलता की बहुत जरूरत होती है। ठोस आंकड़ों और अख़बार की कतरनों से काम नहीं चलता। भाषा के साथ कल्पना भी चाहिए।  यह कल्पना ही किसी राजनेता को बड़ा वक्ता बनाती है। यही उन आंकड़ों में प्राण भारती है, उनकी नयी व्याख्याओं का मार्ग प्रशस्त करती है। और सच कहूँ तो कविता भी बिना कल्पनाशीलता के संभव नहीं होती। वह गद्यात्मक विवरण नहीं होती। उसे कुछ ऐसा कहना होता है, जो सुनते ही किसी के भी दिमाग में उतर जाय, भीतर गूंजने लगे। कहन को यह सजीवता, यह जीवंतता और यह नयापन देने का काम कल्पनाशीलता ही करती है।  डा. सी पी राय में अव्वल दर्जे की कल्पनाशीलता है। इसी के सहारे वे अच्छा बोल पाते हैं और इसी के सहारे वे कविताएँ भी लिख पाते हैं। उनकी एक कविता 'रोटियां' में इस कल्पनाशीलता और भाषा का सहमेल देखते ही बनता है। वे कहते हैं, 'पेट में जब आग हो तो काम आये रोटियां / रोटियां जब मिल न पाएं, जल उठेगीं कोठियां।'
     राजनीति झूठ के बिना चल नहीं पाती। हालाँकि डा. राय इससे बचने की पूरी कोशिश करते हैं लेकिन  आज के समय में जब राजनीति पेशा बन गयी है, इससे बच पाना पूरी तरह संभव नहीं है। मुझे मालूम है कि उन्होंने समाजवादी पार्टी के शासन काल में उसी पार्टी में रहते हुए मीडिया पर उनके हल्लाबोल को अनुचित ठहराया था और इसका खामियाजा उन्हें लम्बे समय तक भुगतना पड़ा था। अगर आप को पार्टी राजनीति में रहना हो और पार्टी ही कोई झूठ खड़ा करना चाहे तो आप के सामने चुप रहकर झूठ का साथ देने अथवा उसके खिलाफ बोलकर सड़क पर आ जाने के अलावा क्या विकल्प बचता है। डा. राय ने ऐसा किया है लेकिन ऐसा हमेशा कर पाना संभव नहीं होता। और कई बार अनजाने ही झूठ का हिस्सा बनना पड़ता है। यह कठिनाई डा. राय के साथ भी आती होगी। ऐसी परिस्थितियां ही भीतर के कवि को मारती हैं। मैं कह सकता हूँ कि उनकी कविताएँ जहाँ कमजोर लगतीं हैं, भाषण में बदल जातीं हैं, वह इसी राजनीति के कारण। शायद वे राजनीति में न होते तो और अच्छे कवि होते। 
बेशक उनके पास जीवन के विविधरंगी विशाल अनुभव हैं। वे अपने अनुभवों को जनपक्षधरता के साथ देखने की भी ताकत रखते हैं, कविता में भी उसका निर्वाह करते हैं। वे गरीबों की, किसानों की, मजदूरों की बात करते हैं, उनके हक़ की बात करते हैं, बदलाव की बात करते हैं। वे समाज के हर तबके को बहुत करीब से देखते हैं, समाज के छल, भेदभाव को भी देखते हैं, 'काटकर औरों की टाँगें खुद लगा लेते हैं लोग /शहर में इस तरह अपना कद बढ़ा लेते हैं लोग।' वे गांव और शहर के फर्क को शिद्दत से महसूस करते हैं, देश के स्पंदन को समझते हैं, जानते हैं कि देश कोई भूगोल भर नहीं है, देश जिन्दा नागरिकों से बना है, वे सभी मनुष्य हैं। इसी आधार पर वे किसी भी तरह की साम्प्रदायिकता के विरुद्ध हैं। उनके लिए सभी रंग एक जैसे हैं, कोई अछूत नहीं, कोई त्याज्य नहीं। चाहे भगवा हो या हरा। न भगवा हिन्दुओं का रंग है न हरा मुसलमानों का। आकाश सबका है, फूल भी सबके हैं।  वे जीवन में आधी आबादी के महत्व को, उनके सम्मान को सम्यक दृष्टि से देखते हैं। स्त्रियों के बिना सामाजिक जीवन अधूरा है, वे किसी भी तरह कमतर नहीं हैं। उनकी कविताओं में बेटियां, मांएं, स्त्रियों के अनेक रूप सम्मानपूर्वक आते हैं। प्रकृति के लिए भी उनके मन में खासी जगह है। वे चाँद से  बात करते हैं, फूलों को, पेड़ों को उनकी अपनी अर्थवत्ता में महसूस करते हैं, 'शाम ढली थी और थोड़ी सी रात हुई / बहुत दिनों के बाद चाँद से बात हुई।' राजनीति और जीवन को कविता के रंग में देखने की उनकी कोशिश रंग लाये, मेरी यही शुभकामनाएं हैं उन्हें। 
सुभाष राय 
प्रधान संपादक, जनसंदेश टाइम्स, लखनऊ