मंगलवार, 30 जनवरी 2024

30 जनवरी मार्ग और बापू

#जिंदगी_के_झरोखे_से 
वो 30 जनवरी की तारीख़ थी जो भारत के इतिहास की काली तारीख़ साबित हुयी और भारत ही क्या दुनिया को मानवता का रास्ता दिखाने वाला सूरज अस्त कर दिया गया एक हत्यारे द्वारा ।
राष्ट्रपिता महात्मा गांधी हम सबके बापू दिल्ली के बिडला हाउस के एक छोटे से कमरे में रहते थे बहुत ही साधारण तरीक़े से । ज़मीन पर बैठते थे सोते थे , बहुत साधारण बर्तन में सादा भोजन करते थे ।
बापू रोज़ पीछे के मैदान में उपस्थित इंसानो से मिलते थे , उनके प्रश्नो का जवाब देते थे , रामधुन गाते थे , प्रार्थना करते थे और विभिन्न विषयों पर प्रवचन भी करते थे ।
कुछ देर पहले ही तो सरदार पटेल महत्वपूर्ण मुद्दों पर बात कर के गए थे और कल ही तो बापू में ड़ा राममनोहर लोहिया को बुलाया था चर्चा करने को । रात हो रही थी और ड़ा लोहिया थके हुए थे जबकि बापू कुछ व्यस्त थे । जब बापू वापस आए तो ड़ा लोहिया गहरी नीद में सो गए थे । बापू ने उन्हें नही जगाया और ख़ुद भी ध्यान करने के बाद सो गए । सुबह बापू जल्दी जाग गए और अपनी नित्य की दिनचर्या में व्यस्त हो गए और ड़ा लोहिया उनके बाद जगे । लोहिया बापू के पास गए की बापू मुझे नीद आ गयी थी बताइए क्या आदेश है । बापू का समय निर्धारित होता था और उसी हिसाब से उनका जीवन चलता था इसलिए बापू ने उन्हें आज यानी ३० जनवरी को आने को कहा और इतना ज़रूर कह दिया कि आवश्यक बात करनी है और कांग्रेस के भविष्य पर तथा उसमें इन लोगों की भूमिका पर बात कर कुछ महत्वपूर्ण निर्णय लेना है । ड़ा लोहिया चले गए । 
३० तारीख़ को मिलने वालो ने सरदार पटेल प्रमुख थे और गम्भीर चर्चा कर वो वापस का चुके थे । 
बापू अपने नियत समय पर अपने कमरे के इसी चित्र वाले दरवाजे से प्रार्थना स्थल के लिए निकले और ज्यों ही नीचे की सीढ़ियाँ चढ़ कर आगे बढ़े भारत का पहला आतंकवादी जो इतना कायर था की आज़ादी की इतनी लम्बी लड़ाई में वो देश के लड़ना तो दूर जिसने कभी मुह छुपा कर भी अंग्रेज के ख़िलाफ़ कोई नारा तक नही लगाया था ,जिसने किसी अंग्रेज के घर की दीवार पर ग़ुस्सा दिखाने के लिए कभी एक कंकरी तक नही फेंका था और जिसने चंद दिन पहले ही अपने हाथ पर मुस्लिम नाम लिखवा लिया था उसी ने जिन अंग्रेजो कि कभी औक़ात नही हुयी बापू को उँगली से भी छूने की उन्होंने की अंग्रेज़ी पिस्तौल से उन्ही अंग्रेजो कि बनाई तीन गोलियाँ बापू के सीने में उतार दिया और भागने लगा जिसको वही के माली ने तमाचे मार कर पकड़ लिया ।
अपने को हिंदुओं का ठेकेदार बताने वाली एक सगठन जो अब देश भक्ति का उपदेश देता है ने तुरंत देश भर में फैलाया की बापू को मुसलमान ने मार दिया पर तुरंत नेहरू जी और पटेल जी ने निर्णय लिया और हत्यारे का नाम देश भर तक रेडियो से पहुँचा दिया । देश की जानता रोटी हुयी सड़क पर थी और कांग्रेसी गोलीय जनता को सच बताने निकल पड़ी ।
ड़ा लोहिया बापू से मिलने के लिए आ रहे थे और अभी थोड़ा दूर ही थे की पता लगा की सूरज अस्त हो गया । नेहरू जी ने रोते हुए कहा कि रोशनी ख़त्म हो गयी । 
दूसरी तरफ़ संघ और हिंदू महासभा ने ख़ुशी मनाया और मिठाई बाँटा । 
जी आज तीस जनवरी को 74 साल हो गए । वो ताकते जी बापू की हत्या के लिए ज़िम्मेदार है सब तक पैर जमा चुकी है तथा अपने आका के सपनो को उतार देना चाहती है बापू के भारत में हिटलर और मुसोलिनी ने भी जो रास्ता तय किया था उसी पर चल कर उन्ही की तरह  मानवता का क़त्ल करके और देश को जहन्नुम बना कर । 
इसलिए ३० जनवरी हमें चेतावनी देती है देश को समाज को और मानवता को बचाने की चेतावनी और हिटलर मसोलिनी का नही बल्कि बापू के सपनो का भारत बनाने की । 
काश उस दिन ड़ा लोहिया दो नही गए होते या काश बापू की हत्या नही हयी होती और आचार्य नरेंद्र देव , ड़ा लोहिया , जयप्रकाश , अच्युत पटवर्धन इत्यादि कांग्रेस में ही रहे होते तो शायद तस्वीर कुछ और होती पर आज इस बात को याद करने का दिन नही है बल्कि मानवतावादी सत्य अहिंसा ग्राम स्वराज और स्वावलम्बन बनाम हत्या दंगे , राक्षसी सोच और अंधाधुंध पूंजीवाद के बीच चलती लड़ाई में से अपना पक्ष चुनने का दिन है ।
आइए बापू के साथ खड़े हो । 
#मैं_भी_सोचूँ_तू_भी_सोच

मंगलवार, 9 जनवरी 2024

जिंदगी_के_झरोखे_से। 1991 और वो सरदार जी

#जिंदगी_के_झरोखे_से 

सरदार जी जो बस बड़ी बाते कर एम एल सी बन गए :

1989 की बात है जब मैं मुलायम सिंह यादव जी के चुनाव का काम देख रहा था जसवंत नगर इटावा में । संभवतः पीलीभीत क्षेत्र के एक सरदार जी तथाथित तैर पर किसानों की कुछ समस्या लेकर मुलायम सिंह जी से मिले थे और शायद ये भी कह दिया था की उनके पास अच्छी खासी ताकत है कही भी भीड़ जाने के लिए ।तभी ये चुनाव पड़ गया । इस समय इटावा में बाबू दर्शन सिंह यादव जी बहुत बड़े और ताकतवर व्यक्ति थे तथा कभी मुलायम सिंह जी की मदद करते थे पर एक राजनीतिक घटनाक्रम के कारण जिसमे पहले उनको जिला पंचायत अध्यक्ष का चुनाव लड़ाने की बात कह कर मुलायम सिंह जी ने रामगोपाल यादव को उम्मीदवार बना दिया था उसी से आहत होकर बैर भी हो गया था और वो काग्रेस में चले गए थे तथा वहा के नेता हो गए थे । जसवंत नगर में मुकाबला उन्ही दर्शन सिंह यादव जी से होना था । इस समय सरकारी गेस्ट हाउस में रुकने पर पाबंदी नहीं थी वैसे भी मुलायम सिंह जी ने सिंचाई विभाग के एक सूट को अपना स्थाई निवास बना रखा था क्योंकि शहर में उनका घर नही था और गांव में भी बस घर था , और चुनाव में गाड़ियों का काफिला लेकर चलने तथा हथियारों के साथ चलने पर रोक नही थी । 
दर्शन सिंह जी का आतंक था की भट्ठे में झोकवा देते है लोगो को और वो मुलायम सिंह जी पर शक्ति में इस वक्त कुछ हद भारी भी थे या ऐसा मनोवैज्ञानिक असर था  इसीलिए जब तक 10/12 राइफल एकत्र नही हो जाती तब तक मुलायम सिंह जी भी प्रचार के लिए नही निकलते थे ( ये भी यही जिक्र कर दे की इसी चुनाव में मुलायम सिंह जी पर गोली भी चली थी जिसमे वो बाल बाल बच गए थे एक हमर  द्वारा धक्का दे दिए जाने के कारण ,फिर शायद दर्शन सिंह जी भी कही हाथ लग गए थे शायद इसलिए की उस घटना के वक्त मैं मौजूद नही था बाद में लोगो से और मीडिया के दोस्तो से पता लगा था जिन लोगो के अचानक उसी स्थान पर पहुंच जाने के कारण दर्शन सिंह जी बच गए थे )। 
ये चुनाव बड़ा तनाव वाला था इसी में एक बार मुलायम सिंह जी नाराज होकर मुझे कह दिया था की मैं तत्काल इटावा छोड़ दूं और इलाहाबाद जनेश्वर मिश्र जी के चुनाव में चला जाऊं क्योंकि मैं कही भी चला जाता और भाषण देने लगाया तो उस दिन मुलायम सिंह जी ने गुस्से में कहा था की आप जानते है को वो भट्ठे में झोकवा देगा और आप की हड्डियां भी नही मिलेंगी और मैं आप के परिवार को क्या जवाब दूंगा और मैने जाने से इंकार कर दिया ये कह कर की मेरी मौत जब आनी होगी तभी आयेगी उसके पहले किसी की औकात नही जो मुझे मार दे और मैने अपनी तरह ही प्रचार जारी रखा ।
मैं बात कर रहा था सरदार जी की जिनका नाम अब याद नहीं । 
इस माहौल के कारण उनकी बन गई और 10/12 सिख लोगो के साथ आ गए और सिंचाई विभाग के गेस्ट हाउस की एनेक्सी में जम गए और जम कर दारू और मुर्गा चलने लगा ।
एक दिन उनका इम्तहान हो गया । वोटिंग के दिन जसवंत नगर कस्बे के पास  वाली पोलिंग पर गोली चल गई और मतदाताओं को भगाया जाने लगा जिसमे स्थानीय दरोगा तथा एस डी एम भी शामिल थे । उस पोलिंग पर मुलायम सिंह जी के पक्ष में मतदान होने की सभवना थी । मेरे पास खबर आई तो मैंने सरदार जी से कहा की आप लोग तुरंत चलो ऐसा हो गया है। मैने 10 मिनट इंतजार किया पर सारे लोग एक दूसरे का मुंह देखते रहे और जाने के प्रति बिलकुल अनिक्षुक तब मैंने अपनी गाड़ी उस पोलिंग की तरफ बढ़ा दिया और वहा जाकर अधिकारियों से भिड़ गया । इतने दिनो में पूरा क्षेत्र मुझे जान गया था और मेरे भाषणों का आकर्षण भी खूब था +जिसका जिक्र अगले किस्से में ) तो मुझे देखते ही तीतर बितर हुए लोग पोलिंग पर इकट्ठे हो गए और अंततः अधिकारियों को झुकना पड़ा और फिर पोलिंग शुरू हो गई ।
चुनाव हो गया मुलायम सिंह जी जीत गए और मुख्यमंत्री बन गए । दर्शन सिंह जी के कारोबार और भट्ठो पर खुद तांडव चला सत्ता का उनकी आर्थिक कमर भी तोड़ी गई और उनको दिल्ली में घर लेकर तब तक शरण लेनी पड़ी जब तक सत्ता रही । ये अलग बात है की बाद में उनसे समझौता भी हुआ और पार्टी में उनका सम्मान भी हुआ और उनको राज्य सभा सदस्य भी बनाया गया जिसपर मुलायम सिंह जी ने भी कहा की इस क्षेत्र में कोई भी विरोधी क्यों हो और दर्शन सिंह जी मुझसे मिले तो पहले तो ये कहा की आप ही है वो सी पी राय ? मैं सोचता था की कौन है ये नौजवान को बिना डरे मेरे क्षेत्र में चुनौती दे रहा है और फिर उनसे मेरी बहुत अच्छी दोस्ती हो गई । उन्होंने कहा की मैने सोचा की अपनी दुश्मनों अगली पीढ़ी को क्यों दिया जाए इसलिए समझौता कर लिया ।
इस बीच उत्तर प्रदेश में एम एल सी चुनाव आ गए । इसी चुनाव में मैने आगरा के खेरागढ़ से टिकट मांगा था जिसके लिए संसदीय बोर्ड के अधिकांश सदस्य मेरे पक्ष में था चौ देवीलाल विशेस तौर पर और जॉर्ज फर्नाडीज इत्यादि भी पर मुलायम सिंह जी वहा एक बदनाम व्यक्ति को टिकट देना चाहते थे तो उन्होंने संसदीय बोर्ड में ये कह दिया की सी पी राय मेरा चुनाव देखे और जब मैं मुख्यमंत्री हो जाऊंगा तो एम एल ए क्या होता है सी पी राय उससे ज्यादा बना दिए जायेंगे और इसपर पहले जॉर्ज साहब फिर देवीलाल जी और चंद्र शेखर जी सहित सभी ने कहा कि में जाकर मुलायम सिंह जी का चुनाव देखूं और जब वो मुख्यमंत्री हो जाएंगे तो उनका बड़ा है बोर्ड के सामने तो हो सकता है कि राज्यसभा दे या एम एल सी बना कर मंत्री ही बना दे , पर दोनो के चुनाव हुए तो मेरा नाम कही नही था और वो सरदार जी सिर्फ बाते बना कर एमएलसी बना दिया गए ।।फिर मुलायम सिंह जी मुझसे जब तक  सरकार रही मिले ही नही हा मुलाकात हुई जब सरकार जा रहती और 1991 का चुनाव आने वाले थे ।

शुक्रवार, 29 दिसंबर 2023

समर्पण

जो कुछ भी लिख सका हूं वो मेरे दादा जी स्व बाबू पतरु राय ,  पिताजी  स्व डा पारस नाथ राय , माता जी स्व जगदम्बा राय और पत्नी स्व मंजुला राय को समर्पित ।

गुरुवार, 28 दिसंबर 2023

1: जिंदगी के झरोखे से / एक अभिमन्यु

अब तो घरों में खिड़कियां होती है पर पुराने जमाने में घर हो या किला उसमे तमाम झरोखे और रोशनदान होते थे जो रोशनी के काम आते थे तो ताक झांक करने के भी और जरूरत पड़ने पर हमला करने और बचाव करने के भी । जिंदगी भी एक तरह का घर ही तो है जिसमे आप आते है रोते हुए और जिससे आप जाते है तो रुलाते हुए । जिंदगी कितने टेढ़े मेढे रास्तों से गुजरती है हसाती भी है और रुलाती भी है । कुछ लोगो का पोर पोर और लहू का कतरा कतरा दर्द देता रहता और वो दर्द जितनी संघर्ष और तकलीफों का होता है उससे ज्यादा लोगो के छल और धोखे का होता है। इंसान संघर्ष और तकलीफे तो एक बार भूल भी जाता है लेकिन छल , दगाबाजिया और धोखे जिंदगी के अंत तक टीस देते रहते है तथा रिसते रहते है। 

जिंदगी में कितने मौके आते है जब पहाड़ की चढ़ाई लगती है जिंदगी तो कभी पहाड़ सा बोझ लगती है जिंदगी , कभी खाई दिखलाई पड़ती है जिंदगी के अगले कदम पर तो कभी इतनी बड़ी नदी की तैर कर पार करना मुश्किल लगता है और तैरना हो

ही  नही आता हो तब तिनके का सहारा भी आकर्षित करता है । वैसे नरेश सक्सेना ने तो अपनी कविता में लिख दिया की " पुल पार होने से पुल पार होता नदी पार नही होती ,  नदी पार नही होती नदी में धसे बिना " । पर कई जिंदगियां  नदी में धसी ही रह जाती है । पुल भी उनके लिए मृगतृष्णा होता है जिसपर पैर रखने की कोशिश में नदी में समा जाते है और कई बार तो कुछ लोगो को नदी नही नाले नसीब होते है जिसमे होती है सिर्फ कीचड़ या दलदल ।कीचड़ हुई और किसी ने बचा लिया तो नहा धोकर साफ होकर फिर इंसान से दिखने लगते है पर दलदल हुआ तो अस्तित्व ही विलीन हो जाता है उसमे ।
तो मैं बात तो झरोखे की कर रहा था । हा जिंदगी में भी कितने झरोखे होते है रंग बिरंगे और बदरंग भी । इन झरोखो में ही न जाने कितने पात्र नजर आते है ।कुछ युधिष्ठिर तो कुछ धृतराष्ट्र , कुछ कृष्ण तो कुछ भीष्म और  कर्ण भी , कुछ द्रोण तो कुछ विदुर, कुछ दुर्योधन तो कुछ गंधारी , कोई द्रौपदी तो कोई अभिमन्यु भी ।।

जिदंगी के महाभारत में सबसे ज्यादा निरीह तो अभिमन्यु दिखता है जो सीख ही नही पाया चक्रव्यूह के सब दरवाजे तोड़ पाना और फिर भी वक्त ने उसे उसी चक्रव्यूह में फंसा दिया।वो अंतिम चक्र तक पहुंच जाना तो जानता है और अंतिम चक्र पार करना नहीं जानता , फैसलाकुन युद्ध जीतना नहीं जानता,  अन्तिम लक्ष्य हासिल करना नहीं जानता है । जिनको वो अपना मानता है वहीं उसका शिकार करने को घात लगाकर खड़े मिलते है जिंदगी के हर चक्र में ।

जी हा ये किस्सा भी एक अभिमन्यु का ही है जो थोड़ा बड़ा होते ही लड़ने लगा अपने बचपन को जीने के लिए अपनो से , अपनी जिंदगी के लिए अपनो से और अपनो ने भरपूर प्रताड़ित भी किया और मनचाहा थोपा भी । फिर शुरू हो गई जंग जिंदगी की तो लड़ाई दो मोर्चो पर शुरू हो गई एक अपनो से जो जिंदगी की लड़ाई के तरीके और लक्ष्य के खिलाफ थे और गैरो से जो प्रयोग तो कर लेना चाहते थे और चुरा लेना चाहते थे अपना वक्त , धन और पुरुषार्थ और बदले में सिर्फ धोखा देना ही था मन में । वो अभिमन्यु तो लड़ रहा था जिनसे उनको जानता था की उनसे लड़ना है मारना है या मरना है पर ये अभिमन्यु तो लड़ नही रहा था बल्कि अपना मान कर पूर्ण समर्पण से योगदान कर रहा था की अपने तरक्की करे और हर मुसीबत उनसे दूर रहे । छल उस अभिमन्यु के साथ हुआ पर वो सामने खड़े घोषित दुश्मनों ने किया लेकिन मेरी पुस्तक के पात्र अभिमन्यु के साथ तो हर तरह का छल तथाकथित अपनो ने किया ।

उस महाभारत में शरशैया पर पड़े भीष्म शायद अतीत में झांक कर तौल रहे थे सही और गलत और अंतिम उपदेश दे रहे थे पर इस महाभारत में तो अभिमन्यु घायल पड़ा है मन और आत्मा से और बस याद कर रहा है उस काले अध्याय को जिसने उसको घायल कर दिया है बुरी तरह की फिर से उठने लायक भी नहीं छोड़ा है ।

इस पुस्तक में अभिमन्यु की जिदंगी के बस कुछ अध्याय है बाकी आगे की पुस्तकों में आते रहेंगे । ये लिख इसलिए दिया गया की आगे शायद अन्य किसी को अभिमन्यु बनाने से बचा सके ।

राजनीति के बारे में कहा जाता है की ये धोखे का कारोबार है पर अभिमन्यु ऐसा नहीं जानता था ।समझौते भी नही करना जानता था अभिमन्यु और धंस गया राजनीति की कीचड़ में और वो भी धोखे को ही राजनीति समझने वालो के चंगुल में । कितना मुस्किल होता है किसी को बड़ा  बना कर उसके लिए समर्पित हो जाना और कितना आसान होता है अपना बना कर हर पल उसकी हत्या करते रहना ।

कितना आसान था अभिमन्यु के लिए किसी भी और काम में सफल हो जाना या उतनी मेहनत और पूंजी से कोई भी कारोबार खड़ा कर लेना ? उसके साथ के लोगो ने क्या क्या सफलताएं नही हासिल कर लिया बहुत कम प्रयास से पर राजनीति के धोखे ही किस्मत में लिखे हो और इतने बड़े कलाकारों से पाला पड़ जाए जो लगातार बहुत अपना बने रहे हो बड़ा भाई  बन कर और दिल में लगातार साजिश रही हो और जातिवादी घृणा तो कोई कर भी क्या सकता था । 

जी मै अभिमन्यु हूं और आजतक आखिरी चक्र से बाहर नहीं निकल पाया हूं और रोज हर वक्त प्रहार झेल रहा हूं  परायों से ज्यादा अपनो के बाणों का , पीठ पर तीर और तलवार का , धोखे का और छल का । फिर भी चला जा रहा हूं लगातार चक्रयुह की गोल परिधि में । न मेरा अंत हो रहा है और न राह मिल रही है चक्रव्यूह से बाहर जाने की और विजय तो बस दिवास्वप्न है । 

जिंदगी के झरोखे में से बस एक पात्र अभिमन्यु के इर्द गिर्द ही घूमेगी ये झरोखे की ये कहानी ।कहानी चाहे अभिमन्यु की है पर इस झरोखें में दिखलाई तो सब पड़ेगा ,देश काल ,घटनाएं और इस महाभारत के सारे पात्र ,उनका चरित्र । मैं नहीं कह सकता हूं कि यह झरोखे की कहानी संपूर्णता से प्रकाश डालती है इनमें सम्मिलित कहानी के पात्रों और समय पर ,पर राजनीति में प्रवेश के इच्छुक लोगों को आगाह भी कर सकती है ये कहानी और घटनाएं तथा पात्र मार्गदर्शन भी कर सकते है ।
राजनीति शामिल होने के इच्छुक या शामिल हो गए दोनों के लिए प्रकाश स्तंभ का काम कर सकती है ये पुस्तक । यदि आप की जाति की संख्या और कीमत है राजनीति में और कुछ मामलों में धर्म की भी तथा आप उस आबादी के बीच रहते है तभी आप राजनीति करिए वरना बस शौक के लिए कर रहे हो तो ठीक वरना समय की बर्बादी है ।यदि आप ठेके तथा दलाली के लिए राजनीती में आए है तो हर दल और हर नेता के यहां खास बन सकते है और पैसा कमा भी सकते है नेता को उसका भाग देकर लेकिन यदि ये सब आप को अनैतिक लगता है तो आप राजनीति के लिए बेकार है । हुस्न की भी बड़ी भूमिका है राजनीति क्या सब जगह और ये शॉर्ट कट है आगे बढ़ने का । यदि आप हा में हा मिला सकते है तथा आप का कोई स्वतंत्र विचार नहीं है तन कार्यकर्ता बन जाइए पर यदि आप भी कुछ सोच और समझ लेते है तो आप अयोग्य है । मौन रहना और बस पक्ष के हाथ उठा देना भी एक बड़ी योग्यता है साथ की अच्छी चापलूसी और विरोधियों की चुगली भी बड़े नेताओं को आनंदित करती है । खबरदार अगर आप को सच बोलने और ईमानदार रहने की बीमारी है तो राजनीति आपके लिए नहीं है । कही आप सिर्फ दिखावा करने के बजाय किसी सिद्धांत को चिमटे से भी छू मत लेना वरना नेता आप को चिमटे से भी नहीं छुएगा । नैतिकता इत्यादि राजनीति के बाद चाय के साथ सुड़कते के शब्द है । 
क्या आप अपने नेता और पार्टी से जबरदस्त छल कर सकते है तो फिर सफलताओं का पहाड़ आप के सामने होगा और सत्ता बदलती रहे पर आप सत्ता के स्थाई भाव बने रह सकते है ।
ये क्या मैं तो उपदेश देने लगा अनैतिकता का पर क्या करू काफी लोगों को बचा लेने की इच्छा के कारण ये सब लिख दिया है ।

इस पुस्तक में कोई प्रारंभ से बाद के काल का ध्यान बिल्कुल नहीं रखा गया है बल्कि जब जो टीस उठी कलम ने उसे कागज पर रच दिया । इसलिए पहले कि घटनाएं बाद में और बाद की घटनाएं पहले हो सकती है । जैसी है उसे स्वीकार किया जाए । ये झरोखे से झांक ताक का प्रारंभ है अंत किस संस्करण में होगा कह नहीं सकता । मैं कुछ एपिसोड " जिंदगी के झरोखे से " तथा कुछ एपिसोड " एक और अभिमन्यु " के नाम से लिखता रहा हूं पर पुस्तक का नाम हो सकता है कि कुछ और हो । जो भी हो उसे ही स्वीकार करिए ।

आइए इस अभिमन्यु के साथ समय के प्रवाह का आनंद लीजिए और महसूस करिए संघर्ष और काबिलियत के द्वंद को ।
समर्पित है ये उन सभी जाने पहचाने और अज्ञात हो किसी झरोखे में विलीन हो गए सभी राजनीतिक कार्यकर्ताओं को जो उठे और चले बड़े जोश में पर पता नहीं कहा कहा किस गर्दा गुबार ने उनको कही पीछे छोड़ दिया या ढक लिया अपनी क्रूर सच्चाई के नीचे । 

मैंने जीवन में उम्मीद कभी नहीं छोड़ी। उजाले की आस में अंधेरों से लड़ता रहा। बार- बार हताश हुआ लेकिन अपने भीतर बसी उम्मीद के उजाले ने कभी हारने नहीं दिया। साधारणतया लोग समझते हैं कि दिन हुआ, सूरज उगा तो उजाला हुआ मगर ऐसा होता नहीं । हमारे समाज में तो हमेशा रात का ही राज है। अंधेरा ही अंधेरा है। ऐसे अंधेरे से लड़ना आधी रात में सूरज उगाने का सपना देखने जैसा है। मैं लड़ता रहा हूँ, लड़ता रहूंगा। 





परिचय

डा चंद्र प्रकाश राय ( डा सी पी राय) का जन्म 1955 में आजमगढ़ के मध्य ग्राम में हुआ था । आपने एम ए ( राजनीति शास्त्र ),   एल एल बी,   स्नातकोत्तर डिप्लोमा ( समूह संचार ),   एम एड ,  पी एच डी ( राजनीति शास्त्र) , पी एच डी ( शिक्षा शास्त्र ) किया है । आप आगरा के बी आर अम्बेडकर विश्वविद्यालय में अध्यापक रहे है । छात्र जीवन से ही आप के लेख पत्र पत्रिकाओं में छपते रहे है । आप की एक शोध पुस्तक " संसद और विपक्ष " को संसदीय पुस्तक पुरस्कार मिल चुका है ।आप की " इतिहास के आईने में डा लोहिया" , "समाजवाद का क ख ग," तथा काव्य संग्रह " यथार्थ के आसपास " नमक पुस्तके प्रकाशित हो चुकी है । 
आप समाजवादी पार्टी के संस्थापक महामंत्री रहे है और उत्तर प्रदेश सरकार में दो बार राज्य मंत्री का दर्जा प्राप्त रहा है तो तीन बार इस दर्ज को ठुकरा कर भी चर्चा में रहे है । आप भारत सरकार द्वारा एक बार प्रतिष्ठित हैंडीक्राफ्ट बोर्ड ऑफ इंडिया के सदस्य मनोनीत किए गए और दो बार  टेलीफोन सलाहकार समिति के सदस्य माननीत किए गए ।
आप का विश्वास है की समाज और देश की विसंगतियों से कलम तथा कर्म से जूझना हर जागरूक नागरिक की जिम्मेदारी है । कलम को हथियार बना कर लड़ते रहना होगा ।