बुधवार, 30 जून 2021

बंगाल का सबक

बंगाल की राजनीति और इस चुनाव के सबक -

पहले बंगाल की बात , बंगाल का चुनाव राजनीति शास्त्र, समाजशास्त्र और मनोविज्ञान के लिये समन्वित रूप से अध्ययन और शोध का बहुत अच्छा विषय है ।इसका जितना सरलीकरण किया जा रहा है दर असल ये उतना ही पेचीदा है ।पहले 2019 का लोक सभा चुनाव जिसमे भाजपा 18 सीट पा गई ।दर असल वो भाजपा नही पायी बल्कि साम्यवादी पार्टियो के लोगो ने जितवा दिया क्योकी उनकी बड़ी दुश्मन ममता बनर्जी थी जिसने उनसे सत्ता और उनका सुख चैन छीना था । साम्यवादी नीचे का नेता और कार्यकर्ता भाजपा मे चला गया की ममता को कमजोर कर ले और राष्ट्रीय पार्टी जिसकी केंद्र मे सत्ता है उसमे रहने का भी लाभ मिलेगा तथा भाजपा यहा  जमीन पर है नही तो हम फिर वापस आ जायेगे  और बिल्कुल ही शुन्य भाजपा उतनी सीट पा गई ।
इस बार 140 से ज्यादा तृणमूल के लोगो को भाजपा ने टिकेट दे दिया और बड़ी संख्या मे उनके साथ वो स्थानीय नेता भी भाजपा मे आ गये जिनसे लडाई के कारण साम्यवादी भाजपा के साथ गये थे तो वो उस खाली जगह को भरने के लिये तृणमूल मे आ गये ।इस चुनाव मे तृणमूल का कुछ वो वोट जो उन नेताओ से जुडा था जो भाजपा मे गये और कुछ ऐसा वोट भी जो उत्तर प्रदेश बिहार और भाजपायी राज्यो की कहानी नही जानते और उनके जुमलो मे और आक्रमक प्रचार के प्रभाव मे आ गये और सोचा की एक बार भाजपा को भी देख ही ले इन वोटो ने भाजपा को ये सीटे जीता दिया ।
जबकी तृणमूल का अपना खुद का मजबूत आधार, अविवाहित बच्चियो और महिलाओ के लिये योजनाये , ममता की लोक प्रियता ,ममता का जुझारु तेवर जिसने मेरी निगाह मे  दिशा उसी दिन तय कर दिया था जिस दिन ममता ने मोदी जी के मंच पर ही उनके कार्यकर्ताओ की हरकत का विरोध कर बोलने से इंकार कर दिया था प्रोटेस्ट मे ,भाजपा का अहंकार और बंगाल को यू पी बिहार समझने की भूल ,साम्यवादी दलो का जीत के लिये आक्रमक न होना और कांग्रेस नेतृत्व का प्रारम्भिक लम्बे समय तक प्रचार से गायब रहने के कारण उसका वोट ममता की ऐतिहासिक जीत का कारण बना और साम्यवादी तथा कांग्रेस दोनो मे मारक नेतृत्व के अभाव ने उन्हे रसातल मे पहुचा दिया । मेरे इस चिंतन पर चिंतन कर बंगाल के चुनाव पर अध्ययन हो सकता है ।
मैं दो बाते मानता हूँ की यदि ये वोट की अदला बदली नही होती और कांग्रेस तथा साम्यवादी पूरी ताकत से प्रारंभ से ही लड़े होते तो भाजपा पुरानी स्थिति मे ही होती , कांग्रेस और साम्यवादीयो की बढत होती पर फिर भी ममता 170 से 180 सीट लाकर सरकार बनाती ।
दूसरा आरएसएस और भाजपा ने इस चुनाव मे अपने सारे शस्त्र प्रयोग कर लिये और बंगाल ने देख लिया ,बहुत सी बाते जिसके प्रचार मे आकर कुछ प्रतिशत ने भाजपा को वोट दिया अब उनकी बातो को कसौटी पर कसेगा इसलिए भाजपा की ये चरम स्थिति है और अब उसके लिये आगे कोई गुंजाइश नही है बशर्ते ममता इनसे सावधान रहे और इनके वत्सप ज्ञान और अफवाहो से बचा कर रखे और अपने नीचे काडर तथा तंत्र को सम्हाल कर रखे ।
समयावादियो को तो 50 के दशक की तरह फिर से शुरू करने की जरूरत है और अपनी पुरानी घिसी पिटी सोच और भारत के बजाय अमरीका और रुस चीन को देख कर कार्यक्रम और भाषण से बचना होगा ।
भाजपा को और आरएसएस को सबक है की पुराने जुमले और हथकंडे जितना चलना था चल चुके अब वो देश और समाज को ही खायेंगे और दुनिया बहुत आगे जा रही है अब 5000 साल पीछे देख कर भविष्य तय करना बंद करना होगा तो अपनी पुरानी सोच देश पर लादने से बाज आना होगा वर्ना ये लोग तो घरो मे घुस जायेंगे सरकार से बाहर होकर पर देश को बहुत भुगतना होगा । कश्मीर पर निर्णय के बाद लोक सभा मे गृह मंत्री का अहंकार पुर्ण बयान हमे कितना भारी पड गया ये कम से कम सत्ता चलाने वाले लोग तो जान ही गये ।मुस्लिम के सवाल पर अरब की राजकुमारी के मुखर होते ही वहा रहने वाले भारतीयो को क्या क्या भुगतना पड़ा और वहा से सिर्फ पेट्रोल नही बल्कि सबसे ज्यादा विदेशी मुद्रा भी आती है ।भारत के वहा के राजदूत से लेकर ऊपर तक लोगो को सफाई देनी पडी थी और भागवत जी को नयी थ्योरी देनी पडी की भारत मे पूरे 130 करोड लोग हिन्दू है जिनकी मान्यताये अलग अलग है ।अपनी खराब विदेश नीति से और सत्ता के मूल संगठन की हरकतो से हमने बहुत कुछ बिगाडा और बहुत कुछ खोया ।अभी हाल मे अचानक पाकिस्तान से प्रेम का व्यव्हार यूँ ही नही है और हमारे उच्च लोगो और उनके उच्च लोगो की लगातार बात हमारे और उनके लोगो की दुबई मे मुलाकात (ऐसा बताया जाता है ) सब यू ही नही है ।वर्ना तो मुसलमान और पकिस्तान ही संघ भाजपा इनकी भक्त मंडली और सुपारी मीडिया का दैनिक जीवन का हिस्सा बन गया था । अब विश्व राज नीति बदल रही है और अरब देश से लेकर तुर्की तक एक नयी धुरी बन रही है ।चीन से हमारे विवाद है ,लाल आंख का सवाल था ,साम्यवाद से घृणा के कारण सबसे विश्वसनीय दोस्त रुस के साथ अब वो रिश्ता नही रहा ,अमरीका व्यापारी है और कभी भी बहुत विश्वसनीय नही रहा, वर्तमान सत्ता समूह इस्राइल की तरफ झुका हुआ है पर इस्राइल खुद संकट मे है ,सारे पडोसी जो हमारे लिये छोटे भाई थे और हम पर आश्रित थे उनको हमने सामने खड़ा कर लिया ।
ऐसे मे उम्मीद सिर्फ अरब देशो की नयी धुरी से बचती है जो संघ के सोच और हरकतो से तो नही होने वाला है ।
कांग्रेस को तो लगातार सबक मिल रहे है और हर सबक पर चर्चा होती है कि अब बदलेगा सब ,चिंतन और मंथन होता है,वही पुरानी घिसी पिटी सोच के लोगो की चिंतन मंथन कमेटियां बनती है और फिर वो अपने ढर्रे पर ही चलती है  ।


बुधवार, 23 जून 2021

#जिन्दगी के झरोखे से मेनका की गालियां

जिंदगी_के_झरोखे_से--


मेनका गांधी की गालिया और नेता जी राज नारायणजी की शिक्षा --


 मेनका गांधी के बारे मे पढा की उन्होने किसी वेटनरी डाक्टर को भद्दी भद्दी गलियाँ दिया ।इस पर मुझे ये संभवतः 1981/82 का किस्सा याद आ गया ।
राज नारायणजी 6 तीन मूर्ती लेन मे रहते थे और सभी समाजवादीयो का दिल्ली जाने पर रहने सोने ही के साथ नहाने और हर वक्त खाने का ठिकाना यही घर होता था । राज नारायणजी के घर डबल बेड और सोफ़ा नही था । वो खुद नीचे जमीन पर ही बैठते थे और सोते थे । उनके कमरे के बाहर के कमरे मे पूरा इस दीवार से उस दीवार तक बिस्तर और चादर बिछा था । यही पर बीच मे बड़ी से प्लास्टिक बिछ जाती थी और वो दस्तरखान बन जाता था जिपर बैठ कर घर मे उस वक्त मौजूद सभी एक साथ खाना खाते थे और रात को सोने का बिस्तर । चूंकि ये घर संसद सदस्य मनीराम बागड़ी के नाम से था जो ज्यादातर हरियाणा मे या कही अपने घर पर रहते थे पर एक कमरा उनका बंद रहता था बेड वाला और सांसद को मिलने वाला फर्नीचर उस हिस्से मे रखा था ।बाहर के बड़े कमरे मे कुछ सोफे भी थी । राज नारायणजी के पास बाहर का छोटा ऑफिस वाला कमरा था , अन्दर का ये मल्टी पर्पस कमरा था ,जिसमे राज नारायणजी रहते थे दर असल वो साइड का बरामदा घेर कर बना हुआ कमरा था और बगल वाले कमरे का बाथरूम इससे जोड़ दिया गया था । बड़े कमरे के पीछे का एक कमरा था जो कर्मचारियो और जिनको बाहर जगह नही मिलती उनके सोने के काम आता ।पीछे एक बडा स्टोर था जिसमे आटा दाल सब्जिया इत्यादि भरी रहती थी कही कही से प्राप्त हुयी और उसके बगल मे रसोई तथा पीछे छोटा सा आंगन कपडे सूखने को ।
अक्सर हाल ये होता था की बाहर बागड़ी जी वाला ड्राइंग रूम भी पूरा भर जाता था ।
कितने भी लोग हो नेता जी की रसोई सबको खिला देती थी ।
बाहर गेट के ठीक सामने का गेराज क्रन्तिकारी और विद्वान युवा लोगो के कमरे मे तब्दील कर दिया गया था और बाहर तो बहुत बाल लांन था जो अच्छे खासे सम्मेलनो और प्रदर्शन की तैयारियो का गवाह बना ।
पर यहा बात मेनका गांधी के किस्से की ।
मैं जब भी राज नारायणजी के घर रहता वो कही मिलने जाते तो अक्सर मुझे भी ले जाते थे चाहे मोहन मिकिन्स के मालिक ब्रिगेडियर कपिल मोहन का घर हो या किसी भी और बड़े नेता का ।
उस दिन मेनका गांधी ने राज नारायणजी को सुबह नाश्ते के लिये बुलाया था । ये वो समय था जब मेनका गांधी इन्दिरा गाँधी जी के घर से बाहर निकल आई थी और राजनीति मे पैर रख चुकी थी जिसको राज नारायणजी जी का हर तरह सहारा प्राप्त था ।मेनका गांधी महारानी बाग मे अपनी मा के घर रह रही थी ।
नेता जी ने रात को ही बता दिया था कि सुबह कही चलना है तैयार हो जाइयेगा ।
सुबह हम दोनो उनकी कार मे रवाना हो गये ।महारानी बाग की एक अच्छी कोठी मे कार रुकी तो तुरंत मेनका गांधी राज नारायणजी की अगवानी करने बाहर आयी ।
हम लोग अंदर गये और एक भव्य ड्राइंग रूम जो अच्छी तरह सज़ा था मे बैठ गये जहा पानी आया । नेता जी ने मेनका गांधी से मेरा परिचय करवाया नाम बता कर बोले की ये हमारे परिवार के है और बहुत क्रांतिकारी युवा नेता है ,आने वाले समय मे मेरा नाम रोशन करेंगे (जो मैं नही कर सका क्योकी उतनी हिम्मत नही जुटा पाया और उतना त्यागी नही हो पाया ) । फिर टेबल पर आने का आग्रह हुआ । ड़ाइनिँग टेबल पर कटे हुये फल , अंकुरित चना इत्यादि , पाराठे दही , लस्सी , कुछ मिठाईयाँ , जलेबी ,ब्रेड जैम इत्यादि बहुत कुछ लगा था और आया जा रहा था । राज नारायणजी पूरे मन से नाश्ता करने लगे ।मैने भी नाश्ते मे इतनी चीजे पहली बार देखा था पर संकोच मे थोडा थोडा सब लिया और खाने लग गया  ।
तभी मेनका गांधी राजनीतिक बाते और कार्य योजना पर बाते करने लगी । वहा तक तो ठीक था पर अचानक एं टी रामाराव और बहुगुणा जी के बारे मे भद्दी कुछ बाते कह कर भद्दी गलिया देने लगी और फिर उनकी भाषा सतही स्तर पर उतर गयी
और वो भी क्रांतिकारी नेता राज नारायणजी के सामने जो मेरे लिये बर्दाश्त करना मुश्किल था क्योकी राज नारायणजी मेरे आदर्श भी थे और पारिवारिक बुजुर्ग भी ।
मेरा गुस्सा बढ रहा था पर नेता जी  ने भांप कर मुझे चुपचाप नाश्ता करने का इशारा किया । मेनका गांधी के घर से वापसी के लिये हम लोग गाडी मे बैठ गये जहा मेनका गांधी और उनकी मा ने विदा किया ।
गाडी मे बैठते ही मैने कहा की आप ने मेनका को डाँटा क्यो नही वो इतनी छोटी और आप के सामने बेलिहाज ऐसी गालिया दे रही थी इतने बड़े लोगो को ।
राज नारायणजी बोले की मेरा ध्यान नाश्ते मे था जिसके लिये उन्होने मुझे बुलाया था और आप का ध्यान उनकी बातो मे ।
जिस काम के लिये कही गये वही करना चाहिए ।
नाश्ता तो बहुत अच्छा था ।
मैने तो कोई गाली नही सुना ।
वाह लोकबंधु राज नारायणजी ( सुभाषचंद्र बोस के बाद और अजादी के बाद आचार्य नरेंद्र द्वारा दिये नाम के अनुसार असली "नेताजी "।
ये मेरे लिये एक शिक्षा थी ।

शनिवार, 12 जून 2021

#जिन्दगी_के_झरोखे_से जब #मुलायम_सिंह यादव जी और #मैं_दोनो_डर_के_मारे बिला वजह #हंस और #बोल रहे थे -

#यादो_के_झरोखे_से

जब #मुलायम_सिंह यादव जी और #मैं_दोनो_डर_के_मारे बिला वजह #हंस और #बोल रहे थे -
1991/92 का किस्सा है उत्तर प्रदेश पार्टी की प्रदेश कार्यकारणी की बैठक थी नैनीताल मे । फिल्मकार मुजफ्फर अली जो समाजवादी पार्टी के उम्मीदवार भी रह चुके है लखनऊ से उनका नैनीताल झील के पास पार्किंग से ऊपर सामने जा रहे रास्ते से चढ़ कर बहुत ही खूबसूरत बंगला है । मुजफ्फर अली ने पूरी कार्यकारिणी को अपने घर रात्रि भोज पर आमंत्रित किया था । 
हम लोग उत्तर प्रदेश भवन से नीचे उतर कर पार्किंग स्थल पर पहुचे और वही सामने ऊपर जा रहे रास्ते पर जाना था । वहा पार्किंग मे लोगो ने ऊपर चढ़ने के लिए घोड़े से चलने को कहा पर सारे लोगो ने घोड़े पर बैठने से मना कर दिया की ज्यादा दूर नही है पैदल ही चलेंगे ,पर मुलायम सिंह जी घोड़े पर बैठ गए और दूसरे घोड़े पर मैं भी । थोडी देर पहले ही बारिश हुई थी और सड़क भीगी हुई भी थी बल्की ऊपर से नीचे की तरफ पानी बह रहा था ।
पहाडी घोड़े पता नही क्यो खाई वाली तरफ के किनारे पर चलते है आज तक नही जान पाया और पूछ भी नही पाया ,अब पता लगाऊंगा ।
खैर हमारे घोड़े भी खाई के बिल्कुल किनारे पर चलने लगे और बाकी लोग पैदल । बिल्कुल किनारे पर चलते घोड़े पर हम दोनो की हालत खराब हो रही थी पर बीच मे उतर भी नही सकते थे ,समझा जा सकता है कारण और कुछ कह भी नही पा रहे थे तो दोनो ध्यान बटाने और डर पर काबू पाने के लिए कुछ बिला वजह बात करने लगे जोर जोर से बोल कर और उसी के साथ जोर से हंसने लगते 
और बाकी पैदल चलने वाले बिना जाने हमारी हालत और बाते यूँ ही हंसी मे साथ दे रहे थे ।
खैर किसी तरह मुजफ्फर अली का घर आ गया और उतरने का मौका मिला तो जान मे जान आई ।
मुलायम सिंह जी ने धीरे से पूछा सी पी राय डर लग रहा था न कि घोडा कही खाई की तरफ पैर फिसल गया तो ।
मैने कहा हा तभी तो हंस रहे थे और उनसे पूछा आप को ? जवाब वही था ।उतरते वक्त रकाबी मे फंस कर मेरे पजामे का नीचे पायचे का हिस्सा फट गया था ।
पर 
उसके बाद आनंद ही आनंद था । बढिया संस्कृतिक कार्यक्रम और बहुत ही दिव्य भोजन ।
और 
वापसी मे घोड़े पर बैठने की गलती हम दोनो ने नही किया कि खाने के बाद टहलना चाहिये ।
हा हा हा हा हा हा हा ।

रविवार, 16 मई 2021

इलाहबाद का संगम

#जिन्दगी_झरोखे_से --जब सुबह जगा कर एडीएम साहब #संगम ले गए थे --

उस दिन सुबह संगम के दृश्य । न जाने कितनी बार आया था #इलाहबाद पर उस दिन सुबह उठ कर उगते हुए सूर्य की किरणों के साथ संगम जाना और वहा दो नदियो या कहे की दो संस्कृतीयो और दो बहनो गंगा और यमुना का मिलन देखना सचमुच बहुत सुखद अनुभूति रही ।
एक दिन पहले कलक्टर साहब से बात हुई थी तो बोले की संगम गए है या नही और नही कहते ही उन्होने फरमान सुना दिया की सुबह तैयार रहियेगा फला एडिएम साहब संगम प्रेमी है वो  आप को ले जायेंगे । मैं सोचने लगा कि कहा मेरे मुह से नही निकल गया , क्या सचमुच इतनी सुबह आ जायेंगे एडीएम साहब , ना आये तो अच्छा । पर वही हुआ सुबह ही करीब 4,45 पर एडीएम साहब ने सर्किट हाऊस जो कलक्टर साहब जो मेरे मित्र थे उन्होने ही बुक करवाया था के मेरे कमरे का दरवाजा खटखटा दिया और फिर उनके साथ गाडी पर संगम जाना ही पडा ( किसी मुसीबत की तरह जो मेरे चेहरे पर साफ दिख रही है फोटो मे , पर वहा पहुच कर थोडी देर बाद एहसास हुआ की सचमुच मैं आज के पहले एक बहुत अच्छे अनुभव और मनोरम दृश्य से वंचित था ) जहा एक शायद सरकारी वोट तैयार थी और ए डी एम साहब के कोई नीचे वाले कोई कर्मचारी पहले से ही पहुच कर तैयारी किये हुये थे ।
खैर --
सूरज उग रहा था और उनकी किरणे गंगा और जमुना के हरे और सफ़ेद पानी को सुनहरा बना रही थी ।क्या मनोहारी दृश्य था और इतनी सुबह की आस्था का सैलाब उमड़ा हुआ था ।ना जाने कितनी नावो में भरे हुए लोग इस ठिठुरती ठण्ड की परवाह किये बिना आये हुए थे की बिलकुल संगम स्थल पर ही आचमन लेंगे या डुबकी लगाएंगे ताकि ,जो भी उनकी मनोकामना या इच्छा हो । बहुत बड़ी संख्या में चिड़ियों को झुण्ड भी चारो तरफ कलरव कर रहा था ।मैं पूछ नहीं पाया की ये चिड़ियाँ  यहाँ स्थायी रूप से मौजूद रहती है या जाड़े में सूदूर बर्फीले इलाके से साइबेरिया इत्यादि से आई हुयी है इस वक्त ।ये जानकारी कोई दे सके तो आभार व्यक्त करूँगा ।
मुझे उस दिन पहली बार पता लगा की संगम के किनारे का किला अकबर ने बनवाया था ।कही नहीं वर्णन आ पाया होगा मेरे अध्ययन में ।अब जानना पड़ेगा की अकबर ने संगम को किला बनवाने को क्यों चुना और हर बात में विवाद ढूँढने वाले लोग  इसमें कोई विवाद नहीं ढूढ़ पाये क्या ।इस पर बाद में अध्ययन करने पर लिखूंगा ।
मेरे दो संस्कृतियो पर बहस छिड़ सकती है क्योकि दोनों  एक ही इलाके में है और मिलन के बाद तो बस गंगा बचती है और विलीन हो जाती है उसमे यमुना , सरस्वती कहां से निकलती है और कब विलीन हो जाती है रहस्य ही बना हुआ है ।
हां तो संस्कृति पर बहस की बात मैंने जान बूझ कर छेड़ा है । यद्यपि यमुना का हरा जल कुछ साफ़ दीखता है यहाँ पता नहीं कैसे जबकि इसके पीछे यमुना पूरी तरह गन्दी दिखती है लेकिन इस हरे रंग के किनारे की संस्कृति कुछ अलग है और उसका खुलकर वर्णन कर दूंगा तो विवाद बढ़ जायेगा । पर इस दो संस्कृति का मेरा आशय और अनुभव भी क्या है कभी लिखूंगा जरूर ताकि मेरी समझ भी साफ़ हो सके । हो सकता मैं जो समझ रहा हूँ उसमे कुछ पेंच हो या मेरे ही मन में किन्ही लोगो या घटनाओ के कारण कुछ खराश हो ।
गंगा का पानी सफ़ेद और कुछ मटमैला दीखता है संगम पर पर गंगा का किनारा पकडे हुए संस्कृति मटमैली नहीं दिखती ।
बताया गया की संगम पर गंगा और यमुना में भी एक युद्ध चलता रहता है । मैं कहूँगा की दो बहनो की आपसी अठखेली होती है या छेड़छाड़ । पर संस्कृति की बड़प्पन की लड़ाई भी हो सकती है ।
कभी गंगा यमुना को पीछे धकेल देती है तो कभी यमुना गंगा को, पर ये पता नहीं चलता की इस लड़ाई में सरस्वती की भूमिका क्या रहती है , तटस्थ एम्पायर या रेफरी की या बस मजा लेते हुए तीसरे व्यक्ति की ।
पर ये सच्चाई तो कबूल करना ही पड़ेगा की अंत में जीत जाती है गंगा और विलीन हो जाता है उसमे सब कुछ , अस्तित्व , संस्कृति , रंग , स्वाद और दोनों नदिया और फिर हथिनी की चाल से गौर्वान्वित चलने लगती है और गंगा भी विलीन हो जाने के लिए अपने से भी बड़े अस्तित्व में ताकि जीवन , मरण और फिर जीवन का चक्र पूरा हो सके ।
फिर समुद्र से भाप बन कर उड़ता है नया जीवन और नई तरह के जीवन बरस पड़ते है उससे जो फिर कही ताल तलैया , तो अलग अलग क्षेत्र में कोई गंगा , कोई यमुना , कोई राप्ती और कोई सरयू जैसा जीवन पाकर चलती रहे ताकि जीवो का जीवन चलता रहे ।
शायद मैं दर्शन से दर्शन की तरफ चला गया ।पर मुझे याद नहीं की इससे पहले उगता हुआ सूरज कब देखा था ।शायद जब कन्याकुमारी गया था नेता जी के साथ ।
इस सब दृश्य के बीच मोटर बोट मंथर गति से नदियो का सीना चीरती हुयी चली जा रही थी और वहां ले जाने वाले साथी वहां के बारे में , ऐतिहासिकता के बारे में और पुण्य के बारे में वर्णन करते जा रहे थे ।उन्होने आज बताया की यदि संगम नहीं आये तो सब तीर्थ बेकार है तो मन में बरबस आ गया की मैं तो कभी किसी मंदिर ही नहीं गया तीर्थ तो बड़ी बात है ,और तब तो यहाँ आकर भी मैं पुण्य का भागी नहीं बन पाया । वैसे ही शीत प्रकृति के कारण डुबकी लगाने का मतलब कुछ दिनों डॉ0 मित्रो की सेवा में रहना हो जाता पर दृश्य सचमुच ऐसा की मैं लिखे बिना नहीं रह सकता था । शायद ऐसे दृश्य ही लोगों को अपनी तरफ खींचते है और यही खिंचाव आस्था बन जाती है । अब तो साधन हो गए पर जब साधन नहीं रहे होंगे तब जो विलीन हो जाते होंगे इन दृश्यों के आगोश में वो स्वर्ग में जाने वाले और ईश्वर के बुलावे वाले वर्ग में शामिल हो जाते होंगे और जो वापस चले जाते होंगे घर वो ईश्वर की और संगम की कृपा से बच जाने वाले वर्ग में शामिल हो जाते होंगे और इसकी विषद व्याख्या अपने अपने जजमानों को सुनाने वालो की भी काफी तादात होती ही है ।
पर पुण्य मिले या न मिले क्योकि अभी तक कोई प्रमाणिक दस्तवेज और अध्ययन नहीं है जो साबित कर सके की पुण्य क्या है और किस किस को मिला तो क्यों और कैसे मिला और संगम में गहरी डुबकी मार कर भी जिन्हें नहीं मिला क्यों नहीं मिला ।
संगम पर ही जिंदगी जीने वाले मछुवारे ,नाव चलाने वाले और रोज नित्यकर्म से लेकर यही नहाने वाले तो पुण्य से मालामाल हो गए होंगे तो उनके जीवन में क्या विशेष है ये अध्ययन का विषय हो सकता है और शायद शोध से कुछ जानकारी मिले । फिर भी करोडो की आस्था का केंद्र है संगम तभी तो इतने कष्ट सह कर करोडो लोग यहाँ कल्पवास करते है और डुबकी लगाते है । आस्थाएं शायद लोगो को अतिरिक्त ताकत देती और भरपूर ऊर्जा भी ।
जी हां पुण्य मिले या न मिले पर उसी संगम के दर्शन कर लिए आज मैंने भी इतनी सुबह जाकर और इस सुबह जाने की मानसिकता और दबाव में पूरी रात नहीं सोकर तो इस कष्ट के लिए कुछ तो मिलेगा ही ।
पर ये सुबह का दृश्य की किसी भी मायने में कन्याकुमारी के सुबह के दृश्य से पीछे नहीं है और इसे सैलानियो को आकर्षित करने के लिए प्रचारित किया जा सकता था । उस दिन मुझे एहसास हुआ की मेरा प्रदेश किस कदर सुस्त ,दिशाहीन और संकल्पहीन है की राजस्थान अपनी रेट की मार्केटिंग कर लेता है ,कश्मीर , शिमला और अन्य अपनी बर्फ और ठंड, तमिलनाडु कन्याकुमारी का सूर्योदय जो ज्यादातर दिखता ही नही बादलो के कारण इसलिए कह रहा हूँ की जब मैं गया था मुलायम सिंह यादव के दौर मे  कन्याकुमारी तब रात भर जगा बैठा रहा बाल्कनी मे की कही सोता न रह जाउँ और सुबह बस हो गई बादलो मे छुपी हुई ,केरल से लेकर महाराष्ट्र तक समुद्र का किनारा ,तो चेरापूंजी अपनी बारिश और हरियाली ,भूटान सिक्किम मेघालय अरुणाचल अपने पहाड़ और दृश्य तो अमरीका तो बस यू ही किसी भी चीज पर मोटा टिकेट लगा कमा रहा है तो क्या चीज नही है उत्तर प्रदेश मे , साथ ही बिहार और मध्यप्रदेश इत्यादि मे भी , बस सैलानियो के लिए सुरक्षा का भाव अपराधियो और शोहदो से और पुलिस की लूट तथा कमाई के लिए परेशान करने वाली प्रवृति से , और अभाव है मार्केटिंग के लिए भाव , समर्पण ,इरादा और व्यव्स्था की ।
ले दे कर एक ताज महल, या बनारस का घाट भी कुछ लोगो को आकर्षित करता है ।
चलिये इस मुद्दे पर विस्तार से फिर कभी ।
बोलो गंगा मैया की जय (क्योकि जय केवल विजेता और शक्तिशाली की ही बोलने की परम्परा है तो मैं भी इस परम्परा को क्यों तोडू )।

संघर्ष के प्रतीक एक राजनीतिक फकीर राज नारायणजी

संघर्ष को समर्पित एक राजनीतिक कबीर की फकीरी जिंदगी का नाम था ; लोकबन्धु राजनारायण 

 

हमें नफरत नहीं थी अंग्रेजो की कौम औ सूरत से ,हमें नफरत थी तो उनके अन्दाजे हुकूमत से 

गर अपनों की हुकूमत अपनी खातिर हो नहीं सकती तो अपनों की भी सूरत से मोहब्बत हो नहीं सकती | 

 

लोकबन्धु राजनारायण के लिए ये चा र पंक्तियां दिशा निर्देशक का काम करती थी | तभी तो जहा देश की स्वतंत्रता के लिए नेता जी कुल चार बार जेल गए वाही आज़ादी के बाद अपनों के शासन में कुल करीब १५ वर्ष जेल में बिताए | जब भी जहा भी उनको जनता का कष्ट दिखलाई पड़ता या आज़ादी के सपनो का खून होता दिखलाई पड़ता वही वो आन्दोलन का शंख बजा देते थे |

आज़ादी की लड़ाई से लेकर आपातकाल उनके संघर्ष की कहनियाँ ही पसरी हुयी है भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में |अगर हर आन्दोलन का तारीखवार वर्णन करूँगा और विस्तार में जाऊँगा तो किताब बन जाएगी इसलिए बस इशारतन ही जिक्र करूँगा यहाँ | वो मजदूरों का आन्दोलन हो उत्तर प्रदेश से लेकर आसनसोल तक जहा उन्होंने नक्सलवादियो का किला तोड़ते हुए समाजवादी संगठन खड़ा कर दिया था मजदूरों का | वो किसानो का आन्दोलन हो अदलपुरा से लेकर अरदाया तक या लखनऊ की धरती पर विशाल प्रदर्शन जिसमे ; किसान जागा पन्त भागा ; के नारे लगे थे ,वह किसान आन्दोलन रहा हो जिसमे राजनारायण जी को बुरी तरह पीट कर बंद कर दिया गया और आचार्य नरेन्द्र देव की मध्यस्थता से समझौता हुआ | १९५३ में गोरखपुर में रेल मजदूरों पर गोली चलने के खिलाफ आन्दोलन हो ,१९५४ में नहर के पानी का रेट बढ़ने पर आन्दोलन हो ,मिर्जापुर में मजदूर आन्दोलन हो ,५५ में गोरखपुर हो या या लखनऊ का छात्र आन्दोलन ,;;और बहुत महत्वपूर्ण १९५६ में जब वो हजारो हरिजनों को लेकर कशी विश्वनाथ मंदिर में घुस गए थे और तब संघियों ने तथा फासिस्ट ताकतों ने न सिर्फ हरिजनो के मदिर प्रवेश का विरोध किया बल्कि राजनारायण जी पर घटक हमला भी कर दिया था | १९५७ के सिबिल नाफ़रमानी आन्दोलन के संचालक बने ,बिक्रीकर के खिलाफ आन्दोलन ,बिहार में सोशलिस्ट पार्टी के आन्दोलन का सञ्चालन ,;;; स्वतंत्र भारत में जगह जगह लगी अंग्रेजो की मूर्ती तोड़ने पर गिरफ्तार हुए और स्वतंत्र भारत की सरकार में इसके लिए १९ महीने की सजा और ४०० रूपये का जुरमाना हुआ वाही से मूर्ती भंजन प्रथा शुरू हुयी तथा सरकार को बाध्य होकर सभी अंग्रेजो की मूर्तियाँ हटानी पड़ी और काशी में किंग एडवर्ड अस्पताल का नाम बदल कर शिवप्रसाद गुप्त अस्पताल हुआ ,१९५८ में खाद्य आन्दोलन ,और सम्पूनानन्द की सरकार में समितियों का बहिष्कार का फैसला ,१९६० में रास्त्रव्यापी आन्दोलन के संचालक बनाये गए ..देश भर में घूम घूम कर आन्दोलन ,लाल बहदुर शास्त्री के निवास पर पर्दर्शन जैसे हजारो आन्दोलन और उसमे सिद्धांत के साथ साथ अपने शरीर को विरोध का इस कदर हथियार बना देना की तमाम बार की पिटाई से पैर टूटे ,सर टूटा ,और जेलों में रहते रहते तमाम बीमारियों ने पकड़ लिया | 

पहले लखनऊ रेलवे स्टेशन पर रिक्शा नहीं जा सकता था तो एक दिन राजनारायण जी वही विरोध पर अड़ गए ,,धीरे धीरे बड़ी संख्या में जनता एकत्र हो गयी तो मजबूर होकर रिक्शा जाने की इजाजत देनी पड़ी | ऐसा ही एक दिन उन्होंने राजभवन पर भी किया और उनका रिक्शा अन्दर गया | 

वो चाहते तो जातिगत आधार पर सुरक्षित स्थान पर चुनाव लड़ कर हमेशा सासद रह सकते थे पर जैसे डॉ लोहिया ने कहा था नेहरु जी के खिलाफ चुनाव लड़ते हुए की मैं जनता हूँ की मैं पहाड़ से टकरा रहा हूँ और उसे गिरा नहीं सकता पर उसमे दरार पैदा कर कमजोर तो कर ही सकता हूँ ,,उन्ही के रस्ते पर चल कर अजेय ताकत बन गयी कांग्रेस और बलशाली नेता इंदिरा गाँधी के खिलाफ वो चुनाव लडे और ये भी इतिहास है की उनको कोर्ट में भी हराया और फिर वोट में भी हराया | उनका संघर्ष ही था की बहुत बड़ी संख्या में गर्रीब परिवारों के लोग जिन्होंने अपने शहर नहीं देखे थे वो प्रदेश और देश की राजधानियों में पहुंचे और स्थापित हुए | 

एक बार जब संसद में नेहरु मंत्रिमंडल की मंत्री तारकेश्वरी सिन्हा ने डॉ लोहिया से कहा की क्या आप पागलो को साथ लेकर घुमते है तो डॉ लोहिया नाराज हो गए और कहा की तारकेश्वरी अगर मुझे कुछ और राजनारायण मिल जाये तो मैं देश को बदल दूंगा और तुम लोगो को भी बेदखला कर दूंगा | इसी प्रकार एक मौके पर आचार्य नरेन्द्र देव विदेश जा रहे थे तो उस वक्त के आन्दोलन के बारे में पुछा गया की कैसे चलेगा तो आचार्य जी ने कहा की उसे नेता जी चलाएंगे और उनके नामकरण के बाद से राजनारायण जी को नेताजी कहा जाने लगा | 

जब राजनारायण जी केंद्र में स्वस्थ्य मंत्री बने तो उन्होंने परिभाषा ही बदल दिया और जमीन पर बैठना तथा बिना ए सी के रहना और उस समय रूस के अखबार प्रावदा ने लिखा की हिंदुस्तान में एक ही मंत्री है जो जन का मंत्री है और समाजवादी फैसले कर रहा है | राजारायण जी ने चालित अस्पताल चलाये थे की वो गाँवो में जाकर गरीबो का इलाज करेंगे और बेयर फुट डाक्टर के नाम पर उस समय १५ लाख लोगो को नौकरी दे दिया था | पर आर एस एस की कुटिल चलो को देख कर वो विचलित हो गए तथा जिस तरह किसानो और गरीबो के मुख्यमन्त्रियो के खिलाफ साजिश हो रही थी उस पर वो मुखर हो गये तथा तत्कालीन जनसंघ के लोगो की दोहरी सदस्यता के सवाल पर सरकार टूट गयी | 

उन्होंने किसानो की लडाई लड़ने वाले किसान नेता चौ चरण सिंह को प्रधानमंत्री बनाने का सपना देखा तो फिर उसे पूरा कर के ही रहे | एक दौर था जब देश का प्रधानमंत्री ,प्रदेशो के मुख्यमंत्री उन्होंने बनाये बिगाड़े पर खुद उनका परिवार कहा है | मनीराम बागड़ी ने एक दिन जब ज्यादातर लोग साथ छोड़ गए थे तथा पार्टी ख़त्म जैसी हो गयी थी राजनारायण जी का नगर निगम में क्लर्क बेटा आया हुआ था ,कहा की पार्टी का काम तो अब कुछ रहा नहीं इसलिए टाइप राईटर और फोटोस्टेट मशीन इसे दे दे ये अपने बच्चो के लिए कुछ कम लेगा इन मशीनों से तो उन्होंने जवाब दिया की पार्टी का है पार्टी कोष में पैसा जमा कर दे और ले जाये जबकि दूसरी तरफ एक प्रमुख नेत्री ने बताया की आज ही अचानक उनकी बेटी के लिए एक लड़का मिल गया है जो दो दिन बाद ही विदेश चला जायेगा तो उसी राजनारायण जी ने उनकी शादी की पूरी व्यवस्था कर दिया | 

उनके साथ रहने पर न तो किसी पद की जरूरत महसूस हुयी और न कही किसी से डर लगा | ८० में एक दिन मैं छात्र आन्दोलन में लाठीचार्ज के बाद गिरफ्तार हो गया पता नहीं उन्हें कहा से पता चला दूसरे ही दिन सुबह दिल्ली से चल कर और पूरे प्रशासन के साथ वो आगरा की जेल थे | जब मेरी शादी की पार्टी थी उसी दिन उनके परिवार में भी और उन्हें १०० से ज्यादा बुखार था पर वो मेरी शादी में हाजिर थे ..उससे भी जायदा तो तब हुआ जब मेरी बेटी पैदा हुयी और कुछ कार्यक्रम था उसी दिन उन्होंने बिहार के दो पूर्व मुख्यमन्त्रियो कर्पूरी ठाकुर और सत्येन्द्र नारायण सिन्हा को दिल्ली बुलाया था उनका विवाद निपटाने को और मुझे मना कर दिया था आने को पर अचानक सभी को साथ लिए हुए घर पर आ खड़े हुए | जब केंद्र में मंत्री भी थे तो अचानक जब घर आ जाते थे तब पता लगता था | ये थी इतनी बड़े नेता की खासियत | 

मानवीय पक्ष और राजनीती की ऊँचाइयाँ तथा रिश्ते भी उनसे सीखे जा सकते है ,एक दिन थोडी से परेशानी पर तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा जी पैदल तीन मूर्ती लेन वाले घर आ गयी तो इंदिरा जी और संजय गाँधी के निधन पर मैंने उन्हें बिलखते देखा | ऐसा क्या कहा था उन्होंने संजय गाँधी से की उसी दिन से वो सड़क पर संघर्ष करने वाला हो गया | लोगो की चुगली और कान भरने से चरण सिंह से दूरी हो गयी थी पर मैंने उन्हें उनके लिये परेशां रहते हुए देखा | जनेश्वर जी और ब्रजभूषण तिवारी साथ छोड़ गए थे पर चुनाव में मैंने उनकी सहायता करते और जीत की कामना करते हुए देखा था | 

वो चाहे कितने भी कमजोर हो गए हो पर जीतनी भीड़ उनके आसपास रहती थी वो मंत्रियो के यहाँ भी नहीं होती थी | देश के सभी बड़े नेता डालो की सीमाए तोड़ कर उनसे मिलने आते थे तथा सलाह करते थे | ये बताना भी समीचीन होगा की जब चंद्रशेखर जी भारत यात्रा कर रहे थे तो उन्होंने ये रहस्य खोला की यदि राजनारायण जी उनकी जिंदगी में नहीं आये होते काशी तो वो तो नौकरी करना चाहते थे पर राजनारायण जी उन्हें राजनीती में ले आये |एक दिन देश के सात ७ बड़े नेता बैठे थे नेता जी के यहाँ और खिचड़ी तथा लिट्टी चोखा खा रहे थे उस दिन नेता जी ने बड़ी वेदना से कहा की यह दें देखने को मैं क्यों जीवित हूँ जब सत्ता मदांध है और विपक्ष रश्म अदायगी कर रहा है | क्या कानून की पढाई राजनारायण को पढ़े बिना पूरी हो सकती है क्या लोकतंत्र में विपक्ष को मायने देने वाले योद्धा को याद किया बिना लोकतंत्र को जिन्दा रखा जा सकता है | 

आज जब सत्ता तथा उससे जुड़े लोगो की भाव भंगिमा ,बोल और कदमो से लोकतंत्र की हत्या होने और फासीवाद स्थापित करने के इरादे की बू आ रही है तो आज जरूरत है एक राजनारायण की और आज के दौर में दूर दूर तक वैसा कोई नही दिख रहा है | समाजवादी आन्दोलन अगर गाँधी के विचार ,लोहिया की हुंकार ,जयप्रकाश की सम्पूर्ण क्रांति और राजनारायण के सतत और निरपेक्ष संघर्ष कर्पूरी ठाकुर रामसेवक यादव जैसे लोगो की सादगी को अपना हथियार बनाएगा तभी देश के लिए सपने देखे गए वो पूरे होंगे और राजनारायण जी को सच्ची श्रधान्जली होगी |