मंगलवार, 4 मई 2021

#आपदा मे अवसर गिद्धो और इन्सानो को कोरोना काल

आपदा में अवसर गिद्धों के लिए भी मनुष्यों के लिए भी —-

ऐसे समय में जब सिख समुदाय , सारे गुरुद्वारे , बहुत सी मस्जिदें और मुस्लिम संगठन अपनी क्षमता अनुसार सचमुच इस आपदा में लोगों की मदद कर रहे है 
बहुत से संगठन और लोग व्यक्तिगत रूप से भी लोगों की मदद करने का प्रयास कर रहे है जिनमें सबसे बड़ी संख्या उन लोगो की है जिनका मीडिया या सोशल मीडिया में कोई ज़िक्र नही होता या वो करना नही चाहते है । पिछले लाक डाउन में भी सबको याद होगा ऐसे लोग जो तमाम सामान सड़क के किनारे रख कर जाकर दूसरी तरफ़ गाड़ियों में बैठ गए थे और अपने हाथ से देने में परहेज़ किया । वो ऑटो बाला अपनी सामर्थ्य भर केले बाँट रहा था और बहुत से परिवार जितना सम्भव था उतना पानी खाना और फल तथा नंगे पैर वालों को चप्पले दे रहे थे । पूरा ग्रंथ लिखा जा सकता है पूरे देश के लोगों पर और समाज पर ।
आगरा के नज़ीर अहमद ने पहला एक करोड़ रुपया अपनी तरफ़ से दिया और फिर पूरन डावर , भुट्टो जैसे तमाम लोग जुड़ने लगे और ग़रीबो की मदद के लिए सामान बटने लगा ऐसा पूरे देश में हुआ और इसी ने शाकर का काम किया वरना भूखी भीड़ पूरे देश की सड़क पर होती तो पता नही क्या होता , मुझे याद है एक घटना जब राशन की दुकान पर किसी व्यक्ति को एक सिपाही ने डंडा मार दिया तो लोगों ने दौड़ा लिया था , क्योंकि सरकार और सिस्टम तो कब चीजें ख़त्म होने को हों या स्थिर हो चुकी हो तब जागता है और फ़ैसले लेता है ।
पिछले लोक डाउन में भी सब कुछ चल सका क्योंकि समाज खड़ा हो गया 
ऐसे में एक संगठन आर एस एस है जो सिर्फ़ फ़ोटो सेशन करता है कही झाड़ू लगाते तो कही कुछ बाटते जैसे पुलिस के लोग दिन भर लट्ठ चलाते है तो छवि सुधार के लिए कुछ फ़ोटो वाले काम भी कर लेते है । 
ख़ुद भाजपा और आर एस एस के तमाम लोग दवाई और आकसीजन की मदद माँगते मर गए पर ये संगठन ने उनकी ही मदद नही कर पाया तो और किसकी कर रहा होगा । 
हा ये फ़ोटो सेशन पूरी साफ़ सुथरी वर्दी में ही करते है । मुझे याद है वो घटना जब मैं किसी को छोड़ने आगरा के राजामंडी स्टेशन गया था ।वहाँ साथ पढ़ने वाले कुछ लड़के मिल गए और साथ खड़े होकर बात करने लगे । तभी दूसरी तरफ़ से सीधे बिना रुके जाने वाली ट्रेन खड़ी ट्रेन से टकरा गयी क्योंकि पटती की कैंची बदलने वाले से गलतीं हो गयी थी । रफ़्तार से टक्कर के कारण डिब्बे डिब्बे में घुस गए और चारों तरफ़ बस चीख पुकार थी । अचानक मेरे साथ खड़े संघी लड़के ग़ायब हो गए । स्टेशन के ठीक पीछे मुस्लिम बस्ती है और वहाँ लोहे का तथा बेल्डिंग का काम होता है ।मिनटों में वो सब अपने अपने गैस कटर , हथौड़े इत्यादि लेकर आ गए पचासों की संख्या में और डिब्बों में काट कर जगह बना कर लोगों  निकालने की कोशिश करने लगे । स्टेशन पर मौजूद हम ही नही जो  भी था सब जो भी हो सकता था करने लगा और जिसे मैं छोड़ने गया था उन्होंने भी दूसरी पटती पर आयी ट्रेन छोड़ दिया  की मैं डाक्टर हूँ अभी यहाँ मेरी ज़रूरत है । क़रीब आधे घंटे वो संघी लड़के फिर आए और कपड़े बदल कर अपनी नेकर वाली वर्दी में और साथ में एक फ़ोटोग्राफ़र भी था । 

अगर किसी कालोनी या अपार्टमेंट की तरफ़ से कोई मदद हो रही है तो उसमें भी जो संघी होता है वो वर्दी पहन कर जाता है और एक दो को बुला लेता है और उस पूरी कालोनी के काम को संघ के खाते में दर्द कर देता है ज़ैसे नौकरशाही भी इन मामलों में करती है और बिल बना देती है । 
हा केवल एक राजनीतिक संगठन है कांग्रेस जिसके युवा दिन रात लोगों की मदद कर रहे है यहाँ तक की भाजपा और आर एस एस के लोग भी मुसीबत में उन्हीसे मदद माँग रहे है , पूरी संघी मीडिया भी उन्ही से मदद माँग रही है और दिल्ली में केंद्र सरकार की नाक के नीचे विदेशी दूतावास भी उन्ही से मदद माँग रहे है ।
महान है मेरा देश कहा एक तरफ़ व्यापारी लुटेरे छोटे हो या बड़े इस आपदा में भी जमाख़ोरी और ज़बरदस्त मुनाफ़ाख़ोरी , कालाबाज़ारी करने में लगे है और इन व्यापारियों में ९५% किस संगठन के है ये कोई रहस्य नही है वही दूसरी तरफ़ इसी समाज के आम लोग फ़रिश्ता बने हुए है और धर्म स्थलों में गुरुद्वारे तो देश का पूरी दुनिया सेवा के लिए समर्पित है और पूरी सिख क़ौम तो बड़ी संख्या में मुस्लिम भी और इन्हीं को देखर ये ख़ास वर्दी वाला अब फूल पैंट संगठन भी फ़ोटो सेशन कर ले रहा है ताकि कल शर्मिंदा ना करे लोग । आत्मचितन करो संघियों।

चुनाव के सबक 3

क्या चुनावो से कांग्रेस सबक लेगी ? 

एक इन्दिरा गाँधी थी वही जिनसे आरएसएस के चीफ और लाखो सन्घियो ने माफी मांगा था ,वही जो दुनिया के 120 देशो की नेता थी नान एलायन मूवमेंट संगठन के कारण और फिर भी रुस सच्चा दोस्त था पर दुश्मन भी कोई नही था,वही जिन्होने 1974 मे परमाणु विस्फोट कर दुनिया को चौंकाया था और चौंकाया तो सिक्किम के विलय से ,पाकिस्तान के दो टुकडे कर नया देश बंगला देश बना कर और अमरीका की धमकी और सातवे बड़े को हुह कह कर परवाह ना करने के कारण ।ऐसा बहुत कुछ है जो एक  किताब बन जायेगी ।
उनके घर के बाहर सिर्फ एक सिपाही खड़ा होता था जैसा छोटे छोटे अफसरो के यहाँ भी होता है पर रोज सुबह 9 बजे उनका बाहरी दरवाजा खुल जाता था और जितने लोग मिलना चाहते थे सब अन्दर जाते थे बिना भय और लिहाज के और अंदर जाने के लिये नेता होना जरूरी नही था ,कांग्रेसी होना जरूरी नही था ,मिलने का समय तय होना जरूरी नही था और किसी की पहचान भी जरूरी नही थी । इसलिए वो इन्दिरा गांधी थी पर आज की कांग्रेस डब्बे मे बंद ,।
आज की कांग्रेस जिसे लगातार सबक मिल रहे है और हर सबक पर चर्चा होती है कि अब बदलेगा सब ,चिंतन और मंथन होता है,वही पुरानी घिसी पिटी सोच के लोगो की चिंतन मंथन कमेटियां बनती है और फिर वो अपने ढर्रे पर ही चलती है  ।
कांग्रेस मे जितने नाम वाले नेता है और जितने अनुभवी है उतने सब दलो मे मिलाकर भी नही है पर लम्बी सत्ता के कारण जहा अहंकार से ग्रस्त है वही जंग भी लग गई है और अपनी पूरी ऊर्जा तथा ज्ञान विरोधी को परास्त करने मे इस्तेमाल करने के बजाय पार्टी के अन्दर ही खर्च कर देते है ।
इधर कांग्रेस सिर्फ वहां जीतती है जहा कोई स्थानीय नेता बड़े कद का हो और जनता उसे अपना नेता समझती हो और वहां कांग्रेस तथा दूसरे दल की सीधी लडाई है तथा नेता अधिक समय प्रदेश के लोगो के बीच मे देता हो ,शर्त ये भी है की वहा कोई तीसरी शक्ती खडी न हो रही हो क्योकी तीसरी शक्ती को देखते ही कांग्रेस के नेता उससे अन्दर से हाथ मिला लेते है की उनकी सीट किसी तरह बच जाये और बदले मे वो तीसरी शक्ती की इच्छानुसार उसकी मदद करते है पार्टी की पीठ मे छुरा घोप कर और नेतृत्व को भी मजबूर करते है की तीसरी शक्ती से बना कर चलना फायदेमंद होगा । कांग्रेस गठबंधन धर्म मे भी अक्सर फ़ेल हो जाती है ।
गोवा जैसे प्रदेशो मे सरकार गवा देना इसके नेताओ की अदूरदर्शीता तथा अहंकार दर्शाता है तो कर्नाटक और मध्य प्रदेश की आई सरकार गवा देना अहंकार और अव्य्हारिक राजनीति की निशानी है । राजस्थान बाल बाल बच गया पर पाइलट की अभी भी उपेक्षा समझ से बाहर है ।पंडीचेरी मे मात्र 16 विधायक भी सम्हाल कर न रख पाने वाला नेता तो नही हो सकता है ।
ममता ही जब कांग्रेस मे थी तो नेतृत्व से मिलने को तरस जाती थी और बाहर जाकर सबको परास्त कर तीन बार सरकार बना उन्होने सिद्ध कर दिया की सचमुच की नेता वो थी जिनकी उपेक्षा हुयी जगन मोहन रेड्डी भी खुशी से नही बल्कि अपमानित होकर गये और सच्चे नेता साबित हुये ।असम के शर्मा से लेकर लम्बी फेहरिश्त जो चक्कर काटते रहे की नेत्रत्व मिल कर बात सुन ले पर नही मिल पाये ।ममता जी ने एक बार किसी से दर्द बयान किया था तो ये भी कहा था की पहले जो लोग संमय माँगने पर कहते थे टॉक टू  जोर्ज , टॉक टू माधवन अब मिलने का इन्तजार करते है ,क्या हम लोग चपरासीयो और बाबुओ के यहा हज़िरी लगाने को नेता बने है ।कांग्रेस मे चंद को छोड कोई ये दावा नही कर सकता की वो नेत्रत्व से जरूरत पर मिल सकता है या उसकी कोई जायज बात मानी जायेगी ।
एक काल्पनिक स्वरूप का शिकार है कांग्रेस की बिना परिवार के जिन्दा नही रहेगी और न जितेगी तो नरसिंहा राव के समय कैसे चली ? जगजीवन राम ,बरुवा से लेकर शंकर दयाल शर्मा तक कैसे चली और जमीन पर शुन्य न शक्ल न आवाज उस सीताराम केसरी के समय भी शायद 116 सीट जीत गई थी दूसरी तरफ पूरा परिवार मिल कर भी अमेठी की अपनी ही सीट नही बचा पाया तो रायबरेली और अमेठी की अपनी नीचे की विधान सभा सीट नही जीता पाता ।सारे प्रचार के बावजूद सब जगह हार केवल वहाँ जीत जहा स्थानीय नेता मजबूत है और प्रदेश मे जुडा है ।नेत्रत्व अपने खास लोगो को भी पार्टी मे रोक नही पाता है और अगर उसकी चलती तो पंजाब मे अमरेंद्र सिंह शायद बाहर होते और हरियाणा मे हुडा भी फिर इन प्रदेशो मे भी क्या होता ।
मान लीजिए किन्ही नेताओ ने सवाल खड़ा किया तो क्या उन 23 और और भी लोगो को 6 महीने पहले से इन प्रदेशो की जिम्मेदारी नही देनी चाहिए थी उल्टे चमचो से उन्हे पार्टी द्रोही सिद्ध करवाया गया ।
क्यो परिवार ही नेतृत्व करे ? जाती धर्म और क्षेत्र इस देश की सच्चाई है और उन आकांक्षाओ पर खरा उतरने वाले लोग भी है क्यो उन लोगो को सबसे बड़ी जिम्मेदारी नही दी जा सकती ? क्यो और भी लोग प्रधान मंत्री पद के उम्मीदवार नही हो सकते और प्रतियोगिता के लिये भी नयी ऊर्जा , नयी समझ तथा नयी रणनीति के लिये क्यो बाहर के लोगो को नही लिया जा सकता ? क्यो सीट और जिलो के तथा प्रदेश के हिसाब से राजनीति और राजनीति के बाहर के लोगो को नही जोडा जा सकता है ,क्यो एक एक सीट एक एक जिला और एक एक ओर प्रदेश पर लगातार मंथन कर लोगो को जोड़ते कुन्बा बढ़ाते,रूठो को मना कर लाकर विस्तार नही किया जा सकता ? क्या पहले नही हुआ है पर पहले तो खुद को ही इकट्ठा रख सके ।कांग्रस अब भी जीत सकती है पर इतिहास मे जीने और इस सम्भावना से बैठने से नही जीतेगी कि कभी तो सबसे निराश होकर जनता आयेगी ।ऐसा नही होता वो जगह दूसरा सक्रिय और समझदार तथा व्यव्हारकुशल व्यक्ति भर देता है जैसा कई जगह हुआ ।
आज भी कांग्रेस पूरे देश की पार्टी है और खडी हो सकती है पर व्यवहारिक होना होगा ,जीत के जज्बे से आक्रमक राजनीति करनी होगी ,धर्मस्थलो के इवेंट के बजाय कांग्रेस की मूल प्रगतिशील सोच को उभारना होगा ,कल कारखानो और रोजगारपरक पीछे के कर्मो को आधार बना कर भविश्य के भारत की तस्वीर तय करनी होगी और भी बहुत कुछ ।अगर कांग्रेस को जिन्दा रहना है बल्कि तो पूरी तरह बदलना होगा ।

चुनाव के सबक 2

बंगाल की राजनीति और इस चुनाव के सबक -

पर पहले बंगाल की बात-

बंगाल का चुनाव राजनीति शास्त्र, समाजशास्त्र और मनोविज्ञान के लिये समन्वित रूप से अध्ययन और शोध का बहुत अच्छा विषय है ।इसका जितना सरलीकरण किया जा रहा है दर असल ये उतना ही पेचीदा है ।पहले 2019 का लोक सभा चुनाव जिसमे भाजपा 18 सीट पा गई ।दर असल वो भाजपा नही पायी बल्कि साम्यवादी पार्टियो के लोगो ने जितवा दिया क्योकी उनकी बड़ी दुश्मन ममता बनर्जी थी जिसने उनसे सत्ता और उनका सुख चैन छीना था । साम्यवादी नीचे का नेता और कार्यकर्ता भाजपा मे चला गया की ममता को कमजोर कर ले और राष्ट्रीय पार्टी जिसकी केंद्र मे सत्ता है उसमे रहने का भी लाभ मिलेगा तथा भाजपा यहा  जमीन पर है नही तो हम फिर वापस आ जायेगे  और बिल्कुल ही शुन्य भाजपा उतनी सीट पा गई ।
इस बार 140 से ज्यादा तृणमूल के लोगो को भाजपा ने टिकेट दे दिया क्योकी उसके पास देश के बहुत बड़े हिस्से मे लोग ही नही है और बड़ी संख्या मे उनके साथ वो स्थानीय नेता भी भाजपा मे आ गये जिनसे लडाई के कारण साम्यवादी भाजपा के साथ गये थे तो वो उस खाली जगह को भरने के लिये तृणमूल मे आ गये ।इस चुनाव मे तृणमूल का कुछ वो वोट जो उन नेताओ से जुडा था जो भाजपा मे गये और कुछ ऐसा वोट भी जो उत्तर प्रदेश बिहार और भाजपायी राज्यो की कहानी नही जानते और उनके जुमलो मे और आक्रमक प्रचार के प्रभाव मे आ गये जैसा की हर जगह करीब 20 %लोग किसी दल से बंधे नही होते और नयी आशा के साथ नया प्रयोग करते रहते है और ऐसे लोगो ने सोचा की एक बार भाजपा को भी देख ही ले इन वोटो ने भाजपा को ये सीटे जीता दिया ।
जबकी तृणमूल का अपना खुद का मजबूत आधार, अविवाहित बच्चियो और महिलाओ के लिये योजनाये , ममता की लोक प्रियता ,ममता का जुझारु तेवर जिसने मेरी निगाह मे  दिशा उसी दिन तय कर दिया था जिस दिन ममता ने मोदी जी के मंच पर ही उनके कार्यकर्ताओ की हरकत का विरोध कर बोलने से इंकार कर दिया था प्रोटेस्ट मे ,भाजपा का अहंकार और बंगाल को यू पी बिहार समझने की भूल ,साम्यवादी दलो का जीत के लिये आक्रमक न होना और कांग्रेस नेतृत्व का प्रारम्भिक लम्बे समय तक प्रचार से गायब रहने के कारण उसका वोट ममता की ऐतिहासिक जीत का कारण बना और साम्यवादी तथा कांग्रेस दोनो मे मारक नेतृत्व के अभाव ने उन्हे रसातल मे पहुचा दिया । मेरे इस चिंतन पर चिंतन कर बंगाल के चुनाव पर अध्ययन हो सकता है ।
मैं दो बाते मानता हूँ की यदि ये वोट की अदला बदली नही होती और कांग्रेस तथा साम्यवादी पूरी ताकत से प्रारंभ से ही लड़े होते तो भाजपा अधिक से अधिक 30 के आसपास सीटे पाती सब कुछ कर के भी , कांग्रेस और साम्यवादीयो की थोडी बढत हो सकती थी पर फिर भी ममता 170 से 180 सीट लाकर सरकार बनाती ।
दूसरा आरएसएस और भाजपा ने इस चुनाव मे अपने सारे शस्त्र प्रयोग कर लिये और बंगाल ने देख लिया ,बहुत सी बाते जिसके प्रचार मे आकर कुछ प्रतिशत ने भाजपा को वोट दिया अब उनकी बातो को कसौटी पर कसेगा इसलिए भाजपा की ये चरम स्थिति है और अब उसके लिये आगे कोई गुंजाइश नही है बशर्ते ममता इनसे सावधान रहे और इनके वत्सप ज्ञान और अफवाहो से बचा कर रखे और अपने नीचे काडर तथा तंत्र को सम्हाल कर रखे ।साम्यवादियो को तो 50 के दशक की तरह फिर से शुरू करने की जरूरत है और अपनी पुरानी घिसी पिटी सोच और भारत के बजाय अमरीका और रुस चीन को देख कर कार्यक्रम और भाषण से बचना होगा ।
भाजपा को और आरएसएस को सबक है की पुराने जुमले और हथकंडे जितना चलना था चल चुके अब वो देश और समाज को ही खायेंगे और दुनिया बहुत आगे जा रही है अब 5000 साल पीछे देख कर भविष्य तय करना बंद करना होगा तो अपनी पुरानी सोच देश पर लादने से बाज आना होगा वर्ना ये लोग तो घरो मे घुस जायेंगे सरकार से बाहर होकर पर देश को बहुत भुगतना होगा । कश्मीर पर निर्णय के बाद लोक सभा मे गृह मंत्री का अहंकार पुर्ण बयान हमे कितना भारी पड गया ये कम से कम सत्ता चलाने वाले लोग तो जान ही गये ।मुस्लिम के सवाल पर अरब की राजकुमारी के मुखर होते ही वहा रहने वाले भारतीयो को क्या क्या भुगतना पड़ा और वहा से सिर्फ पेट्रोल नही बल्कि सबसे ज्यादा विदेशी मुद्रा भी आती है ।भारत के वहा के राजदूत से लेकर दिल्लो पी एम तक को सफाई देनी पडी थी और भागवत जी को नयी थ्योरी देनी पडी की भारत मे पूरे 130 करोड लोग हिन्दू है जिनकी मान्यताये अलग अलग है ।अपनी खराब विदेश नीति से और सत्ता के मूल संगठन की हरकतो से हमने बहुत कुछ बिगाडा और बहुत कुछ खोया ।अभी हाल मे अचानक पाकिस्तान से प्रेम का व्यव्हार यूँ ही नही है और हमारे उच्च लोगो और उनके उच्च लोगो की लगातार बात हमारे और उनके लोगो की दुबई मे मुलाकात (ऐसा बताया जाता है ) सब यू ही नही है ।वर्ना तो मुसलमान और पकिस्तान ही संघ भाजपा इनकी भक्त मंडली और सुपारी मीडिया का दैनिक जीवन का हिस्सा बन गया था । अब विश्व राज नीति बदल रही है और अरब देश से लेकर तुर्की तक एक नयी धुरी बन रही है ।चीन से हमारे विवाद है ,लाल आंख का सवाल था ,साम्यवाद से घृणा के कारण सबसे विश्वसनीय दोस्त रुस के साथ अब वो रिश्ता नही रहा ,अमरीका व्यापारी है और कभी भी बहुत विश्वसनीय नही रहा, वर्तमान सत्ता समूह इस्राइल की तरफ झुका हुआ है पर इस्राइल खुद संकट मे है ,सारे पडोसी जो हमारे लिये छोटे भाई थे और हम पर आश्रित थे उनको हमने सामने खड़ा कर लिया ।
ऐसे मे उम्मीद सिर्फ अरब देशो की नयी धुरी से बचती है जो संघ के सोच और हरकतो से तो नही होने वाला है ।
डा सी पी राय 
स्वतंत्र राजनीतिक समीक्षक और वरिष्ठ पत्रकार ।

सोमवार, 3 मई 2021

इस चुनाव के संदेश

इस चुनाव के सबको संदेश 

इस चुनाव ने क़ई संदेश दिए है । यूँ तो लोकतंत्र मे सभी चुनाव महत्वपूर्ण होते है पर ये चुनाव भारत की राजनीति की दिशा तय कर गया और सबक़ भी दे गया । २०१४ से एक बयार चली थी और आंधी बन गयी थी और ऐसा लगता था की ऐसा अश्वमेघ का घोड़ा मिल गया है आर एस एस और भाजपा को जो कही जीतते हुए भारत के बाहर न निकल जाए पर २०१८ आते ही घोड़ा थकने लगा जब मध्य प्रदेश ,राजस्थान ,छत्तीसगढ़ और कर्नाटक जैसे बड़े प्रदेशों ने लगाम पकड़ कर वापस लौटा दिया । ये अलग बात है कि मध्य प्रदेश और कर्नाटक मे दूसरी सेना मे तोड़फोड़ कर हार जीत मे तब्दील कर दी गयी , उससे पहले भी अश्वमेध यज्ञ करने वालों ने यही ट्रिक अपना कर कुछ हारे हुए प्रदेश अपने खाते मे दर्ज कर लिए थे ।२०१९ झारखंड , महाराष्ट्र और आंध्र प्रदेश ने भी इस घोड़े को बाहर ही रोक दिया फिर बिहार मे दूसरे के कंधे पर बैठ कर पार किया तो दिल्ली ने केंद्रीय सत्ता के घर होते हुए भी कोई लिहाज़ नहीं किया । ये अलग बात है की २०१९ के लोकसभा चुनाव मे पुलवामा नामक औषधी ने इस घोड़े को सरपट दौड़ाया था । 
ये चुनाव यूँ तो ५ प्रदेश मे थे पर पूरी चर्चा बंगाल पर ही सिमट गयी क्योंकि पिछले ५ साल से आर एस एस अपना जाना पहचाना हथियार लेकर जुट गयी थी जिसका हस्र क्या होगा ये तभी तय हो गया था जब बंगाल के मुसलमान गीता रामायण के संदर्भ संस्कृत में मेडिया को सुना रहे थे तो मुस्लिम बेटियाँ हनुमान चालीसा । भाजपा ने भी युद्द के सारे हथियार बंगाल मे उतार दिए जो कमर के नीचे, कमर के ऊपर ही नहीं पीठ पर भी सटीक वार के लिए पूर्व मे आज़माये जा चुके थे । पूरी केंद्र सरकार प्रधान मंत्री गृह मंत्री समेत , सारे प्रदेशों की सरकारें और लाखों कार्यकर्ता झोंक दिए गए और ज़्यादा से ज़्यादा दो या तीन चरणो मे हो सकने वाला चुनाव विशेष कारणो से ८ चरण का किया गया तो ममता बनर्जी के काफ़ी लोगों को तोड़ा गया और ई 
डी सी बी आइ सब लगा दी गयी और चुनाव को इतना आक्रामक बना दिया गया की खुद मोदी जी ने आपदा को एक तरफ़ रख खुद को ही दाव पर लगा दिया ।मीडिया का भी रोल आक्रामक ही रहा ।
पर चुनाव परिणाम ने इन सारे हथियारों को भोथरा साबित कर दिया और एक महिला ने अपनी हिम्मत , मेहनत और सूझबूझ से इन सभी को परास्त कर नया इतिहास दर्ज किया और जीत के बाद भी अपने संतुलित व्यवहार से तथा समय के सरोकार के प्रती प्रतिबद्धता दिखा कर देश का दिल जीता । युवक कांग्रेस की नेता से इतनी बड़ी ताक़तों को हरा कर तीसरी बार नयी लकीर खींच कर सत्ता हासिल करना उनके जुनून और समर्पण का नतीजा जबकि पीछे ना कोई ख़ानदान की विरासत है और ना धन्ना सेठों का हाथ ,ना नेताओ की फ़ौज ना मीडिया का साथ और न संघ जैसा संगठन ।सबक दिया बंगाल ने आर एस एस और भाजपा को तो कांग्रेस और कम्युनिस्टों को भी और खुद भी कुछ सबक़ लिया होगा ममता ने ।
केरल मे भी परिणाम आसमान पर लिखा दिख रहा था वहाँ की पूर्ण शिक्षा के कारण , वर्तमान सत्ता जनोन्मुख उपलब्धियों और मुख्य मंत्री की छवि के कारण तथा चुनाव के समय ही कांग्रेस से कुछ लोगों के पलायन के कारण । भाजपा ने यहाँ भी अपने सारे हथियार प्रयोग किए पर वो जनता पसंद नहीं आए और भाजपा ने एकमात्र सीट भी गँवाया और वोट भी । वहाँ से भी संघ भाजपा ने ही नहीं शायद राहुल गांधी ने भी कुछ सबक़ लिया होगा । 
तमिलनाडु पर निगाह रखने वाले वहाँ के परिणाम को जानते थे । वहाँ भी बालू से तेल नहीं निकला । 
असम असम गन परिषद से आए हुए सोनेवाल और कांग्रेस आए शर्मा की जोड़ी बचाने में सफल रही तो छोटे से केंद्र शासित पंडिचेरी  मे तोड़फोड़ ने आक्सीजन दे दिया ।
सबक़ और राजनीतिक मायने अगल लेख मे ।

डा सी पी राय 
स्वतंत्र राजनीतिक विश्लेषक 
और वरिष्ठ पत्रकार

बुधवार, 21 अप्रैल 2021

ये है भाजपा का राज

#लखनऊ की हालत के बारे मे वरिष्ठ पत्रकार Golesh Swami स्वामी का स्वयं का भोगा उनकी कलम से ही -

यूपी की राजधानी की व्यवस्था की एक बानगी। लखनऊ में जितनी बेबसी इस समय है, ऐसी पहले कभी नहीं देखी। यानी महामारी से लड़ने की कोई तैयारी नहीं थी। सब कागजी घोड़े दौडा रहे थे। अब भी कागजी घोड़े ही दौड़ रहे हैं। किसी गंभीर मित्र के लिए बेड चाहिए। लखनऊ ने नोडल अफसर प्रमुख सचिव वरिष्ठ आईएएस अधिकारी भुवनेश कुमार से बात हुई। वे अच्छे और व्यवहार कुशल अधिकारी हैं। लेकिन वे भी अहाय लगे। बोले मैं सिर्फ अपर मुख्य सचिव मनोज कुमार सिंह साहब के एवज में सुपरवीजन का कार्य देख रहा हूं कि जिनको व्यवस्था सौंपी है, वे अधिकारी ठीक काम कर रहे हैं या नहीं। बेड की व्यवस्था कराना जिले के अफसरों का कार्य है। लखनऊ की प्रभारी डीएम डा रोशन जैकब को फोन मिलाया। मालूम पड़ा वो कोरन्टाइन हैं। उनका सीयुजी नंबर टेलीफोन आपरेटर के पास है। यानी लखनऊ में इस समय कोई डीएम नही है। आपरेटर से किसी जिम्मेदार अधिकारी से बात कराने को कहा जाता है तो वह पीए से बात कराता है। पीए कहता है आपको किस हास्पीटल में एडमिट कराना है, वहां के नोडल अधिकारी का नंबर दे दें। मैं ने कहा जहां बेड हो, वहां के नोडल अफसर का नंबर दे दीजिए। उसने वोला, यह नहीं बता सकते। मैं ने बोला अच्छा मेदांता के नोडल अधिकारी का नंबर दीजिए। मेदांता के नोडल अधिकारी अमित सिंह का नंबर लेकर बात की। उन्होंने कहा मैं स्वयं कोरोना पाजिटिव हूं। खैर उनको गैट वैल सून वोला और उनके विकल्प कमला प्रसाद को फोन मिलाया। उनका फोन ही नहीं उठा। इसके बाद मैं ने अपने एक-दो मेडिकल रिपोर्टर मित्रों को लगाया। वे भी घंटों प्रयास करने के बाद थक गए हैं। इस प्रक्रिया में कई घंटे बीत गए। अब स्थिति राम भरोसे है। यानी लखनऊ में न बेड है, न आक्सीजन और न ही वेंटिलेटर। इसके बाद की स्थिति आप सबको पता है। सादर।