शनिवार, 31 अगस्त 2013

एक सवाल है जिंदगी कितने दिन की होती है ??
हम अपनों के बारे में चाहे कितनी गौरव गाथा लिखे ,कितनी भी तारीफ करे कोई फर्क नहीं पड़ता । बात तो तब है जब अन्य लोग हमारे अपनों की तारीफ के कसीदे पढ़े या हम जो लिखते है, तारीफ करते है उस को पसंद करें और उस पर अच्छी बातें लिखे । अगर ऐसा नहीं हो रहा है तो समझो की हमारा कहा सुना लोगो को पच नहीं रहा है और तब हमें आत्मनिरीक्षण करना चाहिए की चूक कहा हो रही है । बस यूँ ही लिख दिया । जय हिन्द ।
गरीबी और बीमारी किसी को कस कर पकड़ ले और छोड़ने को किसी हालत में तैयार न हो या कोई अपना साथ छोड़ दें तो फिर बर्बादी के आलावा कुछ नहीं बचता मानसिक हो या शारीरिक । मुझे तो ऐसा ही लगता है ।
आसाकाम तो कही माल काट रहा है और मजे ले रहां है,  बलात्कार पीड़ित मानसिक और शारीरिक यातना झेल रही है और उसके पिता अनशन कर भूख झेल रहे है ,सरकार और पुलिस झख मार रही है ,भारत का संविधान कराह रहा है ,हम सब या तो तमाशा देख रहे है या लिख कर खीझ मिटा रहे है और कर्तव्य पूरा कर रहे है ,एक पार्टी बलात्कारी को बचा रही है ,अन्ना ,रामदेव ,किरन बेदी जैसे लोग मुह छुपा रहे है और भारत माता पता नहीं क्या सोच रही है , सीता को उठाने पर लंका को बरबाद करने वाले राम और द्रौपदी की साड़ी खींचने पर भारत को महाभारत बनाने वाले कृष्ण अभी और अनीति बढ़ने का इन्तजार कर रहे है और उनको मानने वाले उनका इन्तजार कर रहे है । मेरा भारत महान है ,हम क्या करे हम देवता नहीं है तुच्छ इन्सान है । वाह वाह असाकाम तू महान है ।
अभी एक दोस्त ने लिखा की वो दलित साहित्य पढ़ना चाहती है और कोई उनकी मदद करे । मैंने तो बचपन से केवल साहित्य शब्द पढ़ा है ,उसमे हिंदी साहित्य ,अंग्रेजी साहित्य देखा है । उसमे विधाए देखी है । पर ये दलित साहित्य , पिछड़ा साहित्य ,अगडा साहित्य ,पुरुष साहित्य ,स्त्री साहित्य , इत्यादि इत्यादि कब पैदा हुआ । अगर ऐसा है तो ये बड़ा गुनाह है ,बड़ा विभाजन है और राजनैतिक रूप से किये गए विभाजन से भी ज्यादा खतरनाक है क्योकि ये उन साहित्यकारों द्वारा किया जा रहा है जिनपर समाज और देश को सही दिशा दिखाने की जिम्मेदारी है । समाज और देश तथा साहित्य का ये विभाजन कभी सही रास्ता नहीं हो सकता । जय हिन्द ।