शुक्रवार, 22 मार्च 2013

लोग मुझे याद करेंगे मेरे मर जाने के बाद [ डॉ लोहिया ] ????

                                 लोग मुझे याद करेंगे मेरे मर जाने के बाद [ डॉ लोहिया ] ????
                                            [12 अक्टूबर उनकी पुण्यतिथि पर  ]
     
                                                                                                                                                                                            इस देश के अनोखे नेता डॉ राममनोहर लोहिया को आज याद करने का दिन है | वही डॉ लोहिया जिसने उस वक्त जर्मनी से अर्थशास्त्र में पी एच डी किया जब हिटलर उभर रहा था और उनके अपने विचारो के कारन उनके प्रोफ़ेसर ने उनका पी एच डी का इन्टरवियू समय से पहले करवा दिया की हिटलर के सत्ता में आने के पहले वे जर्मनी छोड़ दे । वही डॉ लोहिया जो जर्मनी गए तो जर्मन नहीं जानते थे और जर्मन जाने बिना वहा छात्र नहीं बन सकते थे तो उन्होंने अपने प्रोफ़ेसर से केवल दो महीने का समय माँगा और जब दो माह बाद वो दुबारा अपने प्रोफ़ेसर से मिले तो जर्मन बोलते हुए मिले | वाही डॉ लोहिया जो देश के करो या मरो नारे के मुख्या चिन्तक थे और गाँधी जी को इस हद तक ले जाने के लिए उन्हें पूरे एक हफ्ते तक उनके साथ रह कर तर्क करना पड़ा था | वाही डॉ लोहिया जिन्होंने १९४२ में जब सारे नेता जेल चले गए थे तो भूमिगत रह कर देश की आजादी की लड़ाई को धार दिया | वाही डॉ लोहिया जिनको लाहौर की जेल में आजादी की लड़ाई के लिए भरी यातनाएं डी गयी थी और फिर भी नहीं झुके थे | वाही डॉ लोहिया जिनको गाँधी जी ने कलकत्ता बुला लिया था जब देश आजादी का जश्न मना रहा था उस वक्त रक्तपात से डूबे कलकत्ता को शांत करने के लिए ,ये अलग बात है की उनका जिक्र नहीं होता है | वाही डॉ लोहिया जिनको गाँधी जी ने पहले देश के सरकार में मंत्री बन कर जिम्मेदारी लेने को कहा पर लोहिया जी की दृष्टि और चिंतन को सुनकर उन्हें ३० जानवरी की शाम को राजनीतिक चर्चा के लिए बुलाया था ,पर उस दिन जब लोहिया वहा पहुचने वाले थे तो कुछ दूर पहले उन्हें पता लगा की बापू की फासीवादी ताकतों ने हत्या कर दिया ,वर्ना कोई राजनीतिक तस्वीर उभर सकती थी |
देश के वणिक समाज के लोग अपने कार्यक्रम में उनकी फोटो लगाते है और उनको अपने समाज का गौरव बताते है और वे ये भूल जाते है  तथा इसका जिक्र भी नहीं करना चाहते  की उसी डॉ लोहिया ने इस देश में जाति तोड़ो अभियान चलाया था और तमाम लोगो ने अपने नाम से जाती का नाम हटा दिया था । ये लोग ये भी याद नहीं रखना चाहेंगे की उसी डॉ लोहिया ने कई लाखो जनेऊ तुड़वा कर जलवा दिया था । ये तो बिलकुल याद नहीं रखना चाहिए कि उसी डॉ लोहिया ने ; संसोपा ने बाँधी गांठ - पिछड़े पाए सौ में साठ : का नारा दिया था । जिसने मण्डल कमीशन की बुनियाद रखा । पर उनके नाम के साथ उनकी जाती चिपकाते हुए बताया जाता है की डॉ लोहिया भी दर असल बनिया थे और डॉ लोहिया को शायद इससे बड़ी गाली दी भी नहीं जा सकती जो उन्हें अपने कद से बहुत छोटा बना देती है  ।
कुछ दूसरे हम जैसे लोग भी उन्हें शायद याद  करेंगे जो उनके चित्र से अपने ड्राइंग रूम या ऑफिस सजाते है । हम जैसे लोग उनके इतिहास को याद करने की कोशिश करेंगे ,उन्हें याद करने की कोशिश करेंगे केवल एक व्यक्ति के रूप में ,एक नेता के रूप में और थोडा सा स्वतंत्रता सेनानी के रूप में भी शायद याद कर लें ।  पर उनकी बातो पर ध्यान नहीं देंगे ,उनके विचारो को अपनी अलमारियों के सबसे पीछे खाने के लिए छोड़ देंगे । डॉ लोहिया अगर चाहते तो पूरी जिंदगी सांसद रह सकते थे । वे चाहते तो नेहरु जी की सरकार से लगातार केंद्र का महत्वपूर्ण मंत्री रह सकते थे । वे चाहते तो दिल्ली के एक शानदार बंगले का सुख उठा सकते थे ।
पर फिर इतिहास चक्र कौन लिखता ,कौन  सीता और सावित्री और द्रौपदी  के बहाने औरतो की स्वतंत्रता की चर्चा छेड़ता । फिर चित्रकूट में रामायण मेला  लगा कर संस्कृति को सहेजता कौन ? देश विभाजन के गुनाहगार की चर्चा नहीं कर सकते थे वे । राम ,कृष्ण ,शिव या केवल कृष्ण लिख कर इनके बहाने जीवन संस्कृति ,जिम्मेदारियों ,मर्यादाओ ,और न्याय की चर्चा नहीं कर पाते वे । तब कहा सगुण और निर्गुण की बात हुयी हुयी नए संदर्भो में । तब नहीं हुयी होती चर्चा संसद में अमीरी और गरीबी की इतनी बड़ी खाई की तीन आना बनाम छ आना की बहस के साथ । तब कौन भारत को चीन के आक्रमण से आगाह करता । कौन होता जो तिब्बत की लड़ाई लड़ता । तब शायद गोवा की आजादी और लम्बी हो जाती और नेपाल में जागरण का सूरज देर से पहुँचता । कौन दहाड़ कर कहता की हिमालय बचाओ और जिस पानी की आज चर्चा है उसकी बुनियाद किसने  रखी होती गंगा बचाओ का अभियान चला कर और उसके बहाने सभी नदियों को बचाने  की आवाज लगा कर । तब कौन कहता की दुनिया को सात क्रांतियों की जरूरत है वो रंग भेद के खिलाफ हो ,यानि चमड़ी की हो ,वो स्त्री पुरुष के बीच भेद की हो ,वो जाती के आधार पर भेदभाव के खिलाफ हो ,वो धर्म के आधार पर भेदभाव के खिलाफ हो ,गरीबी अमीरी के भेदभाव के खिलाफ हो इत्यादि । तब कौन इबारत लिखता चौखम्भा राज की जिसके आधार पर आज का भारत गाँव से देश तक चार सरकारों से संचालित होता है ।
यदि डॉ लोहिया ने सब सुख स्वीकार कर लिया होता तो कौन तोड़ता आज़ादी के बाद भी हमें मुह चिढाती अंग्रेजो की मूर्तियों को और महीनो इसके लिए जेल काटता  राजनारायण जैसे साथियों के साथ और मूर्तियाँ आज भी हमारे सीने पर मूंग दल रही होती । तब कौन लड़ाई छेड़ता अंग्रेजी हाय हाय की जिसकी एक परिणिति अभी दिखलाई पड़ी है जब आई ए  एस के इम्तहान से अंग्रेजी की बाध्यता समाप्त कर दी गयी है । तब कौन लड़ता नौजवानों के लिए विश्वविद्यालयो और कालेजो में जा जा कर और उन्हें आने वाले समय में लोकतंत्र का मजबूत हथियार बनाता । कौन  कहता की किसान को उसकी उपज का मूल्य दो और गरीब को उसका हक़ । वे नहीं कह पाते ; संसोपा ने बांधी गांठ और पिछड़े मांगे सौ में साठ ; और आज का सामाजिक न्याय का परिदृश्य भी शायद  दिखलाई नहीं पड़ता या अभी शैशव अवस्था में घुटने पर चल रहा होता । यदि उन्होंने मंत्री पद स्वीकार कर लिया होता तो कौन बताता इस देश को की पहाड़ जैसे सत्ता में बैठे लोगो से कैसे टकराया जा सकता है और कौन अहसास करवाता की विपक्ष भी कुछ होता है । कौन गैर कांग्रेसवाद का सिद्धांत देकर अजेय कांग्रेस की देश में नौ सरकारें गिरा  कर रास्ता दिखाता की कांग्रेस की सरकार हटाई भी जा सकती है । कौन लड़ता नेहरु जी जैसे बड़े नेता से और ये कहने का सहस करता की मै जानता हूँ की पहाड़ से टकरा रहा हूँ पर टकराते टकराते मैं दरार तो पैदा कर ही दूंगा जिसे कल कोई गिर भी देगा ।
हाँ जो सब छोड़ने को तैयार होते है वही नए समाज की रचना करते है ,वही देशी की आजादी के योद्धा होते है ,वही सामाजिक और आर्थिक क्रांतियाँ करते है । वही समाज को रास्ता दिखाते है । वही उंच नीच के भेदभाव से लड़ते है । ऐसे लोग ही होते है क्रांतिदूत ,समाज परिवर्तक ,और महामानव  । मुझ जैसे लोग लोग जो उन्हें पढ़ कर और जान कर राजनीती में आ गए पता नहीं उनके अभियान को कुछ इंच भी सरका पाए या नहीं । पता नहीं समाज को बदलने की बात करते करते खद ही बदल गए या नहीं । पता नहीं लोगो को न्याय दिलाते दिलाते खुद अन्याय का शिकार तो कही नहीं हो गए । लोगो को खुशहाल बनाते बनते खुद तो बर्बाद नहीं हो गए । पर आज मुझ जैसे उनके तमाम दीवानों का उस चिन्तक और त्यागी डॉ लोहिया को सलाम ।हाँ आज भी मुलायम सिंह यादव तथा अखिलेश यादव जैसे लोग उनके सपनो को याद कर कर के जमीन पर उतारने की कोशिश कर रहे है ,और कोशिश कर रहे है की डॉ लोहिया सदा जिन्दा रहे और उनके सिधान्तो की लौ जलती रहे ।  आइये कुछ उनके विचारो पर हम भी  विचार भी कर ले । उन्हें पूरे देश का सलाम ।




                                                                      
                                                                                       

                                                                                                

                                                                                            


बुधवार, 20 मार्च 2013

अथ बेनी कथा सम्पन्न्तः

अरे बेनिया तो बहुत ही चर्चा में हुई गवा । कौनो नहीं पूछ रहा था वोका पर केहू को ढंग से बस गरिया दिया और चारो ओर वाही की बात हुई रही है । कुल अखबार में वोका तमाम जगह मिल गयी जो जिनगी में नहीं मिली थी । कुल टी वी वाले अपना धंधा पानी का खियाल किये बिना बेनिया ,बेनिया ही रट रहे है और तमाम चेहरा चमकाऊ लोगन को बुला बुला ,घेर घेर कर बस बेनिया बेनिया ही बतिया रहे है । बस यही बात नहीं हुई रही है खुल कर की बेनिया का बोल ,चर्चा केवल उकी भाषा और गाली की हुई रही है ।
वह रे बेनिया तू तो बड़ा ही तेज निकला ,खूब दाव चला और सबकी निगाह में आ गया । वर्ना चुपचाप धंधा पानी में बीजी था । कभी कभी बात तो हुई बेनिया के बारे में पर या तो धंधा और घोटाले की हुई या फिर जुबान फिसलने की हुयी । इस ससुर जुबान हुई की पोखरी या नल किनारे की कई हो गयी की जब चाहो फिसल जाओ । खैर बेनिया  को फिसलने से कौनो फर्क नहीं पड़ता ।जौन  ससुर को पड़े वो नाला और पोखरी के किनारे न जाये और बेनिया फिसल गया तो आंख बंद कर ले ।
पर बेनिया चर्चा में खूब है बस यही चर्चा है । हम जैसे लोग तो जल भुन कर खाक हुई गए है की आखिर हमारी जुबान कहे नहीं फिसलती है और हमार दिमाग बेनिया की तरह काम कहे नहीं करता है की कब फिसल जाएँ पूरा नंगा होकर की खूब फोटो छपे और खूब चर्चा हुई जाये । धिक्कार है ऐसे सभी हम जैसन को जो चर्चा में आना नहीं जानते । वैसे बेनिया से पूछेंगे जरूर की यार कोई कोचिंग कहे नहीं खोल लेते जुबान फिसलने की सही टाइमिंग और सही शब्द का इस्तेमाल करने की । वैसे तुम्हारी बोली भाषा थोड़ी क्लिस्ट है तो शब्दार्थ ,भावार्थ की एक कुंजी भी छाप दो बहुत धंधा होगा । ये भी खूब विचार आ गया हम जैसे अज्ञानी के दिमाग में की गाली और सही समय दी गयी गाली और उसकी कुंजी से भी धंधा हो सकता है ।
पर बेनिया दोस्त हमारी राय को हम पर ही मत अजमा देना । हम बहुत कमजोर है सदमे से मर जायेंगे । वैसे हमें अभी याद आया की एक दिन हम अस्पताल में थे तो तुम्हारा एक फोन आया था किसी माँ को ऐसी ही गाली देते हुए तुमने उसके लडके को भी कुछ कुत्ता पिल्ला टाइप कहा था । खैर तुम महान हो और दुनिया के सारे अज्ञानी और गली तथा उसकी टाइमिंग नहीं जानने वाले तुम्हे सलाम करते है । और ऐसे अपने बेनिया की कथा को हम आज भरे मन से आज इतने पर ही विराम देते है क्योकि ज्यादा कह देंगे तो बहुत भावुक हुई जायेंगे और बेनिया के दोस्त भावुक हो इ अच्छा थोड़े लगेगा ।भावुकता तो इंसानों में होती है और इंसान न्न्न्न्न्न्न्न
।नहीं बिलकुल नहीं । अथ बेनी कथा सम्पन्न्तः ।

गुरुवार, 31 जनवरी 2013

आदरणीय नेता जी उत्तर प्रदेश के अधिकारीयों से नाराज है क्यों न हो ,दो घटनाएँ इनका आइना दिखा देगी --1--एक पार्टी नेता ने अपने अच्छे बुरे वक्त के साथी लेकिन अच्छे और योग्य एक इंजीनियर जिनकी केवल कुछ माह की नौकरी शेष है का सरकार की डेढ़ साल वाली नीति के अंदर मुख्यमंत्री से उनके इच्छित स्थान पर स्थानांतरण का आदेश करवाया । जब यह आदेश उस विभाग के सबसे बड़े अधिकारी मिश्रा जी के पास पहुंचा तो उन्होंने आदेश दबा दिया ।नेता ये सोच कर चुप रहे कोई प्रशासनिक दिक्कत होगी । दो हफ्ते बाद मिश्र जी ने उस इंजीनियर को फ़ोन किया की नेताओ के चक्कर में क्यों पड़ गए ,काम करवाना है या नहीं ,और बुलाया ,एक बड़ी रकम लिया और आदेश कर दिया ।-----2----एक शर्मा जी है जिनकी जमीन अधिगृहित हुयी थी और नियमानुसार उन्हें कुछ जमीन मिलनी थी ।सांसदों ,मंत्रियों के चक्कर काट कर थक गए तो किसी तरह मुख्यमंत्री से मिले । मुख्यमंत्री के एक विशेष कार्य अधिकारी से आवास आयुक्त को फ़ोन करवाया । आवास आयुक्त ने कई दिन चक्कर कटवा कर अंत में सबसे नीचे पहुँच कर बात करने को । सबसे नीचे वाले ने पूछा की चक्कर काटना है और फाइल में कागज बढ़ाने है या काम करवाना है ? काम करवाना है तो तीन लाख रुपये दे दो ,एक घंटे में काम ख़त्म वर्ना हमें जो जवाब देना है लिख देंगे ।---- मुख्यमंत्री इमानदार है पर अधिकारी कोई भी विकास का पैसा जरी करने से पहले ही 5% ले लेते है । बाकि नीचे वाले अपना अपना लेते जाते है ।--- पिछली सरकार में कागजो पर ही काम करने के आदि अभी भी वाही सोच कर काम कर रहे है । मुख्यमंत्री शरीफ और सीधे सादे व्यक्ति है पर नेता जी की निगाह से कुछ छुपा नहीं है ।-- छोटे से सबसे बड़े तक सभी अधिकारियो की कार्य शैली यही है । ये जनता और राजनैतिक कार्यकर्त्ता से सीधे मुह बात नहीं करते है पर कुछ खास वर्ग के लोगो के सामने बिछे रहते है ।---केवल 2 --करोड़ के लिए सांसद --और डेढ़ करोड़ की निधि जिसकी केवल स्वीकृति ये लोग करते है ,काम कारवाना और उसका भुगतान करना अधिकारीयों का काम है उसके लिए ये जनप्रतिनिधि बदनाम कर दिए गए है पर हजारो लाखो करोड़ खर्च करने वाले नीचे से ऊपर तक के अधिकारी दूध के धुले मान लिए गए है । -- मध्यप्रदेश से लेकर जहा जहा तंत्र में बैठे कर्मचारियों और अधिकारियो पर छपे पड़े उनके घरो में करोडो नहीं सैकड़ो करोडो निकले । कुछ राजनैतिक लोगो के पास भी निकल सकते है पर 90% से ज्यादा राजनैतिक लोगो की अपने अस्तित्व के लिए इमानदार रहना ही पड़ता है । -- नेता को रोज इम्तहान देना होता है और चुनाव के मैदान में हर पांच साल बाद इम्तहान भी देना होता है पर अधिकारियो और कर्मचारियों को एक बार चयन के के बाद न तो कोई जवाब देना है ,न कोई अपने काम का हिसाब देना है और न दुबारा इम्तहान देना है और रिटायर होने पर भी बड़ी रकम मिलते रहने की गारंटी है ।---क्या इनकी भी कोई जवाबदेही होनी चाहिए ???? क्या इन लोगो की नौकरियां भी संविदा पर केवल कुछ समय के लिए होनी चाहिए ?? क्या इमानदार और परिणामदायक नहीं होने पर इन्हें भी प्राइवेट कंपनियों की तरह बाहर कर देना चाहिए ??? क्या भारत जैसे गरीबो के देश के अधिकारयो को पचासों बीघे वाले घरो में रहना चाहिए या इन घरो का जनहित में कोई और उपयोग होना क चाहिए क्योकि ये घर तो गुलाम रास्त्र के मालिको के थे न की जन सेवको के ??? ----- एक दिन एक बड़े और सीनियर मंत्री एक अधिकारी से बात करने को परेशान थे और उस अधिकारी ने घंटो क्या उस पूरे दिन फ़ोन नहीं उठाया । क्या होना चाहिए उनका । कुछ भी कह लीजिये सरकार के असली मालिक आज के राजा तो यही लोग है । जनता किसी राजनैतिक कार्यकर्ता को रात को दो बजे भी जग सकती है पर ये लोग क्रमशः मीटिंग या बाथरूम में ही मिलते है ।-----नेता जी ने चिंता जताई है ,आज़म खान साहब ने एक रास्ता बताया है ,मुख्यमंत्री जी ने भी तेवर दिखाया है तो हम भी इन मुद्दों पर बहस तो कर ही ले । क्योकि हम सब भी तो महान है पड़ोस में रहने वाले बड़े स्वतंत्रता सेनानी को नमस्ते नहीं करते ,परम वीर चक्र पाने वाले को नहीं पहचानते ,बड़े से बड़े साहित्यकार और विद्वान को कुछ नहीं समझते और दरोगा से डरते है ,अधिकारियो को माला पहनाते है और उनकी चापलूसी में सुख महसूस करते है । आइये इन मुद्दों पर बात ही कर लें ।

शुक्रवार, 23 नवंबर 2012

                                             महामानव  लोकबन्धु राजनारायण                                 [ डॉ सी पी राय ]
                                                                                                    प्रदेश महासचिव सपा एवं राज्यमन्त्री
नेताजी के नाम से प्रसिद्द राजनारायण जी हर वक्त केवल जन और जनतंत्र की सोचते थे जागते हुए और मुझे लगता है की सोते हुए भी । लखनऊ की दो घटनाये उनके आम जन की चिंता और उसकी लड़ाई को दर्शाने के लिए काफी है । पहली -एक समय तक लखनऊ रेलवे स्टेशन के अन्दर रिक्शा नहीं जा सकता था । नेताजी अन्दर रिक्शे से जाने की जिद कर बैठे और मना होने पर उसी रिक्शे पर खड़े होकर भाषण देने लगे । मजमा जुटने लगा हजारो की भीड़ लग गयी रास्ते  बंद हो गए ,लोगो की ट्रेन छूटने लगी पर नेताजी कहा मानने वाले थे । जब सरकार ने रिक्शे को अन्दर जाने की इजाजत दे दिया तभी उनका वो तात्कालिक आन्दोलन समाप्त हुआ और आज सभी स्टेशन में रिक्शे से जा सकते है ।दूसरा - ऐसा ही उनका रिक्शा आन्दोलन राजभवन में प्रवेश को लेकर हुआ और फिर सरकार को झुकना पड़ा तथा वे राजभवन में रिक्शे से ही गए ।
इस तरह के आन्दोलनों के वर्णन से पूरा ग्रन्थ तैयार हो सकता है ।उन्हें आज की तरह अच्छाई ,बुराई ,फायदा ,नुक्सान सोचने की आदत नहीं थी । जहा भी जन तकलीफ में दिखा या कोई बात जन के खिलाफ दिखी ,जहा भी जनतंत्र को खतरा दिखा या कोई कमजोरी दिखी राजनारायण जी वहा स्वतः मौजूद दिखते थे और जहा वो खड़े हो जाते थे वही आन्दोलन अपने आप पैदा हो जाता था ।
गडवाल का बहुगुणा जी का चुनाव हो या बाबू  बनारसी दास जी का  ,माया त्यागी कांड हो या चौधरी चरण सिंह जी के खिलाफ उनका चुनाव ,पंडित कमलापति त्रिपाठी जी के खिलाफ उनका बनारस का चुनाव हो या इंदिरा जी के खिलाफ रायबरेली का चुनाव राजनारायण जी की संघर्ष क्षमता ,नेतृत्व क्षमता ,आदर्श राजनैतिक सोच ,विरोधी के प्रति भी मर्यादा का पालन ,जीत और हार को सहज भाव से स्वीकार करने का गुण ,तमाम ऐसी बाते है जिनका आज अभाव दीखता है और लोग उनसे बहुत कुछ सीख सकते है ।
वे केंद्र सरकार के मंत्री बने तो सादगी की मिसाल ही नहीं पेश किया बल्कि ऐसा काम किया की रूस के प्रावदा ने लिखा की भारत में एक ही मंत्री है जो सचमुच समाजवादी फैसले कर रहा है । बेयर फूट डॉक्टर की उनकी योजना के द्वारा दूरस्त गाँवो में प्रारंभिक चिकत्सा की सुविधा पहुचाने के साथ लाखो को रोजगार देने का काम भी हुआ । चलते फिरते पूर्ण अस्पताल वाली गाड़ियाँ भी उनकी गरीबो और गाँवो को चिकित्सा सुविधा देने के उनकी चिंता और चिंतन को दर्शाती है ।
पंजाब के बटवारे के समय संसद में दिया गया उनका भाषण और उसमे आने वाले समय में आतंकवाद और अलगाववाद के सर उठाने की चिंता उनके दूर तक देख सकने वाली क्षमता  दिखती है ।जनता सरकार बन जाने पर इंदिरा जी को पूर्व प्रधानमंत्री होने और स्वतंत्रता सेनानी होने के नाते उचित सम्मान और निवास तथा सुरक्षा देने के बारे में मंत्रिमंडल में कही गयी बातें उनके बड़े दिल और लोकतंत्र के प्रति आस्था को को दिखाती है जब उन्होंने कहा की न्यायलय इंदिरा जी के साथ क्या करेगा ये उसका काम है पर हमारी सरकार को उनके साथ वो करना चाहिए जो हम अपने लिए सही समझते है । उन्होंने यहाँ तक कह दिया था की यदि उन्हें दिल्ली में निवास नहीं दिया तो उन्हें तो केवल एक कमरे की जरूरत है ,वे अपना मंत्री वाला बाकी  घर इंदिरा जी को दे देंगे । ये एक बडा सोचने और आगे का राजनीतिक व्यव्हार तय करने वाले नेता का वक्तव्य था ।उनकी बात नहीं मानी गयी और तत्कालीन गृहमंत्री अपने काम पर ध्यान देने के स्थान पर केवल इंदिरा जी के पीछे पड़  गए और उसका जो परिणाम सामने आना था आया ,वर्ना जानने वाले जानते है की राजनीती की दशा और दिशा कुछ और होती ।
एक किसान नेता और सचमुच जनाधार वाले नेता को प्रधानमंत्री बनाने का उनका सपना और संकल्प जूनून तक चला गया जब बिना जनधार वालो ने जनधार वालो को अपमानित करना शुरू किया और देश अपने तरीके से हांकने का प्रयास किया । उनका विद्रोही स्वाभाव और उग्र हो गया जब षड़यंत्र द्वारा गरीबो के नेतृत्व को प्रदेशो में पदस्थ करने की मुहीम चली । उन्होंने आगे आने वाले समय की गुप्त चुनौतियों को देखा उसकी जड़ पर हमला करना शुरू कर दिया जब आधे लोग सत्ता में आये और दल में आये आधो को आने वाले षड़यंत्र के लिए अलग छोड़ दिया गया ।
क्या क्या लिखूं ? क्या लिखूं की कैसे उनको जरा सा बीमार जान कर इंदिरा जी पैदल ही उनके घर तक चली आई थी प्रधानमत्री होते हुए ,क्या लिखूं की संजय गाँधी को उन्होंने संघर्ष का क्या मंत्र दिया ,क्या लिखूं की उन्होंने ऐसे तमाम लोग जिन्होंने अपने शहर नहीं देखे थे उन्हें प्रदेश और देश की राजधानी दिखा दिया ,क्या लिखूं की देश के कानून की पढाई करने वाले और अदालत में जाने वाले राजनारायण जी को पढ़े बिना काम नहीं चला पाएंगे ? क्या लिखूं की अपने को संसदीय दल का नेता चुन लिए जाने के बाद एक दिन पहले तक उनकी लानत मलानत करने वाले को उन्होंने नेता चुनवाया और प्रधानमंत्री बनवा दिया ? क्या ये लिखूं की उनकी बात मान ली गयी होती और इस्तीफ़ा नहीं देकर सदन चलाया गया होता तो राजनीती कुछ और होती ? क्या ये लिखू की वो भी जाति की राजनीती कर रहे होते तो जिंदगी भर संसद में रहे होते पर इतिहास नहीं रचा होता । क्या ये लिखूं की इतने बड़े नेता जिसने दिल्ली को पलटा  ,प्रदेशो के नेतृत्व तय किया उनके बच्चो को कोई नहीं जानता  था ,या ये लिखू की जब उनका दल कमजोर हो गया था और उनके एक बेटे ने मनीराम बागड़ी से कहलवाया की टाइप और फोटोस्टेट मशीन उसे दे दिया जाये तो उसका खर्च चल जायेगा तो नेताजी ने जवाब दिया की पार्टी का है पैसा जमा कर दो ले जाओ ,क्या क्या बताऊ ?
जहा तक व्यक्तिगत अनुभव का सवाल है तो नेताजी की केंद्रीय मंत्री होने के बावजूद बिना स्थानीय प्रशासन की जानकारी के मुझ जैसे किसी भी कार्यकर्ता के घर अचानक पहुँच जाते थे की चाय पिलाओ और चलो कही चलना है । आन्दोलन में 20 जानवरों को लाठी चार्ज होता है शाम को जेल जाते है और 21 जनवरी को सुबह 10 बजे नेता जी दिल्ली से चल कर आगरा की जेल में हाजिर है ।104 बुखार में दवाई लेकर मेरी शादी की पार्टी में खड़े है और लोगो से मिल रहे है । मेरी बेटी के पैदा होने पर निमत्रण देने पर कहते है की मै  व्यस्त हूँ कर्पूरी ठाकुर और सतेन्द्र नारायण सिन्हा की पंचायत की जिम्मेदारी चंद्रशेखर जी मुझे दिया है और पार्टी वाले दिन केवल आधे घंटे के लिए दलबल को लेकर वो पहुँच जाते है । कभी नहीं लगा की उनसे कोई पद मांगे ,वैसे ही बड़ी ताकत महसूस होती थी । देश में कही भी हो लगता था की राजनारायण जी साथ खड़े है किसी से डरने की जरूरत नहीं है । ऐसा हुआ भी जब हैदराबाद में कोई दिक्कत आई पर बस एक फ़ोन किया और समस्या ख़त्म । इतने बड़े संबल ,इतने बड़े लड़ाके  ,इतने बड़े और सच्चे समाजवादी ,इतने बड़े दिल वाले ,इतने बड़े राजनैतिक भविष्यवक्ता ,लोकतंत्र और सिधान्तो के इतने समर्पित इंसान और भारत के लोकतंत्र को मायने देने वाले महामानव को मेरा शत शत नमन ।

गुरुवार, 1 नवंबर 2012

क्यों कुछ लोग ऐसे होते है

क्यों कुछ लोग ऐसे होते है की उन पर विश्वास करें या नहीं करें कुछ समझ में नहीं आता है । पर इसके लिए जिम्मेदार भी तो वही होते है, अपने अनिर्णय के कारण और कभी कह कर मुकरने के कारण । क्यों कुछ लोग होते है जिनके लिए कभी बहुत सम्मान पैदा होता है मन में पर दूसरे ही पल घृणा होने लगती है उनसे । जब कोई ऐसी स्थिति से लगातार गुजर रहा हो तो कैसी उथल पुथल भरी होती है उसकी जन्दगी में ,उसके मन में और उसके खून के कतरे कतरे में ।
कुछ लोग बहुत बड़े हो जाते है लोगो को इस्तेमाल कर और सीढियां बना कर ,तमाम लोगो के साथ फरेब कर ,तमाम लोगो के साथ कसाई बन कर उसकी उम्मीदों उसके भविष्य और उसके दिल पर छुरियां चला कर बार बार । न जाने कितनो की क़ुरबानी होने और उनकी जिंदगियों को मिटा कर और उन्हें पावडे बना कर उसे खूबसूरत कालीन समझ उस पर चल कर बुलंदियां पाते है ये लोग । घायल कितने पड़े है पीछे उन्हें वैसे ही भूल जाते जाते है जैसे चलते हाथी को पता ही नहीं होता की कितने कीड़े मकोड़े शहीद हो गए उसके पैरों के नीचे । सच है ऐसे लोगो को लोग कीड़े मकोड़े से ज्यादा महसूस ही नहीं होते कभी भी ।
ये किसकी कहानी है क्या बताऊ । ऐसी तमाम कहानियां बिखरी पड़ी है चारो तरफ और ऐसे चरित्र कोई कहानी के काल्पनिक पात्र नहीं बल्कि चारो तरफ फैले हुए । इनके शिकार भी भरे हुए है चारो तरफ । नाम लेना जरूरी नहीं है और ऐसे लोग नाम नही बस बड़े होते है और हजारो साल पहले ही किसी ने कह दिया था की ; समरथ को नहीं दोष गुसाई ;। बाकी लोगो के भी नाम नहीं बस वे इस्तेमाल होने और गर्त में खो जाने वाले कीड़े मकोड़े है ।
ऐसा मंथन सचमुच समुद्र मंथन से कम नहीं होता है । समुद्र मंथन में तो विष निकला था तो अमृत के साथ बहुत सी अच्छी चीजें भी निकली थी ,पर इस समुद्र मंथन में तो केवल विष ही निकलना है और निकल भी रहा है ।
इस विष की कहानी से दूर बड़े मस्त है अपने वैभव ,अपनी आभा ,अपनी सत्ता और अपने गुरूर में । उन्हें परवाह ही नहीं  है की कोई जीए या मरे । कोई  रहे या न रहे । कोई अपमानित हो या सम्मानित । उन्हें तो बस अपनी और अपनों की चिंता है और चिंता है लाखो साल आगे तक की सत्ता और वैभव की । पता नहीं इन्हें राम ,कृष्ण ,बुद्ध ,महावीर ,नानक ,ईशा ,रावण ,कंस ,जदीज और तमाम राजाओं ,नवाबो की उठती और डूबती जिंदगियो से कुछ सीखने को मिला है या नहीं । पता नहीं दुनिया के सिद्धांतो से ऊपर उठकर इन्हें अमरत्व मिल गया है क्या ? क्या इन्हें कोई वरदान मिल गया है की ये और इनके अपने लाखो साल तक सत्ता और वैभव भोगेंगे ,बिना किसी बीमारी के ,बिना किसी पतन के । इन्हें ये अमरत्व मुबारक ,इन्हें ये वैभव मुबारक ,इन्हें ये सत्ता मुबारक ,इन्हें लोगो की हत्या मुबारक ,इन्हें लोगो को दिए धोखे मुबारक ,इन्हें आगे भी इनके हाथ से चलने वाली छुरियां मुबारक ,इन्हें इनकी चालबाजियां मुबारक । ये कौन है ---- ये मै क्यों बताऊँ ? आप सभी आँखें खोलिए और देख लीजिये ऐसे किसी एक को या बहुतों को । आप को ये ज्ञान मुबारक जो आप को ऐसे लोगो से बचा सके ।