शुक्रवार, 23 नवंबर 2012

                                             महामानव  लोकबन्धु राजनारायण                                 [ डॉ सी पी राय ]
                                                                                                    प्रदेश महासचिव सपा एवं राज्यमन्त्री
नेताजी के नाम से प्रसिद्द राजनारायण जी हर वक्त केवल जन और जनतंत्र की सोचते थे जागते हुए और मुझे लगता है की सोते हुए भी । लखनऊ की दो घटनाये उनके आम जन की चिंता और उसकी लड़ाई को दर्शाने के लिए काफी है । पहली -एक समय तक लखनऊ रेलवे स्टेशन के अन्दर रिक्शा नहीं जा सकता था । नेताजी अन्दर रिक्शे से जाने की जिद कर बैठे और मना होने पर उसी रिक्शे पर खड़े होकर भाषण देने लगे । मजमा जुटने लगा हजारो की भीड़ लग गयी रास्ते  बंद हो गए ,लोगो की ट्रेन छूटने लगी पर नेताजी कहा मानने वाले थे । जब सरकार ने रिक्शे को अन्दर जाने की इजाजत दे दिया तभी उनका वो तात्कालिक आन्दोलन समाप्त हुआ और आज सभी स्टेशन में रिक्शे से जा सकते है ।दूसरा - ऐसा ही उनका रिक्शा आन्दोलन राजभवन में प्रवेश को लेकर हुआ और फिर सरकार को झुकना पड़ा तथा वे राजभवन में रिक्शे से ही गए ।
इस तरह के आन्दोलनों के वर्णन से पूरा ग्रन्थ तैयार हो सकता है ।उन्हें आज की तरह अच्छाई ,बुराई ,फायदा ,नुक्सान सोचने की आदत नहीं थी । जहा भी जन तकलीफ में दिखा या कोई बात जन के खिलाफ दिखी ,जहा भी जनतंत्र को खतरा दिखा या कोई कमजोरी दिखी राजनारायण जी वहा स्वतः मौजूद दिखते थे और जहा वो खड़े हो जाते थे वही आन्दोलन अपने आप पैदा हो जाता था ।
गडवाल का बहुगुणा जी का चुनाव हो या बाबू  बनारसी दास जी का  ,माया त्यागी कांड हो या चौधरी चरण सिंह जी के खिलाफ उनका चुनाव ,पंडित कमलापति त्रिपाठी जी के खिलाफ उनका बनारस का चुनाव हो या इंदिरा जी के खिलाफ रायबरेली का चुनाव राजनारायण जी की संघर्ष क्षमता ,नेतृत्व क्षमता ,आदर्श राजनैतिक सोच ,विरोधी के प्रति भी मर्यादा का पालन ,जीत और हार को सहज भाव से स्वीकार करने का गुण ,तमाम ऐसी बाते है जिनका आज अभाव दीखता है और लोग उनसे बहुत कुछ सीख सकते है ।
वे केंद्र सरकार के मंत्री बने तो सादगी की मिसाल ही नहीं पेश किया बल्कि ऐसा काम किया की रूस के प्रावदा ने लिखा की भारत में एक ही मंत्री है जो सचमुच समाजवादी फैसले कर रहा है । बेयर फूट डॉक्टर की उनकी योजना के द्वारा दूरस्त गाँवो में प्रारंभिक चिकत्सा की सुविधा पहुचाने के साथ लाखो को रोजगार देने का काम भी हुआ । चलते फिरते पूर्ण अस्पताल वाली गाड़ियाँ भी उनकी गरीबो और गाँवो को चिकित्सा सुविधा देने के उनकी चिंता और चिंतन को दर्शाती है ।
पंजाब के बटवारे के समय संसद में दिया गया उनका भाषण और उसमे आने वाले समय में आतंकवाद और अलगाववाद के सर उठाने की चिंता उनके दूर तक देख सकने वाली क्षमता  दिखती है ।जनता सरकार बन जाने पर इंदिरा जी को पूर्व प्रधानमंत्री होने और स्वतंत्रता सेनानी होने के नाते उचित सम्मान और निवास तथा सुरक्षा देने के बारे में मंत्रिमंडल में कही गयी बातें उनके बड़े दिल और लोकतंत्र के प्रति आस्था को को दिखाती है जब उन्होंने कहा की न्यायलय इंदिरा जी के साथ क्या करेगा ये उसका काम है पर हमारी सरकार को उनके साथ वो करना चाहिए जो हम अपने लिए सही समझते है । उन्होंने यहाँ तक कह दिया था की यदि उन्हें दिल्ली में निवास नहीं दिया तो उन्हें तो केवल एक कमरे की जरूरत है ,वे अपना मंत्री वाला बाकी  घर इंदिरा जी को दे देंगे । ये एक बडा सोचने और आगे का राजनीतिक व्यव्हार तय करने वाले नेता का वक्तव्य था ।उनकी बात नहीं मानी गयी और तत्कालीन गृहमंत्री अपने काम पर ध्यान देने के स्थान पर केवल इंदिरा जी के पीछे पड़  गए और उसका जो परिणाम सामने आना था आया ,वर्ना जानने वाले जानते है की राजनीती की दशा और दिशा कुछ और होती ।
एक किसान नेता और सचमुच जनाधार वाले नेता को प्रधानमंत्री बनाने का उनका सपना और संकल्प जूनून तक चला गया जब बिना जनधार वालो ने जनधार वालो को अपमानित करना शुरू किया और देश अपने तरीके से हांकने का प्रयास किया । उनका विद्रोही स्वाभाव और उग्र हो गया जब षड़यंत्र द्वारा गरीबो के नेतृत्व को प्रदेशो में पदस्थ करने की मुहीम चली । उन्होंने आगे आने वाले समय की गुप्त चुनौतियों को देखा उसकी जड़ पर हमला करना शुरू कर दिया जब आधे लोग सत्ता में आये और दल में आये आधो को आने वाले षड़यंत्र के लिए अलग छोड़ दिया गया ।
क्या क्या लिखूं ? क्या लिखूं की कैसे उनको जरा सा बीमार जान कर इंदिरा जी पैदल ही उनके घर तक चली आई थी प्रधानमत्री होते हुए ,क्या लिखूं की संजय गाँधी को उन्होंने संघर्ष का क्या मंत्र दिया ,क्या लिखूं की उन्होंने ऐसे तमाम लोग जिन्होंने अपने शहर नहीं देखे थे उन्हें प्रदेश और देश की राजधानी दिखा दिया ,क्या लिखूं की देश के कानून की पढाई करने वाले और अदालत में जाने वाले राजनारायण जी को पढ़े बिना काम नहीं चला पाएंगे ? क्या लिखूं की अपने को संसदीय दल का नेता चुन लिए जाने के बाद एक दिन पहले तक उनकी लानत मलानत करने वाले को उन्होंने नेता चुनवाया और प्रधानमंत्री बनवा दिया ? क्या ये लिखूं की उनकी बात मान ली गयी होती और इस्तीफ़ा नहीं देकर सदन चलाया गया होता तो राजनीती कुछ और होती ? क्या ये लिखू की वो भी जाति की राजनीती कर रहे होते तो जिंदगी भर संसद में रहे होते पर इतिहास नहीं रचा होता । क्या ये लिखूं की इतने बड़े नेता जिसने दिल्ली को पलटा  ,प्रदेशो के नेतृत्व तय किया उनके बच्चो को कोई नहीं जानता  था ,या ये लिखू की जब उनका दल कमजोर हो गया था और उनके एक बेटे ने मनीराम बागड़ी से कहलवाया की टाइप और फोटोस्टेट मशीन उसे दे दिया जाये तो उसका खर्च चल जायेगा तो नेताजी ने जवाब दिया की पार्टी का है पैसा जमा कर दो ले जाओ ,क्या क्या बताऊ ?
जहा तक व्यक्तिगत अनुभव का सवाल है तो नेताजी की केंद्रीय मंत्री होने के बावजूद बिना स्थानीय प्रशासन की जानकारी के मुझ जैसे किसी भी कार्यकर्ता के घर अचानक पहुँच जाते थे की चाय पिलाओ और चलो कही चलना है । आन्दोलन में 20 जानवरों को लाठी चार्ज होता है शाम को जेल जाते है और 21 जनवरी को सुबह 10 बजे नेता जी दिल्ली से चल कर आगरा की जेल में हाजिर है ।104 बुखार में दवाई लेकर मेरी शादी की पार्टी में खड़े है और लोगो से मिल रहे है । मेरी बेटी के पैदा होने पर निमत्रण देने पर कहते है की मै  व्यस्त हूँ कर्पूरी ठाकुर और सतेन्द्र नारायण सिन्हा की पंचायत की जिम्मेदारी चंद्रशेखर जी मुझे दिया है और पार्टी वाले दिन केवल आधे घंटे के लिए दलबल को लेकर वो पहुँच जाते है । कभी नहीं लगा की उनसे कोई पद मांगे ,वैसे ही बड़ी ताकत महसूस होती थी । देश में कही भी हो लगता था की राजनारायण जी साथ खड़े है किसी से डरने की जरूरत नहीं है । ऐसा हुआ भी जब हैदराबाद में कोई दिक्कत आई पर बस एक फ़ोन किया और समस्या ख़त्म । इतने बड़े संबल ,इतने बड़े लड़ाके  ,इतने बड़े और सच्चे समाजवादी ,इतने बड़े दिल वाले ,इतने बड़े राजनैतिक भविष्यवक्ता ,लोकतंत्र और सिधान्तो के इतने समर्पित इंसान और भारत के लोकतंत्र को मायने देने वाले महामानव को मेरा शत शत नमन ।

गुरुवार, 1 नवंबर 2012

क्यों कुछ लोग ऐसे होते है

क्यों कुछ लोग ऐसे होते है की उन पर विश्वास करें या नहीं करें कुछ समझ में नहीं आता है । पर इसके लिए जिम्मेदार भी तो वही होते है, अपने अनिर्णय के कारण और कभी कह कर मुकरने के कारण । क्यों कुछ लोग होते है जिनके लिए कभी बहुत सम्मान पैदा होता है मन में पर दूसरे ही पल घृणा होने लगती है उनसे । जब कोई ऐसी स्थिति से लगातार गुजर रहा हो तो कैसी उथल पुथल भरी होती है उसकी जन्दगी में ,उसके मन में और उसके खून के कतरे कतरे में ।
कुछ लोग बहुत बड़े हो जाते है लोगो को इस्तेमाल कर और सीढियां बना कर ,तमाम लोगो के साथ फरेब कर ,तमाम लोगो के साथ कसाई बन कर उसकी उम्मीदों उसके भविष्य और उसके दिल पर छुरियां चला कर बार बार । न जाने कितनो की क़ुरबानी होने और उनकी जिंदगियों को मिटा कर और उन्हें पावडे बना कर उसे खूबसूरत कालीन समझ उस पर चल कर बुलंदियां पाते है ये लोग । घायल कितने पड़े है पीछे उन्हें वैसे ही भूल जाते जाते है जैसे चलते हाथी को पता ही नहीं होता की कितने कीड़े मकोड़े शहीद हो गए उसके पैरों के नीचे । सच है ऐसे लोगो को लोग कीड़े मकोड़े से ज्यादा महसूस ही नहीं होते कभी भी ।
ये किसकी कहानी है क्या बताऊ । ऐसी तमाम कहानियां बिखरी पड़ी है चारो तरफ और ऐसे चरित्र कोई कहानी के काल्पनिक पात्र नहीं बल्कि चारो तरफ फैले हुए । इनके शिकार भी भरे हुए है चारो तरफ । नाम लेना जरूरी नहीं है और ऐसे लोग नाम नही बस बड़े होते है और हजारो साल पहले ही किसी ने कह दिया था की ; समरथ को नहीं दोष गुसाई ;। बाकी लोगो के भी नाम नहीं बस वे इस्तेमाल होने और गर्त में खो जाने वाले कीड़े मकोड़े है ।
ऐसा मंथन सचमुच समुद्र मंथन से कम नहीं होता है । समुद्र मंथन में तो विष निकला था तो अमृत के साथ बहुत सी अच्छी चीजें भी निकली थी ,पर इस समुद्र मंथन में तो केवल विष ही निकलना है और निकल भी रहा है ।
इस विष की कहानी से दूर बड़े मस्त है अपने वैभव ,अपनी आभा ,अपनी सत्ता और अपने गुरूर में । उन्हें परवाह ही नहीं  है की कोई जीए या मरे । कोई  रहे या न रहे । कोई अपमानित हो या सम्मानित । उन्हें तो बस अपनी और अपनों की चिंता है और चिंता है लाखो साल आगे तक की सत्ता और वैभव की । पता नहीं इन्हें राम ,कृष्ण ,बुद्ध ,महावीर ,नानक ,ईशा ,रावण ,कंस ,जदीज और तमाम राजाओं ,नवाबो की उठती और डूबती जिंदगियो से कुछ सीखने को मिला है या नहीं । पता नहीं दुनिया के सिद्धांतो से ऊपर उठकर इन्हें अमरत्व मिल गया है क्या ? क्या इन्हें कोई वरदान मिल गया है की ये और इनके अपने लाखो साल तक सत्ता और वैभव भोगेंगे ,बिना किसी बीमारी के ,बिना किसी पतन के । इन्हें ये अमरत्व मुबारक ,इन्हें ये वैभव मुबारक ,इन्हें ये सत्ता मुबारक ,इन्हें लोगो की हत्या मुबारक ,इन्हें लोगो को दिए धोखे मुबारक ,इन्हें आगे भी इनके हाथ से चलने वाली छुरियां मुबारक ,इन्हें इनकी चालबाजियां मुबारक । ये कौन है ---- ये मै क्यों बताऊँ ? आप सभी आँखें खोलिए और देख लीजिये ऐसे किसी एक को या बहुतों को । आप को ये ज्ञान मुबारक जो आप को ऐसे लोगो से बचा सके ।

बुधवार, 26 सितंबर 2012



                                  कागज पर न हो पर दिलो में लिखा है रास्ट्रपिता                    डॉ 0 सी 0 पी 0 राय
                                                                                                                    स्वतंत्र चिन्तक एवं स्तम्भकार

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          पिछले दिनों एक समाचार ने पूरे हिंदुस्तान ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया का ध्यान अपनी तरफ खींचा और सभी को सोचने को मजबूर ही नहीं किया बल्कि महात्मा गाँधी को महापुरुष मानने वालों और दिलो में रास्ट्रपिता पिता मान चुके लोगो की आस्था को हिला कर रख दिया । मुझ जैसे करोडो लोग बचपन से बापू को रास्ट्रपिता मानते आये थे और ये समझते थे की आजाद भारत ने सर्वसम्मति से उन्हें इस उपाधि से नवाजा होगा जसे अन्य बहुत से देशो अपने देश के महापुरुषों को ;फादर ऑफ़ द नेशन;जैसे शब्दों से समय समय पर नवाजा है । पर जब कुछ लोगो ने पता नहीं किन कारणों से सूचना के अधिकार के द्वारा भारत सरकार से ये जानकारी माँगा कि क्या महात्मा गाँधी को रास्ट्रपिता की उपाधि से भारत ने नवाजा है ? यदि हाँ तो किस आदेश या प्रक्रिया द्वारा और कब ?इस सवाल का भारत सरकार द्वारा दिया गया जवाब ही इस चर्चा का कारण बना ,जब भारत सरकार ने जवाब दिया की ऐसा तो कुछ भी और कभी नहीं हुआ । ऐसा कोई अभिलेख भारत सरकार के संज्ञान में नहीं है । आश्चर्य तो इस जवाब पर नहीं है बल्कि इस बात पर है की इस जवाब के बाद भी न तो कांग्रेस की सरकार जो अपने को महात्मा गाँधी को मानने वाली कहती है उसने इस भूल का सुधार करने की तरफ कोई कदम बढ़ाने की कोशिश किया और न देश भर में बापू के नाम की रोटी खाने वालो ने ही इस पर कोई मुद्दा बनाने की कोशिश किया ।
          क्या मुश्किल हो जाती भारत सरकार को यदि वो अब से ऐसा कर देती और संसद तथा सभी विधान सभावो में सर्वसम्मति प्रस्ताव पास कर देती की पुँरानी गलती सुधारते हुए महात्मा गाँधी को देश रास्ट्रपिता स्वीकार करता है । जबकि ऐसा दुनिया के अन्य देशो ने अपने देश के दुनिया में कम चर्चित लोगो के साथ किया है ।1- अहमद शाह दुर्रानी [अफगानिस्तान  ]2- डान जोश डी सैन मार्टिन [ पेरू ] 3- सर लिंडन पिडिंग [ बहमास ] 4-शेख मुजीबुर्रहमान [ बंगला देश ] 5 -जोर्ज केडल प्रायिस [ बेलायिस ] 6- साइमन बोल्वियर [बोलविया ] 7-डोम पेड्रो [ ब्राजील ] 8 - बर्मान्दो ओ हिंस [ चिली ] 9 - सू यां चेन [ चाइना ] 10 - साइमन बोल्वियर [ कोलंबिया ] 11- कार्लोस मैनुअल [क्यूबा ] 12 -सुकर्णो [ इंडोनेशिया ]13 - विकटर इमैनुअल[ इटली ] 14 - थिओडोर हर्जिल [इज़राइल ] 15 -टुंकु अब्दुल रहमान [ मलेशिया ] 16-शिवसागर रामगुलाम [ मारीशस ] 17 -सैम नुजोमा [ नाम्बिया ] 18 - विलयम द साइलेंट [ नीदरलैंड ] 19 - इनर गर हर्द्सन [ नार्वे ] 20 - मोहमद अली जिन्ना [ पाकिस्तान ] 21 -डोन स्टीफन सर् नायके [ श्री लंका ] 22- जुलियस न्यरेरे  [ तंजानिया ]23 -मुस्तफा कमाल अता तुर्क [टर्की ] 24 - जोर्ज वाशिंगटन [ अमेरिका ] सहित ऐसे  कई महापुरुष हुए कई देशो में जिन्हें उन देशो ने अपने देश में फादर ऑफ़ द नेशन स्वीकार किया । जब की ये  तमाम नाम अपने देशो की सीमाओं में कार्यों की दृष्टि से बंधे रहे और हमारे बापू ने देश की सीमाओं \ को तोड़ कर दुनिया को रास्ता दिखाया और अपने सिद्धांतो का मुरीद बनाया ।
          मार्टिन लूथर किंग से लेकर वर्तमान राष्ट्रपति ओबामा तक ने उन्हें अपनी लड़ाई और जीवन का प्रेरणा श्रोत माना और आज भी मान रहे है । बापू की रोशनी ने ऐसी ताकत दी की नेलशन मंडेला ने पूरी जिंदगी जेल में बिता दिया और तभी वापस बाहर आये जब दक्षिण अफ्रीका में बापू द्वारा छेड़ा गया युद्ध जीत लिया ।आज संयुक्त रास्ट्र संघ ने बापू के जन्मदिन को वर्ड पीस डे मान लिया और मनाना शुरू कर दिया । दुनिया के तमाम देशो ने इन वर्षो में बापू के अहिंसा को हथियार बना कर उसी तरह अपनी लड़ाइयाँ जीत लिया जैसे बापू जिसका सूरज अस्त नहीं होता था उसके खिलाफ बिना हथियार उठाए जीता था । जहा स्वतंत्रता और गैर बराबरी की लड़ाइयाँ बची है ,वे लगातार बापू के हथियार को मांज रहे है और बस कदम उठाने की देरी है ।
             सरकार किसी कागज पर लिखे या न लिखे पर जिस  दिन सिंगापूर में आजाद हिंद रेडियो को पहली बार संबोधित करते हुए महान रास्त्रभक्त नेता जी सुभाष चन्द्र बोस ने बापू को रास्ट्रपिता कह कर संबोधित किया भारत ने और करोडो भारतीयों ने तो उसी दिन अपने दिलो पर लिख दिया रास्ट्रपिता महात्मा गाँधी ।दुनिया ने भी मान लिया की दुनिया को रास्ता दिखने का दावा करने वाले हिंदुस्तान ने दुनिया के बीसवी सदी के आश्चर्य [ जैसा की महान वैज्ञानिक आइन्सटीन ने महात्मा गाँधी के बारे कहा था जब ये कहा था की शायद आने वाली पीढियां विश्वास ही नहीं कर पाएंगी की कभी पृथ्वी पर ऐसा हाड़ मांस का कोई पुँतला भी चला था । तभी उन्होंने कहा था की बीसवी सदी में दो आश्चर्य हुए है 1- अणु बम्ब और 2- महात्मा गाँधी ।] को ये छोटी सी उपाधि दे दिया है ।
               पर सच्चाई में ये नहीं हुआ । जैसा की हमेशा होता है सत्ता की चकाचौंध कुछ मतिभ्रम पैदा कर देती है और उसकी चमक घेर लेती है सभी को ,वो भूल जाता है उन लोगो को जिनके कारण वो सत्ता के दरवाजे तक पंहुचा होता है । भारत में भी यही हुआ और बापू को सामान्य सा सम्मान देना भी भूल गया भारत का शासन ।
सवाल ये है की क्या अब इस भूल का सुधर तुरंत नहीं होना चाहिए । क्या बापू को दुनिया ने याद रखा और मान्यता दिया पर वो अपने देश में ही बेगाने हो गए । क्या बहुत छोटे छोटे स्वार्थो को लेकर संसद और विधान सभाओ में हंगामा मचाने वाले लोग एक दिन कुछ मिनट खर्च कर सर्वसम्मति से बापू के रास्ट्रपिता होने का प्रस्ताव पास नहीं कर सकते । उस दिन का इंतजार है मुझे भी ,दुनिया को भी और कही दूर से देखते हुए महात्मा गाँधी को भी और उनके मानने वाले दुनिया के करोडो लोगो भी । देखे ये दिन कब आयेगा ।

                                                                                                   डॉ 0 सी 0 पी 0 राय
                                                                                        स्वतंत्र चिन्तक एवं स्तम्भकार
                                                                                     13/1 एच आई जी फ़्लैट संजय प्लेस आगरा
                                                                                                  094122 54400
                                                                                          [ cprai1955@yahoo.co.in


                                                                                      


शुक्रवार, 21 सितंबर 2012

क्या भारत में 1- बंद को बंद कर देना चाहिए ? 2- क्या सभी तरह के रास्ते रोकना बड़ा अपराध घोषित होना चाहिए ? 3 - क्या रास्ट्रीय दिवस को छुट्टी के स्थान पर पूरे समय मौजूद रह कर उसकी याद और उस पर चर्चा होनी  चाहिए ? 4- क्या महापुरुषों के दिवस पर छुट्टी के बजाय  ज्यादा कार्य दिवस कर देना चाहिए जिसमे आधा समय उस महापुरुष पर चर्चा और आधे समय में ज्यादा  काम हो । हाँ तीज त्यौहार भारत की आत्मा है उनके लिए छुट्टी भी हो और हर स्तर पर पूरी तरह मनाया भी जाना चाहिए । क्या देश और देशवासी सहमत है 
प्रधानमंत्री जी की बातो पर भरोसा करना चाहिए और उन्हें समय तथा विश्वास भी देना चाहिए ।1991 यदि उन्होंने दोहराया तो निश्चित ही देश हित में चमत्कार होगा ।ऐसा लगता है की उनमे इतिहास के प्रति जवाबदेही का जबरदस्त अहसास पैदा हो गया है । जब किसी में इतिहास के प्रति ये अहसास पैदा होता है तो वो इतिहास बनाता है ऐसा इतिहास बताता है ।