बुधवार, 14 मई 2025

जिंदगी के झरोखे से

#जिंदगी_के_झरोखे_से 

कई साल पहले ये लिखा था 

कुछ अपनों को बहुत कुछ याद दिलाने को ---------------- ---------------------------------------------समाजवादी पार्टी पुनः बनाया जाये ये प्रस्ताव रखने वाला पहला व्यक्ति मैं था । स्थापना सम्मलेन में मेरी भूमिका भगवती सिंह जी को याद होगी और बहुत पुराने पत्रकारो को ।
पर पता नहीं संस्थापक सदस्यों का नाम लेते वक्त मेरा नाम क्यों भुला दिया जाता है । मैंने जाती की राजनीती नहीं किया समाजवाद की राजनीती किया और चुनाव नहीं लड़ा संगठन में काम करता रहा ,कभी एम् पी ,एम एल ए और मंत्री नहीं बना इसलिए या भूमिहार जाती में पैदा हुआ हूँ और इस जाती की राजनीती में कीमत नहीं है ,पिछडो की राजनीती में इसलिए ।
मैंने अंग्रेजी हटाओ आंदोलन में भाग लिया छोटी उम्र में और : अंग्रेजी में काम न होगा फिर से देश गुलाम न होगा ;का नारा लगाया .।
मैं सोशलिष्ट मूवमेंट में था और : संसोपा ने बाँधी गाँठ पिछड़े मांगे सौ में साठ ;का नारा लगता रहा ।
मैं जयप्रकाश आंदोलन में था ।
मैंने नेता जी का चुनाव देख 1989 और फिर रद्द होने वाला बीजेपी के जुल्म में हुआ 1992 में ।
मैं प्रदेश का चुनाव प्रभारी था 1991 ।
91 में चुनाव हार जाने पर जिद कर के आगरा में विशाल मंडलीय सम्मलेन करवाया ताकि पार्टी का मनोबल गिर न जाये और 14 लाख से अधिक की थैली भेंट किया ।
मेरे प्रस्ताव पर बनी समाजवादी पार्टी के स्थापना सम्मलेन में तीन दिन सोया नहीं तो घूम तो नहीं रहा था और सम्मलेन ख़त्म होने पर कुर्सी पर बैठ ही सो गया था जब नेता जी ने स्टेट गेस्ट हाउस के कमरा नंबर 43 में आकर जगाया और फिर कोफ़ी पीने बैठ गए और बोले की बहुत मेहनत पद गयी ,बस एक दिन और सबको विदा कर पूरा दिन सो कर फिर मेरे पास आइयेगा । तो रात भर भुट्टे तो नहीं बेच रहा था ।
विशेष --- - स्थापना सम्मलेन का बेनी प्रसाद वर्मा ने बहिष्कार किया और पहले दिन आये ही नहीं । वो ये पार्टी बनाने के खिलाफ थे । दूसरे दिन मैं और रामसरन दास घर से मना कर लाये तो वो हो गए संस्थापक और नाम रखने वाले क्योकि कुर्मी है और हम कोई नहीं क्योकि रॉय है ।
पार्टी की स्थापना के बाद पहली राष्ट्रीय कार्यसमिति करवाया आगरा में जो अपनी व्यवस्थाओ और प्रचार के लिए मील का पत्थर साबित हुयी और उसका रेकॉर्ड आज तक नहीं टूट पाया और इसके बाद सरकार बन गयी थी ।
जब 92 का नेता जी का चुनाव था तो टी एन शेषन से संपर्क रखने से लेकर जिस गांव में भी जुल्म होता था वहां जाने और सम्हालने की जिम्मेदारी मेरी थी ।
चुनाव में पहली सभा में साथ रह कर भाषण देने के बाद मैं अगली सभा में चला जाता और वहां जनता को जोड़ता भीड़ इकट्ठी करता और बाते बताता फिर नेता जी के आने में बाद आगे चला और फिर आखिरी सभा चाहे रात को 1 बजे हो हम साथ करते ।
1993 में राजभवन कॉलोनी के दफ्तर से मेरे भाषण के कैसेट बिके थे । 
मेरे जामा मस्जिद पर दिए गए भाषण पर स्वर्गीय अशोक सिंघल ने प्रमुख अख़बार को बयांन दे दिया की सी पी राय किसी मुसलमान को बाप बना ले जो पहले पन्ने पर छपा और मेरा जवाब भी ठीक से मिला ।
जब etv कॉनक्लेव हुआ जयपुर में तो जहा कांग्रेस से विदेश मंत्री सलमान खुर्शीद और अल्पसंख्यक कल्याण मंत्री रहमान ,बीजेपी से राजनाथ और ऐसे ही बड़े लोग थे तो समाजवादी सिपाही के रूप में वहां भी पार्टी का झंडा बुलंद रखा जो यू टयूब पर मौजूद है ।
जो ईमानदार होंगे वो ये सब स्वीकार करेंगे ।
और भी बहुत कुछ जो कहने से लोगो के अहम् को आज चोट लगेगी । 
जब मैं राज्यसभा सौचता भी नहीं था तब नेता जी ने एक बड़े नेता का नाम लेकर कहा की उसे भेज कर गलती हो गयी । वहां तो आप मेरे काम के है ।
इधर मेरी भूमिका पूरे दिन महामंत्री के रूप में ऑफिस में समय देने की हो या मीडिया में मेरी भूमिका या अज़मगढ़ में मेरी भूमिका ईमानदार लीग ही उसे स्वीकार कर सकते ।
शायद पार्टी से मिले पैसे में से बचा हुआ लौट देने वाला मैं अकेला हूँ ।
लोकसभा चुनाव हारने पर नैतिकता के नाते खुद पर जिम्मेदारी लेकर मंत्री और महामन्त्री पद से इतीफे की पेशकश करने वाला भी मैं अकेला हूँ ।
योजना आयोग का प्रतिष्ठित पद ठुकराने वाला भी मैं अकेला हूँ ।
आज तक कोई दाग नहीं ,ठेका नहीं ,खनन नहीं ,दलाली नहीं ।
पर मैं कही गिनती में नहीं हुआ वर्ना जब ये जिक्र आता है की संस्थापक कौन कौन तो मुझ साधारण व्यक्ति को किनारे नहीं किया जाता ।
आज बहुत दुखी होकर और अपनी घिर उपेक्षा झेल कर सार्वजानिक रूप से लिखने को मजबूर हुआ और ये अखिलेश जी को भी लिख रहा हूँ ।
क्या क्या बताऊँ किताब लिख जायेगी ।
तो फिर क्या सारी उपेक्षा ,तिराष्कार और पीछे छोड़ देना तथा सब किया भुला देना सिर्फ इसलिए की मैं भूमिहार जाती में पैदा हुआ हूँ । पिछड़ा या अल्पसंख्यक नहीं हूँ ।
बहुत दुखी होकर आज लिख रहा हूँ ।
हो सकता है को महाभ्रष्ट ,दलाल इस पर प्रतिक्रिया भी दे चापलूसी में ।
पर जनता की अदालत में मेरा दर्द हाजिर है ।जब अदालत न सुने तो जनता की अदालत में जाने का ही विकल्प बचता है ।
आज बहुत दुखी होकर और जिसे बहुत अपना समझता था उससे झटका मिलने पर ।

शनिवार, 3 मई 2025

क्या कांग्रेस सबक लेगी

क्या चुनावो से #कांग्रेस सबक लेगी ? 

एक इन्दिरा गाँधी थी वही जिनसे आरएसएस के चीफ और लाखो सन्घियो ने माफी मांगा था ,वही जो दुनिया के 120 देशो की नेता थी नान एलायन मूवमेंट संगठन के कारण और फिर भी रुस सच्चा दोस्त था पर दुश्मन भी कोई नही था,वही जिन्होने 1974 मे परमाणु विस्फोट कर दुनिया को चौंकाया था और चौंकाया तो सिक्किम के विलय से ,पाकिस्तान के दो टुकडे कर नया देश बंगला देश बना कर और अमरीका की धमकी और सातवे बड़े को हुह कह कर परवाह ना करने के कारण ।ऐसा बहुत कुछ है जो एक  किताब बन जायेगी ।
उनके घर के बाहर सिर्फ एक सिपाही खड़ा होता था जैसा छोटे छोटे अफसरो के यहाँ भी होता है पर रोज सुबह 9 बजे उनका बाहरी दरवाजा खुल जाता था और जितने लोग मिलना चाहते थे सब अन्दर जाते थे बिना भय और लिहाज के और अंदर जाने के लिये नेता होना जरूरी नही था ,कांग्रेसी होना जरूरी नही था ,मिलने का समय तय होना जरूरी नही था और किसी की पहचान भी जरूरी नही थी । इसलिए वो इन्दिरा गांधी थी पर आज की कांग्रेस डब्बे मे बंद ,।
आज की कांग्रेस जिसे लगातार सबक मिल रहे है और हर सबक पर चर्चा होती है कि अब बदलेगा सब ,चिंतन और मंथन होता है,वही पुरानी घिसी पिटी सोच के लोगो की चिंतन मंथन कमेटियां बनती है और फिर वो अपने ढर्रे पर ही चलती है  ।
कांग्रेस मे जितने नाम वाले नेता है और जितने अनुभवी है उतने सब दलो मे मिलाकर भी नही है पर लम्बी सत्ता के कारण जहा अहंकार से ग्रस्त है वही जंग भी लग गई है और अपनी पूरी ऊर्जा तथा ज्ञान विरोधी को परास्त करने मे इस्तेमाल करने के बजाय पार्टी के अन्दर ही खर्च कर देते है ।
इधर कांग्रेस सिर्फ वहां जीतती है जहा कोई स्थानीय नेता बड़े कद का हो और जनता उसे अपना नेता समझती हो और वहां कांग्रेस तथा दूसरे दल की सीधी लडाई है तथा नेता अधिक समय प्रदेश के लोगो के बीच मे देता हो ,शर्त ये भी है की वहा कोई तीसरी शक्ती खडी न हो रही हो क्योकी तीसरी शक्ती को देखते ही कांग्रेस के नेता उससे अन्दर से हाथ मिला लेते है की उनकी सीट किसी तरह बच जाये और बदले मे वो तीसरी शक्ती की इच्छानुसार उसकी मदद करते है पार्टी की पीठ मे छुरा घोप कर और नेतृत्व को भी मजबूर करते है की तीसरी शक्ती से बना कर चलना फायदेमंद होगा । कांग्रेस गठबंधन धर्म मे भी अक्सर फ़ेल हो जाती है ।
गोवा जैसे प्रदेशो मे सरकार गवा देना इसके नेताओ की अदूरदर्शीता तथा अहंकार दर्शाता है तो कर्नाटक और मध्य प्रदेश की आई सरकार गवा देना अहंकार और अव्य्हारिक राजनीति की निशानी है । राजस्थान बाल बाल बच गया पर पाइलट की अभी भी उपेक्षा समझ से बाहर है ।पंडीचेरी मे मात्र 16 विधायक भी सम्हाल कर न रख पाने वाला नेता तो नही हो सकता है ।
ममता ही जब कांग्रेस मे थी तो नेतृत्व से मिलने को तरस जाती थी और बाहर जाकर सबको परास्त कर तीन बार सरकार बना उन्होने सिद्ध कर दिया की सचमुच की नेता वो थी जिनकी उपेक्षा हुयी जगन मोहन रेड्डी भी खुशी से नही बल्कि अपमानित होकर गये और सच्चे नेता साबित हुये ।असम के शर्मा से लेकर लम्बी फेहरिश्त जो चक्कर काटते रहे की नेत्रत्व मिल कर बात सुन ले पर नही मिल पाये ।ममता जी ने एक बार किसी से दर्द बयान किया था तो ये भी कहा था की पहले जो लोग संमय माँगने पर कहते थे टॉक टू  जोर्ज , टॉक टू माधवन अब मिलने का इन्तजार करते है ,क्या हम लोग चपरासीयो और बाबुओ के यहा हज़िरी लगाने को नेता बने है ।कांग्रेस मे चंद को छोड कोई ये दावा नही कर सकता की वो नेत्रत्व से जरूरत पर मिल सकता है या उसकी कोई जायज बात मानी जायेगी ।
एक काल्पनिक स्वरूप का शिकार है कांग्रेस की बिना परिवार के जिन्दा नही रहेगी और न जितेगी तो नरसिंहा राव के समय कैसे चली ? जगजीवन राम ,बरुवा से लेकर शंकर दयाल शर्मा तक कैसे चली और जमीन पर शुन्य न शक्ल न आवाज उस सीताराम केसरी के समय भी शायद 116 सीट जीत गई थी दूसरी तरफ पूरा परिवार मिल कर भी अमेठी की अपनी ही सीट नही बचा पाया तो रायबरेली और अमेठी की अपनी नीचे की विधान सभा सीट नही जीता पाता ।सारे प्रचार के बावजूद सब जगह हार केवल वहाँ जीत जहा स्थानीय नेता मजबूत है और प्रदेश मे जुडा है ।नेत्रत्व अपने खास लोगो को भी पार्टी मे रोक नही पाता है और अगर उसकी चलती तो पंजाब मे अमरेंद्र सिंह शायद बाहर होते और हरियाणा मे हुडा भी फिर इन प्रदेशो मे भी क्या होता ।
मान लीजिए किन्ही नेताओ ने सवाल खड़ा किया तो क्या उन 23 और और भी लोगो को 6 महीने पहले से इन प्रदेशो की जिम्मेदारी नही देनी चाहिए थी उल्टे चमचो से उन्हे पार्टी द्रोही सिद्ध करवाया गया ।
क्यो परिवार ही नेतृत्व करे ? जाती धर्म और क्षेत्र इस देश की सच्चाई है और उन आकांक्षाओ पर खरा उतरने वाले लोग भी है क्यो उन लोगो को सबसे बड़ी जिम्मेदारी नही दी जा सकती ? क्यो और भी लोग प्रधान मंत्री पद के उम्मीदवार नही हो सकते और प्रतियोगिता के लिये भी नयी ऊर्जा , नयी समझ तथा नयी रणनीति के लिये क्यो बाहर के लोगो को नही लिया जा सकता ? क्यो सीट और जिलो के तथा प्रदेश के हिसाब से राजनीति और राजनीति के बाहर के लोगो को नही जोडा जा सकता है ,क्यो एक एक सीट एक एक जिला और एक एक ओर प्रदेश पर लगातार मंथन कर लोगो को जोड़ते कुन्बा बढ़ाते,रूठो को मना कर लाकर विस्तार नही किया जा सकता ? क्या पहले नही हुआ है पर पहले तो खुद को ही इकट्ठा रख सके ।कांग्रस अब भी जीत सकती है पर इतिहास मे जीने और इस सम्भावना से बैठने से नही जीतेगी कि कभी तो सबसे निराश होकर जनता आयेगी ।ऐसा नही होता वो जगह दूसरा सक्रिय और समझदार तथा व्यव्हारकुशल व्यक्ति भर देता है जैसा कई जगह हुआ ।
आज भी कांग्रेस पूरे देश की पार्टी है और खडी हो सकती है पर व्यवहारिक होना होगा ,जीत के जज्बे से आक्रमक राजनीति करनी होगी ,धर्मस्थलो के इवेंट के बजाय कांग्रेस की मूल प्रगतिशील सोच को उभारना होगा ,कल कारखानो और रोजगारपरक पीछे के कर्मो को आधार बना कर भविश्य के भारत की तस्वीर तय करनी होगी और भी बहुत कुछ ।अगर कांग्रेस को जिन्दा रहना है बल्कि तो पूरी तरह बदलना होगा ।

शुक्रवार, 2 मई 2025

2021

इस चुनाव के संदेश 

इस चुनाव ने क़ई संदेश दिए है । यूँ तो लोकतंत्र मे सभी चुनाव महत्वपूर्ण होते है पर ये चुनाव भारत की राजनीति की दिशा तय कर गया और सबक़ भी दे गया । २०१४ से एक बयार चली थी और आंधी बन गयी थी और ऐसा लगता था की ऐसा अश्वमेघ का घोड़ा मिल गया है आर एस एस और भाजपा को जो कही जीतते हुए भारत के बाहर न निकल जाए पर २०१८ आते ही घोड़ा थकने लगा जब मध्य प्रदेश ,राजस्थान ,छत्तीसगढ़ और कर्नाटक जैसे बड़े प्रदेशों ने लगाम पकड़ कर वापस लौटा दिया । ये अलग बात है कि मध्य प्रदेश और कर्नाटक मे दूसरी सेना मे तोड़फोड़ कर हार जीत मे तब्दील कर दी गयी , उससे पहले भी अश्वमेध यज्ञ करने वालों ने यही ट्रिक अपना कर कुछ हारे हुए प्रदेश अपने खाते मे दर्ज कर लिए थे ।२०१९ झारखंड , महाराष्ट्र और आंध्र प्रदेश ने भी इस घोड़े को बाहर ही रोक दिया फिर बिहार मे दूसरे के कंधे पर बैठ कर पार किया तो दिल्ली ने केंद्रीय सत्ता के घर होते हुए भी कोई लिहाज़ नहीं किया । ये अलग बात है की २०१९ के लोकसभा चुनाव मे पुलवामा नामक औषधी ने इस घोड़े को सरपट दौड़ाया था । 
ये चुनाव यूँ तो ५ प्रदेश मे थे पर पूरी चर्चा बंगाल पर ही सिमट गयी क्योंकि पिछले ५ साल से आर एस एस अपना जाना पहचाना हथियार लेकर जुट गयी थी जिसका हस्र क्या होगा ये तभी तय हो गया था जब बंगाल के मुसलमान गीता रामायण के संदर्भ संस्कृत में मेडिया को सुना रहे थे तो मुस्लिम बेटियाँ हनुमान चालीसा । भाजपा ने भी युद्द के सारे हथियार बंगाल मे उतार दिए जो कमर के नीचे, कमर के ऊपर ही नहीं पीठ पर भी सटीक वार के लिए पूर्व मे आज़माये जा चुके थे । पूरी केंद्र सरकार प्रधान मंत्री गृह मंत्री समेत , सारे प्रदेशों की सरकारें और लाखों कार्यकर्ता झोंक दिए गए और ज़्यादा से ज़्यादा दो या तीन चरणो मे हो सकने वाला चुनाव विशेष कारणो से ८ चरण का किया गया तो ममता बनर्जी के काफ़ी लोगों को तोड़ा गया और ई 
डी सी बी आइ सब लगा दी गयी और चुनाव को इतना आक्रामक बना दिया गया की खुद मोदी जी ने आपदा को एक तरफ़ रख खुद को ही दाव पर लगा दिया ।मीडिया का भी रोल आक्रामक ही रहा ।
पर चुनाव परिणाम ने इन सारे हथियारों को भोथरा साबित कर दिया और एक महिला ने अपनी हिम्मत , मेहनत और सूझबूझ से इन सभी को परास्त कर नया इतिहास दर्ज किया और जीत के बाद भी अपने संतुलित व्यवहार से तथा समय के सरोकार के प्रती प्रतिबद्धता दिखा कर देश का दिल जीता । युवक कांग्रेस की नेता से इतनी बड़ी ताक़तों को हरा कर तीसरी बार नयी लकीर खींच कर सत्ता हासिल करना उनके जुनून और समर्पण का नतीजा जबकि पीछे ना कोई ख़ानदान की विरासत है और ना धन्ना सेठों का हाथ ,ना नेताओ की फ़ौज ना मीडिया का साथ और न संघ जैसा संगठन ।सबक दिया बंगाल ने आर एस एस और भाजपा को तो कांग्रेस और कम्युनिस्टों को भी और खुद भी कुछ सबक़ लिया होगा ममता ने ।
केरल मे भी परिणाम आसमान पर लिखा दिख रहा था वहाँ की पूर्ण शिक्षा के कारण , वर्तमान सत्ता जनोन्मुख उपलब्धियों और मुख्य मंत्री की छवि के कारण तथा चुनाव के समय ही कांग्रेस से कुछ लोगों के पलायन के कारण । भाजपा ने यहाँ भी अपने सारे हथियार प्रयोग किए पर वो जनता पसंद नहीं आए और भाजपा ने एकमात्र सीट भी गँवाया और वोट भी । वहाँ से भी संघ भाजपा ने ही नहीं शायद राहुल गांधी ने भी कुछ सबक़ लिया होगा । 
तमिलनाडु पर निगाह रखने वाले वहाँ के परिणाम को जानते थे । वहाँ भी बालू से तेल नहीं निकला । 
असम असम गन परिषद से आए हुए सोनेवाल और कांग्रेस आए शर्मा की जोड़ी बचाने में सफल रही तो छोटे से केंद्र शासित पंडिचेरी  मे तोड़फोड़ ने आक्सीजन दे दिया ।
सबक़ और राजनीतिक मायने अगल लेख मे ।

डा सी पी राय 

बुधवार, 9 अप्रैल 2025

जिंदगी के झरोखे से

एक राजनीतिक 'कैपसूल'

यह एक ऐसे योद्धा की कथा है, जिसने जीवन में बस लड़ना सीखा। नहीं कहूंगा कि निष्काम होकर क्योंकि यह संभव नहीं है। जो भी आदमी लड़ता है, वह निष्काम नहीं हो सकता। लड़ाई निरुद्देश्य नहीं होती, उसके पीछे कोई न कोई मंतव्य होता ही है। डा. सीपी राय ने भी अगर संघर्ष किया तो वह अकारण नहीं था। उन्हें कुछ बदलना था, कुछ नया बनाना था। जब कोई आदमी कुछ नया बनाता है तो उसके साथ- साथ उसके स्वयं के बनने की प्रक्रिया भी चलती है। कोई लाख कहे कि वह कुछ नहीं चाहता लेकिन भीतर कुछ आकांक्षाएँ होती हैं। कुछ समाज के लिए, कुछ अपने लिए।
डा. राय एक राजनीतिक शख्सियत हैं । छात्र जीवन से ही उन्होंने यह रास्ता पकड़ लिया था और आज भी उसी रास्ते पर चल रहे हैं। उन्होंने अपने संघर्ष से कई ऐसे काम संभव किये, जो लगभग अकल्पनीय थे। लाटरी को खत्म किया जाना या जनरल मुशर्रफ को इस बात के लिए राजी करना कि वे भारतीय कैदियों से उनके परिजनों को मिलने दें, ऐसी अनेक उपलब्धियाँ डा. राय के खाते में हैं। उन्होंने हमेशा मूल्यों की राजनीति की। यह उनके पक्ष में एक खराब बात साबित हुई। राजनीति जी हुजूरी का खेल है। यहां सच के लिए कोई गुंजाइश नहीं । कोई अपने नेता के झूठ और भ्रम से असहमति जताये, यह बात स्वीकार नहीं की जाती। चापलूसी के खेल में डा. राय कभी माहिर नहीं रहे। इसका खामियाजा उन्हें लगातार भुगतना पड़ा। दरबारी छुटभैये तो आगे चले गये लेकिन डा. राय अपने तमाम राजनीतिक कौशल और बौद्धिक सामर्थ्य के बावजूद वहीं के वहीं रह गये। इस कमी के बावजूद उन्हें सम्मान हासिल हुआ। इसका कारण यह रहा कि उनकी बातें जो तात्कालिक रूप से नेताओं को नागवार लगती थीं, वे बाद में सही साबित होती थीं।
यह किताब उनके राजनीतिक जीवन के खट्टे- मीठे अनुभवों का दस्तावेज तो है ही, इसमें लगभग चार दशक से भी ज्यादे समय का राजनीतिक इतिहास भी है। यह कुछ लोगों को चौंकायेगा तो कुछ के चेहरों से नकाब भी उतारेगा, कुछ की कलई भी खोलेगा। साथ ही नयी पीढ़ी को राजनीतिक हठधर्मिता, छल-प्रपंच और धोखाधड़ी से भी परिचित करायेगा। यहां बहुत सारी जानकारियां ऐसी हैं, जो पहली बार लोगों के सामने आ रही हैं । ऐसे में यह किताब एक ऐसे राजनीतिक कैपसूल की तरह है, जो बेआवाज धमाका करने वाला है।
डा. राय कविमना हैं, सहृदय और ईमानदार हैं । यही उनकी सबसे बड़ी कमजोरी है। राजनीति में ऐसे और लोग भी हुए हैं लेकिन उनका समय इतना बुरा नहीं था कि उन्हें स्वीकार न किया जाये। अटल बिहारी वाजपेयी और वी पी सिंह भी कविताएं लिखते थे। राजनीतिक होने के बावजूद उन लोगों को कवि होने का अतिरिक्त सम्मान मिला। उनकी सहृदयता को आदर मिला।लेकिन बाद के समय में राजनीति इतनी निष्ठुर हो गयी कि वहां निश्छलता और भावुकता के लिए कोई सम्मान नहीं रह गया। डा. राय को इसी तरह के समय का सामना करना पड़ा। उनके बहुत करीबी नेताओं ने उनकी कविता को तो सम्मान दिया, उस पर भाषण भी किया लेकिन एक कवि राजनेता के रूप में उनकी उपस्थिति को लगातार ठुकराया। इसके बावजूद डा. सीपी राय अपने रास्ते से डिगे नहीं, राजनीति में भी रहे और कविताएं भी लिखीं। उन्हें अपनी इस यात्रा पर कोई पछतावा नहीं हैं। उनके कई कविता संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं। हाल में उनके नये संग्रह 'मुनादी' की खासी चर्चा भी हुई। नरेश सक्सेना जैसे बड़े कवि ने मुक्त कंठ से उनकी अनेक कविताओं की प्रशंसा की। डा. राय की राजनीतिक टिप्पणियां लगातार प्रतिष्ठित अखबारों में प्रकाशित होती रही हैं। 
डा. राय अपने लम्बे राजनीतिक जीवन में राजनारायण जी, मधु लिमये जी के साथ ही मुलायम सिंह यादव के भी घनिष्ठ संपर्क में रहे। छात्र जीवन में उन्होंने सानाजिक न्याय और समानता के लिए डटकर संघर्ष किया। पार्टी लाइन से हटकर हर राजनीतिक दल में उनकी प्रशंसा करने वाले लोग रहे हैं। उन्होंने अपने राजनीतिक सहधर्मियों से बेहतर रिश्ता बनाये रखा। इस किताब में उनकी इसी संघर्ष यात्रा के सजीव अनुभव हैं। आशा है कि यह किताब कोई बड़ी हलचल न भी मचा सकी तो भी राजनीति के प्रति लोगों के नजरिये में कुछ नया जरूर जोड़ेगी, राजनेताओं को आत्मावलोकन के लिए विवश जरूर करेगी। डा. सी पी राय को इस नयी कोशिश के लिए बहुत बधाई। भविष्य के लिए ढेरों शुभकामनाएँ ।
सुभाष राय
संपादक, जनसंदेश टाइम्स, लखनऊ

अहमदाबाद सम्मेलन

कांग्रेस का अहमदाबाद सम्मेलन: एक नई दिशा की ओर कदम
भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस, भारत की सबसे पुरानी और ऐतिहासिक राजनीतिक पार्टी, ने 8 और 9 अप्रैल, 2025 को गुजरात के अहमदाबाद में अपने दो दिवसीय राष्ट्रीय अधिवेशन का आयोजन किया। यह सम्मेलन न केवल पार्टी के लिए एक महत्वपूर्ण अवसर था, बल्कि यह भारतीय राजनीति में एक नए अध्याय की शुरुआत का भी प्रतीक बना। साबरमती नदी के किनारे आयोजित इस अधिवेशन ने न सिर्फ कांग्रेस की नीतियों और रणनीतियों को पुनर्जनन करने का प्रयास किया, बल्कि गुजरात जैसे राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण राज्य में अपनी उपस्थिति को और मजबूत करने की दिशा में भी कदम उठाए। इस लेख में, हम इस सम्मेलन के उद्देश्यों, चर्चाओं, परिणामों और इसके व्यापक प्रभावों का विश्लेषण करेंगे।
सम्मेलन का ऐतिहासिक संदर्भ
कांग्रेस का गुजरात के साथ गहरा और ऐतिहासिक रिश्ता रहा है। यह वही भूमि है, जहां महात्मा गांधी ने साबरमती आश्रम से स्वतंत्रता संग्राम को गति दी थी। सरदार वल्लभभाई पटेल जैसे दिग्गज नेताओं की कर्मभूमि होने के कारण, गुजरात हमेशा से कांग्रेस के लिए महत्वपूर्ण रहा है। अहमदाबाद में इससे पहले 1902, 1921 और 1938 में भी कांग्रेस के महत्वपूर्ण अधिवेशन हो चुके हैं। 2025 का यह सम्मेलन उसी ऐतिहासिक धरोहर को आगे बढ़ाने का प्रयास था।
इस बार अधिवेशन की टैगलाइन थी—‘न्यायपथ: संकल्प, समर्पण, संघर्ष’। यह नारा न केवल पार्टी के मूल्यों को दर्शाता है, बल्कि सामाजिक न्याय, समावेशिता और संवैधानिक मूल्यों की रक्षा के प्रति कांग्रेस की प्रतिबद्धता को भी रेखांकित करता है। यह सम्मेलन ऐसे समय में आयोजित हुआ, जब गुजरात में भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) का दबदबा रहा है, और कांग्रेस विपक्ष के रूप में अपनी स्थिति को मजबूत करने की कोशिश कर रही है।
सम्मेलन के उद्देश्य
इस दो दिवसीय अधिवेशन का मुख्य उद्देश्य पार्टी को संगठनात्मक और वैचारिक रूप से सशक्त करना था। इसके प्रमुख लक्ष्य निम्नलिखित थे:
  1. विदेश नीति पर रणनीति: वैश्विक मंच पर भारत की स्थिति और क्षेत्रीय चुनौतियों को देखते हुए, कांग्रेस ने विदेश नीति पर व्यापक मंथन किया। विशेष रूप से, पड़ोसी देशों के साथ संबंध, वैश्विक व्यापार, और जलवायु परिवर्तन जैसे मुद्दों पर पार्टी की स्थिति को स्पष्ट करने का प्रयास किया गया।
  2. शिक्षा और निजी क्षेत्र में आरक्षण: शिक्षा में समानता और निजी क्षेत्र में अनुसूचित जाति (एससी), अनुसूचित जनजाति (एसटी), और अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) के लिए आरक्षण लागू करने की नीतियों पर चर्चा हुई। यह मुद्दा सामाजिक न्याय के प्रति कांग्रेस की प्रतिबद्धता का हिस्सा है।
  3. संगठनात्मक पुनर्गठन: गुजरात में पार्टी की स्थिति को मजबूत करने के लिए बूथ स्तर से लेकर प्रदेश स्तर तक संगठन को पुनर्जनन करने की रणनीति बनाई गई। इसमें युवा और महिला नेताओं को अधिक जिम्मेदारी देने पर जोर दिया गया।
  4. आर्थिक और सामाजिक मुद्दों पर रुख: महंगाई, बेरोजगारी, और सामाजिक असमानता जैसे मुद्दों पर जनता के बीच अपनी आवाज को और प्रभावी बनाने के लिए नीतिगत प्रस्ताव पारित किए गए।
  5. विचारधारा की मजबूती: कांग्रेस ने अपनी धर्मनिरपेक्ष और समावेशी विचारधारा को पुनर्जनन करने का प्रयास किया, ताकि यह जनता के बीच अधिक प्रभावी ढंग से पहुंच सके।
पहले दिन की कार्यवाही: नीति और संगठन पर मंथन
सम्मेलन का पहला दिन 8 अप्रैल को सरदार वल्लभभाई पटेल मेमोरियल में कांग्रेस कार्य समिति (सीडब्ल्यूसी) की विस्तारित बैठक के साथ शुरू हुआ। इस बैठक में सीडब्ल्यूसी के स्थायी सदस्यों, विशेष आमंत्रित सदस्यों, सभी राज्यों के मुख्यमंत्रियों, उपमुख्यमंत्रियों, प्रदेश अध्यक्षों, और पूर्व मुख्यमंत्रियों सहित लगभग 169 नेताओं ने हिस्सा लिया।
पहले दिन की चर्चा का केंद्र बिंदु था—‘कांग्रेस का भविष्य और गुजरात में पुनर्जनन’। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने अपने उद्घाटन भाषण में पार्टी की ऐतिहासिक भूमिका और वर्तमान चुनौतियों पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा, “गुजरात गांधी और पटेल की भूमि है। यह वह जगह है जहां से हमने स्वतंत्रता की लड़ाई लड़ी, और अब यहीं से हम सामाजिक न्याय और समावेशिता की नई लड़ाई शुरू करेंगे।”
इस दिन विदेश नीति पर एक विशेष सत्र आयोजित हुआ, जिसमें भारत-अमेरिका संबंधों, चीन के साथ सीमा विवाद, और दक्षिण एशियाई क्षेत्रीय सहयोग संगठन (सार्क) जैसे मुद्दों पर विचार-विमर्श हुआ। कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने इस सत्र में जोर दिया कि भारत की विदेश नीति को समावेशी और शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व के सिद्धांतों पर आधारित होना चाहिए।
शिक्षा और आरक्षण पर भी गहन चर्चा हुई। पार्टी ने निजी क्षेत्र में आरक्षण लागू करने के लिए एक ठोस रोडमैप तैयार करने का प्रस्ताव रखा। यह कदम खास तौर पर युवाओं और हाशिए पर मौजूद समुदायों को आकर्षित करने की रणनीति का हिस्सा था।
दूसरे दिन की कार्यवाही: जनता तक पहुंचने की रणनीति
9 अप्रैल को दूसरा दिन पूर्ण अधिवेशन के रूप में आयोजित हुआ, जिसमें कांग्रेस के सभी पदाधिकारी, फ्रंटल संगठनों के प्रमुख, और 1727 एआईसीसी सदस्य शामिल हुए। यह सत्र साबरमती रिवरफ्रंट पर आयोजित किया गया, जो न केवल प्रतीकात्मक महत्व रखता था, बल्कि जनता के बीच पार्टी की उपस्थिति को मजबूत करने का भी अवसर प्रदान करता था।
दूसरे दिन की थीम थी—‘जनता के बीच, जनता के लिए’। इस सत्र में राजनीतिक और आर्थिक प्रस्ताव पारित किए गए। एक महत्वपूर्ण प्रस्ताव में पार्टी ने अनुसूचित जाति, जनजाति, और अन्य पिछड़ा वर्ग के लिए मौजूदा आरक्षण की रक्षा और विस्तार पर जोर दिया। इसके साथ ही, महंगाई और बेरोजगारी जैसे मुद्दों को जनता तक ले जाने के लिए एक राष्ट्रव्यापी अभियान शुरू करने का फैसला लिया गया।
कांग्रेस महासचिव जयराम रमेश ने इस अवसर पर कहा, “हमारी लड़ाई सिर्फ सत्ता के लिए नहीं, बल्कि संविधान और सामाजिक न्याय की रक्षा के लिए है। यह अधिवेशन हमें नई ऊर्जा देगा।” इस दिन युवा और महिला नेताओं को विशेष रूप से प्रोत्साहित किया गया। सचिन पायलट और प्रियंका गांधी जैसे नेताओं ने युवाओं को संगठन में सक्रिय भूमिका निभाने के लिए प्रेरित किया।
संगठनात्मक बदलाव और भविष्य की रणनीति
इस सम्मेलन में संगठनात्मक पुनर्गठन पर विशेष ध्यान दिया गया। गुजरात में बीजेपी के मजबूत गढ़ को चुनौती देने के लिए, कांग्रेस ने बूथ स्तर पर कार्यकर्ताओं को प्रशिक्षित करने और डिजिटल माध्यमों का उपयोग बढ़ाने का फैसला लिया। इसके लिए एक विशेष समिति गठित की गई, जिसमें सचिन पायलट, भूपेश बघेल, और रणदीप सुरजेवाला जैसे नेता शामिल थे।
पार्टी ने यह भी निर्णय लिया कि वह स्थानीय मुद्दों, जैसे किसानों की समस्याएं, छोटे व्यापारियों की कठिनाइयां, और युवाओं में बेरोजगारी, को अपने अभियान का केंद्र बनाएगी। इसके साथ ही, सोशल मीडिया और डिजिटल अभियानों के माध्यम से पार्टी अपनी पहुंच को और व्यापक करने की योजना बना रही है।
सम्मेलन का प्रभाव और आलोचनाएं
इस अधिवेशन ने कांग्रेस को कई मायनों में नई दिशा दी। सबसे पहले, यह गुजरात में पार्टी की उपस्थिति को मजबूत करने का एक मजबूत संदेश देता है। दूसरा, विदेश नीति और आरक्षण जैसे जटिल मुद्दों पर पार्टी की स्पष्ट स्थिति ने इसे वैचारिक रूप से और मजबूत किया। तीसरा, युवा और महिला नेताओं को बढ़ावा देने से पार्टी में नई ऊर्जा का संचार हुआ। यह अधिवेशन पार्टी कार्यकर्ताओं में उत्साह भरने में सफल रहा।
निष्कर्ष
कांग्रेस का अहमदाबाद सम्मेलन न केवल एक राजनीतिक आयोजन था, बल्कि यह पार्टी के लिए आत्ममंथन और पुनर्जनन का अवसर भी था। साबरमती के किनारे आयोजित इस अधिवेशन ने गांधीवादी मूल्यों और सामाजिक न्याय की बात को फिर से जीवंत किया। यह सम्मेलन कांग्रेस को गुजरात में अपनी खोई हुई जमीन वापस पाने और राष्ट्रीय स्तर पर एक मजबूत विपक्ष के रूप में उभरने का अवसर प्रदान करता है। आने वाले समय में, इस अधिवेशन के प्रस्तावों और रणनीतियों का कार्यान्वयन यह तय करेगा कि क्या कांग्रेस वाकई में ‘न्यायपथ’ पर आगे बढ़ पाएगी।
यह अधिवेशन भारतीय राजनीति में एक महत्वपूर्ण पड़ाव के रूप में देखा जा रहा है, और इसके दीर्घकालिक प्रभाव भविष्य में ही स्पष्ट होंगे। लेकिन एक बात निश्चित है—कांग्रेस ने इस सम्मेलन के माध्यम से अपनी आवाज को और बुलंद करने का संकल्प लिया है