सोमवार, 4 नवंबर 2024

मुलायम सिंह जी वो आखिरी बात

#जिन्दगी_के_झरोखे_से 

मुलायम सिंह यादव जी से वो आखिरी बातचीत और मेरा बोला वाक्य जिसका मुझे आज भी अफसोस है :; 

2016/17 में सत्ता रहते हुए गैरकानूनी( क्योंकि पार्टी अध्यक्ष की अनुमति के बिना सम्मेलन नही बुलाया जा सकता था और अध्यक्ष मुलायम सिंह यादव जी थे ) तरीके से पार्टी का एक सम्मेलन बुलाया गया और उसमे मुलायम सिंह यादव जी को अध्यक्ष पद से हटा दिया गया था तथा मुख्यमंत्री अखिलेश यादव को अध्यक्ष बना दिया गया था । 

मुझे मुलायम सिंह यादव का ये अपमान तथा पार्टी विरोधी कार्य मंजूर नहीं था । भगवती सिंह जी ,अंबिका चौधरी , ओम प्रकाश सिंह , शादाब फातिमा , नारद राय के अलावा पूरी पार्टी और मुलायम सिंह यादव का शिवपाल सिंह यादव को छोड़कर पूरा खानदान सत्ता के साथ यानी अखिलेश यादव के साथ चला गया था । आजम खान साहब जरूर उस सम्मेलन में नही गए थे और लगातार मुलायम सिंह यादव तथा अखिलेश यादव के बीच में पुल बनने की असफल कोशिश किया था ।
 
उस सम्मेलन में अखिलेश यादव ने बोला था की आने वाले चुनाव में वो सरकार बना लेंगे तथा सरकार और पार्टी दोनो नेता जी को सौप देंगे पर क्या हुआ वो दुनिया ने देखा और सबको याद है ।

इसके बाद के चुनाव में भाजपा ने इस घटना का अपने लिए इस्तेमाल कर लिया तथा इतिहास के एक व्यक्ति से अखिलेश यादव को जोड़ते हुए नारा दे दिया की " जो न हुआ अपने बाप का वो क्या होगा आप का " और भाजपा ने माहौल अपने पक्ष में कर लिया तथा चुनाव जीत लिया ।

यद्यपि मैने तो मुलायम सिंह यादव जी  के निष्कासन के दिन ही मुलायम सिंह यादव जी के निर्देश पर उनके दरवाजे पर खड़े देश भर की मीडिया से बात करते हुए कह दिया था कि अखिलेश जी अभी भी भूल सुधार लीजिए वरना इस चुनाव में 50 सीट भी नही मिलेगी तथा आप के माथे पर जो कलंक लगेगा वो लंबे समय तथा पीछा नहीं छोड़ेगा और उस वक्त पार्टी की टूट पर बोलते हुए मैं रो पड़ा था । बाद में काफी लोगो ने बताया कि उस वक्त के मेरे बयान को सुन कर काफी लोग रो पड़े थे ।

उस वक्त पूरे देश का मीडिया केवल इस घटना पर केंद्रित था और लखनऊ का माहौल बहुत ही गर्म था और यहां तक तनाव बढ़ गया था की अखिलेश समर्थक नौजवानो ने मुलायम सिंह यादव की तस्वीर को पैरो से रौंदा था ।बाकी सब इतिहास में दर्ज है और ये भी दर्ज है की अखिलेश यादव के एक समर्थक ने एक चिट्ठी जारी किया जिसमें मुलायम सिंह यादव जी की पत्नी को कैकेई शब्द से विभूषित किया था।

बाकी सब इतिहास में दर्ज है । इस सारे घटना क्रम के लिए मुलायम सिंह यादव जी ने राम गोपाल यादव जी को जिम्मेदार ठहराया था और कहा था की अखिलेश राम गोपाल के बहकावे में आ गया ,रामगोपाल इसे कही का नही छोड़ेगा । 

जैसा मैने प्रारंभ में लिखा की मुझे ये अनैतिक काम मंजूर नहीं था इसलिए मैं पूरी ताकत से मुलायम सिंह यादव जी के साथ खड़ा हो गया था और मुलायम सिंह यादव जी का प्रवक्ता बन वो जो कहते रहे वो मैं बोलता रहा । पार्टी के महामंत्री पद और मंत्री दर्जा से मैने स्तीफा दे दिया था । इसके बाद के बाकी घटना क्रम पर अलग एपिसोड लिखूंगा । 
अभी उस दिन तक सीमित करता हूं । 

मुलायम सिंह यादव जी अकेले पड़ गए थे और उनके यहां पार्टी का क्या परिवार का भी कोई नही आता था । बस शिवपाल यादव और नेता जी के  कुछ गिने चुने पुराने साथी कभी कभी लखनऊ आने पर मिल लिया करते थे । मैने एक नियम बना लिया की लगातार उनसे मिलने जाना है और कुछ समय उनके साथ बिताना है ताकि उन्हें ये नही लगे की कोई उनके साथ नही है । 

मुलायम सिंह यादव जी के निधन के कुछ समय पहले मैं इसी तरह उनसे मिलने गया । जैसा कि हमेशा होता था वो घर के अंदर बुला लेते थे । उस दिन भी उन्होंने अंदर बुला लिया तथा वही पर उनकी पत्नी साधना यादव जी भी बैठी थी । हाल चाल और इधर उधर की कुछ बाते हुई की अचानक उन्होंने मुझसे पूछा की ये रामगोपाल आप के इतने खिलाफ क्यों है ? उसकी खिलाफत के कारण आप का बहुत नुकसान हुआ और साथ ही एस पी सिंह बघेल तथा रामशकल गुजर भी आप के खिलाफ बहुत शिकायते करते और आरोप लगाते जो जो जांच कराने पर सब गलत निकला । मैं आप को राज्य सभा मे रखना चाहता था पर रामगोपाल विरोध कर देता था । 

इसपर मैने पूछा कौन है रामगोपाल तो बोले पार्टी का महासचिव है आप नही जानते है । मैने कहा कि पार्टी के महासचिव तो रामजी लाल सुमन भी है जो मेरे पड़ोसी है,और भी कई है क्या उनकी भी आप ऐसे ही सुनते है । पार्टी के उपाध्यक्ष और बहुत बड़े नेता थे जनेश्वर मिश्र क्या उनकी आप ने कभी सुना इन मामलों में ? जहां तक राम गोपाल जी का सवाल है न मैने उनकी भैंस खोला और उनका खेत काट लिया तथा कभी उनके मेरे बीच कोई कहा सुनीं भी नहीं हुई । हा वैचारिक और पसंद न पसंद का अंतर उनके मेरे बीच रहा है ।वो आप के परिवार से जुड़े नही होते तो सिर्फ मास्टर होते । उनकी योग्यता इतनी है की तीस साल से संसद में होने के बावजूद कोई उनका महत्वपूर्ण भाषण किसी को याद नही है , कोई प्राइवेट मेंबर बिल याद नही है और पिछड़ों या  अल्पसंख्यको के सवाल पर या देश के सवाल पर कभी उन्होंने ऐसा कुछ नही किया की कुछ देर तक सदन डिस्टर्ब हो गया हो । आप को ऐसे ही सब पसंद आए राज्य सभा में भेजने को जो गए और कमा धमा कर वापस आ गए कोई नाम भी नही जान पाया पर मेरा देश में नाम होता और संसद में मेरी भूमिका होती जो आप को शायद इसलिए पसंद नहीं है की सत्ता नाराज न हो जाए । 

जाने दीजिए भाईसाहब अब आप का समय अपनी गलतियों पर अफसोस प्रकट करने का तथा किसी के साथ बुरा किया हो तो उसपर खेद व्यक्त करने का है ऐसी बाते करने का नही और वो भी मुझसे जो जब आप के साथ कोई नही तब भी लगातार आप के साथ बैठा है । जाने दीजिए । 

1989 में मैने आगरा के खेरागढ़ से टिकट मांगा था और मेरा संसदीय बोर्ड में बहुमत था तथा चौ देवीलाल और जॉर्ज फर्नांडीज सहित कई लोग मेरे पक्ष में थे । वो विश्वनाथ प्रताप सिंह की लहर का चुनाव था इसलिए खेरागढ़ में मैं क्या कोई भी चुनाव लड़ता तो जीत जाता वहा के जातिगत समीकरण के कारण पर आप एक अपराधी प्रवृति के व्यक्ति को टिकट देना चाहते थे इसलिए तब आप ने बोर्ड में ये कह दिया था की आप तो देश मे प्रचार के लिए निकलेंगे तो आप का चुनाव सी पी राय देखेंगे  और आप के मुख्यमंत्री हो जाने पर एम एल ए क्या होता है सी पी राय उससे ज्यादा बन जाएंगे । सबसे पहले जॉर्ज साहब बाहर आए थे और उन्होंने मुझसे कहा था कि होने वाला सी एम आपको अपना चुनाव इंचार्ज बनाना चाहता है और बोल रहा है की सी एम बनने के बाद सी पी राय एम एल ए से ज्यादा होंगे तो आप उसकी बात मानो। क्या पता वो आप को राज्य सभा में भेज दे या एम एल सी बना कर मंत्री बना दे । फिर यही सब देवी लाल जी , चंद्रशेखर जी इत्यादि ने भी कहा । फिर भी काफी कोशिश किया था मैंने की आप मान जाए और चुनाव जीत कर मेरा सदन का कैरियर शुरू हो जाए पर आप नही माने थे। मैं आप के चुनाव में इटावा आ गया और प्रचार में लगा रहा पर आप सत्ता आने के बाद आप मुझे मिले ही नही । तब मिले जब सरकार जा रही थी । 

भाई साहब आप मेरे साथ लगातार यही तो करते रहे है तो बोले दर्जा तो दिया । मैने कहा की वो तो मैं कभी नही चाहता था आपने  दबाव देकर दो बार ज्वाइन करवाया ये कह कर की अभी ये होने दो चुनाव आते ही राज्य सभा में भेज देंगे । यहां तक कि एक बार तो आप ने अपने घर जहा आप का और मेरा परिवार साथ लंच कर रहा था सबके सामने कहा था की इस बार फला फला कारण से आप को अनिल अंबानी तथा जया बच्चन को टिकट देना पड रहा है पर अभी मुझे कोपरेटिव फेडरेशन का अध्यक्ष बनायेंगे जो आप ने नहीं बनाया तथा अगली बार चाहे एक टिकट हो मुझे ही देंगे । 

आप ने तो आगरा में मेरी किताब के विमोचन करते वक्त भी सैकड़ों लोगों के सामने कहा था की आप लोग नही जानते होंगे पर मैं जानता हूं की सी पी राय देश में बहुत बड़े लोगो को जानते है वो किसी को भी बुला सकते थे पर उन्होंने मुझे बुला कर मेरा सम्मान बढ़ाया है । यहां समाज के सभी प्रमुख लोग और साहित्यकार तथा कवि बैठे है आज मैं सबके सामने बताना  चाहता हूं की सी पी राय ने क्या क्या किया मेरे लिए और आप ने बहुत कुछ बताने के बाद यह भी कहा था की मैने सी पी राय के साथ न्याय नहीं किया । अब सी  पी राय का जो सम्मान समाज तथा साहित्य में है वो मैं उन्हें राजनीति में दूंगा, अब उनको उनका हक मिलेगा ।

ऐसी ही कुछ बाते कहते कहते अचानक मुझे पता नही क्या सूझा कि मैंने बोल दिया की भाई साहब आप के और मेरे बीच 35/36 साल से एक लड़ाई चल रही है । 
वो बोले की मेरे आप के बीच लड़ाई चल रही है । तब बोले मेरे आप के बीच क्या लड़ाई है ? 
मेरे मुंह से निकल गया कि मेरी सच्चाई,ईमानदारी और वफादारी तथा आप का झूठ ,धोखा और दगाबाजी के बीच लड़ाई है ।
आप लगातार जीत रहे हो और मैं हार रहा हूं।
आप कभी रामगोपाल के कंधे पर रख कर बंदूक चला देते हो तो कभी अमर सिंह का इस्तेमाल कर लेते हो । बेनी प्रसाद वर्मा ने संसद में आप को गाली दिया तो उनको राज्य सभा दे दिया ,अमर सिंह ने आप के खिलाफ कोई कसर नहीं छोड़ा तो उसे दे दिया पर मेरा गुण आप की निगाह में अवगुण ही रहे इसलिए मैने ये लड़ाई बोला ।

इस बात पर वो बहुत अपसेट हो गए तथा बोलने लगे  : क्या मैं दगाबाज हूं ,क्या में दगाबाज हूं ? 
और फिर यही वाक्य जल्दी जल्दी बोलने लगे ।तब साधना जी उठी और दौड़ कर एक प्याली में दो रसगुल्ला रख लाई तथा जबरन उनके मुंह में डालने लगी कि जल्दी खा लीजिए वरना बीमार हो जाएंगे और अभी अस्पताल ले जाना पड़ेगा ।  
मैं इस बात से आवाक रह गया तथा अंदर से बहुत दुखी हो गया । मेरा मन मुझे कचोटने लगा की मैने ये क्या कर दिया ।अभी कुछ हो जाएगा तो मैं खुद से निगाह नही मिला पाऊंगा। 
वहा सन्नाटा पसर गया । सब चुप । कोई कुछ नही बोला काफी देर तक । फिर करीब 20/25 मिनट बाद साधना जी ने सन्नाटा तोड़ा और बोली की रायसाहब से क्यों नाराज हो रहे हो । आप ने क्या कर दिया इनके लिए ? राय साहब ने क्या क्या किया है वो आप भी बताते रहे और मैं भी जानती हूं । इनकी पत्नी को आप ने बहन माना और राखी बंधवाया पर वो कैंसर से मर गई आप ने क्या किया ? वैसे तो आप लोगो को भी जहाज से भेज कर मेदांता में इलाज करवाते रहे ।

तब मैने कहा भाभी जी जाने दीजिए मुझे ऐसा नहीं कहना चाहिए था । मैं अपने शब्दो के लिए माफी चाहता हूं ।

इसपर साधना जी फिर नेता जी से बोली की मैने कई बार आपको कहा की राय साहब को अपना सलाहकार बना लो । ये भी कहा था की प्रोफेसर साहब को दिल्ली में अकेले मत रखो राय साहब को भी रखो पर आप ने बात नही माना। साधना जी बोली की ये जी बुरा वक्त हम लोग देख रहे है वो नही होता ।  मैं ये सब सुनकर हतप्रभ था क्योंकि साधना जी से मेरी कोई बात नही होती थी । 

मुलायम सिंह जी तब बोले सी पी राय अखिलेश को मुख्यमंत्री बना कर गलती हो गई । वो मुख्यमंत्री नही बनता तो लीडर बन जाता । अब वो  लीडर नही बन पाएगा । मैने कहा ये तो आप मुझसे कई बार कह चुके पर बन गया तो बन गया और आपने ही बनाया  । बोले  देखो क्या कर बैठा ।अपने मन का हो गया है हमारी बात ही नही मानता । मैने एम एल सी के लिए आप के लिए बोला था की आप लखनऊ में ही रहोगे और मंत्री बनवा दूंगा पर हरियाणा का वो क्या नाम है जो यूथ का नेता था , लाठर ! उसका नाम गवर्नर हाउस भेज कर कलकत्ता  चला गया था । 
मैने कहा की अब तो आप साथ है न । तो नेता जी बोले सी पी राय पेट और मुंह में अंतर होता है ।  बेटा है तो उसे कैसे छोड़ देता , माफ़ कर दिया और मेरी बनाई पार्टी भी तो खत्म नही होने देना था । 

मैने कहा की क्या आप को याद है की समाजवादी पार्टी कैसे बनीं। तो बोले सब याद है । आप ने ही पहली बार कहा था बनाने को और फिर जनेश्वर तथा कपिल देव बाबू को लेकर मिले था और मेरे पीछे पड़े रहे तब मैने पार्टी बनाया । आप ने भी बहुत साथ दिया और बहुत मेहनत किया पार्टी के लिए । 
फिर बोले की आप की अखिलेश से मुलाकात हुई । मैने कहा नही , वो आपके साथ गद्दारी नहीं करने वालो को अपना दुश्मन मानते है तो मुझसे क्यों मिलेंगे । भाई साहब अब जो हो गया वो हो गया पर ये नही पता की किसका जीवन ज्यादा है लेकिन जब तक मेरा जीवन है तब तक आप का साथ नही छोडूंगा । इसपर साधना जी बोली की देख लो एक ये रायसाहब है जो जिंदगी भर साथ निभाने की बात कर रहे है दूसरी तरफ वो लोग है जो हमारे घर का रास्ता ही भूल गए । 

मुलायम सिंह यादव जी पता नही उम्र के कारण या यू ही भावुक हो गए और तब बोले की इस बार राज्य सभा चुनाव आने दो मैं अखिलेश के पास चल कर बैठ जाऊंगा जब तक आप को टिकट नहीं देता । साधना जी बोली की मैं भी साथ चलूंगी । मैने कहा भाईसाहब जाने दीजिए । अब आप के हाथ में कुछ नही है और मेरे लिए ऐसा करेंगे तो आप को फिर बेइज्जत होना पड़ेगा और वो मैं नही चाहूंगा । इसपर बोले की मैने आप के साथ बहुत गलत किया अब दुनिया से जाने के पहले भूल सुधारूंगा । मैने कहा जाने दीजिए फिर से एक असत्य मत बोलिए तो नेता जी बोले की असत्य क्यों आप देख लेना इस बार । 

साधना जी ने नौकर को आवाज दी की फला वाली मिठाई ले आओ और चाय ले आओ , पानी भी लेते आना । मिठाई खाकर जो मुलायम सिंह यादव जी ने जोर देकर तीन मिठाई खिला दिया और चाय पीकर एक बार फिर उनसे माफी मांग कर मैं विदा हो । 

अफसोस कि फिर मुलायम सिंह यादव जी नही बल्कि उनकी अंत्येष्ठि में उनकी मिट्टी से ही मुलाकात हुई । 
उन्होंने क्या किया वो उनके साथ गया पर उस दिन अपने बोले गए शब्दो पर जिससे वो आहत हो गए थे मुझे आज तक अफसोस है ।

अशोक सिंहल का बयान

जब अशोक सिंहल ने मेरे बारे में बयान दिया था 

राम जन्मभूमि और बाबरी मस्जिद का मामला जोरो पर था । दोनो ही पक्ष अपने अपने पक्ष में देश भर में कार्यक्रम कर रहे थे । ऐसा ही एक कार्यक्रम बाबरी मस्जिद पक्ष ने आगरा की जमा मस्जिद के अंदर रखा था । उस कार्यक्रम में असाउद्दीन वोबैसी के पिता जी आए थे , जफरयाब जिलानी आए थे और ऐसे ही कई बड़े नाम थे इस पक्ष के ।मोहम्मद आजम खान साहब भी आए थे जो मेरी पार्टी के नेता भी थे और मेरे घनिष्ट मित्र भी ।आजम साहब के साथ मुझे भी वहां जाना पड़ा । पता नहीं क्यों या शायद पार्टी का महासचिव और प्रवक्ता होने के कारण मुझे भी मंच पर बुला लिया गया जिसके लिए मैं तैयार नहीं था । थोड़ी देर में मेरा नाम बोलने के लिए पुकार दिया गया जबकि ये केवल बाबरी एक्शन कमेटी का कार्यक्रम था ।
मैने भाषण दिया कि दो ही तरीके है कि दोनों पक्ष आपसी सहमति से इस विवाद का हल निकाल ले या फिर अदालत पर ही छोड़ दे । और कोई तरीका इस विवाद का हल नहीं कर सकता है पर विश्व हिंदू परिषद इसे अदालत का नहीं आस्था का मामला बताता है तो ध्यान रखना होगा कि किसी भी तरह सामाजिक सौहार्द खराब न हो और कौमी एकता बनी रहे इत्यादि इत्यादि।अंत में मैने कह दिया की जब हम जाती और धर्म में बटे हुए थे तो गुलाम हुए थे और जब एक हिन्दुस्तानी बन कर लड़े तो आजाद हो गए । ये बात सबको याद रखना चाहिए । ह से हिंदू और म से मुसलमान जब हम बनता है तब बनता है हिंदुस्तान । 
अगले दिन मेरा भाषण भी अखबार में छपा ।उस दिन अशोक सिंहल जी आगरा अपने घर आए हुए थे और उनका घर कालेज वाले मेरे घर के ठीक पीछे था ।उनको पता नहीं क्या समझ में आया कि उन्होंने बयान दे दिया कि हम चन्द्र प्रकाश राय से कहना चाहते है कि वो किसी मुसलमान को अपना बाप बना ले ।
मुझे अशोक सिंहल जैसे वरिष्ठ व्यक्ति से ऐसी उम्मीद नहीं थी । पर मुझे भी जवाब देना पड़ा कि मुझे तो यकीन है कि मेरे पिता ही मेरे पिता है और मेरे पिता पर मुझे गर्व है इसलिए मुझे पिता बदलने की कोई जरूरत नहीं । अशोक सिंहल जी बहुत वरिष्ठ है अपने बारे में वो स्वयं तय कर ले । 

काश आडवाणी तभी गिरफ्तार हो जाते

जब मुख्यमंत्री मुलायम सिंह जी को रात को जगा कर मैने कहा था कि आडवाणी जी को आगे न जाने दे रूरा स्टेशन पर गिरफ्तार कर किसी गेस्ट हाउस में रख दे । 
लालकृष्ण आडवाणी जी ने अपनी रथयात्रा की घोषणा कर दिया था और सोमनाथ से यात्रा शुरू करने के लिए वो दिल्ली से ट्रेन से जा रहे थे । मेरे एक मित्र जो दिल्ली में एक बहुत सेंसटिव विभाग में अधिकारी थे उनका मुझे फोन आया ।उन्होंने कहा की राय साहब यदि ये यात्रा निकल गई तो ये देश को बहुत मुसीबत में डाल सकती है और कुछ भी हो सकता है  । उन्होंने और भी बहुत कुछ कहा जो लिखना उचित नहीं है । 
उनका कहना था कि आप के मुख्यमंत्री के पास ये अवसर है की वो देश को बचाये वरना यात्रा जब उत्तर प्रदेश में आएगी की सरकार को सम्हालना मुश्किल हो जाएगा ।उन्होंने ही राय दिया कि अभी आप मुख्यमंत्री जी के पास जाइए और उनको समझाइए की इतने बजे ट्रेन कानपुर के पास रूरा रेलवे स्टेशन पहुंचेगी ।वही ट्रेन रुकवा कर आडवाणी जी को गिरफ्तार कर ले और उन्होंने ही राय दिया कि उनको चुनार के किले में गेस्ट हाउस में रखा जाए जिससे बहुत भीड़ बाद तमाशा नहीं कर सके । 
मैं कपड़े बदल चुका था पर तुरंत फिर कैसे पहने और मुलायम सिंह जी के घर पहुंच गया । जगजीवन नीचे वाले कमरे में बैठा था । मैने कहा कि अर्जेंट बात करनी है।वो बोला कि साहब सोने चले गए अब मैं तो बजर नहीं दूंगा । तो मैने खुद बजर दबा दिया। मुलायम सिंह जी ने फोन उठाया तो मैं बोला कि मैं सी पी राय हूं । कुछ जरूरी बात है दो मिनट के लिए नीचे आ जाइए । मुलायम सिंह जी नीचे ड्राइंग रूम में आ गए तो मैने उनको पूरी बात बताया और कहा कि बात गंभीर है और बिना देर किए निर्णय लेकर गिरफ्तारी करवा देना चाहिए । मुलायम सिंह जी बोले की जाने दीजिए जब उत्तर प्रदेश की तरफ यात्रा आएगी तब देखा जाएगा । और एक इतिहास बनते बनते रह गया ।शायद वो उस दिन हो गया होता तो नफरत के व्यापार के लिए भाजपा को कुछ और दिन लगा होता । जो माहौल देश भर में बन गया वो नहीं बना होता । देश भर का भाई चारा बिगड़ गया। नफरत की राजनीति परवान चढ़ गई तब बिहार में लालू प्रसाद यादव जी ने उन्हे गिरफ्तार किया । 
बाकी तो हम कल्पना ही कर सकते है कि क्या हुआ होता तो क्या होता ।
ये मैं पाठकों पर छोड़ देता हु की वो ये कल्पना करे ।

कारगिल शहीदों की पत्नियों का आयकर माफ हुआ


अटल_बिहारी_वाजपेयी_सरकार मजबूर_हुई  वादे_पूरा_करने_को ? 

कारगिल के शहीदो के #परिवारो को मिलने वाले  10 लाख पर 33% आयकर जमा करने का नोटिस भेजा था अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार ने और बाकी जो शहीदो को मिलता है उस पर चुप्पी साध ली थी ।
और 

आगरा मे भाजपा की अटल बिहारी वाजपेयी सरकार और पकिस्तान के राष्ट्रपति मुशर्रफ के बीच वार्ता होने का एलान हो चुका था कारगिल के जख्मो के बाद जिसमे पाकिस्तानी फौज हमारी जमीन पर आकर बैठ गई थी और उस सरकार को  पता ही नही चला । वो तो उस इलाके के किसी ने पास की छावनी को बताया तब मालूम पडा ।
फिर हमे अपने सैकड़ो जवान की शहादत देकर अपनी जमीन वापस मिली ।ये अलग बात है की भाजपा सरकार ने उसका भी जश्न मनाया ।
खैर उसके बाद ये वार्ता तय हो गई थी ।
शहीदो के परिवारो को तत्काल 10 लाख रुपया मिलता था और पेट्रोल पंप तथा निवास ।
कारगिल युद्द मे आगरा के भी कई जवान शहीद हुये थे । शहीदो के परिवार ताजमहल वाले इलाके मे रह रहे थे और कुछ अपने गांवो मे ।
चूँकि मैं बहुत ज्यादा सक्रीय रह्ता था इसलिए एक दिन एक परिवार की मुझे खबर मिली की वो लोग बात करना चाहते है । मैं मिलने गया तो उन लोगो ने अपना दुख बताया की देखिये सब कुछ हमारा चला गया पर अब 10 लाख का 33% आयकर जमा करने का नोटिस आ गया है और बाकी जो वादे किये गये उसमे से एक भी पूरा नही किया सरकार ने ।
मैं बात कर चला आया और फिर अपने सम्पर्को से अन्य जगह के शहीदो की स्थिति को भी पता किया तथा आयकर विभाग के बड़े अधिकारी से भी बात किया ।
उसके बाद आगरा के बुद्धिजीवियो , लेखक कवियो , शिक्षको तथा पत्रकारो को पूरी बात बताया और साथ ही हिंदुस्तान के वर्तमान समूह संपादक शशिशेखर जी जो उस वक्त आजतक मे बड़े पद पर थे उनको भी अपने कार्यक्रम की जानकारी दिया और उन्होने इस मुद्दे को पूर्ण समर्थन दिया ।
बस वो 8 तारीख थी यानी वाजपेयी मुशर्रफ वार्ता से 7 दिन पहले हम लोग आगरा के शहीद स्मारक से निकल पड़े जुलुस की शक्ल मे करीब 20 फुट लम्बा बैनर लेकर महात्मा गांधी मार्ग पर । जुलुस मे आगे मेरे साथ शहीदो की पत्नियाँ थी और कई प्राचार्य , पूर्व कुलपति, शिक्षक , कवि लेखक नाट्यकर्मी और काफी पत्रकार भी और बैनर था मेरी संस्था पहचान का ।तब की भाजपा सरकार भी इतनी लोकतान्त्रिक थी की मुकदमे कायम नहीं किया तथा हमें जुलुस भी निकालने दिया तथा जिलाधिकारी कार्यलय पर भाषण भी करने दिया और एक बड़े अधिकारी न इ हमारा ज्ञापन भी लिया और इसी कार्यक्रम में नहीं  बल्कि आये दिन हम लोग उस कार्यलय या कमिशनर के कार्यालय पर धरना भाषण कर लेते थे और ज्ञापन देकर शांति से वापस चले जाते थे |
उस दिन दिल्ली से आज तक की एक टीम आगरा आ गयी थी और हमारा पूरा कार्यक्रम उन्होंने कवर किया | जिलाधिकारी कार्यालय पर जहा हमारा जुलुस समाप्त हुआ आज तक की टीम ने हमारा भाषण और इंटरव्यू रिकोर्ड किया और उसे अगले २४ घंटे तक अपने समाचार में दिखाया | मैंने उस दिन कुछ मांगे रखा था | पहली मांग थी की कारगिल के शहीदों की पत्नियों को दिया गया आयकर का नोटिस वापस हो और आगे भी उन्सेक आयकर न माँगा जाये .उनका हक़ यानि रहने को घर तथा मिलने वाला पेट्रोल पम्प तत्काल दिया जाए और अगर ये सब नहीं  हुआ तो प्रधानमंत्री  बिहारी वाजपेयी जी और पाकिस्तान के राष्ट्रपति मुशर्रफ के बीच होने वाली शिखर वार्ता के दिन हम फिर जुलुस लेकर निकलेंगे | साथ ही दो मांगे मैंने मुशर्रफ जी से भी कर दिया था | पहली की जब वो भारत से वार्ता करने आ  रहे है तो कारगिल के लिए खेद व्यक्त कर के आये और दूसरी की जो भारत के युद्ध बंदी १९६५ और १९७१ से पाकिस्तान की जेल में बंद है उन्हे छोड़ कर आये और इसपर भी मैंने कहा था की मुशर्रफ  ने ये मांगे नहीं माना तो १५ को ठीक वार्ता के समय हम लोग उसी क्षेत्र मेर कही से विरोध में निकलेंगे | 
आज तक ने हमारा मुद्दा इतना उठा दिया था शशिशेखर जी के कारण की शहीदों की पत्नीयो की मांग अगले ४८ घंटे में ही मान ली गयी | पहला अभियान हम जीत चुके थे | ये जीत उन शहीदों की पत्नियों की थी ,आगरा के उस बुद्धिजीवी समाज की थी जो मेरे साथ खड़ा हुआ था और आजतक सहित उन सभी मीडिया के साथियो की थी जिन्होंने इस पवित्र काम को पूरा सम्मान दिया था | 
पर अभी कहानी बाकी थी जो अगले एपिसोड में है | 

2: मुशर्रफ ने मांग मान लिया

#जिंदगी_के_झरोखे_से


जिस मुशर्रफ ने पूरी वार्ता में कोई सकारत्मक मुह नहीं खोला उससे हमने एक मांग मनवा लिया 


आगरा मे भाजपा की अटल बिहारी वाजपेयी सरकार और पकिस्तान के राष्ट्रपति मुशर्रफ के बीच वार्ता होने का एलान हो चुका था कारगिल के जख्मो के बाद जिसमे पाकिस्तानी फौज हमारी जमीन पर आकर बैठ गई थी और उस सरकार को  पता ही नही चला । वो तो उस इलाके के किसी ने पास की छावनी को बताया तब मालूम पडा ।
फिर हमे अपने सैकड़ो जवान की शहादत देकर अपनी जमीन वापस मिली ।ये अलग बात है की भाजपा सरकार ने उसका भी जश्न मनाया ।

खैर उसके बाद ये वार्ता तय हो गई थी ।
शहीदो के परिवारो को तत्काल 10 लाख रुपया मिलता था और पेट्रोल पंप तथा निवास ।
कारगिल युद्द मे आगरा के भी कई जवान शहीद हुये थे । शहीदो के परिवार ताजमहल वाले इलाके मे रह रहे थे और कुछ अपने गांवो मे ।

चूँकि मैं बहुत ज्यादा सक्रीय रह्ता था इसलिए एक दिन एक परिवार की मुझे खबर मिली की वो लोग बात करना चाहते है । मैं मिलने गया तो उन लोगो ने अपना दुख बताया की देखिये सब कुछ हमारा चला गया पर अब 10 लाख का 33% आयकर जमा करने का नोटिस आ गया है और बाकी जो वादे किये गये उसमे से एक भी पूरा नही किया सरकार ने ।

उसके बाद आगरा के बुद्धिजीवियो , लेखक कवियो , शिक्षको तथा पत्रकारो को पूरी बात बताया और साथ ही हिंदुस्तान के वर्तमान समूह संपादक शशिशेखर जी जो उस वक्त आजतक मे बड़े पद पर थे उनको भी अपने कार्यक्रम की जानकारी दिया और उन्होने इस मुद्दे को पूर्ण समर्थन दिया ।

बस वो 8 तारीख थी यानी वाजपेयी मुशर्रफ वार्ता से 7 दिन पहले हम लोग आगरा के शहीद स्मारक से निकल पड़े जुलुस की शक्ल मे करीब 20 फुट लम्बा बैनर लेकर महात्मा गांधी मार्ग पर । जुलुस मे आगे मेरे साथ शहीदो की पत्नियाँ थी और कई प्राचार्य , पूर्व कुलपति, शिक्षक , कवि लेखक नाट्यकर्मी और काफी पत्रकार भी और बैनर था मेरी संस्था पहचान का ।

आजतक की टीम दिल्ली से आ गयी और बाकि आगरा के मीडिया ने भी सहयोग दिया और अगर ४८ घंटे में शहीदों  की पत्नियों की सब मांग पूरी हो गयी थी | मैंने  मुशर्रफ से मांग किया था की जब वार्ता करने आ रहे है तो पहले तो कारगिल पर खेद वक्त कर के आये और दूसरा तमाम ऐसे फ़ौज और एयरफ़ोर्स के परिवार  जिनको लगता था की १९६५ और १९७१ के युद्ध उनके जो परिजन गायब हो गए थे वो पाकिस्तान की जेल् में है तो वो लोग लगातार लिखत पढ़त करते रहे और इस मौके पर आगरा भी आ गए थे | ऐसे ही एक परिवार के साथ मैंने दो तीन पहले ही एक प्रेस कांफ्रेंस किया था | उन  लोगो की मांग भी मैंने जोड़ लिया था की इतने दिनों से बंद हमारे लोगो को छोड़कर आओ तब हम मानेगे की आप सही नियत से आ रहे हो और चेतावनी दे दिया था की यदि मुशर्रफ ने ये मांगे नहीं माना तो वार्ता के दिन वार्ता वाली जगह के आसपास ही मैं मुशर्रफ का विरोध करूँगा | 

शहीदों की पत्नियों की मांग तो भारत सरकार को मानना था तो वो मान ली गयी पर  मुशर्रफ से की गयी मागे अभी पूरी नहीं हुयी थी | वार्ता के एक दिन पहले मेरे दो रिश्तेदार एक  मेरी पत्नी के भाई जो आई ए एस अधिकारी थे और भारत सरकार में महत्तवपूर्ण पद पर थे  इस वार्ता की तैयारी के लिया आगरा आ गए तो होटल जाने से पहले घर आये और दूसरे मेरे फुफेरे भाई जो आई पी एस अधिकारी थे तथा एस पी जी के सबसे पद पर थे और प्रधानमंत्री की सुरक्षा के जिम्मेदार थे वो भी घर आये | जब उन लोगो को मेरे अगले दिन के कार्यक्रम का पता लगा तो ऊँ लोगो ने बहुत डराया की की ये दो राष्ट्राध्यक्षो की वार्ता है और पूरे शहर में कर्फ्यू के हालत होंगे तो पहले तो आप निकलेंगे कैसे और दूसरा ऐसा कुछ करने पर आप के साथ कुछ भी हो सकता है | 
मैंने कहा की देखा जायेगा पर कोशिश तो करुँगा | 
 
वार्ता का दिन आ गया तो अपनी गाडी में बैनर रख कर मैं निकल लिया | हा कर्फ्यू जैसा ही था सारे शहर और सड़क पर कोई नहीं था | आज इस सरकार का दौर होता तो मुझे या तो गिरफ्तार कर लिया जाता या नजरबन्द कर दिया जाता घर में ही पर ऐसा कुछ नहीं हुआ था और तेज चलता हुआ मैं उसी क्षेत्र में अपने एक साथी के घर पहुच गया | शहीदों की पत्नियों से भी आग्रह किया था की अगर संभव हो तो वो लोग उसी जगह पहुचने की कोशिश करे और वार प्रिसनर्स के परिवारों को भी पर मैं जब पंहुचा तो वहा कोई नहीं पंहुचा था तो मैं परेशांन हो गया की अब कैसे होगा | मैं जिसके घर पर बैठा था उनके घर मेरे एक दो साथी जो उसी क्षेत्र के थे वो भी आ गए तथा एक बहुत बुजुर्ग मुसलमान भी आकर बैठ गए | आगरा  ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया का मीडिया आगरा में था तथा और मुग़ल शेरटन होटल मीर्डिया सेंटर बना हुआ था | मैंने अपने मीडिया के साथियों द्वारा मुग़ल होटल में ये अफवाह नुमा फैलाने में कामयाबी हासिल कर लिया था की अमर होटल के पास कुछ होने वाला है बस ये नहीं पता था की क्या होगा |तो अलग अलग बहाने से पूर राष्ट्रीय तथा अंतरराष्ट्रीय  मीडिया के कैमरे अमर होटल की छत पर पहुच गए और ये भी भ्रम था की जो होगा वो मुग़ल होटल या ताज की तरफ से होगा तो भरी पुलिस भी लग गयी उसी तरफ | 

मैंने उस साथी और वहा मौजूद लोगो से कहा की धरा १४४ तोड़ने लायक तो हम लोग हो गए है और बैनर भी इतने लोग पकड़ कर पूरी चौड़ाई में सड़क पर चल सकते है तो वहा सन्नाटा था | इस माहौल में निकलने में सभी डर रहे थे तो मैंने कहा की कोई बात नहीं आप लोग रहने दीजिये मैं अपनी पत्नी और तीनो छोटे बच्चों को बुला लेता हूँ और हम ५ निकल लेंगे बैनर लेकर हमारा काम हो जायेगा | तब वो ८० साल के बुजुर्ग मुसलमान बोले क्या बरते हो हम चलते है आप के साथ |फिर शर्म के मारे सभी तैयार हो गए | हम लोग धीरे धीरे रणनीति बना कर डा जग्गी के अस्पताल पहुच गए की जिससे भी कोई पूछेगा वो  उस अस्पताल जाने की बात कर वहा पहुचेगा | वहा इकठ्ठा होते ही हम लोग बैनर लेकर पूरी चौड़ाई में सड़क घेर कर अमर होटल की तरफ निकल लिए नारे लगते हुए की कारगिल पर माफ़ी मागो ,माफ़ी माफी  मागो :हमारे जवानों को छोड़ दो छोड़ दो | हिंदुस्तान जिंदाबाद जिन्दाबाद ,पाकिस्तान मुर्दाबाद मुर्दाबाद इत्यादि | चारो तरफ सन्नाटा था तो आवाज गूजने लगी | अमर होटल के ऊपर खड़े मीडिया ने जो कैमरा दूसरी तरफ कर इन्तजार कर रहे थे कैमरा इस सड़क पर घुमा लिय और अधिकांश होटल से नीचे उतर कर इधर दौड़े |पुलिस भी इधर दौड़ी | सबसे आगे मेरे घनिष्ठं  मित्र और आगरा के एस पी सिटी आर पी  सिंह जी थे और उन्होंने मुझे देखा तो जहा थे वाही रुक गए और फ़ोर्स को भी रोक दिया | हम  लोग करीब तीन सौ मीटर चल कर उस जगह पहुच गए जहा एस पी सिटी और पुलिस कड़ी थी | तब तक कही से बचते बचाते दो शादीदो की पत्निया भी आ गयी और दो तीन लोग वार प्रिसनर्स के परिवार वाले भी जो वाही किसी होटल में रुके थे वो भी आ गए | मैंने अपना पूरा भाषण दिया जिसे अंतर राष्ट्रीय मीडिया और राष्ट्रीय मीडिया में से अधिकांश ने लाइव टेलीकास्ट किया क्योकि अमरीका से मेरे एक रिश्तेदार ने मेर्री पत्नी को फोन कर पुछा की अभी चन्द्र प्रकाश जी को देख उनको पुलिस गिरफ्तार कर रही थी | उस बुजुर्ग मुसलमान ने कहा की मिया मुशर्रफ मसला उस कश्मीर का नहीं है जो हमारे पास है मसला उस कश्मीर का है जो तुम्हारे पास है वो हमें दे दो तो मसला हल हो जायेगा | अपनी पूरी बात कह कर इज्जत से हम लोग गिरफ्तार हो गए |शहीदों की पत्नियों को मैंने जाने को कह दिया | 

हम लोगो को गिरफ्तार कर आगरा के पुलिस  लाइन में ले आया गया और सम्मान के साथ सी ओ लाइन के कमरे  में  बैठा दिया गया | आर पी सिंह जी ने कह दिया था या जो भी करण है पानी और चाय भी पिलाई गयी | उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री राजनाथ सिह जी भी प्रधानमंत्री जी   के अगवानी के लिए शहर में थे और वो उस वक्त अमर उजाला अखबार के प्रधान संपादक अशोक अग्रवाल के घर चले गए थे | जब वो वहा बैठे थे तो टीवी पर मेरा ही संमाचार चल रहा था जिसे देखकर अशोक अग्रवाल ने कहा की अरे भाई सी पी राय को क्यों गिरफ्तार कर दिया वो तो बहुत अच्छे आदमी है और अच्छा काम कर रहे थे | इसपर राजनाथ सिंह जी ने आगरा के एस एस पी को फोन मिलवाया और कहा की सी पी राय और उनके लोगो को इज्जत से उनके घर भिवाइये  इधर पूरी दुनिया का मीडीया मुझसे  बात करना चाह रहा था .सबको जवाब दे दे कर मेरा फोन जवाब दे गया था  | मुझे उस साथी के घर पर छोड़ा गया जहा मेरी गाड़ी खड़ी थी | वाही कुछ देर मैंने अपना फोन चार्ज किया और फिर परिवार को फोन कर बता कर की मैं छूट गया हु और अब मुग़ल होटल जा रहा हूँ जहा काफी मीडिया के लोग मेरा इन्तजार कर रहे इसलिए हो सकता है देर से आ पाऊं और मुग़ल शेरटन होटल चला गया | वहा एक एक कर मेरा इंटरव्यू होने लगा तो रात १० बज गए  | मीडिया के लिए नाच गाने और खाने का इंतजाम था | मीडिया के साथियों ने जिद किया की उन  लोगो के साथ ही खाना खाऊ पर मुझे  चिंता थी की आज मैंने इतना रिस्क लेकर किया उसका क्या होगा | 

वाजपेयी जी की मुशर्रफ से अगले दिन तक वार्ता फेल हो गयी थी | अगले दिन मुशर्रफ की सम्पदाको के साथ शाम को चाय थी | वहा मेरा मुद्दा उठ गया तो मुशर्रफ जिसने किसी मुद्दे पर मुह नहीं खोला था इस मुद्दे पर मुह खोला और बोला की हा मैंने अंतरराष्ट्रीय मीडिया में ये समाचार देखा ॉ मैं भी सिपाही हूँ मैं क्यों चाहूँगा कोई वार प्रिसनर इतने दिन मेरी जेल में रहे | मै ऊँ सभी परिवारो को आमंत्रित करता हूँ को वो लोग मेरे गेस्ट बन कर पाकिस्तान आये | मैं उन सभी लोगो को सभी जेलों में भेजूंगा अगर किसी का भी परिवार का कोई भी मिलता है तो मैं तुरंत उन्हें साथ में वापस भेज दूंगा और बाद में कई परिवार पाकिस्तान गए पर न कोई मिलना था और न कोई मिला | पर मुझ जैसे अदना से से आदमी ने बस थोडा इरादा मजबूत कर और थोड़ी हिम्मत कर चंद लोगो के साथ ये कर दिया की मुशर्रफ को हमारे मामले पर बोलना पड़ा और दो में से एक मांग माननी पड़ी | कारगिल पर उसने खेद व्यक्त नहीं किया ये मांग जरूर रह गयी |