शुक्रवार, 9 फ़रवरी 2024

जिंदगी_के_झरोखे_से। एक थे बेनी बाबू

जिंदगी_के_झरोखे_से
एक बेनी बाबु थे यानी बेनी प्रसाद वर्मा। वो भी मेरे साथ मुलायम सिंह यादव के महामंत्री रह चुके है | एक दिन उनके पैसे से नमक वाला खाना भी खाया है | १९९० की बात है मुझे उन्होंने फोन कर घर बुलाया तब वो सरकार में कैबिनेट मंत्री भी थे और पार्टी के मंत्री भी । उन्होंने कहा चलिए आज आप को बढ़िया खाना खिलाते है और बाहर तो बोले सरकारी गाड़ी छोड़िए आप की ही गाड़ी से चलते है । आगे बढ़े तो उन्होंने गाड़ी क्लार्क अवध होटल ले चलने को कहा । वहा सबसे टॉप फ्लोर पर रेस्त्रां में चले गए हम लोग । उन्होंने कई नॉन वेज डिशेस का ऑर्डर किया और पहले चिकन सूप मगवाया। बात चलने लगी और वो पार्टी के बारे में कुरेद कुरेद कर कुछ बाते पूछते रहे तथा मुझे जितना बोलना चाहिए था उतना मैं बोला । कुछ मामलों पर नेता जी के विचार पता नहीं क्यों मुझसे जानना चाहते थे | खाने के बाद आइक्रीम खाते हुए बहुत अफ़सोस से बोले की मुलायम सिंह ने बहुत चालाक बना दिया है सी पी राय कुछ नहीं बोले | अब क्या कहता मैं ? 

यूं तो जब भी कोई राजनीतिक हलचल होती देश या प्रदेश की उनका फोन आ जाता था इस राजनीतिक हलचल के बारे में मेरा विचार जानने को । चुनाव परिणामों पर भी वो मेरी राय जानना चाहते थे ।सबका जिक्र कहा तक करे पर एक घटना का जिक्र और और कर देता हूं

अमर सिंह के कारण बेनी प्रसाद वर्मा, मो आजम खान और हम भी पार्टी से निस्कासित कर दिए गए थे । मुझे काफी सालो से हमेशा जुकाम होता रहता था जिसके बाद मेरे पूरे साइनस में पोलिप बनते बनते भर गया था और मुझे सांस लेने में दिक्कत आती थी । किसी ने राय दिया की दिल्ली के गंगाराम अस्पताल में एक डाक्टर है जो पोलिप ऑपरेट कर निकाल देने के एक्सपर्ट है । मैं एक विश्वविद्यालय के साथी को लेकर दिल्ली जाना चाहता था ऑपरेशन के लिए पर बच्चे नही माने । बच्चो के साथ में दिल्ली पहुंच गया ।मेरी बड़ी बेटी सॉफ्टवेयर इंजिनियर बन चुकी थी और नोएडा में एक पीजी में रहती थी तो छोटी बेटी उसके साथ रुक गई और यू पी भवन में एक कमरा मुझे रहने को मिल गया तो बेटा मेरे साथ रुक गया ।

डाक्टर साहब ने पोलिप के 5000 ऑपरेशन कर रखा था । उनका कहना था की 15 मिनट में वो एक ऑपरेशन कर देते है पर मेरे ऑपरेशन में डेढ़ घंटा लग गया तो बच्चे थोड़ा घबड़ा गए । पोलिप इतना ज्यादा था की इतना समय लग गया । 

मुझे ऑपरेशन थियेटर से बाहर जब कमरे में लाया गया तो अभी तक मैं एनेस्थीसिया के नशे में ही था ।

इसी समय बेनी बाबू का फोन आ गया । बेटे ने बताया की अभी ऑपरेशन थियेटर बाहर आए ही है पापा । बेनी बाबू बोले की जरूरी बात है इसलिए बात करवाइए । बेनी बाबू कांग्रेस में शामिल हो गए थे और कांग्रेस सरकार के मंत्रिमंडल की शपथ होनी थी । उस समय उनकी जो सूचना आई वो राज्यमंत्री पद के लिए शपथ हेतु आई थी । बेनी बाबू बहुत वरिष्ठ नेता तो थे ही और कुर्मी बिरादरी में बड़ा जनाधार भी था । 

मुझे फोन दे दिया बेटे ने तो बोले अरे रायसाहब ये सोनिया ने तो धोखा दे दिया , राज्यमंत्री बना रही है ,में शपथ लेने जाऊं या नही जाऊं । मैने कहा की मुझे लगता है की आप को स्वतंत्र प्रभार का राज्यमंत्री बनाया जाएगा और यदि ऐसा होता है तो बुरा नही है तथा शपथ लेकर सोनिया जी को धन्यवाद देने भी जाएगा , शीघ्र कैबिनेट मंत्री और महत्त्वपूर्ण मंत्री भी बन जाएंगे । तब बोले की मुलायम सिंह का फोन आया था वो तो शपथ लेने से मना कर रहे थे तो मैंने कहा की आप उनकी पार्टी से बाहर आए है तो वो क्यों चाहेंगे की आप महत्वपूर्ण बने । शपथ लीजिए और केवल राज्यमंत्री बनाया जाए तो स्टीफा देना अपने हाथ में है और उन्होंने शपथ ले लिए तथा उस वक्त स्वतंत्र प्रभार का राज्यमंत्री बने और फिर स्टील के कैबिनेट मंत्री भी बना दिए गए ।

अकसर दिल्ली जाना होता और चर्चाएं होती रहती । ज्यादातर बेडरूम में लेते रहते या बैठे होते तो हर वक्त बगल में रखे थूकदान में थूकते रहते थे ।

एक दिन ऐसा भी आया जब उन्होंने लोकसभा में मुलायम सिंह यादव की मौजूदगी में ही उनपर बहुत से आरोप लगाए और उन्हे आतंकवादियों का साथी तक कह दिया और तमतमाते हुए उनका पैर पटक कर :::::; माई फुट वाला डायलॉग खूब चर्चा में रहा । 

बाद के चुनाव में चुनाव हार गए और फिर ऐसी परिस्थितियां बनी की समाजवादी पार्टी में वापस आ गए और उतनी गालियां देने के बदले राष्ट्रीय महासचिव बना दिए गए और राज्यसभा में भी भेज दिए गए क्योंकि वो एक पिछड़ी जाति के नेता थे ।

गुरुवार, 8 फ़रवरी 2024

पहाड़ की नागिन की तरह इठलाती हुई सड़के मसूरी

पहाड़ की नागिन की तरह इठलाती हुई सड़के कितनी रोमांचित करती है , कभी नीचे तो लगातार नीचे और कभी सीधी चढाई, एक तरफ ऊंचा पहाड़ तो दूसरी तरफ खाई ।
देखते है की बस वो रहा जहा जाना है पर कितना घुमाव होता है उतनी सी दूरी मे और कितने ऊंचा नीचा रास्ता होता है , बिल्कुल जिन्दगी की तरह । बहुत विरले होते है जो मुह मे सोने की चम्मच लेकर पैदा होते है , बाकी तो सभी की जिदगियाँ पहाड़ की चढाई जैसी ही होती है घुमावदार और थोडा सा चलने मे हंफ़ा देने वाली और ज्यादा समय लेने वाली । राजनीती मे तो ये कुछ ज्यादा ही होता है ।
पहाड़ के आज के सफर मे मुझे कुछ यूँ लगा की ये आज की व्यव्स्था और राजनीती जैसा है , एक तरफ गहरी खाई जो अधिकतर जनता के हिस्से मे आती है और दूसरी तरफ ऊंचा सीधा पहाड़ जिस पर चढा ही नही जा सकता है । खाई मे अगर मौत या तकलीफे है तो पहाड़ भी तो अनुत्पादक है और बेजान रूखा सा ।
कभी कभी लगता है की हम क्या देखने आते है इतना चल कर वो पहाड़ जिनकी हरियाली हमारे कर्मो से खत्म होती जा रही है ,या फिर कभी कभी गिर गयी बर्फ और चूँकि फिल्मो मे किसी हीरो हीरोइन को बर्फ का गोला एक दूसरे पर फेंकते देखा तो हम भी फेंक लेते है ,जैसे मेरी छोटी सी नतिनी इशान्वी मेरे ऊपर फेंक कर बहुत खुश हो रही थी ।
एक सिल्ली बर्फ को घिसवा कर ऐसा खेल अपनी छत पर भी खेला जा सकता है , पर फिर पहाड़ तो पहाड़ है और बात उसके नाम मे होती है कभी मसूरी , कभी शिमला तो कभी कश्मीर ।
मुझे पता नही क्यो पहाड़ो मे विचरण करना और थकना बिल्कुल पसंद नही है , पहाड़ ही क्यों समुद्र के बीच पर भी ।
मुझे अच्छा लगता है वह स्थान जहा से पहाड़ियां दिखती हो बर्फ से आच्छादित , या वह कमरे की खिडकी जिससे बस समुद्र को निहार सकूँ , अच्छा तो मुझे हरिद्वार का वो गेस्ट हाउस भी लगता है जो बिल्कुल बेराज पर बना है और उसकी बालकनी मे बैठ कर बेराज से कल कल की आवाज के साथ बहते पानी की आवाज और दूर तक के नदी का एहसास और उसके पार जंगल और पहाड़ की खामोशी ।
मुझे अच्छा लगता बस ये सब निहारना और खो जाना खुद मे या फिर कलम पकड़ कर रच देना कुछ । 
मुझे लगता है की प्रकृती निहारने की चीज है नापने की नही ।
आज भी गया मैं प्रकृती को निहारने पर गाड़ियो की भीड , चिल्ल पो , भीड का सैलाब इन सबने ग्रस लिया है प्रकृती को 
अब खोजूंगा कोई और जगह जहा ये शोर न हो ।
2006 मे ही तो आये थे जब हम सब थे ,उनके भगवान के पास जाने के पहले और रुके थे आई ए एस अकादमी के सामने वाले उस गेस्ट हाउस मे जो एकलौता जैसे झूल रहा हो पहाड़ से नीचे और उसके बाहर बना चबूतरा कितनी खूबसूरत जगह थी जहा धूप खिलती थी तो चमक उठता था सामने बर्फ से ढका पहाड़ । 
तब हमने तय किया था की यहा फिर आयेंगे पर फिर एक साल भर शायद हुआ था और साथी बिछड़ गया और शिमला हो ,कुफरी हो या मसूरी का वो गेस्ट हाउस या हरिद्वार की नदी के बेराज का वो खूबसूरत गेस्ट हाउस हमारी बाट ही जोह रहे है तब से।
अब तो डर लगने लगा है किसी भी ऐसे स्थांन पर किसी से भी ये कहने मे कि यहा फिर आयेंगे ।
पर

मंगलवार, 6 फ़रवरी 2024

मेरा_गांव_मेरा_घर

#मेरा_गांव_मेरा_घर 

आजमगढ़ में मेरे गांव में मेरा पैतृक निवास जिसमे सामने हिस्से में 10 कमरे है, सामने बरामदा है और घर के अंदर आंगन के चारो तरफ बरामदा है 
और जो दाहिनी दिख रहा है ये बैठक कहने को है इसमें सामने बड़ा बरामदा ,अंदर एक बड़ा कमरा ,नीचे तीन छोटे कमरे और ऊपर चार कमरे तथा एक और रसोई है ।।इसी के पीछे 60 के दशक का हो लैटिन बाथरूम बना हुआ है । 
घर के सामने आगे बहुत बड़ा द्वार और उसके भी आके काफी दूर तक जगह तथा अंत में एक छोटा सा बगीचा है ।
पहले कभी दरवाजे पर बहुत बड़ा छायेदार मौलश्री का छाएदार पेड़ तथा तथा आने बरामदे में बहुत ही मीठे और ठंडे पानी का कूवा था । इस रास्ते आने जाने वाले लोग मौलश्री के नीचे कुछ देर सुस्ताते थे और उस कुएं का पानी पीते थे ।ठीक सामने बीच में गन्ना पेरने और रस निकालने का कोल्हू था और दाहिनी तरह गुड बनाने का बड़ा चूल्हा या कडाह, उसके बगल में बहुत बड़ा इमली का पेड़ था और सामने की तरह बहुत बड़ा जामुन का पेड़ और शायद दो पाकड़ और गूलर का पेड़ था ।
दाहिनी तरह सामने तालाब है जो अब लोगो के अतिक्रमण से बहुत छोटा हो गया है और सूख भी गया वरना पहले उसमे बहुत मछली होती थी तथा एक परिवार द्वारा अपनी बहु की डूबा कर हत्या के काम भी आई थी । हम बच्चे लोग कटिया लगा देते थे और ज्योही कोई छोटी मछली पकड़ में आती थी पीछे वाले घर के बगल में जो तब बरदौर थी बैल गाय भैंस के लिए और सामने भूसा घर भी था उसके सामने के खाली मैदान में अरहर की सूखी डंठल जला लेते है और उसी पर मछली रख देते । थोड़ी देर में भुन जाती तो नमक लगाकर खा लेते और फिर दुबारा कटिया लगा लेते ।कभी कभी कहा जाता की तलाब हीड़ना है तो तमाम गांव के लोग तालाब पर हल्ला बोल देते और खूब हीडते थे ,पूरा तालाब मटमैला हो जाता तो सारी मछली परेशान होकर ऊपर आ जाती और मार ली जाती फिर अंत में अगर तय है तो बटवारा हो जाता वरना जिसने जो पकड़ा वो उसकी हो जाती थी ।
जाड़े में गांव में अधिकतम लोग चारपाई पर सोने के बजाय नीचे पुवाल बिछा लेते थे जो नीचे से गर्म रखता था और उसपर चादर या गद्दा बिछा लेते थे तथा रजाई ।
मेरे दरवाजे पर शाम से रात तक बातचीत की महफिल जमाते थी ।अगर गर्मी हुई तो जमीन पर खूब पानी का छिड़काव कर चारपाई और तख्त बिछ जाता, छत को भी पानी से ठंडा कर।लिया जाता सोने के लिए ।दरवाजे महफिल जमाते खासकर मेरे दादा जी के रहते कुछ ज्यादा और गांव में रहने वाले चाचा चूंकि शहर में पढ़ाते थे और वापसी में देर से आते थे तो थोड़ा संक्षिप्त । बाबा के समय जहा मानस चौपाई और दुनियादारी की तमाम बाते होती और अलग अलग घर के आए हुए लोग अपना अपना ज्ञान बाटते थे ,कभी बहस भी हो। जाती थी तो चाचा जी के समय गांव के लोगो की उत्सुकता उस दिन के अखबार को लेकर होती थी और देश दुनिया के क्या समाचार है ये जानने में होती थी ।
हम लोग जब शहर से जाते तो तमाम लोग मिलने आते और सुबह शाम चाय ,घुघनी, दाना भुजा या पकौड़ी और हलवा बनता जितने लोग आए होते थे ।
क्या क्या लिखूं गांव के बारे क्योंकि भावुक हो रहा हूं । मैं इसी घर में नही जो पुराने जमाने का दो मंजिला मोटी दीवार और छत पर करीने से लगाए गए खपड़ैल का घर थे उसके अंधेरे कमरे में पैदा हुआ था।
बाबा जी ईश्वर के यहां चले गए मेरे आगरा में घर से फिर बारी बारी गांव में रहने वाले चाचा और चाची भी चले गए ।।पहले है गर्मी की छुट्टी हम लोगो की गांव में ही कटती थी और कई बार किसी कारण से दो तीन बार जाना हो जाता था लेकिन सभी परिवार के लोग नौकरी वाले हो गए तो ये घर सूना हो गया । एक चचेचा भाई जो नेवी में था और अब बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय के ट्रामा सेन्टर में काम करता है वही गांव का सब देखता है। यदि रिटायर होने के बाद उसने गांव में रहने का फैसला किया तो हो सकता है की गांव फिर गुलजार हो जाए और हम लोग भी वहा कुछ दिन बिताने लगे ।
पर सभी भाइयों ने बनारस में घर ले लिया है इसलिए स्थाई निवास तो मुश्किल ही लगता है ।।
अब नही लिखा जाएगा मुझसे ।।
हा ये बता दूं ये जो दिख रहा है ये हमारे घर का सिर्फ  आधा हिस्सा है । पिता जी के चचेरे भाई से बटवारे के बाद जो काफी दिन ग्राम प्रधान रहे तथा वही इंटर कालेज के प्राचार्य रहे ।

मंगलवार, 30 जनवरी 2024

30 जनवरी मार्ग और बापू

#जिंदगी_के_झरोखे_से 
वो 30 जनवरी की तारीख़ थी जो भारत के इतिहास की काली तारीख़ साबित हुयी और भारत ही क्या दुनिया को मानवता का रास्ता दिखाने वाला सूरज अस्त कर दिया गया एक हत्यारे द्वारा ।
राष्ट्रपिता महात्मा गांधी हम सबके बापू दिल्ली के बिडला हाउस के एक छोटे से कमरे में रहते थे बहुत ही साधारण तरीक़े से । ज़मीन पर बैठते थे सोते थे , बहुत साधारण बर्तन में सादा भोजन करते थे ।
बापू रोज़ पीछे के मैदान में उपस्थित इंसानो से मिलते थे , उनके प्रश्नो का जवाब देते थे , रामधुन गाते थे , प्रार्थना करते थे और विभिन्न विषयों पर प्रवचन भी करते थे ।
कुछ देर पहले ही तो सरदार पटेल महत्वपूर्ण मुद्दों पर बात कर के गए थे और कल ही तो बापू में ड़ा राममनोहर लोहिया को बुलाया था चर्चा करने को । रात हो रही थी और ड़ा लोहिया थके हुए थे जबकि बापू कुछ व्यस्त थे । जब बापू वापस आए तो ड़ा लोहिया गहरी नीद में सो गए थे । बापू ने उन्हें नही जगाया और ख़ुद भी ध्यान करने के बाद सो गए । सुबह बापू जल्दी जाग गए और अपनी नित्य की दिनचर्या में व्यस्त हो गए और ड़ा लोहिया उनके बाद जगे । लोहिया बापू के पास गए की बापू मुझे नीद आ गयी थी बताइए क्या आदेश है । बापू का समय निर्धारित होता था और उसी हिसाब से उनका जीवन चलता था इसलिए बापू ने उन्हें आज यानी ३० जनवरी को आने को कहा और इतना ज़रूर कह दिया कि आवश्यक बात करनी है और कांग्रेस के भविष्य पर तथा उसमें इन लोगों की भूमिका पर बात कर कुछ महत्वपूर्ण निर्णय लेना है । ड़ा लोहिया चले गए । 
३० तारीख़ को मिलने वालो ने सरदार पटेल प्रमुख थे और गम्भीर चर्चा कर वो वापस का चुके थे । 
बापू अपने नियत समय पर अपने कमरे के इसी चित्र वाले दरवाजे से प्रार्थना स्थल के लिए निकले और ज्यों ही नीचे की सीढ़ियाँ चढ़ कर आगे बढ़े भारत का पहला आतंकवादी जो इतना कायर था की आज़ादी की इतनी लम्बी लड़ाई में वो देश के लड़ना तो दूर जिसने कभी मुह छुपा कर भी अंग्रेज के ख़िलाफ़ कोई नारा तक नही लगाया था ,जिसने किसी अंग्रेज के घर की दीवार पर ग़ुस्सा दिखाने के लिए कभी एक कंकरी तक नही फेंका था और जिसने चंद दिन पहले ही अपने हाथ पर मुस्लिम नाम लिखवा लिया था उसी ने जिन अंग्रेजो कि कभी औक़ात नही हुयी बापू को उँगली से भी छूने की उन्होंने की अंग्रेज़ी पिस्तौल से उन्ही अंग्रेजो कि बनाई तीन गोलियाँ बापू के सीने में उतार दिया और भागने लगा जिसको वही के माली ने तमाचे मार कर पकड़ लिया ।
अपने को हिंदुओं का ठेकेदार बताने वाली एक सगठन जो अब देश भक्ति का उपदेश देता है ने तुरंत देश भर में फैलाया की बापू को मुसलमान ने मार दिया पर तुरंत नेहरू जी और पटेल जी ने निर्णय लिया और हत्यारे का नाम देश भर तक रेडियो से पहुँचा दिया । देश की जानता रोटी हुयी सड़क पर थी और कांग्रेसी गोलीय जनता को सच बताने निकल पड़ी ।
ड़ा लोहिया बापू से मिलने के लिए आ रहे थे और अभी थोड़ा दूर ही थे की पता लगा की सूरज अस्त हो गया । नेहरू जी ने रोते हुए कहा कि रोशनी ख़त्म हो गयी । 
दूसरी तरफ़ संघ और हिंदू महासभा ने ख़ुशी मनाया और मिठाई बाँटा । 
जी आज तीस जनवरी को 74 साल हो गए । वो ताकते जी बापू की हत्या के लिए ज़िम्मेदार है सब तक पैर जमा चुकी है तथा अपने आका के सपनो को उतार देना चाहती है बापू के भारत में हिटलर और मुसोलिनी ने भी जो रास्ता तय किया था उसी पर चल कर उन्ही की तरह  मानवता का क़त्ल करके और देश को जहन्नुम बना कर । 
इसलिए ३० जनवरी हमें चेतावनी देती है देश को समाज को और मानवता को बचाने की चेतावनी और हिटलर मसोलिनी का नही बल्कि बापू के सपनो का भारत बनाने की । 
काश उस दिन ड़ा लोहिया दो नही गए होते या काश बापू की हत्या नही हयी होती और आचार्य नरेंद्र देव , ड़ा लोहिया , जयप्रकाश , अच्युत पटवर्धन इत्यादि कांग्रेस में ही रहे होते तो शायद तस्वीर कुछ और होती पर आज इस बात को याद करने का दिन नही है बल्कि मानवतावादी सत्य अहिंसा ग्राम स्वराज और स्वावलम्बन बनाम हत्या दंगे , राक्षसी सोच और अंधाधुंध पूंजीवाद के बीच चलती लड़ाई में से अपना पक्ष चुनने का दिन है ।
आइए बापू के साथ खड़े हो । 
#मैं_भी_सोचूँ_तू_भी_सोच

मंगलवार, 9 जनवरी 2024

जिंदगी_के_झरोखे_से। 1991 और वो सरदार जी

#जिंदगी_के_झरोखे_से 

सरदार जी जो बस बड़ी बाते कर एम एल सी बन गए :

1989 की बात है जब मैं मुलायम सिंह यादव जी के चुनाव का काम देख रहा था जसवंत नगर इटावा में । संभवतः पीलीभीत क्षेत्र के एक सरदार जी तथाथित तैर पर किसानों की कुछ समस्या लेकर मुलायम सिंह जी से मिले थे और शायद ये भी कह दिया था की उनके पास अच्छी खासी ताकत है कही भी भीड़ जाने के लिए ।तभी ये चुनाव पड़ गया । इस समय इटावा में बाबू दर्शन सिंह यादव जी बहुत बड़े और ताकतवर व्यक्ति थे तथा कभी मुलायम सिंह जी की मदद करते थे पर एक राजनीतिक घटनाक्रम के कारण जिसमे पहले उनको जिला पंचायत अध्यक्ष का चुनाव लड़ाने की बात कह कर मुलायम सिंह जी ने रामगोपाल यादव को उम्मीदवार बना दिया था उसी से आहत होकर बैर भी हो गया था और वो काग्रेस में चले गए थे तथा वहा के नेता हो गए थे । जसवंत नगर में मुकाबला उन्ही दर्शन सिंह यादव जी से होना था । इस समय सरकारी गेस्ट हाउस में रुकने पर पाबंदी नहीं थी वैसे भी मुलायम सिंह जी ने सिंचाई विभाग के एक सूट को अपना स्थाई निवास बना रखा था क्योंकि शहर में उनका घर नही था और गांव में भी बस घर था , और चुनाव में गाड़ियों का काफिला लेकर चलने तथा हथियारों के साथ चलने पर रोक नही थी । 
दर्शन सिंह जी का आतंक था की भट्ठे में झोकवा देते है लोगो को और वो मुलायम सिंह जी पर शक्ति में इस वक्त कुछ हद भारी भी थे या ऐसा मनोवैज्ञानिक असर था  इसीलिए जब तक 10/12 राइफल एकत्र नही हो जाती तब तक मुलायम सिंह जी भी प्रचार के लिए नही निकलते थे ( ये भी यही जिक्र कर दे की इसी चुनाव में मुलायम सिंह जी पर गोली भी चली थी जिसमे वो बाल बाल बच गए थे एक हमर  द्वारा धक्का दे दिए जाने के कारण ,फिर शायद दर्शन सिंह जी भी कही हाथ लग गए थे शायद इसलिए की उस घटना के वक्त मैं मौजूद नही था बाद में लोगो से और मीडिया के दोस्तो से पता लगा था जिन लोगो के अचानक उसी स्थान पर पहुंच जाने के कारण दर्शन सिंह जी बच गए थे )। 
ये चुनाव बड़ा तनाव वाला था इसी में एक बार मुलायम सिंह जी नाराज होकर मुझे कह दिया था की मैं तत्काल इटावा छोड़ दूं और इलाहाबाद जनेश्वर मिश्र जी के चुनाव में चला जाऊं क्योंकि मैं कही भी चला जाता और भाषण देने लगाया तो उस दिन मुलायम सिंह जी ने गुस्से में कहा था की आप जानते है को वो भट्ठे में झोकवा देगा और आप की हड्डियां भी नही मिलेंगी और मैं आप के परिवार को क्या जवाब दूंगा और मैने जाने से इंकार कर दिया ये कह कर की मेरी मौत जब आनी होगी तभी आयेगी उसके पहले किसी की औकात नही जो मुझे मार दे और मैने अपनी तरह ही प्रचार जारी रखा ।
मैं बात कर रहा था सरदार जी की जिनका नाम अब याद नहीं । 
इस माहौल के कारण उनकी बन गई और 10/12 सिख लोगो के साथ आ गए और सिंचाई विभाग के गेस्ट हाउस की एनेक्सी में जम गए और जम कर दारू और मुर्गा चलने लगा ।
एक दिन उनका इम्तहान हो गया । वोटिंग के दिन जसवंत नगर कस्बे के पास  वाली पोलिंग पर गोली चल गई और मतदाताओं को भगाया जाने लगा जिसमे स्थानीय दरोगा तथा एस डी एम भी शामिल थे । उस पोलिंग पर मुलायम सिंह जी के पक्ष में मतदान होने की सभवना थी । मेरे पास खबर आई तो मैंने सरदार जी से कहा की आप लोग तुरंत चलो ऐसा हो गया है। मैने 10 मिनट इंतजार किया पर सारे लोग एक दूसरे का मुंह देखते रहे और जाने के प्रति बिलकुल अनिक्षुक तब मैंने अपनी गाड़ी उस पोलिंग की तरफ बढ़ा दिया और वहा जाकर अधिकारियों से भिड़ गया । इतने दिनो में पूरा क्षेत्र मुझे जान गया था और मेरे भाषणों का आकर्षण भी खूब था +जिसका जिक्र अगले किस्से में ) तो मुझे देखते ही तीतर बितर हुए लोग पोलिंग पर इकट्ठे हो गए और अंततः अधिकारियों को झुकना पड़ा और फिर पोलिंग शुरू हो गई ।
चुनाव हो गया मुलायम सिंह जी जीत गए और मुख्यमंत्री बन गए । दर्शन सिंह जी के कारोबार और भट्ठो पर खुद तांडव चला सत्ता का उनकी आर्थिक कमर भी तोड़ी गई और उनको दिल्ली में घर लेकर तब तक शरण लेनी पड़ी जब तक सत्ता रही । ये अलग बात है की बाद में उनसे समझौता भी हुआ और पार्टी में उनका सम्मान भी हुआ और उनको राज्य सभा सदस्य भी बनाया गया जिसपर मुलायम सिंह जी ने भी कहा की इस क्षेत्र में कोई भी विरोधी क्यों हो और दर्शन सिंह जी मुझसे मिले तो पहले तो ये कहा की आप ही है वो सी पी राय ? मैं सोचता था की कौन है ये नौजवान को बिना डरे मेरे क्षेत्र में चुनौती दे रहा है और फिर उनसे मेरी बहुत अच्छी दोस्ती हो गई । उन्होंने कहा की मैने सोचा की अपनी दुश्मनों अगली पीढ़ी को क्यों दिया जाए इसलिए समझौता कर लिया ।
इस बीच उत्तर प्रदेश में एम एल सी चुनाव आ गए । इसी चुनाव में मैने आगरा के खेरागढ़ से टिकट मांगा था जिसके लिए संसदीय बोर्ड के अधिकांश सदस्य मेरे पक्ष में था चौ देवीलाल विशेस तौर पर और जॉर्ज फर्नाडीज इत्यादि भी पर मुलायम सिंह जी वहा एक बदनाम व्यक्ति को टिकट देना चाहते थे तो उन्होंने संसदीय बोर्ड में ये कह दिया की सी पी राय मेरा चुनाव देखे और जब मैं मुख्यमंत्री हो जाऊंगा तो एम एल ए क्या होता है सी पी राय उससे ज्यादा बना दिए जायेंगे और इसपर पहले जॉर्ज साहब फिर देवीलाल जी और चंद्र शेखर जी सहित सभी ने कहा कि में जाकर मुलायम सिंह जी का चुनाव देखूं और जब वो मुख्यमंत्री हो जाएंगे तो उनका बड़ा है बोर्ड के सामने तो हो सकता है कि राज्यसभा दे या एम एल सी बना कर मंत्री ही बना दे , पर दोनो के चुनाव हुए तो मेरा नाम कही नही था और वो सरदार जी सिर्फ बाते बना कर एमएलसी बना दिया गए ।।फिर मुलायम सिंह जी मुझसे जब तक  सरकार रही मिले ही नही हा मुलाकात हुई जब सरकार जा रहती और 1991 का चुनाव आने वाले थे ।