शनिवार, 23 दिसंबर 2023

जिन्दगी_के_झरोखे_से। ये कौन से राय है

#जिन्दगी_के_झरोखे_से--

#ये_कौन_से_वाले_राय_है ? 

( जिस सवाल ने पूरी जिंदगी पीछा नही छोडा और दीवार बना रहा किये का हक पाने मे भी )

1991का चुनाव हो चुका था और पार्टी सत्ता से बेदखल ही नही हुई थी बल्की बुरी तरह चुनाव हार चुकी थी ।
यद्दपि प्रदेश का चुनाव उस वक्त देखने के कारण मैं मुलायम सिंह यादव जी को बता चुका था कि 40 विधान सभा और 5 लोक सभा मुश्किल लग रही है और उनका कहना था कि सभी अधिकारी और सभी खुफिया एजेंसियां कम से कम 125 दे रही है ।
हुआ ये की 1989 मे पूरे महीने मुलायम सिंह यादव का चुनाव देखा था जब उन्होने हरियाणा भवन मे होने वाले संसदीय बोर्ड मे जिसमे मेरे पक्ष मे टिकेट को लेकर बहुमत था मेरा टिकेट यह कह कर कटवा दिया था कि मैं तो देश मे प्रचार के लिए जाऊंगा तो मेरा चुनाव कौन देखेगा ।मैं सी पी राय को टिकेट देने के खिलाफ नही हूँ पर वो मेरा चुनाव देखे और मैं मुख्यमंत्री हो जाऊंगा तो विधायक क्या होता है उससे ज्यादा उनको बना दूंगा और मीटिंग से निकल कर सबसे पहले जॉर्ज फर्नांडीज ने मुझे ये बताया और मैं समझ गया की खेल हो गया फिर भी प्रयास जारी रखा पर उनको ये टिकेट एक कांग्रेस से निस्कासित बदनाम व्यक्ति को देना था क्योकी इनका मानना था की बदनाम ही जीत सकता है जबकी विश्वनाथ प्रताप सिंह की लहर का चुनाव था और जो भी खड़ा होता उस सीट पर वही जीतता ।चौ देवीलाल जी मिले उन्होने भी यही कहा कि जिद मत कर वही मुख्यमंत्री होगा फिर के पता की राज्यसभा मे भेज दे या मंत्री बना दे एम एल सी बना कर ।
और मुझे इटावा मे आकर कैम्प करना पडा ।
जिला पंचायत के गेस्ट हाउस का एक नंबर कमरा रहने को मिल गया पर चाय तक पीने को दूर जाना पडता था और खाने स्टेशन के पास ।मुलायम सिंह यादव खुद सिचाई विभाग के गेस्ट हाउस का एक सूट अपना घर बना कर रहते थे क्योकी उनका बस गाँव मे ही एक साधरण सा घर था उस वक्त तक । बाद मे मुलायम सिंह यादव जी ने इन्तजाम कर दिया की उनके छोटे भाई राजपाल यादव मेरा इन्तजाम देखेंगे और भतीजे रनवीर मेरे साथ रहा करेंगे क्षेत्र के दौरे मे ।
उस वक्त इटावा शहर मे एक घर मे ऊपर की मंजिल पर राजपाल यादव और शिवपाल यादव दोनो एक साथ छोटे छोटे हिस्से मे रहते थे ।
राजपाल यादव ने ये तय किया की मेरा दोनो समय का खाना उनके और शिवपाल यादव की संयुक्त रसोई मे होगा दोनो समय पर और दोनो की पत्नियाँ अपने हाथ से बना कर दोनो समय खाना खिलाने लगी ,उस वक्त तक किसी के पास नौकर नही था ।
एक ऐसा दिन भी आया की मुलायम सिंह यादव सुबह 6 बजे बहुत नाराज होकर बोले की आप इटावा छोड दीजिये और जनेश्वर जी के चुनाव को देखिये इलाहबाद जाकर ।कारण ये था की मैं कही भी चला जाता और थोडे लोग भी होते तो भाषण करने लगता जबकी उस वक्त तक स्थिति ये थी कि जब तक 15/20 राइफल इकट्ठा न हो जाये मुलायम सिंह यादव खुद भी प्रचार मे नही निकलते थे क्योकी सामने दर्शन सिंह यादव थे जो बहुत मजबूत थे उस वक्त तक जब तक मुलायम सिंह यादव ने मुख्यमंत्री बन कर उनको भाग कर दिल्ली मे रहने को मजबूर नही कर दिया  पुलिस और सत्ता के सहयोग से ।
ये अलग बात है की बाद मे उनको पार्टी मे लाकर राज्यसभा भी दिया और दर्शन सिंह जी मेरे तो पहले ही दोस्त बन गये थे एक मुलाकात मे और ये शिकायत करते हुये की राय साहब मैं सोचता की ऐसा कौन आ गया जो मेरे घर मे घुस कर मुझे चुनौती दे रहा है और उन जगहो का नाम भी गिनाया जहा मैने उनके खिलाफ आग उगला था ।
मुलायम सिंह यादव ने कहा की आप को पता है की आप जहा यू ही चले जाते हो भट्ठे मे झोंक दिये जाओगे हड्डियां भी नही मिलेंगी की आप के परिवार को लौटा सकूं ।
आप अभी इलाहबाद निकल जाओ ।
मैने जवाब दिया की आप ने जो कहा था बोर्ड की बैठक मे वो याद रखो और मैं कही नही जाऊंगा ।किसी की औकात नही मुझे मारने की ।मेरी मौत ईश्वर ने जैसे तय किया होगा वैसे होगी उसकी चिंता आप मत करो ।
और मैं चुनाव तक वही रहा मुलायम सिंह यादव जी जीत भी गये और मुख्यमंत्री भी बन गये ।
पर मुझसे मुलाकात फिर तब हुई जब सरकार जाने का दिन आ गया और नये चुनाव की घोषणा हो गई ।
इस चुनाव मे मुलायम सिंह यादव ने मुझे लखनऊ रह कर प्रदेश की चुनाव व्यव्स्था देखने का काम सौपा । तब तक गेस्ट हाउस मे रुकने पर रोक नही थी इसलिए मैं स्टेट गेस्ट हाउस मे रुक गया और मेरे बगल वाले कमरे मे अटल बिहारी वाजपेयी जी रुके थे जो लोक सभा चुनाव लड़ रहे थे । हम दोनो के कमरे की बालकनी एक ही थी ( ये किस्सा बाद मे ) वैसे वही गलती किया मैने जो  1977 मे आज़मगढ़ के उप चुनाव मे  इन्दिरा गाँधी जी से मिलने के बाद किया था ।
इसी बीच किसी काम से मैं दिल्ली गया ,किसी काम क्या उस वक्त हमारी सरकार मे केन्द्रीय वाणिज्य मंत्री सुब्रमण्यम स्वामी के यहा से कुछ सामान लाना था (ये किस्सा भी बाद ने ,और न लिखू तो कोई याद दिला दे क्योकी इसमे एक सच का दर्शन होगा ) ।
दिल्ली से लौटते हुये मैं आगरा नही रुका बल्की इटावा रुका और खाना खाने राजपाल यादव और शिवपाल यादव के घर रुक गया । तभी वहा मुलायम सिंह यादव भी आ गये क्योकी किसी बच्चे की उंगली जल गई थी ।
हम दोनो खाने बैठे और उन दोनो की पत्नियाँ खाना लगा रही थी और ताजी रोटियां परोस रही थी । मुलायम सिंह यादव ने मुझसे पूछा की आप प्रदेश का चुनाव देख रहे है क्या लग रहा है ? मैने कहा की 40 विधानसभा और 5 लोक सभा हो जाये तो काफी है ।वो बोले की सभी अधिकारियो और खुफिया की रिपोर्ट तो कम से कम 125 की है ।
मैने कहा की 225 हो जाये तो मुझे खुशी होगी ।
उन्होने मेरा दिल्ली का काम पूछा और आगे का कार्यक्रम फिर मैं लखनऊ आ गया और वो अपने गन्तव्य को ।
चुनाव परिणाम आया जिसमे चन्द्रशेखर जी सहित हम केवल 4 लोक सभा चुनाव जीत पाये और 30 से भी कम विधायक ।
(बाकी चुनाव के बाद का किस्सा अगले एपिसोड मे )
एक दिन मुलायम सिंह यादव का फ़ोन आया की वो आगरा आ रहे है । आगरा मे राजस्थान के पुराने समाजवादी नेता पंडित रामकिशन जो 1977 मे भरतपुर से सांसद भी रह चुके थे उनके परिवार की बेटी की शादी थी ।
आगरा के बॉर्डर पर हम केवल 9/10 लोग अगवानी करने वाले थे जिसमे एक पूर्व मंत्री थी और भट्ठो का मालिक थे तथा उनके पास जीप थी और दूसरा मै जिसके पास अपनी कार थी और मेरे साथ 6/7 लडके ।
मुलायम सिंह यादव ने मुझे अपनी गाडी मे बुला लिया और मेरी गाडी एक कार्यकर्ता चलाने लगा ।शादी का कार्यक्रम खत्म कर हम लोग वापस उनको इटावा जाने के लिए जब छोड़ने वापस आने लगे तो मुलायम सिंह यादव के साथ बिहार के एक नेता भी आये थे हरेन्द्र नाथ प्रसाद और आते वक्त से इस वक्त तक वो मेरी और मुलायम सिंह यादव जी की लगातार चर्चाये सुन कर कुछ विचलित थे ।कुछ दूर चलते ही उन्होने मुलायम सिंह यादव से पूछा की साहब एक बात पूछना है । मुलायम सिंह यादव ने उनकी तरफ देखा की क्या तो बोले की ये जो राय साहब है ये हमारे बिहार वाले दारोगा प्रसाद राय ( जो यादव थे और कांग्रेस के मुख्यमंत्री रहे थे ) वाले राय है या कल्पनाथ राय वाले राय है (जो भूमिहार थे और इन्दिरा गाँधी के बहुत प्रिय और केन्द्र मे मंत्री ) ? कि आप इनपर इतना भरोसा जता रहे है ।
मुलायम सिंह यादव को शायद ऐसे सवाल की उम्मीद नही थी तो थोडा अचकचाये ,थोडा रुके और बोले कि ये कल्पनाथ राय वाले राय है पर नेताजी यानी राज नारायण जी के बहुत करीबी रहे है और प्योर सोशलिस्ट है और पूरे भरोसे के ।
मैने महसूस किया था उस वक्त की हरेन्द्र बाबू असली जाति  सुन कर अभी भी आश्वस्त नही हो पाये थे ये अलग बात की बाद मे मेरे प्रशंसक हो गये थे ।
कितने खट्टे मीठे अनुभव से भरी है मेरी जिन्दगी भी ।

जिन्दगी_के_झरोखे_से। १९८९ देवीलाल जी मेरा टिकट , मुलायम सिंह का चुनाव

#जिन्दगी_के_झरोखे_से

पहले #हरियाणा के #मुख्यमंत्री और फिर #देश के #उप_प्रधानमंत्री चौ #देवीलाल का भी मुझे बहुत स्नेह प्राप्त था ,उनके हरियाणा भवन या राष्ट्रपति भवन के गेट नम्बर ३६ के अंदर उनके घर जाना होता था तो घर के पीछे के लॉन में मिलते थे बातें पूछते और कुछ खिला कर ही जाने देते ।
उप प्रधान-मंत्री के रूप मे उन्होने मेरे घर का कार्यक्रम बनाया , जनता दल क्या पूर्ण विपक्ष का एक सबसे बडा स्तम्भ और धुरी बन गए थे उस वक्त वो और देश के सारे नेता उनकी तरफ देखने लगे थे, वही प्रेरणा थे , वही फैसलाकुन होते थे और उन्ही की सहयता पर सब आश्रित हो गए थे ।
वो तो मुझे 1989 का चुनाव भी लड़वाना चाहते थे और संसदीय बोर्ड के अध्यक्ष के नाते उनका फैसला आखिरी होता और बोर्ड के सदस्यो मे से बहुमत मेरे पक्ष मे था ।
पर हरियाणा भवन मे बोर्ड की बैठक मे  मुलायम सिंह यादव जी ने ये कह दिया की मैं देश मे प्रचार करूँगा तो सी पी राय मेरा चुनाव देखेंगे और जब मैं मुख्यमंत्री हो जाऊंगा तो फिर एम एल ए और एम पी क्या होता है उनका ऐसा स्थान हो जायेगा । बोर्ड की बैठक से आकर पहले जॉर्ज फर्नांडीज साहब ने कहा की जब होने वाला सी एम आप को अपना चुनाव इंचार्ज बनाना चाहता है तो चुनाव मत लडो उसका काम देखो ।फिर विश्वनाथ प्रताप सिंह और अन्य भी निकल कर यही बोले ।
एक दिन सुबह 4 बजे अशोका होटल दिल्ली मे भी कुछ ऐसा ही हुआ और फिर दिल्ली एयरपोर्ट के वी आई पी लाऊन्ज मे ।
वो सब किस्से फिर कभी ।
मैं मुलायम सिंह यादव जी के पूरे चुनाव मे जान की बाजी लगाकर जुटा रहा कि एक दिन वो बहुत गुस्से मे बोले की यहा से इलाहबाद जनेश्वर जी के यहा चले जाओ वर्ना आप की यहा हड्डियां भी नही मिलेंगी भट्टे मे झोंक दिये जावोगे जैसा दुस्साहस आप कर रहे हो ।
मेरा जवाब क्या था वो जाने देते है 
पर मैं रिजल्ट तक वही डटा रहा ।
बल्की मुलायम सिंह यादव जी अपने क्षेत्र के दौरे मे मुझे साथ रखते और अपने से पहले मेरा भाषण करवाते थे ।जो क्रम 1993 के बद तक के चुनावो मे भी चलता रहा की उनकी सभावो मे उनसे पहले मेरा भाषण होने लगा सब जगह ।
और बाद मे या आज तक क्या हुआ वो लिखने की जरूरत इसलिए नही की सब जानते है ।

जिंदगी_के_झरोखे_से। रामगोपाल यादव का चुनाव

#जिंदगी_के_झरोखे_से-'
#रामगोपाल_यादव_का_पहला_राज्यसभा_चुनाव

ये 1992 की बात है । मैं मुलायम सिंह यादव के घर गया था उनके बुलाने पर । तब वो 5 विक्रमादित्य मार्ग पर अकेले रहते थे और नीचे कोने मे छोटे से कमरे मे जगजीवन बैठता था जो तब तक टाईपिष्ट , खजांची ,व्यक्तिगत टेलिफोन ओपरेटर सहित सब बन चुका था और नीचे पायजामा तथा ऊपर कमीज पहनता था ।
बाहर गेट पर छोटी सी गुमटी बनी थी जिसमे सुरक्षा बैठती थी ।
मेरे लिए कोई रोक टोक नही थी कही भी जाने की ।
गेट पर राम अवतार शाक्य विधायक मिला जो अंदर से आ रहा था और उसकी आंखो मे आँसू थे । मुझे देख कर रुक गया ।मैने पूछा कि क्या हो गया तो बोला की मुलायम सिंह यादव ने डांट कर भगा दिया जबकी वो कुछ जरूरी बात करने आया था और आज पार्टी बुरी दशा मे है फिर भी ये बेइज्जती तो कोई पार्टी मे क्यो रहे ? मैने उसकी पूरी बात सुना और फिर बाहर ही उसे रोक दिया की वो मुझसे बिना मिले नही जायेगा ।मेरी आदत थी ये सबको जोडना । 
मैं अंदर गया ।मुलायम सिंह यादव तनाव मे टहल रहे थे । मैने पूछा कि क्या हो गया ? वो बोले की चंद्रशेखर जी के 4 विधायक पार्टी छोड गये और उन्होने अपने भाई को राज्य सभा उम्मीदवार घोसित कर दिया है अब क्या राजनीति करेंगे और क्या मुह दिखाएँगे ।
मैने कहा की पार्टी चंद्रशेखर जी के लोगो ने छोडा है और गुस्सा आप अपनो पर उतार रहे है इसका क्या मतलब है ।तो बोले की मूड ठीक नही फिर भी लोग चले आ रहे है ।मैने कहा उनको क्या पता ,आप गेट पर बोर्ड लगवा दीजिये मूड़ ठीक नही ।
तो चुप हो गए । मैने कहा की राम अवतार शाक्य को मैने रोक दिया है बाहर पहले उसे बुलाइए और अच्छी तरह बात करिए फिर बात करते है ।
उन्होने उसे बुलाया ,खेद व्यक्त किया और मिठाई खिला कर विदा किया ।फिर हम दोनो ड्राइंग रूम में बैठ गये ।
मैने कहा हमारे पास 25/26 विधायक बचे है , यदि मैं 2 विधायक का इन्तजाम कर दूँ तो क्या आप और बाकी लोग मिल कर 2/4 का इन्तजाम नही कर सकते ?  वो बोले की आप कैसे करेंगे ? बहुत पैसा मांगेंगे लोग और हम कहा से देंगे ? 1989 की सरकार मे उन्होने लूट नही किया था । मैने कहा की एक भी पैसा मेरे लोगो को नही देना होगा ।मैने कहा की अकसर आखिरी व्यक्ति 30 के आसपास वोट पर जीत जाता है । वो बोले की कोई निर्दलीय पूंजीपति खड़ा हो गया तो नही होगा ।
तब मैने कहा की काशीराम जी फला तारीख को कानपुर आ रहे है आप भी चले जाईये और यूँ ही उनके रूंम मे चाय पीने चले जाईयेगा सर्किट हाउस में ।
उन्होने कहा की काशीराम ने बयान दिया है कि वो चुनाव मे हिस्सा नही लेंगे ।
मैने कहा की बयानो का क्या अर्थ आप जाईये तो और मिल गया तो सीधे 11/ 12 वोट मिल जायेंगे ।
फिर हम लोगो ने चाय पिया और वही हुआ ।मुलायम सिंह जी की काशीराम की बात हो गई और वही 1993 मे दो दलो के समझौते की बुनियाद बनी ।
इस बीच जीवन मे पहली बार मैने गाडी के शीशो पर काली फिल्म लगवाया जो चुनाव के बाद हटा दिया ।
जनता दल के विधायक चन्द्रभान मौर्य और ओम प्रकाश दिवाकर को काली शीशे वाली गाडी मे ले जाकर मैने मुलायम सिंह यादव से मिलवाया और फिर कुछ और लोगो को भी ।
और अन्ततः रामगोपाल यादव अच्छे वोट से जीत गये ।
मुझे वो दृश्य भी याद है जब चुनाव जीतने के बाद सब लोग विधान सभा से राज भवन कालोनी के दफ्तर तक पैदल गये थे और मैं मुलायम सिंह यादव के साथ गाडी मे ।
पार्टी ऑफिस मे छोटा सा तखत लान मे रखा था उस पर मुलायम सिंह यादव ,राम सरन दास सहित हम कुछ लोग बैठ गये और बाकी सभी सामने नीचे लान मे जमीन पर और रामगोपाल जी सबसे पीछे ।
मैने उस कार्यक्रम का संचालन कर रहा था ।मैने मुलायम सिंह यादव से धीरे से कहा की रामगोपाल को मंच पर बुला ले आज उनका दिन है तो उन्होने मुझे धीरे से डपट  दिया की वही बैठने दो ,दिमाग खराब मत करो और मैं चुप हो गया ।
इससे पहले बैकग्राउंड ये है कि एक दिन दिल्ली के अशोका होटल मे चाय पीते हुए मुलायम सिंह यादव ने अचानक कहा की सी पी राय क्या आप को पता है कि रामगोपाल के बेटे भूखे मर रहे है ?
मैने कहा की वो तो डिग्री कालेज मे टीचर है और गाँव मे खेतो भी है तो भूखे कैसे मर रहे है ? फिर उन्होने ना पचने वाले तर्क दिये और मैं बात समझ गया और कह भी दिया कि भाई साहब आप उन्हें राज्य सभा देना चाहते है तो देगे ही पर उसके लिए ये सब बाते करने की क्या जरुरत है ।
मुझे अगली बार दे दीजियेगा । जो मौका कभी नही आया 
और रामगोपाल ने जिदंगी भर पता नही किस बात की मुझसे दुश्मनी निभाया की फिर कुछ मिलने ही नही दिया जो मेरा हक था और जिससे पार्टी का भी भला  ही  होता ।

जिन्दगी_झरोखे_से। संगम यात्रा

#जिन्दगी_झरोखे_से --

जब सुबह जगा कर एडीएम साहब #संगम ले गए थे --

उस दिन सुबह संगम के दृश्य । न जाने कितनी बार आया था #इलाहबाद पर उस दिन सुबह उठ कर उगते हुए सूर्य की किरणों के साथ संगम जाना और वहा दो नदियो या कहे की दो संस्कृतीयो और दो बहनो गंगा और यमुना का मिलन देखना सचमुच बहुत सुखद अनुभूति रही ।
एक दिन पहले कलक्टर साहब से बात हुई थी तो बोले की संगम गए है या नही और नही कहते ही उन्होने फरमान सुना दिया की सुबह तैयार रहियेगा फला एडिएम साहब संगम प्रेमी है वो  आप को ले जायेंगे । मैं सोचने लगा कि कहा मेरे मुह से नही निकल गया , क्या सचमुच इतनी सुबह आ जायेंगे एडीएम साहब , ना आये तो अच्छा । पर वही हुआ सुबह ही करीब 4,45 पर एडीएम साहब ने सर्किट हाऊस जो कलक्टर साहब जो मेरे मित्र थे उन्होने ही बुक करवाया था के मेरे कमरे का दरवाजा खटखटा दिया और फिर उनके साथ गाडी पर संगम जाना ही पडा ( किसी मुसीबत की तरह जो मेरे चेहरे पर साफ दिख रही है फोटो मे , पर वहा पहुच कर थोडी देर बाद एहसास हुआ की सचमुच मैं आज के पहले एक बहुत अच्छे अनुभव और मनोरम दृश्य से वंचित था ) जहा एक शायद सरकारी वोट तैयार थी और ए डी एम साहब के कोई नीचे वाले कोई कर्मचारी पहले से ही पहुच कर तैयारी किये हुये थे ।
खैर --
प्रयाग का संगम 
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सूरज उग रहा था और उनकी किरणे गंगा और जमुना के हरे और सफ़ेद पानी को सुनहरा बना रही थी ।क्या मनोहारी दृश्य था और इतनी सुबह की आस्था का सैलाब उमड़ा हुआ था ।ना जाने कितनी नावो में भरे हुए लोग इस ठिठुरती ठण्ड की परवाह किये बिना आये हुए थे की बिलकुल संगम स्थल पर ही आचमन लेंगे या डुबकी लगाएंगे ताकि ,जो भी उनकी मनोकामना या इच्छा हो । बहुत बड़ी संख्या में चिड़ियों को झुण्ड भी चारो तरफ कलरव कर रहा था ।मैं पूछ नहीं पाया की ये चिड़ियाँ  यहाँ स्थायी रूप से मौजूद रहती है या जाड़े में सूदूर बर्फीले इलाके से साइबेरिया इत्यादि से आई हुयी है इस वक्त ।ये जानकारी कोई दे सके तो आभार व्यक्त करूँगा ।
मुझे उस दिन पहली बार पता लगा की संगम के किनारे का किला अकबर ने बनवाया था ।कही नहीं वर्णन आ पाया होगा मेरे अध्ययन में ।अब जानना पड़ेगा की अकबर ने संगम को किला बनवाने को क्यों चुना और हर बात में विवाद ढूँढने वाले लोग  इसमें कोई विवाद नहीं ढूढ़ पाये क्या ।इस पर बाद में अध्ययन करने पर लिखूंगा ।
मेरे दो संस्कृतियो पर बहस छिड़ सकती है क्योकि दोनों  एक ही इलाके में है और मिलन के बाद तो बस गंगा बचती है और विलीन हो जाती है उसमे यमुना , सरस्वती कहां से निकलती है और कब विलीन हो जाती है रहस्य ही बना हुआ है ।
हां तो संस्कृति पर बहस की बात मैंने जान बूझ कर छेड़ा है । यद्यपि यमुना का हरा जल कुछ साफ़ दीखता है यहाँ पता नहीं कैसे जबकि इसके पीछे यमुना पूरी तरह गन्दी दिखती है लेकिन इस हरे रंग के किनारे की संस्कृति कुछ अलग है और उसका खुलकर वर्णन कर दूंगा तो विवाद बढ़ जायेगा । पर इस दो संस्कृति का मेरा आशय और अनुभव भी क्या है कभी लिखूंगा जरूर ताकि मेरी समझ भी साफ़ हो सके । हो सकता मैं जो समझ रहा हूँ उसमे कुछ पेंच हो या मेरे ही मन में किन्ही लोगो या घटनाओ के कारण कुछ खराश हो ।
गंगा का पानी सफ़ेद और कुछ मटमैला दीखता है संगम पर पर गंगा का किनारा पकडे हुए संस्कृति मटमैली नहीं दिखती ।
बताया गया की संगम पर गंगा और यमुना में भी एक युद्ध चलता रहता है । मैं कहूँगा की दो बहनो की आपसी अठखेली होती है या छेड़छाड़ । पर संस्कृति की बड़प्पन की लड़ाई भी हो सकती है ।
कभी गंगा यमुना को पीछे धकेल देती है तो कभी यमुना गंगा को, पर ये पता नहीं चलता की इस लड़ाई में सरस्वती की भूमिका क्या रहती है , तटस्थ एम्पायर या रेफरी की या बस मजा लेते हुए तीसरे व्यक्ति की ।
पर ये सच्चाई तो कबूल करना ही पड़ेगा की अंत में जीत जाती है गंगा और विलीन हो जाता है उसमे सब कुछ , अस्तित्व , संस्कृति , रंग , स्वाद और दोनों नदिया और फिर हथिनी की चाल से गौर्वान्वित चलने लगती है और गंगा भी विलीन हो जाने के लिए अपने से भी बड़े अस्तित्व में ताकि जीवन , मरण और फिर जीवन का चक्र पूरा हो सके ।
फिर समुद्र से भाप बन कर उड़ता है नया जीवन और नई तरह के जीवन बरस पड़ते है उससे जो फिर कही ताल तलैया , तो अलग अलग क्षेत्र में कोई गंगा , कोई यमुना , कोई राप्ती और कोई सरयू जैसा जीवन पाकर चलती रहे ताकि जीवो का जीवन चलता रहे ।
शायद मैं दर्शन से दर्शन की तरफ चला गया ।पर मुझे याद नहीं की इससे पहले उगता हुआ सूरज कब देखा था ।शायद जब कन्याकुमारी गया था नेता जी के साथ ।
इस सब दृश्य के बीच मोटर बोट मंथर गति से नदियो का सीना चीरती हुयी चली जा रही थी और वहां ले जाने वाले साथी वहां के बारे में , ऐतिहासिकता के बारे में और पुण्य के बारे में वर्णन करते जा रहे थे ।उन्होने आज बताया की यदि संगम नहीं आये तो सब तीर्थ बेकार है तो मन में बरबस आ गया की मैं तो कभी किसी मंदिर ही नहीं गया तीर्थ तो बड़ी बात है ,और तब तो यहाँ आकर भी मैं पुण्य का भागी नहीं बन पाया । वैसे ही शीत प्रकृति के कारण डुबकी लगाने का मतलब कुछ दिनों डॉ0 मित्रो की सेवा में रहना हो जाता पर दृश्य सचमुच ऐसा की मैं लिखे बिना नहीं रह सकता था । शायद ऐसे दृश्य ही लोगों को अपनी तरफ खींचते है और यही खिंचाव आस्था बन जाती है । अब तो साधन हो गए पर जब साधन नहीं रहे होंगे तब जो विलीन हो जाते होंगे इन दृश्यों के आगोश में वो स्वर्ग में जाने वाले और ईश्वर के बुलावे वाले वर्ग में शामिल हो जाते होंगे और जो वापस चले जाते होंगे घर वो ईश्वर की और संगम की कृपा से बच जाने वाले वर्ग में शामिल हो जाते होंगे और इसकी विषद व्याख्या अपने अपने जजमानों को सुनाने वालो की भी काफी तादात होती ही है ।
पर पुण्य मिले या न मिले क्योकि अभी तक कोई प्रमाणिक दस्तवेज और अध्ययन नहीं है जो साबित कर सके की पुण्य क्या है और किस किस को मिला तो क्यों और कैसे मिला और संगम में गहरी डुबकी मार कर भी जिन्हें नहीं मिला क्यों नहीं मिला ।
संगम पर ही जिंदगी जीने वाले मछुवारे ,नाव चलाने वाले और रोज नित्यकर्म से लेकर यही नहाने वाले तो पुण्य से मालामाल हो गए होंगे तो उनके जीवन में क्या विशेष है ये अध्ययन का विषय हो सकता है और शायद शोध से कुछ जानकारी मिले । फिर भी करोडो की आस्था का केंद्र है संगम तभी तो इतने कष्ट सह कर करोडो लोग यहाँ कल्पवास करते है और डुबकी लगाते है । आस्थाएं शायद लोगो को अतिरिक्त ताकत देती और भरपूर ऊर्जा भी ।
जी हां पुण्य मिले या न मिले पर उसी संगम के दर्शन कर लिए आज मैंने भी इतनी सुबह जाकर और इस सुबह जाने की मानसिकता और दबाव में पूरी रात नहीं सोकर तो इस कष्ट के लिए कुछ तो मिलेगा ही ।
पर ये सुबह का दृश्य की किसी भी मायने में कन्याकुमारी के सुबह के दृश्य से पीछे नहीं है और इसे सैलानियो को आकर्षित करने के लिए प्रचारित किया जा सकता था । उस दिन मुझे एहसास हुआ की मेरा प्रदेश किस कदर सुस्त ,दिशाहीन और संकल्पहीन है की राजस्थान अपनी रेट की मार्केटिंग कर लेता है ,कश्मीर , शिमला और अन्य अपनी बर्फ और ठंड, तमिलनाडु कन्याकुमारी का सूर्योदय जो ज्यादातर दिखता ही नही बादलो के कारण इसलिए कह रहा हूँ की जब मैं गया था मुलायम सिंह यादव के दौर मे  कन्याकुमारी तब रात भर जगा बैठा रहा बाल्कनी मे की कही सोता न रह जाउँ और सुबह बस हो गई बादलो मे छुपी हुई ,केरल से लेकर महाराष्ट्र तक समुद्र का किनारा ,तो चेरापूंजी अपनी बारिश और हरियाली ,भूटान सिक्किम मेघालय अरुणाचल अपने पहाड़ और दृश्य तो अमरीका तो बस यू ही किसी भी चीज पर मोटा टिकेट लगा कमा रहा है तो क्या चीज नही है उत्तर प्रदेश मे , साथ ही बिहार और मध्यप्रदेश इत्यादि मे भी , बस सैलानियो के लिए सुरक्षा का भाव अपराधियो और शोहदो से और पुलिस की लूट तथा कमाई के लिए परेशान करने वाली प्रवृति से , और अभाव है मार्केटिंग के लिए भाव , समर्पण ,इरादा और व्यव्स्था की ।
ले दे कर एक ताज महल, या बनारस का घाट भी कुछ लोगो को आकर्षित करता है ।
चलिये इस मुद्दे पर विस्तार से फिर कभी ।
बोलो गंगा मैया की जय (क्योकि जय केवल विजेता और शक्तिशाली की ही बोलने की परम्परा है तो मैं भी इस परम्परा को क्यों तोडू )।

जमशेदपुर कार्यकारिणी

#ज़िंदगी_के_झरोखे_से

जब जमशेदपुर मे राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक हुई थी । बैठक मे मुलायम सिंह यादव जी , जनेश्वर मिश्रा जी , आज़म खान साहब , संचालन कर रहे रमाशंकर कौशिक जी,रशीद मसूद जी , अलीगढ वाले चौ राजेन्द्र सिंह जी, हम भी और अमर सिंह ।
दूसरे चित्र मे प्रेस कांफ्रेंस के वक्त साथ मे बृजभूषण तिवारी जी और हम भी ।
इस आयोजन को करवाने वाले बन्ना गुप्ता आजकल झारखण्ड सरकार मे मंत्री है पार्टी बदल लेने के बाद ।