शनिवार, 23 दिसंबर 2023

मुलायम सिंह यादव का पिछड़ा प्रेम और उनका धोखा

#ज़िंदगी_के_झरोखे_से—

मुलायम सिंह यादव का पिछड़ा प्रेम और पिछड़ो का उनसे धोखा —
1989 की बात है राष्ट्रीय स्तर पर एक कमेटी में एक नाम मुलायम सिंह जी को देना था । मेरा नाम था पर उन्होंने एक अशोक यादव का नाम देना ज़रूरी समझा जिसका राजनीति से कोई लेना देना नही था , बस वो यादव था । नाम न देने के बावजूद मैं उस कमेटी में पूरी ताक़त और सक्रियता से रहा । 
फिर वही अशोक यादव मुलायम सिंह के ख़िलाफ़ लग गया यादव के गोत्र घोसी और कमरिया की लड़ाई लेकर । फिर वो जेल भी गया । 
1989 में ही मैंने एक चुनाव क्षेत्र से टिकट माँगा था और संसदीय बोर्ड में चौ देवी लाल से लेकर ज़ोर्ज फ़र्नाडिस सहित काफ़ी लोग मेरे पक्ष में थे पर मुलायम सिंह जी ने वहाँ यह कह दिया की मैं तो प्रचार में व्यस्त रहूँगा तो सी पी राय मेरा चुनाव देखेंगे और मैं कब मुख्यमंत्री हो जाऊँगा तो एम एल ए क्या होता है सी पी राय उससे ज़्यादा होंगे और ये बात बोर्ड की बैठक से निकल कर सबसे पहले ज़ोर्ज फ़र्नाडिस साहब ने मुझसे कहा हरियाणा भवन में । फिर उत्तर प्रदेश के लिए बनी समिति में से कु रेवती रमण सिंह जी और संजय सिंह जी भी मेरे पक्ष में थे पर मुलायम सिंह जी एक बदनाम पिछड़े को टिकट देना चाहते थे और दिया भी जो न पहले उनके साथ था और न बाद में उनके साथ रहा । वो सीट वी पी सिंह की लहर में ऐसी थी की जिसे भी मिलती वो जीतता । मैं उनके चुनाव में तमाम ख़तरों जिसके नाम पर वही एक दिन मुझसे नाराज़ होकर बोले थे की मैं वहाँ से जनेश्वर जी के क्षेत्र में चला जाऊँ वरना मेरी हड्डियाँ भी नही मिलेगी और भट्टे मे झोंक दिया जाऊँगा के बावजूद पूरे चुनाव में वही रहा और एम एल ए से बड़ा बनना तो छोड़िए मुख्यमंत्री बनने के बाद तभी मुलाक़ात हुयी जब सरकार चली गयी और इतने साल निकल गए इंतज़ार 
में की वादा कब पूरा होगा । 
इसके बाद भी मेरी ईमानदारी और कर्मठता को धता बताते हुए क्योंकि मैं अगड़ी जाती का हूँ पिछड़ो को बार बार आगे बढ़ाया जिन्होंने खूब लूटा और सारी राजनीतिक उपलब्धियाँ भी हासिल किया पर उन सभी ने मुलायम सिंह का साथ छोड़ने और उनके या परिवार के ख़िलाफ़ खड़ा होने में एक पल नही गँवाया । ऐसे तमाम मामले है । उनके से गुर्जर तुरंत भाजपा में गया और एक बघेल सिर्फ़ गए नही बल्कि पहले उनके भाई के ख़िलाफ़ ताल ठोंकी और अब अखिलेश के सामने है , पर फिर वक्त बदलने पर इन्ही को मिलेगा क्योंकि ये तथाकथित रूप से पिछड़े है । 

हमने आज भी सम्बंध नही तोड़े है । 

ख़ुद के कर्म ख़ुद के सामने आ खड़े होते है । 

हम जहाँ थे वही खड़े है हर मायने में ।

१९९१ की हार और वो अशोक होटल की घटना

#जिंदगी_के_झरोखे_से

1991/ 1992 की बात है, हम बुरी तरह हार गए थे जिसके बारे में मैंने पहले ही इशारा कर दिया  ।1991 के चुनाव मे मै प्रदेश कार्यालय मे बैठता था और चुनाव का काम भी देख रहा था ,बीच मे प्रचार के लिए या अन्य कामो के लिए भी चला जाता था । 
इसी मे ऐसा भी हुआ की सुब्रमण्यम स्वामी चंद्रशेखर जी की सरकार के मह्त्वपूर्ण मंत्री थे ।(ये किस्सा बाद मे लिखूंगा ) ।
सत्ता मे मुझसे कभी न मिले मुलायम सिंह यादव को सत्ता के आखिरी महीने मे मैं याद आ गया और मैं पार्टी का प्रदेश महामंत्री और प्रवक्ता बना दिया गया और ओर प्रदेश के चुनाव के काम लायक भी समझा गया ।चुनाव की हार के बाद आगरा मंडल का विशेस रूप से प्रभारी भी बना दिया गया पर जिम्मेदारी हर जगह पहुचने और अच्छा मीडिया कवरेज करवाने की होती थी दिल्ली मे ,प्रदेश मे और देश मे कही भी मद्रास से देहरादूण तक और  मुलायम सिंह यादव जी के साथ पूरे प्रदेश और देश के बहुत से प्रदेश के दौरे पर भी रहना होता  था और दिल्ली मे भी प्रेस के अलावा कुछ और काम सम्हालता था ।
मुलायम सिंह जी को जब दिल्ली आना होता था तो मुझे पहले ही दिल्ली पहुच कर यू पी भवन मे रुक कर कुछ इन्तजाम करने होते थे जिसमे पहले सम्राट होटल और फिर बाद मे अशोका होटल का सुईट बुक करना , एन एस जी जो चन्द्रशेखर जी ने पी एम पद से हटने से पहले दे दिया था ( क्यो और कैसे ये जाने देते है )  को खबर करना , उस समय सरकारी गाडी नही मिलती थी इसलिए आर के पुरम के सरदार जी से तीन अच्छी टैक्सी के बारे मे बोलना और जहाज के समय एयरपोर्ट जाकर उन्हे लाना और फिर जब तक दिल्ली मे हो साथ रहना ,लोगो से मिलवाना तथा वापसी पर एयरपोर्ट छोड़ने के बाद वापस घर जाना ।
डिटेल मे सब लिखना विश्वास भंग की श्रेणी मे आता है इसलिए वो मेरे बाद छपने वाली आत्मकथा या अनटोल्ड  स्टोरीस ऑफ इंडियन पोलटिक्स के लिए छोड़ता हूँ ।
ये किस्सा तब का है जब सम्राट छोड दिया था और अशोका होटल मे मुलायम सिंह जी रुकने लगे थे । दो कमरे वाला सुईट होता था जिसमे बाहरी ड्राइंग रूम में मे मैं बैठता था और दूसरे कमरे मे वो और एक अन्य साथी भी जो मुलायम सिंह के दिखाने को बड़े विश्वासपात्र थे जिसका कारण मैं आज तक नही समझ पाया ।कम उम्र के थे बंगाली थे । पर बहुत ही पावरफुल थे ।मेरे सामने ही मुलायम सिंह का उनको दिन भर मे कई बार फ़ोन आता था चाहे सत्ता रही हो या उसके बाद और वो अंदर जाकर बात करते थे । 
वो भी हमेशा होते थे दिल्ली आने पर साथ ही और अंदर होते थे 90% सिवाय जब खाना खाना या चाय पीना होता था तब हम सब साथ बाहर के कमरे मे बैठते थे । 
वो सज्जन कितने पावर फुल थे की दिल्ली के 
कैलाश हिल्स जैसी जगह जगह जहा बहुत ही बड़े लोग रहते है उन्होने 3 या 4मंजिल की बहुत ही भव्य कोठी बना ली थी और सत्ता के दौरान उत्तर प्रदेश के काफी सुरक्षा कर्मी उनके यहा ड्यूटी करते थे खैर उनको पद भी दिया गया था जिसका दर्जा संभवतः चीफ सेक्रेटरी के बराबर कर दिया गया था । और काफी संपन्न होने के बाद एक दिन अचानक कैलाश हाइट्स की कोठी बेच कर वो सम्भवतः न्यूजीलैंड चले गए परिवार के साथ या कही और पता नही पर सुना यही था ।
उनपर विस्तार से बाद मे लिखूंगा ।
अभी बस एक घटना तक सीमित करता हूँ ।
एक दिन की बात है मुलायम सिंह यादव जी अशोका होटल मे रुके थे और हा इन दोनो होटलो के सारे बिल पर हस्ताक्षर मुझे करने होते थे किसी के बिहाफ पर जो देश के बहुत बड़े सेठ है ।
उस दिन मुलायम सिंह से कोई बहुत ही खास मिलने आने वाला था ।सारे फ़ोन पहले मैं ही उठाता था इसलिए उन्होने मुझसे कहा की फला मिलने आयेंगे उनको सीधे बाहर से मेरे वाले कमरे मे पहुचा दीजियेगा और फिर चाहे जिसका फ़ोन आये मना कर दीजियेगा की मैं कही जरूरी काम से गया हूँ और कह गया हूँ की शाम को आऊँगा । मैने पूछा भी की अगर फला फला का फ़ोन आया तो ? 
तो बोले की कहा न की किसी का भी तो किसी का भी ।
कुछ समय हुआ और पहले चौ हरमोहन सिंह का फ़ोन आया ,फिर उदय प्रताप सिंह का , फिर ईशदत्त यादव का और इसी तरह अन्त मे राम गोपाल यादव का ।
मैने सबको वही जवाब दे दिया । पर चूँकि दिल्ली मे भी मैं हर जगह साथ जाता था तो लगता है इन लोगो को शक हो गया और ये लोग एक ही जगह बैठे थे ।एक साथ अशोका होटल आ गये । मेरी साइड का दरवाज खुला रहता था तो सब अंदर आ गए और मुझे काटो तो खून नही क्योकी मैं झूठ नही बोलता पर यहा नेता के आदेश का पालन कर रहा था । इन लोगो को तो होटल से बाहर ही पता लग गया था की मुलायम सिंह अंदर ही है क्योकी ब्लैक कैट कमांडो और गाडी बाहर पोर्च मे मौजूद थी । इन सबकी आंखो से लगता था की मुझे भस्म कर देगे । मैने अंदर जाकर बता दिया की ये लोग मना करने पर आ गए है ।
थोडी देर मे जो आये थे दूसरे कमरे के दरवाजे से सीधे बाहर निकल गए तो मैं फिर अंदर गया और मैने कहा की एक आप के भाई है और बाकी भी सब सांसद अब ये सब मुझे दुश्मन मांन लेंगे तो मुलायम सिंह बोले की चिंता मत करो ये सब मेरी वजह से है ।
आगे लिखने की जरूरत नही की राम गोपाल सहित सभी ने मेरे बारे मे क्या विचार बनाया होगा और फिर क्या किया होगा 
पर अफसोस की मुलायम सिंह ने कभी ये साफ नही किया की उन्होने मना किया था और न कभी रामगोपाल के प्रकोप से कभी बचाया जो पीठ पीछे ही होता रहा घातक तरीके से ,बल्की उनका नाम लेकर ही मेरा अहित करते रहे की उससे बात करो की क्यो नाराज है ।
जैसे मैं बच्चा हूँ या मन्द बुद्धि हूँ ।
यह नीचे की फोटो नैनीताल मे आयोजित प्रदेश कार्यकारिणी की बैठक के समय की है ।
इसपर भी लिखूंगा ।

१९९१ मंडलीय सम्मेलन और १४ लाख की थैली

#जिंदगी_के_झरोखे_से 

#1991_मंडलीय_सम्मेलन_और_14_लाख_की_थैली 

बात 1991 के चुनाव के बाद की है पता नही वो घटना अभी तक मैने लिखा या नही जब रात भर चुनाव परिणाम देखने के बाद मैं सुबह ही मुलायम सिंह यादव जी के घर पहुचा था और इतने बुरे परिणाम से वो बेचैन थे ,जबकी पहले ही दिल्ली से लौटते हुये शिवपाल जी कर घर पर उन्हे मैं ऐसे परिणाम की आशंका जाता चुका था प्रदेश का चुनाव देखने के कारण पर सारे अधिकारी और इंटेलीजेंस एजेंसियां उन्हे 125 से 150 तक की रिपोर्ट दे रही थी ।
केवल 29 एम एल ए और चंद्रशेखर जी समेत केवल 4 एम पी सीट सत्ता मे रहते उनको विचलित कर गई थी ।
मिलते ही बोले कि अयोध्या के कारण ये तो सारी जनता नाराज हो गई है इत्यादि । मैने कहा कि छोटा हूँ पर एक बात कहना चाहता हूँ कि अब हमे इसी स्टैंड पर कायम रहना चाहिये । आप ने कुछ बुरा नही किया बल्की मुख्यमंत्री होने के कारण संविधान की रक्षा किया है और उस पर आप को गर्व होना चाहिये । ये ठीक है की संघ अभी जहरीला प्रचार कर कामयाब हो गया पर कल जब लोग समझेंगे की देश तो संविधान और कानून से ही चल सकता है न कि दंगो से तो यही प्रदेश आप को फिर वापस लाएगा ,और हम दोनो चाय पीने बैठ गये और उसी समय ये भी तय हुआ की मात्र 7 दिन मे चुनाव लड़े विधनसभा के 425 और लोक सभा के 85 लोगो की बैठक बुला लिया जाये (इसका किस्सा अलग से ) ।कल्याण सिंह की सरकार बन गई थी ।
पर सरकार जाने के बाद बडा संकट था और पार्टी चलाने मे दिक्कत हो रही थी क्योकि इस मुख्यमंत्री काल मे मुलायम सिंह जी ने पैसे के बारे मे सोचा ही नही था और जहा तक मुझे पता है सिर्फ एक मामले मे ओम प्रकाश चौटाला ने कुछ दिया था जो दिल्ली से टी सीरीज कैसेट के डिब्बो मे ले जाया गया था और जो आया भी वो चुनाव मे खर्च हो गया था । दो बार तो त्योहार के मौके पर भी हम दफ्तर के स्टाफ को तन्ख्वाह नही दे पाये तब मैने तपन दादा को कुछ रुपए दिये की वो जगजीवन और शरमा इत्यादि बराबर बराबर बांट ले और त्योहार मना ले ,तपन अब बुजर्ग हो गये है पर है और जगजीवन तो आज बहुत रईस भी है और एम एल सी भी । इसी तरह मुलायम सिंह जी के घर का फ़ोन कट गया और कई दिन बाद जुड़ा तब एक दिन मैने महामंत्री के रूप मे लोगो का आह्वान कर दिया की जितना मन हो चाहे 5/10 रुपया ही सही मुलायम सिंह यादव जी को मनी ऑर्डर करे ।जो भी पहुचा मैने पूछा नही ।
2 महीने बाद ही मुलायम सिंह यादव जी एक सामाजिक कार्यक्रम के लिये आगरा आये और जैसा की हमेशा होता था कि अन्त मे प्रेस से मुलाकात मेरे निवास पर होती थी । उस दिन भी हुयी ।
प्रेस के बाद इटावा जाना था तो बोले की आप भी चलिये रास्ते मे बात करते चलेंगे और आज ही ट्रेन पकड़ कर लखनऊ जाना है तो आप उसके बाद वापस आ जाईयेगा ,ऐसा अक्सर ही होता था उस दौर मे । मुझे ऐसा याद आता है कि उस दिन देश के जाने माने कवि और हमारे सांसद उदय प्रताप जी भी साथ थे जिन्होने बाद मे मुझसे शिकायत किया था कि रास्ते भर आप दोनो ही बात करते रहे और मैं तो महज श्रोता बना रहा ।
हम लोग इटावा सिचाई विभाग के डाक बंगला पहुचे जहा शायद मुलायम सिंह यादव जी के आने की खबर नही दी गई थी तो जिस सुईट मे ये रुकते थे पुलिस के किसी डी आई जी को आवंटित हो गया था । मैने वहा के व्यवस्थापक को हड़काया कि आवंटन किसी का हो पर जब प्रोटोकोल मे बडा व्यक्ति आ जाता है तो वो आवंटन अपने आप निरस्त हो जाता है ।खैर डरते डरते की साहब मेरे खिलाफ कुछ न हो जाये उसने कमरा खोल दिया ।मुलायम सिंह जी अंदर गये और बस बाथरूम होकर बाहर आ गये कि अच्छा मौसम है ,बाहर पार्क के चबूतरे पर बैठते है जबकी जून आखिर या जुलाई का आरम्भ था और तेज गर्मी थी ।
खैर हम लोग वही बैठ गये । मुलायम सिंह यादव जी का मानना था को कम से कम एक साल चुपचाप आराम किया जाये और राजनीतिक गतिविधिया बंद रखा जाये क्योकि अभी कही भी निकलने पर जनता का गुस्सा झेलना पड़ सकता है ।
मैने कहा की मैं इस बात से सहमत नही हूँ और वही मैने बीजेपी तथा आरएसएस के गढ आगरा से ही तत्काल कार्यक्रम शुरु करने को आमंत्रित किया । वो सहमत नही थे पर मेरे जोर देने पर मान गये की प्रदेश कार्यकारिणी और वरिष्ठ नेताओ की बैठक कर इसपर बिचार हो जाये तो मैने कहा की देर क्यो हो तत्काल बुला लिया जाये और शायद एक हफ्ते बाद ही वो बैठक बुला ली गई लोहिया ट्रस्ट के हाल मे ।वहां मैने सबसे पहले अपनी बात रखा और तर्क की क्यो तत्काल बाहर निकल कर सक्रिय हुआ जाये और आगरा से ही क्यो । तब कुछ लोगो ने कहा की आगरा मे पार्टी नही है और पार्टी का कोर वोटर नही है कार्यक्रम फ़ेल हो सकता है तब मैने आश्वस्त किया कि आगरा मंडल का कार्यकर्ता सम्मेलन रखा जाये और बाकी सब मुझ पर छोड दिया जाये और उसी मे मैने प्रस्ताव रख दिया कि पार्टी चलाने के लिये 5 से 10 लाख तक की थैली भेंट करने की कोशिश भी की जाये और कार्यक्रम तय हो गया सम्भवतः अगस्त की कोई तारीख तय हुयी ,हम लोग मई अन्त मे चुनाव हारे थे ।
मैं वापस आगरा आया और सबसे पहले कागज पर योजना और अनुमानित बजट तथा अपना कार्यक्रम बनाया और दूसरे दिन ही आगरा का सर्किट हाउस तथा सूर सदन हाल बुक कर दिया तथा बाहर पार्किंग मे लगाने के लिये पंडाल और बैठने का इन्तजाम की भीड ज्यादा हो तो अव्यवस्था न हो और अपने एक दोस्त के बात कर गैलरी से बाहर के पंडाल तक देश के किसी भी कार्यक्रम मे पहली बार क्लोस सर्किट टीवी का इस्तेमाल की व्यव्स्था भी । शाम को आगरा मे जो थोडी बहुत पार्टी थी जनता दल टूटने के बाद जिसमे अधिकतर मेरे द्वारा जोड़े गये 8/10 लडके थे उनकी मीटिंग किया और सबको काम अभी से बता दिया । अपने एक दोस्त के होटल मे आने वाले लोगो के लिये 5000 पैकेट खाना बनाने की बात तय कर दिया ।
आगरा के अन्य नेताओ से कह दिया की मुलायम सिंह के आगरा आने से लेकर जाने तक ठहरना , पूरे सम्मेलन का खाना, शहर भर मे स्वागत द्वार और स्वागत , वाल राइटिंग, गाडियाँ इत्यादि सब मेरी जिम्मेदारी और बाकी लोग थैली के लिये धन एकत्र करे ।
इसके बाद मैं मंडल भर के सभी जिलो के दौरे पर निकल गया सभी जिला अध्यक्षो को बता कर और तब तक मंडल बटा नही था अलीगढ़ भी इसी मे था । सभी जिलो मे मैं सम्मेलन और थैली के लिये माहौल बनाने मे कामयाब रहा ।
सम्मेलन से दो दिन पहले से पूरे महात्मा गांधी मार्ग पर वाल राइटिंग मैने खुद भी किया ,खम्भो पर चढ़ चढ़ कर झंडे और बैनर मैने खुद भी बाधे ताकी कार्यकर्ताओ मे उत्साह रहे क्योकि वो धन का नही जन का जमाना था और राजनीती के ये सब काम कार्यकर्ता ही करते थे और हम जैसे लोग तो छात्र राजनीति से ही करते आ रहे थे ।
कार्यक्रम के एक दिन पहले कई दिनो से आता मुलायम सिंह जी का फ़ोन फिर आया कि अभी भी कार्यक्रम रद्द कर दीजिये फेल जो जायेगा और मैने कहा की आप ट्रेन पकड़ लो रात को सुबह मैं स्टेशन पर मिलूंगा ।
उस दिन सुबह 4 बजे मैने कार्यक्रम स्थल की व्यवस्थाये देखा और खुद मंच के पीछे का बडा बैनर टंगवाया और फिर स्टेशन रवाना हो गया । मुलायम सिंह जी और साथ मे आज़म खान साहब आये थे । अपनी योजना के अनुसार पहले स्टेशन के सामने किले के गेट पर अम्बेडकर मैदान मे बाबा साहेब अम्बेडकर की मूर्ति पर इन लोगो से माल्यार्पण करवाया और फिर सर्किट हाऊस पहुचा कर ये कह कर घर आ गया कि आप लोग तैयार हो जाइये और लोगो से मिलिये 10 बजे  निकलेंगे हम लोग ।
घर आया थोडी देर लेटा पर नीद कहा तो उठ कर नहा धोकर तैयार हो गया और 9,45 पर फिर सर्किट हाऊस पहुच गया ।
हम लोग बड़े काफिले के साथ वहाँ से निकले और महत्मा गांधी तथा अन्य महापुरुषो की मूर्तियो पर माल्यार्पण करते हुये काफिला महात्मा गांधी मार्ग पर निकला जिसपर समाज के सभी समाजो तथा धर्मो की तरफ से अलग अलग चौराहो पर स्वागत द्वार पर स्वागत हुआ तथा दो स्थानो पर मुलायम सिंह जी को सिक्को से तौला भी गया और जब हम लोग कार्यक्रम स्थल पर पहुचे तो बाहर ही बडा हुजूम था । अंदर गये तो एक एक सीट पर किसी तरह अटक कर दो दो लोग बैठे थे और सारी सीढियां ही नही बल्की मंच के सामने का खाली स्थान भी भरा था और मंच पर भी तिल रखने को जगह नही थी क्योकि सारे पूर्व और वर्तमान सांसद , विधायक , सभी प्रमुख पदाधिकारी तथा अध्यक्ष इत्यादि मंच पर आ गये थे और मेरे तथा पड़ोस मे रहने वालो के बच्चे भी जबकी मेरे प्रोफेसर पिता तथा पत्नी इत्यादि भी नीचे कार्यकर्ताओ मे बैठे थे ।
दो बात का जरूर उल्लेख करना चाहूँगा कि  मैने अपने कार्यकर्ताओ से कहा था कि जिसकी जहा जिम्मेदारी है वही रहेगा यहा तक की मुलायम सिंह भी सामने आ जाये तो नही हिलना है और बाद मे मैं सबको मिलवाउंगा और साथ फोटो भी करवाउंगा , दूसरा मैने ऐसी व्यव्स्था किया था कि पानी के लिये बस इशारा करिए आप तक पहुच जायेगा और खाने के समय भी सब अपनी जगह ही रहे वही अधिक से अधिक 15 मिनट मे सबको खाना और पानी मिल जायेगा और वही हुआ भी किसी कार्यक्रता ने अपना काम नही छोडा और सारा वितरण मेरी योजना अनुसार ही हो गया ।
मुलायम सिंह जी चाहते थे की अपने स्वागत भाषण और राजनैतिक भाषण के बाद कार्यक्रम का संचालन मैं ही करू पर मेरी ये कमी है की कोई जिम्मेदारी लेने के बाद उसके हर पहलू पर निगाह रखना तथा समय पर व्यवस्थित रूप से चीजो करवा लेना मेरी बेचैनी मे शामिल रहता है इसलिए भाषण के बाद और पूरे कार्यक्रम का ब्योरा देने के बाद मैने पूर्व सिचाई मंत्री बाबू राम यादव से संचालन का आग्रह किया और फिर बाकी सब व्यवस्थित करने मे लग गया जिसका जिक्र ही अखबारो ने किया की सी पी राय मंच पर रहने के बजाय लगातार भाग दौड करते रहे ,करता भी क्यो नही कोई बडी और प्रशिक्षित तथा संपन्न पार्टी तो थी नही ,साधन विहीन ,कमजोर पार्टी थी और आगरा मे सब नये नौजवान थे मेरे जोड़े हुये तो लगता था कही परेशान न हो जाये ।
हा दो दिन पहले लगातार 2/3 घंटे बैठ कर मैने राजनीतिक प्रस्ताव , आर्थिक प्रस्ताव इत्यादि लिख कर प्रिंट करने भेज दिया था और फ़ाईल और कार्यक्रम के पहले वाली रात कई लोग फाइल बनाने मे लगे रहे मेरे घर के बाहर बनी झोपड़ी मे बैठ कर जिसमे कुछ लोग बाद मे बहुत महत्वपूर्ण हो गये और मेरे प्रोफेसर पिता रात को उन सभी को बना बना कर ट्रे भर भर चाय पिलाते रहे और साथ बैठ काम भी करवाते रहे और घर के अंदर मेरी पत्नी और बच्चे भी क्योकि 5000 फाइल बननी थी ।
कार्यक्रम के प्रारंभिक औपचारिकताओ के बाद थैली भेंट होनी शुरु हुयी । वादा किया था कि 10 लाख की कोशिश होगी पर 5 तो होगा ही और भेट किया सब लोगो ने मिल कर 14 लाख जिसके लिये मैने पहले खरीदी अटैची जिसकी दुकान पास ही थी वापस भेज कर बडी अटैची मंगवाया और मथुरा के पंडित राधेश्याम शर्मा ने 50 ग्राम सोना भेट किया ।
दिनभर तमाम नेताओ का भाषण हुआ और अन्त मे मुलायम सिंह जी का नम्बर आया ।वो बहुत भावुक हो गये थे ऐसे स्वागत और कार्यक्रम से तो बोले कि मैं पहले भी कई बार आगरा आया हूँ , चौ चरण सिंह के साथ भी आया जब तीन विधायक थे तो कार्यक्रम रतन मुनी जैन इंटर कालेज मे हुआ था । मैं कल तक सी पी राय से कहता रहा की कैन्सिल कर दीजिये पर इनका आत्मविश्वास था और बोले की बस आप आ जाइये और आज सर्किट हाऊस से यहा तक हर चौराहे पर स्वागत हुआ । यहा भी इतनी भीड हो गई है को अंदर ,बाहर गैलरी और उसके बाहर का पंडाल भरा है और पहली बार मै ये देख रहा हूँ की बाहर वाले लोग भी सब लोग बाहर लगे टीवी पर सब कुछ देख और सुन रहे है । सी पी राय ने उतने अच्छे सब प्रस्ताव लिखे है और बहुत अच्छा सारा इन्तजाम किया है और अनुशासन के साथ सारा इन्तजाम ।
मेरी निगाह मे  यह कार्यकम भीड से ,प्रस्ताव से अनुशासन से , व्यव्स्था से और राजनीती के लिये सर्वश्रेष्ठ कार्यक्रम है और इसका श्रेय केवल सी पी राय को जाता है ।मैने सोचा था 5 लाख नही तो कुछ तो मिलेगा ही पार्टी चलाने को पर यहा तो 5 क्या 14 लाख रुपया और सोना भी मिला है । सी पी राय ने ये कैसे सम्भव किया इनसे बाद मे पूछूंगा पर पार्टी आज से फिर चल गयी और इसके लिये सी पी राय को याद रखा जायेगा ।
नेता के सामने भीड हो और सब अच्छा हो तो जोश तो आ ही जाता है ।जबरदस्त भाषण दिया मुलायम सिंह जी ने और उनके पहले आज़म खान साहब ने भी । काफी बडी संख्या मे नेता लोग बोले ।
सम्मेलन के बाद मैने सूर सदन के बाहर पोर्च से सार्वजनिक सभा को संबोधित करने का इन्तजाम पहले से ही कर रखा था तो मुलायम सिंह को पोर्च पर ले गया । ये बात उनको पहले से नही बताया था ।शाम करीब 5 बज रहा था एम जी रोड पर भीड का समय था और सभा के कारण बडा जाम लग गया ।
सभा के बाद मेरे निवास पर प्रेस से वार्ता और भोजन था । अपने निवास पर मैने कार्यकर्ताओ से उनको मिलवाया ।मुलायम सिंह जी गदगद थे और मेरे सभी कार्यकर्ता भी पर जब स्टेशन उनको छोड़ने गया अपने निवास से तब तक मेरे गले की आवाज मेरा साथ छोड चुकी थी पर तसल्ली इतनी थी की पार्टी को मैने फिर से रफ्तार दे दिया था धन से भी और आत्मविश्वास से भी और खासकर मुलायम सिंह जी का आत्मविश्वास लौट आया था जो बहुत जरूरी था और फिर हम लोग निकल लिये पूरे प्रदेश मे ।
मैने तो बस इमानदारी से अपना कर्तव्य निभाया था ।
कुछ छूट गया होगा तो वो आत्मकथा मे मिलेगा ।

आंदोलन की निराशा

हमें याद है युवा आंदोलन और उसकी आवाजे क्योकि हम उसका हिस्सा रहे है ।
1967/68 अंग्रेजी हटाओ आंदोलन ( बहुत दिनों तक नारा लगता रहा - अंग्रेजी में काम न होगा फिर से देश गुलाम न होगा )
परिणाम ?????% अंग्रेजी बढती गयी और आंदोलन करने वाला छात्र और नौजवान छला गया ।
1975 जयप्रकाश आंदोलन , कुर्सी खाली करो की जनता आती है , संघर्ष हमारा नारा है ,भावी इतिहास हमारा है , और सत्ता नही व्यवस्था परिवर्तन करना है ।
परिणाम- बस सत्ता बदली और नौजवान फिर छला गया । पढाई और रोजगार का नुकसान हुआ ।
1989 राजा नहीं फ़कीर है देश की तकदीर है ।
परिणाम - एक और सत्ता परिवर्तन और नौजवान से बस छलावा ।
से लेकर 2014 - अच्छे दिन ,2 करोड़ रोजगार ,15 लाख ,गुजरात मॉडल तक 
कब तक नौजवान केवल लोगो को सत्ता दिलवाने का हथियार बनता रहेगा ? इस उम्मीद में की शायद अब उसके लिए अच्छे दिन आएंगे ।
नौजवान भावना में बह कर केवल अपनी जिंदगियां ख़राब करता रहा है ।
नौजवानों कब चेतोगे और एक फैसलकुन फैसला करोगे सचमुच के व्यवस्था परिवर्तन के लिए ,समाज परिवर्तन के लिए ,गैर बराबरी ,भ्र्ष्टाचार और धोखे से मुक्ति के लिए ।
नहीं चेते तो बस किसी न किसी के नारे लगाते रहोगे और अपनी जिंदगी में हारते रहोगे उन लाखो की तरह जो तुमसे पहले हार कर बूढा गए है भरी जवानी में ।
और तुम्हारी जगह फिर नए नौजवानो की फ़ौज तैयार हो जायेगी किसी का आंख बंद कर और जूनून के साथ नारा लगाने को और वो कुर्सियों पर बैठते रहेंगे ।
पर व्यवस्था कभी नहीं बदलेगी ,समाज कभी नहीँ बदलेगा और तुम भी कभी नहीं बदलोगे ।
या फिर खूब चिंतन कर एक बार खड़े हो जाओ और आने वाली पीढ़ियों को मुक्त कर दो इस छल से और उसका रास्ता सुगम बना दो ।
( एक  सफर का चिंतन पर पता नहीं क्यों और कितनी भृकुटियां तन जाएँगी मुझपर जिसकी मैंने कभी चिंता नहीं किया क्योंकि सच जिन्दा रहना चाहिए --- क्योकि मेरी आँखों में कुछ सपने है )
जय हिंद

#दरोग़ा जी आए है

#जिंदगी_के_झरोखे_से

ध्रुवलाल यादव दारोगा जी आये है कुर्सी छोड दो -

मुलायम सिंह यादव जी को दरोगा और पुलिस से बहुत प्यार रहा है ,उसी का एक किस्सा है ये ।
हम लोग सत्ता से बाहर थे और कार्यक्रम बहुत करने लगे थे और दौरे भी ।
ऐसा ही एक कार्यक्रम लगा फीरोजाबाद का, वहा जैन मन्दिर प्रांगण मे चौ हरिमोहंन सिंह यादव के स्वागत का कार्यक्रम था जिसमे मुलायम सिंह यादव जी मुख्य अतिथि थे । प्रदेश महामंत्री ,एक मात्र प्रवक्ता था और सब जगह साथ जाना होता था तो इस कार्यक्रम मे भी था ।
कार्यक्रम के बाद फीरोजाबाद के रईस जैन साहब ने अपने घर पर खाना रखा था और वही मैने प्रेस बुला लिया था ।प्रेस के बाद खाना हुआ और हम लोग बात करने तथा जो लोग मिलना चाहते थे उनसे मिलने के लिए वही बैठ गए ।उस जमाने मे दारोगा ध्रुव लाल यादव की बहुत चर्चा थी अलग अलग कारणो से ।बाद मे एक एनकाउन्टर मे वो मारे भी गए जो रहस्य ही रह गया ।क्योकी चर्चाये कुछ और भी हुई ।
अचानक कोई आया की ध्रुव लाल यादव आ रहे है ।
ये बात बताना जरूरी है कि मैने फीरोजाबाद एकमात्र शहर देखा जहा लोग कार्यक्रमो का मुख्य अतिथि उस जमाने मे किसी वी आई पी , साहित्यकार , डी एम, एस पी को नही बल्की दक्षिणी थाने के थानेदार को ही बनाते थे ।
ध्रुव लाल प्रकट हुये तो कोई कुर्सी खाली नही थी । मुलायम सिंह यादव ने ने मेरी तरफ कुछ इस तरह देखा की मैं उनके लिए कुर्सी छोड दूँ पर मैने अनदेखा कर दिया और बगल मे बैठे विधायक से बात करने लगा ।
2 मिनट ही उनको खड़ा रहना पडा होगा कि सेठ जी के एक रिश्तेदार सेठ और फीरोजाबाद के एक नेता ने कुर्सी छोड दिया और विनम्रता से अपनी अपनी कुर्सी पर बैठाने के लिए पूरी जद्दो-जहद कर दिया ।
इस पोस्ट का मतलब है भी और न समझे तो नही भी है ।