बुधवार, 12 अक्टूबर 2022

पग यात्रा ,पद यात्रा और पथ यात्रा और राहुल गांधी ।

पग यात्रा ,पद यात्रा और पथ यात्रा और राहुल गांधी ।
पद यात्रा देती है पद प्रतिष्ठा और पहचान ।

भारत क्या पूरी दुनिया मे अनंत काल से पग यात्रा चल रही है ।इंसान रोज अपने पैरो पर चलता है अपने कामो से उद्देश्य कुछ भी हो यूँ ही टहलना ,किसी भी काम से जाना , पूजा पाठ के लिये या नौकरी और व्यापार के लिये जाना पर पग यात्रा व्यक्तियो के स्वयं तक सीमित होती है ।

पद यात्रा का अपना इतिहास है वो अमरीका मे मार्टिन लूथर किंग के नेतृत्व मे कालो के अधिकारो के संघर्ष के लिये हुयी हो जब 1960 के दशक मे वो लड़ रहे थे और 1965 मे सेल्मा अल्बामा से मोन्टगोमरी तक यात्रा निकली तथा अन्ततः अफ्रीकी अमरीकी नागरिको के साथ न्याय हुआ ।  भारत मे अभिनेता सुनील दत्त ने आतंकवाद खिलाफ पद यात्रा किया तो जापान जाकर परमाणु हथियार के खिलाफ । चन्द्रशेखर जी की भारत यात्रा भी एक दौर मे देश के उत्सुकता जा कारण बनी जब उन्होने कन्याकुमारी से दिल्ली तक की यात्रा किया , यद्दपि उसी समय इन्दिरा जी हत्या ने उनकी यात्रा का असर फीका कर दिया पर उनको नेता के रूप मे राष्ट्रीय फलक पर स्थापित कर दिया जिसके कारण वो आगे चल कर प्रधानमंत्री बने ।आन्ध्र प्रदेश मे वाई एस राजशेखर रेड्डी ने पद यात्रा से सत्ता हासिल किया तो उनके पुत्र जगन रेड्डी को भी सत्ता दिलाने का काम किया पद यात्रा ने और चन्द्र बाबू नायडू ने भी ऐसे ही सत्ता हासिल किया ।सीमित मामलो मे इन्दिरा गाँधी के काम आई ऐसे यात्रा 1977 के बाद तो 2017 मे  दिग्विजय सिंह की यात्रा मध्य प्रदेश में कांग्रेस के काम आयी । ऐसी तमाम छोटी बड़ी पद यात्राए होती रही है। अब राहुल गांधी पद यात्रा पर निकले है ।
पद यात्राओ ने हमेशा अपने यात्री को पद प्रतिष्ठा और पहचान दिया है तो राजनीतिक पद यात्राओ ने सत्ता दिया है । यद्दपि सत्ता तो रथ यात्राओ ने भी दिया पर उन्होने साथ ही हिंसा , विध्वस और नफरत भी दिया तथा उनसे मिली सत्ताए लोगो के पैरो के छाले देखने तथा भूखे पेटो की आवाज सुनने मे नाकाम रही क्योकी उनका पाला ही नही पड़ा और वो केवल एकल प्रवचन करते हुये जनता को अपने मनचाहे शोर और स्वार्थ मे डुबोते हुये गुजर गयी ।
जबकि पथ यात्रा विचार यात्रा होती है जो परिवर्तन कारी होती है और गौतम बुद्ध से लेकर महत्मा गाँधी होते हुये विनोबा भावे तक ने अपने अपने स्तर की पथ यात्राए ही किया वैसे अमरीका मे मार्टिन लूथर किंग की यात्रा को भी इसमे शामिल किया जा सकता है ।जहा सिद्धार्थ ने राजपाट छोडा और महत्मा बुद्ध बन गये और एक ऐसा पथ बनाया जिसका अनुगामी विश्व का एक बडा हिस्सा हो गया वही महत्मा गाँधी की चम्पारन से शुरु हुयी यात्रा 1930 के डांडी मार्च तक जाते जाते पूरे भारत को सन्देश दे चुकी थी और जन जन  को गांधी जी से जोड़ चुकी थी और इन यात्राओ ने  अजेय सत्ता को बेदखल ही नही किया बल्कि पूरे विश्व को अहिंसा और सत्याग्रह नामक एक नया और बहुत असरदार हथियार दे दिया । तो विनोबा भावे ने अपनी सीमित यात्रा मे लाखो बेघरो को घर और भूखो को रोटी का साधन दिलवा दिया उन लोगो से जिनके पास ज्यादा था ।
इस वक्त भारत ही नही बल्कि दुनिया की निगाह राहुल गांधी की यात्रा पर है ।राहुल की यात्रा भी इतनी चर्चित नही होती और उत्सुकता पैदा नही करती अगर उन्होने सिरे से सारे पद नही लेने और सत्ता के प्रति निर्मोही होने का मजबूत एलान नही किया होता और भारत के जन सरोकारो से जुडे मुद्दो को धारदार तरीके से उठाते हुये हर तरह की टूटन के खिलाफ और हर तरह के जुडाव के लिये खुद को झोंक नही दिया होता ।अगर एक यात्रा पूरी कर राहुल गाँधी भी काम पूरा किये बिना अपनी पुरानी जिन्दगी मे जाकर रम जाते है तो हो सकता है इसका तत्कालिक लाभ कांग्रेस की मिल जाये और सत्ता भी हासिल हो जाये पर ये बाकी पद यात्राओ की श्रेणी मे से ही एक होकर रह जायेगी और फिर बहुत दिनो के लिये पद यात्राओ का आकर्षण खत्म हो जायेगा ।पर जैसा की दिख रहा है राहुल गाँधी सत्ता के मोह से दूर अपने बौद्धिक चिंतन के साथ एक बडा इरादा और मजबूत समर्पण लेकर चलते हुये दिख रहे है । अगर ये यात्रा अन्तिम नही बल्कि बापू की तरह परिणाम हासिल करने तक निरन्तर चलती रही और देश के कोने कोने तथा जन जन को उद्वेलित कर जोडने मे कामयाब रही तो फिर ये पद यात्रा नही बल्कि पथ यात्रा हो जाएगी । समय इस बात का जवाब देगा की राहुल पद यात्रा तक सीमित रहते है या पथ यात्रा पर चल पडते है क्योकी उनको पद मिल रहा था उन्होने ठुकरा दिया और पहचान की उन्हे जरूरत नही ,हा उस प्रतिष्ठा के लिये वो खुद को तपा सकते है जो पथ यात्रा से ही मिलती है ।
इसका उत्तर केवल आने वाला समय दे पायेगा ।


बुधवार, 5 अक्टूबर 2022

कांग्रेस अध्यक्ष चुनाव के आगे पीछे

24 साल के बाद अन्ततः राहुल गाँधी की जिद की वजह से इंडियन नेशनल कांग्रेस का नेहरू गांधी  परिवार के बाहर का अध्यक्ष बनने जा रहा है ।राहुल गांधी ने पिछला चुनाव हार जाने पर अचानक कांग्रेस अध्यक्ष पद से स्तीफा दे दिया था और साथ ही ये भी घोसित कर दिया था कि अब वो अध्यक्ष नही बनेगे और ना ही परिवार का कोई भी अध्यक्ष बनेगा ।तब से अंतरिम व्यवस्था मे सोनिया गांधी कार्यकारी अध्यक्ष के रूप मे काम देख रही थी ।नये अध्यक्ष के चुनाव की चर्चा शुरु हुयी तो फिर तमाम प्रदेश से कांग्रेस से राहुल के अध्यक्ष बनने का प्रस्ताव पास कर दिया और उन्हे तैयार करने को बहुत दबाव भी बनाया पर राहुल अपनी बात पर अडिग रहे और अन्ततः सोनिया जी और जितेन्द्र प्रसाद के चुनाव के बाद पहली बार विधवत चुनाव हो रहा है । इस बार भी गहलौत से लेकर दिग्विजय सिंह तक का एपिसोड हुआ तो मुकुल वासनिक से लेकर मीरा कुमार तक का नाम चला पर अन्ततः दक्षिण के ही दो नेता राज्यसभा मे विपक्ष के नेता मलिकार्जुन खड़गे और संयुक्त राष्ट्र संघ मे रहे शशि थरूर के बीच चुनाव हो रहा है ।यद्द्पि प्रकट तौर पर चुनाव को स्वतंत्र बताया जा रही है पर कही न कही नेतृत्व का पलड़ा खड़गे जी की तरफ झुका लग रहा है ।
खड़गे जी कर्नाटक के दलित नेता है और बहुत अनुभवी है तो थरूर विद्वान और युवा वर्ग मे लोकप्रिय है ।फैसला जो होना है वो सबको पता है पर ये राजनीतिक पण्डितो को समझ मे नही आ रहा है की पंजाब की भांति राजस्थान की अच्छी भली चलती सरकार और राजनीति को क्यो छेडा गया जबकि गहलौत पहले ही दिन से दिल्ली आने के इच्छुक नही थे और खड़गे जी राज्यसभा मे नेता प्रतिपक्ष थे ही जिसके कारण उनका कैबिनेट मंत्री का स्तर था तो उनको बिना हटाये देश भर मे दलित नेता के रूप मे दौडाया जा सकता था प्रोटोकोल के साथ और पार्टी उनका इच्छित राजनीतिक उपयोग कर सकती थी ।
जबकि राजनीति पर पैनी निगाह रखने वालो का मानना है की इस माहौल मे मीरा कुमार सबसे अच्छी कांग्रेस अध्यक्ष साबित हो सकती थी क्योकि वो बाबा साहेब के बाद सबसे बड़े दलित नेता बाबू जगजीवन राम की बेटी है ,महिला है , दलित है , पूर्व आई एफ एस अधिकारी है , लोकप्रिय रही पूर्व लोकसभा अध्यक्ष है जिनकी तारीफ तब भाजपा के नेता भी करते थे और राष्ट्रपति के चुनाव मे विपक्ष की प्रत्याशी रही थी ,उनका पिछड़े वर्ग के कुशवाहा बिरादरी मे विवाह हुआ है । कांग्रेस का अध्यक्ष होते ही उनके प्रधानमंत्री होने की सम्भावना का प्रचार होते हो देश भर के दलितो मे सदेश जाता कि पहली बार दलित प्रधानमंत्री हो सकता है ,बिहार गौरव का सवाल आता तो उत्तर प्रदेश मे मायावती के भाजपा के पक्ष मे खडे दिखने के कारण चौराहे पर खड़ा भ्रमित दलित वर्ग अपनी पुरानी पार्टी की तरफ मुड़ जाता और ऐसा ही असर पूरे देश मे दिखता यदि कांग्रेस उनकी ठीक से ब्रांडिंग करती । देश की आधी आबादी भी प्रधानमंत्री के सपने से जुड़ती ।इसके अलावा जब भी कांग्रेस या मीरा कुमार पर हमला होता वो एक स्त्री पर , एक दलित पर और एक शिक्षित पर हमला बता कर जो आरोप पहले से संघ पर है इन लोगो के विरोध का वो और मजबूती से वर्तमान सत्ता को कटघरे मे खड़ा करता । चूक तो हुयी है और तीन चूक एक साथ हुयी है ।
परंतु फिर भी यदि खडगे जी को जीत के बाद कांग्रेस सर पर उठा लेती है तो राहुल गाँधी की दक्षिण मे बहुत सफल यात्रा के परिणाम स्वरूप और अगर खडगे जी भी अति सक्रीय तथा आक्रमक रहे तो उसका फायदा कांग्रेस पहले दक्षिणी राज्यो मे तो उसी तरह उठा सकती है जैसे 1977 मे पूरे उत्तर भारत मे हार के बावजूद केवल दक्षिण भारत से 154 सीट जीत गयी थी ।
देखना ये होगा की उत्तर भारत मे अगले चुनाव मे कांग्रेस के इस दलित कार्ड से क्या फर्क पडता है ।महाराष्ट्र, बिहार, झारखंड जहा गठबंधन की नाव पर पार करना चाहेगी कांग्रेस ,वही उत्तर प्रदेश जो सबसे ज्यादा सीट वाला प्रदेश है और कांग्रेस का मुख्य आधार रहा है वहा हताशा और आत्म समर्पण वाली स्थिति रहेगी और कोई नई कूटनीतिक तथा आक्रमक नीति बनेगी । गुजरात के विधान सभा चुनाव वहा के बारे मे संकेत देगे तो बंगाल और उड़ीसा पर अभी कांग्रेस का रवैया देखना होगा,  जबकि मध्य प्रदेश, राजस्थान ,दिल्ली , हरियाणा , पंजाब , हिमाचल , उत्तराखंड और कश्मीर इत्यादि मे कांग्रेस स्वाभाविक तौर पर कुछ बढता हासिल कर सकती है पर इसके लिये इन प्रदेशो की कांग्रेस की राजनीति और राहुल गान्धी के इधर की यात्रा पर निगाह रखनी होगी और तब तक इन्तजार करना होगा ।

गुरुवार, 4 अगस्त 2022

भारत_तमाशों_का_देश_है

#भारत_तमाशों_का_देश_है ? 
काफ़ी पहले मेरा एक लेख छपा था कुछ अख़बारों में । हाँ सचमुच है और तमाशों के प्रति भारत का जुड़ाव तथा आग्रह इतना है कि तमाशे के लिए दवाई या खाने बिना मरता व्यक्ति भी ताली बजा ही देगा और कुछ देर के लिए शामिल हो ही जाएगा उस तमाशे में । चाहे कितने ज़रूरी काम से भी जा रहा हो पर काम छोड़ कर सहभागी हो ही जाएगा तमाशे में ।
पहले भारत की ये कमजोरी भालू और बंदर नचाने वाले , जादू दिखाने वाले , बाइसकोप दिखाने वाले और बसो में या चौराहों पर सुरमा या अन्य चीजें बेचने वाले जानते थे । धर्म के छोटे से बड़े तक ठेकेदार भी थोड़ा बहुत उससे काम चला लेते थे ।
पर कुछ सालो से मीडिया और अख़बार वालो ने पन्ना और अख़बार बेचने के लिए इस तकनीक का प्रयोग किया ,प्राइवेट शिक्षा संस्थानों तथा व्यापारिक संस्थानो ने प्रयोग करना शुरू किया फिर और बड़े पैमाने पर धार्मिक व्यापारियों ने इस तकनीकी और मनोविज्ञान का भरपूर दोहन शुरू किया ।
और अब तो राजनीतिक जमात और उनके आकाओ ने इस तकनीक को मुख्य हथियार ही बना लिया है । कैसी महंगाई ? , कैसी बेरोजगारी ? , कैसी बीमारी ? कैसी चिकित्सा ? कैसी मौत ? कैसी बर्बादी ? कैसी अयोग्यता और असफलता ?कैसी अदूरदर्शिता ? सब कुछ तमाशे के नीचे दफ़न करने की क्या खूब कारीगरी और बाज़ीगरी आ गयी है । सब ख़ास हम भी ख़ुश । उधर लगे रहो , कोई सवाल मत पूछो , अपनी ज़िंदगी और आसपास बिलकुल मत झांको और भविष्य का तो सोचो ही मत बस चली ताली बजाओ मेहरबान क़द्रदान दिखो मेरे झोले से अच्छा दिन निकलने ही वाला है , जो जल्दी में है वो जाकर घर सो जाए क्योंकि वो बीमार है । बाक़ी सब एक बात फ़ोर से थाली बजाओ और अच्छा दिन न दिखे तो मोमबत्ती दिया टॉर्च जलाओ और वो न हो तो मोबाइल की रोशनी में देखो ।  अरे देखो तो वो है अच्छा दिन आप सब के घर में पहुँचा दिया है फिर भी जो नही देख पा रहा है वो ये तो अंधा है , या धर्म द्रोही या देशद्रोही या सेकूलरिस्ट है अन्यथा पड़ोसी देशों का एजेंट है मारो इसे । मारने वाले अपना काम करे बाक़ी सब मुस्कुराओ और फिर से ताली बजाओ । 
अच्छा मेहरबान क़द्रदानों अपने घर जाओ आज का तमाशा यही ख़त्म होता है अब अगले तमाशे का इंतज़ार करो ? 
क्या ? सब महँगा हो गया है ?  बच्चों को नौकरी नही मिल रही है और इलाज बिना लोग मर रहे है और भूखा  किसान आत्महत्या कर रहा है ? 
अरे मूर्ख किसान की आत्महत्या का कारण कुछ मर्दानगी से जुड़ा है हमारे नेता ने इतना बड़ा ज्ञान दिया तूने सूँ नही ? सब नौकरी माँगोगे तो नया स्टार्ट आप कौन करेगा ? पकोड़े बनाओ , रिक्शा चलाओ , नाले से गैस निकालो देश में स्टार्ट अप की संख्या बढ़ाओ । इलाज का क्या रोना रोते हों नीम की पत्ती खाओ और ठीक हो जाओ । जवान सीमा पर खड़ा है और तुम बिना खाए मर रहे हो अरे थोड़ा उसका सोचो और जब तुम कुछ नही कर रहे हो तो जीकर भी क्या फ़ायदा ? लेकिन इस चुनाव तक तो किसी तरह तुमने जीना ही पड़ेगा उसके लिए ५ किलो अनाज और साल के ६ हजार चुनाव तक तो दे दूँगा फिर मुझे वोट देने के बाद तुम जानो तुम्हारा काम जाने । 
अब ज़ोर से नारा लगाओ की हम महान है ऐसा दुनिया में कोई नही और ताली ज़ोर से बजाओ मेहरबान क़द्रदान । ज़्यादा सोचो मत और आपस में ये बातें भी मत किया करो वरना क़ानून अंधा है और वर्दी किसी को नही पहचानती , समझ गए ना । 
तो एक बार बहुत ऊँचा झंडा लहराओ , ज़ोर से ताली बजाओ और समवेत स्वर में गाओ - हर हर —- घर घर — तथा -जी -जी -जी -जी । 
जी जनाब नशा शराब का हो या गुजरात के पोर्ट पर उतरने वाली हजारों करोड़ के माल का उससे भी बड़ा नशा है जानकर अंधे होने का , भक्त होने का और उससे भी बड़ा नशा तमाशे का होता है जनाब ।
यद्दपी सिद्धम लोक विरुद्धम ना करणीयम ना करणीयम ।

शुक्रवार, 15 जुलाई 2022

विपक्ष फिर चूक गया

रास्ट्रपति का चुनाव विपक्ष की मजबूत एकता का कारण बन सकता था , केन्द्र की वर्तमान सत्ता को चुनौती पेश कर सकता था पर इस बार फिर चूक गया सम्पूर्ण विपक्ष । 
यूँ भी लम्बे समय से विपक्ष भाजपा की सत्ता को न तो संसद मे ही कभी परेशानी मे डाल पाया और न सडक पर चुनौती दे सका है । पिछले 5/6 वर्षो मे कोई बडा आन्दोलन नही खड़ा कर सका । असरदार किसान आन्दोलन हुआ तो वो उनका था विपक्ष कही नही था । एन आर सी और सी ए ए के खिलाफ शाहीन बाग से आवाज उठी वो भी विपक्ष के बिना थी और रोजगार के सवाल पर या अभी अग्निपथ के खिलाफ सडक गरमा गयी तो विपक्ष उसमे भी दूर दूर तक नही था ।
कलमकारो और थोडा बहुत चितंन करने वालो  की जिम्मेदारी सिर्फ सत्ता का कान उमेठना ही नही है बल्कि सिद्धांतहीनता और विचलन का शिकार विपक्ष को भी लगातार कोंचना और आइना दिखाना है और वो भी अपनी इस भुमिका को पूरी तरह नही निभा पा रहे है ।
यद्दपि द्रौपदी मुर्मू का राज्यपाल के रूप मे कार्यकाल बहुत निस्पक्ष और गरिमा के अनुरूप नही बताया जाता है बल्कि उनपर संघ के लिये काम करने के आरोप लगते रहे और ये भी सत्य है की भारत का राष्ट्रपति जो केवल भारत के सार्वभौमिकता का प्रतीक ही नही है बल्कि सम्पूर्ण भारत का प्रतीक है ,तीनो सेनाओ का सर्वोच्च कमान्डर है और दुनिया मे जब वो जाता है या किसी राष्ट्राध्यक्ष का स्वागत करता है तो संपूर्णता से भारत का परिचायक होता है ,शिक्षा ,संस्कृति ,ज्ञान सब कुछ और द्रौपदी मुर्मू इन मामलो मे सम्भवतः 5% भी खरी नही उतरती है । ये भी सच है की आरएसएस के लगातार 50 साल शासन कर अपने सपने को साकार करने की बेचैनी मे भाजपा जिम्मेदार और भविश्य के लिये जवाबदेह शासन देने मे विफल केवल चुनावी मशीन बन चुकी है, वो आने वाली जनरेशन के बजाय आने वाले एलेक्शन के लिये ही सब करती दिखती है और उसका हर फैसला केवल अगले चुनाव को प्रभावित करने के उद्देश्य तक सीमीत होता है और ये फैसला भी भारत राश्ट्र के लिये नही बल्कि आगामी चुनाव के लिये ही है पर सवाल ये है कि क्या विपक्ष ने कोई मजबूत विकल्प दिया ? मजबूत चुनौती पेश किया ? ऐसा उम्मीदवार देते कि जो अपने नही वो भी मजबूर हो जाते उसे वोट देने को जैसे इस मामले मे जो भाजपा के नही वो भी काफी लोग मुर्मू का विरोध नही कर पायेंगे सिर्फ आदिवासी होने के कारण । 
बडा सवाल ये है कि क्या विपक्ष के सारे बड़े नेताओ ने भाजपा की रणनीति पर निगाह रखा और क्या गम्भीरता से चुनौती देने के बारे मे सोचा ? 
मनमोहन सिंह,प्रकाश सिंह बादल ,चन्द्र बाबू नायडू ,#मानिक_सरकार , देव गौडा, शरद यादव ,पवन कुमार चामलिग  इत्यादि के अलावा कोई प्रतिष्ठित पूर्व सर्वोच्च न्यायधीश , कोई पूर्व सेनाध्य्क्ष , शिक्षा जगत का प्रतिष्ठित व्यक्ति ,मेघा पाटकर जैसी कोई प्रसिद्ध समाज सेवी के साथ दक्षिण का होना या वंचित होना इत्यादि रणनीति विपक्ष की भी तो हो सकती थी । 
भाजपा के वर्तमान नेत्रत्व को बेचैन करने को आगे बढ़ कर रणनीतिक रूप से उन्ही के खेमे मे लालकृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी, वर्तमान उप राष्ट्रपति पर चर्चा चलाई जा सकती थी ।
जब पता था कि आदिवासी कार्ड खेला जा सकता है तो विपक्ष के पास भी तो आदिवासी नेता है जो शिक्षित भी है और अनुभवी भी ।
यदि केवल नाम के लिये ही चुनाव लड़ना था तो किसी सीवर मे घुस कर सफाई करने वाले को वही से उठा कर उम्मीदवार बना देते , किसी खेत से मजदूर को उठा कर खड़ा कर देते ,किसी बिल्कुल अनजान राजनीतिक कार्यकर्ता को ले आते या प्रो पुरुषोत्तम अग्रवाल अथवा प्रो आनंद कुमार जैसे किसी बुद्धिजीवी को उम्मीदवार बना देते ।
विपक्ष को ये समझना होगा की आधे अधूरे मन से और आपसी काट छांट से भाजपा से नही लड़ा जा सकता है और किसी भी चुनाव मे विकल्पहीनता या कमजोर विकल्प और वैकल्पिक कार्यक्रम और मजबूत सैधांतिक धरातल के बिना आरएसएस और उनके राजनीतिक चेहरे भाजपा को नही हराया जा सकता है ।
विपक्ष की सबसे बड़े पार्टी खुद इस वक्त राहुल गांधी को ईडी से बचाने की लड़ाई तक सीमित है । देश की राजनीतिक लड़ाई भी वो केवल राहुल गांधी के नेत्रत्व तक सीमित रखना चाहती है ।
देश, लोकतंत्र सब कुछ दाव पर लगा है पर कोई जिम्मेदार नही है ,कोई जवाबदेह नही है । सब अपना अपना ढोल पीट रहे है । कोई सामुहिक प्रयास नही दिख रहा है ।
क्या भाजपा मे असन्तोष नही है ? क्या वहा सभी नेता और कार्यकर्ता खुश और संतुष्ट है ? ना ,बिल्कुल नही ।पर वो तो नही टूट रही है , उसकी सरकारे नही गिर रही है । फिर विपक्ष की क्यो ? क्योकी विपक्ष मे कोई उसके लिये सतत और सार्थक प्रयास नही करता ।ये कहना की भाजपा ने हमारे लोगो को तोड लिया ये आधा सच है पूरा सच ये है की आप अपनो को अपना बना कर क्यो नही रख पाते,आप अपनो से जुडे क्यो नही रह पाते है । इस पर आत्मचिन्तन तो करना ही चाहिये  । 
अभी से भी यशवंत सिन्हा की जगह किसी अन्य नाम पर विचार करना चाहिये ।

डा सी पी राय 
स्वतंत्र राजनीतिक समीक्षक एवं वरिष्ठ पत्रकार

बुधवार, 22 जून 2022

राष्ट्रपति चुनाव के बहाने

रास्ट्रपति का चुनाव विपक्ष की मजबूत एकता का कारण बन सकता था , केन्द्र की वर्तमान सत्ता को चुनैती पेश कर सकता था पर इस बार फिर चूक गया सम्पूर्ण विपक्ष ।
मैने यशवंत सिन्हा को प्रत्याशी बनाने के खिलाफ भाजपा की आदिवासी का समर्थन किया जिसपर मुझे आलोचना का सामना करना पड़ रहा है पर इस बहाने एक बहस तो खडी हुयी कि क्या हम वैचारिक आधार पर वर्तमान विपक्ष के साथ खडे लोग भी सत्ता का केवल अन्धा विरोध कर रहे है और विपक्ष के सभी ऊल-जलूल फैसलो ,कर्मो का अन्धा समर्थन ही कर रहे है ? यदि उत्तर हा है तो हम सब भी भ्रमित और पथविचलित है । कलमकार होने और थोडा बहुत चितंन करने के कारण हमारी जिम्मेदारी सिर्फ सत्ता का कान उमेठना ही नही है बल्कि सिद्धांतहीनता और विचलन का शिकार विपक्ष को भी लगातार कोचना और आइना दिखाना है ।
 यद्दपि आज द्रौपदी मुर्मू  पास से जानने वाले एक  साथी से पता चला की राज्यपाल के रूप मे इनके क्या कारनामे थे और इन्होने भी किस तरह हर जगह सब कुछ ताक पर रख कर संघ को ही भरा ।ये भी सत्य है की भारत का राष्ट्रपति जो केवल भारत के सार्वभौमिकता का प्रतीक ही नही है बल्कि सम्पूर्ण भारत का प्रतीक है ,तीनो सेनाओ का सर्वोच्च कमान्डर है और दुनिया मे जब वो जाता है या किसी राष्ट्राध्यक्ष का स्वागत करता है तो संपूर्णता से भारत का परिचायक होता है ,शिक्षा ,संस्कृति ,ज्ञान सब कुछ और द्रौपदी मुर्मू इन मामलो मे सम्भवतः 5% भी खरी नही उतरती है । ये भी सच है की आरएसएस के लगातार 50 साल शासन कर अपने सपने को साकार करने की बेचैनी मे भाजपा जिम्मेदार और भविश्य के लिये जवाबदेह शासन देने मे विफल केवल चुनावी मशीन बन चुकी है और उसका हर फैसला केवल अगले चुनाव को प्रभावित करने के उद्देश्य तक सीमीत होता है और ये फैसला भी भारत राश्ट्र के लिये नही बल्कि आगामी चुनाव के लिये ही है पर सवाल ये है कि क्या विपक्ष ने कोई मजबूत विकल्प दिया ? मजबूत चुनौती पेश किया ? कि जो अपने नही वो भी मजबूर हो जाते उसे वोट देने को जैसे इस मामले मे जो भाजपा के नही वो भी काफी लोग मुर्मू का विरोध नही कर पायेंगे आदिवासी के कारण । 
बडा सवाल ये है कि क्या विपक्ष के सारे बड़े नेताओ ने भाजपा की रणनीति पर निगाह रखा और क्या गम्भीरता से चुनौती देने के बारे मे सोचा ? 
मनमोहन सिंह,प्रकाश सिंह बादल ,चन्द्र बाबू नायडू ,#मानिक_सरकार , देव गौडा, शरद यादव ,पवन कुमार चामलिग  इत्यादि के अलावा कोई प्रतिष्ठित पूर्व सर्वोच्च न्यायधीश , कोई पूर्व सेनाध्य्क्ष , शिक्षा जगत का प्रतिष्ठित व्यक्ति ,मेघा पाटकर जैसी कोई प्रसिद्ध समाज सेवी के साथ दक्षिण का होना या वंचित होना इत्यादि रणनीति विपक्ष की भी तो हो सकती थी । 
भाजपा के वर्तमान नेत्रत्व को बेचैन करने को आगे बढ़ कर उन्ही के खेमे मे लाल कृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी, वर्तमान उप राष्ट्रपति पर चर्चा चलाई जा सकती थी ।
जब पता था कि आदिवासी कार्ड खेला जा सकता है तो विपक्ष के पास भी तो आदिवासी नेता है जो शिक्षित भी है और अनुभवी भी ।
यदि केवल नाम के लिये ही चुनाव लड़ना था तो किसी सीवर मे घुस कर सफाई करने वाले को वही से उठा कर उम्मीदवार बना देते , किसी खेत से मजदूर को उठा कर खड़ा कर देते ,किसी बिल्कुल अनजान राजनीतिक कार्यकर्ता को ले आते या प्रो पुरुषोत्तम अग्रवाल अथवा प्रो आनंद कुमार जैसे किसी बुद्धिजीवी को उम्मीदवार बना देते ।
विपक्ष को ये समझना होगा की आधे अधूरे मन से और आपसी काट छांट से भाजपा से नही लड़ा जा सकता है और किसी भी चुनाव मे विकल्पहीनता या कमजोर विकल्प और वैकल्पिक कार्यक्रम और मजबूत सैधांतिक धरातल के बिना आरएसएस और उनके राजनीतिक चेहरे भाजपा को नही हराया जा सकता है ।
विपक्ष की सबसे बड़े पार्टी खुद इस वक्त राहुल गांधी को ईडी से बचाने की लड़ाई तक सीमित है । देश की राजनीतिक लड़ाई भी वो केवल राहुल गांधी के नेत्रत्व तक सीमित रखना चाहती है ।
देश, लोकतंत्र सब कुछ दाव पर लगा है पर कोई जिम्मेदार नही है ,कोई जवाबदेह नही है । सब अपना अपना ढोल पीट रहे है । कोई सामुहिक प्रयास नही दिख रहा है ।
क्या भाजपा मे असन्तोष नही है ? क्या वहा सभी नेता और कार्यकर्ता खुश और संतुष्ट है ? ना ,बिल्कुल नही ।पर वो तो नही टूट रही है , उसकी सरकारे नही गिर रही है । फिर विपक्ष की क्यो ? ये कहना की भाजपा ने हमारे लोगो को तोड लिया ये अधूरा सच है पूरा सच ये है की हम अपनो को अपना बना कर क्यो नही रख पाते,हम अपनो से जुडे क्यो नही रह पाते है । इस पर आत्मचिन्तन तो करना ही चाहिये  । 
अभी से भी यशवंत सिन्हा की जगह किसी अन्य नाम पर विचार करना चाहिये ।