शुक्रवार, 15 जुलाई 2022

विपक्ष फिर चूक गया

रास्ट्रपति का चुनाव विपक्ष की मजबूत एकता का कारण बन सकता था , केन्द्र की वर्तमान सत्ता को चुनौती पेश कर सकता था पर इस बार फिर चूक गया सम्पूर्ण विपक्ष । 
यूँ भी लम्बे समय से विपक्ष भाजपा की सत्ता को न तो संसद मे ही कभी परेशानी मे डाल पाया और न सडक पर चुनौती दे सका है । पिछले 5/6 वर्षो मे कोई बडा आन्दोलन नही खड़ा कर सका । असरदार किसान आन्दोलन हुआ तो वो उनका था विपक्ष कही नही था । एन आर सी और सी ए ए के खिलाफ शाहीन बाग से आवाज उठी वो भी विपक्ष के बिना थी और रोजगार के सवाल पर या अभी अग्निपथ के खिलाफ सडक गरमा गयी तो विपक्ष उसमे भी दूर दूर तक नही था ।
कलमकारो और थोडा बहुत चितंन करने वालो  की जिम्मेदारी सिर्फ सत्ता का कान उमेठना ही नही है बल्कि सिद्धांतहीनता और विचलन का शिकार विपक्ष को भी लगातार कोंचना और आइना दिखाना है और वो भी अपनी इस भुमिका को पूरी तरह नही निभा पा रहे है ।
यद्दपि द्रौपदी मुर्मू का राज्यपाल के रूप मे कार्यकाल बहुत निस्पक्ष और गरिमा के अनुरूप नही बताया जाता है बल्कि उनपर संघ के लिये काम करने के आरोप लगते रहे और ये भी सत्य है की भारत का राष्ट्रपति जो केवल भारत के सार्वभौमिकता का प्रतीक ही नही है बल्कि सम्पूर्ण भारत का प्रतीक है ,तीनो सेनाओ का सर्वोच्च कमान्डर है और दुनिया मे जब वो जाता है या किसी राष्ट्राध्यक्ष का स्वागत करता है तो संपूर्णता से भारत का परिचायक होता है ,शिक्षा ,संस्कृति ,ज्ञान सब कुछ और द्रौपदी मुर्मू इन मामलो मे सम्भवतः 5% भी खरी नही उतरती है । ये भी सच है की आरएसएस के लगातार 50 साल शासन कर अपने सपने को साकार करने की बेचैनी मे भाजपा जिम्मेदार और भविश्य के लिये जवाबदेह शासन देने मे विफल केवल चुनावी मशीन बन चुकी है, वो आने वाली जनरेशन के बजाय आने वाले एलेक्शन के लिये ही सब करती दिखती है और उसका हर फैसला केवल अगले चुनाव को प्रभावित करने के उद्देश्य तक सीमीत होता है और ये फैसला भी भारत राश्ट्र के लिये नही बल्कि आगामी चुनाव के लिये ही है पर सवाल ये है कि क्या विपक्ष ने कोई मजबूत विकल्प दिया ? मजबूत चुनौती पेश किया ? ऐसा उम्मीदवार देते कि जो अपने नही वो भी मजबूर हो जाते उसे वोट देने को जैसे इस मामले मे जो भाजपा के नही वो भी काफी लोग मुर्मू का विरोध नही कर पायेंगे सिर्फ आदिवासी होने के कारण । 
बडा सवाल ये है कि क्या विपक्ष के सारे बड़े नेताओ ने भाजपा की रणनीति पर निगाह रखा और क्या गम्भीरता से चुनौती देने के बारे मे सोचा ? 
मनमोहन सिंह,प्रकाश सिंह बादल ,चन्द्र बाबू नायडू ,#मानिक_सरकार , देव गौडा, शरद यादव ,पवन कुमार चामलिग  इत्यादि के अलावा कोई प्रतिष्ठित पूर्व सर्वोच्च न्यायधीश , कोई पूर्व सेनाध्य्क्ष , शिक्षा जगत का प्रतिष्ठित व्यक्ति ,मेघा पाटकर जैसी कोई प्रसिद्ध समाज सेवी के साथ दक्षिण का होना या वंचित होना इत्यादि रणनीति विपक्ष की भी तो हो सकती थी । 
भाजपा के वर्तमान नेत्रत्व को बेचैन करने को आगे बढ़ कर रणनीतिक रूप से उन्ही के खेमे मे लालकृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी, वर्तमान उप राष्ट्रपति पर चर्चा चलाई जा सकती थी ।
जब पता था कि आदिवासी कार्ड खेला जा सकता है तो विपक्ष के पास भी तो आदिवासी नेता है जो शिक्षित भी है और अनुभवी भी ।
यदि केवल नाम के लिये ही चुनाव लड़ना था तो किसी सीवर मे घुस कर सफाई करने वाले को वही से उठा कर उम्मीदवार बना देते , किसी खेत से मजदूर को उठा कर खड़ा कर देते ,किसी बिल्कुल अनजान राजनीतिक कार्यकर्ता को ले आते या प्रो पुरुषोत्तम अग्रवाल अथवा प्रो आनंद कुमार जैसे किसी बुद्धिजीवी को उम्मीदवार बना देते ।
विपक्ष को ये समझना होगा की आधे अधूरे मन से और आपसी काट छांट से भाजपा से नही लड़ा जा सकता है और किसी भी चुनाव मे विकल्पहीनता या कमजोर विकल्प और वैकल्पिक कार्यक्रम और मजबूत सैधांतिक धरातल के बिना आरएसएस और उनके राजनीतिक चेहरे भाजपा को नही हराया जा सकता है ।
विपक्ष की सबसे बड़े पार्टी खुद इस वक्त राहुल गांधी को ईडी से बचाने की लड़ाई तक सीमित है । देश की राजनीतिक लड़ाई भी वो केवल राहुल गांधी के नेत्रत्व तक सीमित रखना चाहती है ।
देश, लोकतंत्र सब कुछ दाव पर लगा है पर कोई जिम्मेदार नही है ,कोई जवाबदेह नही है । सब अपना अपना ढोल पीट रहे है । कोई सामुहिक प्रयास नही दिख रहा है ।
क्या भाजपा मे असन्तोष नही है ? क्या वहा सभी नेता और कार्यकर्ता खुश और संतुष्ट है ? ना ,बिल्कुल नही ।पर वो तो नही टूट रही है , उसकी सरकारे नही गिर रही है । फिर विपक्ष की क्यो ? क्योकी विपक्ष मे कोई उसके लिये सतत और सार्थक प्रयास नही करता ।ये कहना की भाजपा ने हमारे लोगो को तोड लिया ये आधा सच है पूरा सच ये है की आप अपनो को अपना बना कर क्यो नही रख पाते,आप अपनो से जुडे क्यो नही रह पाते है । इस पर आत्मचिन्तन तो करना ही चाहिये  । 
अभी से भी यशवंत सिन्हा की जगह किसी अन्य नाम पर विचार करना चाहिये ।

डा सी पी राय 
स्वतंत्र राजनीतिक समीक्षक एवं वरिष्ठ पत्रकार

बुधवार, 22 जून 2022

राष्ट्रपति चुनाव के बहाने

रास्ट्रपति का चुनाव विपक्ष की मजबूत एकता का कारण बन सकता था , केन्द्र की वर्तमान सत्ता को चुनैती पेश कर सकता था पर इस बार फिर चूक गया सम्पूर्ण विपक्ष ।
मैने यशवंत सिन्हा को प्रत्याशी बनाने के खिलाफ भाजपा की आदिवासी का समर्थन किया जिसपर मुझे आलोचना का सामना करना पड़ रहा है पर इस बहाने एक बहस तो खडी हुयी कि क्या हम वैचारिक आधार पर वर्तमान विपक्ष के साथ खडे लोग भी सत्ता का केवल अन्धा विरोध कर रहे है और विपक्ष के सभी ऊल-जलूल फैसलो ,कर्मो का अन्धा समर्थन ही कर रहे है ? यदि उत्तर हा है तो हम सब भी भ्रमित और पथविचलित है । कलमकार होने और थोडा बहुत चितंन करने के कारण हमारी जिम्मेदारी सिर्फ सत्ता का कान उमेठना ही नही है बल्कि सिद्धांतहीनता और विचलन का शिकार विपक्ष को भी लगातार कोचना और आइना दिखाना है ।
 यद्दपि आज द्रौपदी मुर्मू  पास से जानने वाले एक  साथी से पता चला की राज्यपाल के रूप मे इनके क्या कारनामे थे और इन्होने भी किस तरह हर जगह सब कुछ ताक पर रख कर संघ को ही भरा ।ये भी सत्य है की भारत का राष्ट्रपति जो केवल भारत के सार्वभौमिकता का प्रतीक ही नही है बल्कि सम्पूर्ण भारत का प्रतीक है ,तीनो सेनाओ का सर्वोच्च कमान्डर है और दुनिया मे जब वो जाता है या किसी राष्ट्राध्यक्ष का स्वागत करता है तो संपूर्णता से भारत का परिचायक होता है ,शिक्षा ,संस्कृति ,ज्ञान सब कुछ और द्रौपदी मुर्मू इन मामलो मे सम्भवतः 5% भी खरी नही उतरती है । ये भी सच है की आरएसएस के लगातार 50 साल शासन कर अपने सपने को साकार करने की बेचैनी मे भाजपा जिम्मेदार और भविश्य के लिये जवाबदेह शासन देने मे विफल केवल चुनावी मशीन बन चुकी है और उसका हर फैसला केवल अगले चुनाव को प्रभावित करने के उद्देश्य तक सीमीत होता है और ये फैसला भी भारत राश्ट्र के लिये नही बल्कि आगामी चुनाव के लिये ही है पर सवाल ये है कि क्या विपक्ष ने कोई मजबूत विकल्प दिया ? मजबूत चुनौती पेश किया ? कि जो अपने नही वो भी मजबूर हो जाते उसे वोट देने को जैसे इस मामले मे जो भाजपा के नही वो भी काफी लोग मुर्मू का विरोध नही कर पायेंगे आदिवासी के कारण । 
बडा सवाल ये है कि क्या विपक्ष के सारे बड़े नेताओ ने भाजपा की रणनीति पर निगाह रखा और क्या गम्भीरता से चुनौती देने के बारे मे सोचा ? 
मनमोहन सिंह,प्रकाश सिंह बादल ,चन्द्र बाबू नायडू ,#मानिक_सरकार , देव गौडा, शरद यादव ,पवन कुमार चामलिग  इत्यादि के अलावा कोई प्रतिष्ठित पूर्व सर्वोच्च न्यायधीश , कोई पूर्व सेनाध्य्क्ष , शिक्षा जगत का प्रतिष्ठित व्यक्ति ,मेघा पाटकर जैसी कोई प्रसिद्ध समाज सेवी के साथ दक्षिण का होना या वंचित होना इत्यादि रणनीति विपक्ष की भी तो हो सकती थी । 
भाजपा के वर्तमान नेत्रत्व को बेचैन करने को आगे बढ़ कर उन्ही के खेमे मे लाल कृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी, वर्तमान उप राष्ट्रपति पर चर्चा चलाई जा सकती थी ।
जब पता था कि आदिवासी कार्ड खेला जा सकता है तो विपक्ष के पास भी तो आदिवासी नेता है जो शिक्षित भी है और अनुभवी भी ।
यदि केवल नाम के लिये ही चुनाव लड़ना था तो किसी सीवर मे घुस कर सफाई करने वाले को वही से उठा कर उम्मीदवार बना देते , किसी खेत से मजदूर को उठा कर खड़ा कर देते ,किसी बिल्कुल अनजान राजनीतिक कार्यकर्ता को ले आते या प्रो पुरुषोत्तम अग्रवाल अथवा प्रो आनंद कुमार जैसे किसी बुद्धिजीवी को उम्मीदवार बना देते ।
विपक्ष को ये समझना होगा की आधे अधूरे मन से और आपसी काट छांट से भाजपा से नही लड़ा जा सकता है और किसी भी चुनाव मे विकल्पहीनता या कमजोर विकल्प और वैकल्पिक कार्यक्रम और मजबूत सैधांतिक धरातल के बिना आरएसएस और उनके राजनीतिक चेहरे भाजपा को नही हराया जा सकता है ।
विपक्ष की सबसे बड़े पार्टी खुद इस वक्त राहुल गांधी को ईडी से बचाने की लड़ाई तक सीमित है । देश की राजनीतिक लड़ाई भी वो केवल राहुल गांधी के नेत्रत्व तक सीमित रखना चाहती है ।
देश, लोकतंत्र सब कुछ दाव पर लगा है पर कोई जिम्मेदार नही है ,कोई जवाबदेह नही है । सब अपना अपना ढोल पीट रहे है । कोई सामुहिक प्रयास नही दिख रहा है ।
क्या भाजपा मे असन्तोष नही है ? क्या वहा सभी नेता और कार्यकर्ता खुश और संतुष्ट है ? ना ,बिल्कुल नही ।पर वो तो नही टूट रही है , उसकी सरकारे नही गिर रही है । फिर विपक्ष की क्यो ? ये कहना की भाजपा ने हमारे लोगो को तोड लिया ये अधूरा सच है पूरा सच ये है की हम अपनो को अपना बना कर क्यो नही रख पाते,हम अपनो से जुडे क्यो नही रह पाते है । इस पर आत्मचिन्तन तो करना ही चाहिये  । 
अभी से भी यशवंत सिन्हा की जगह किसी अन्य नाम पर विचार करना चाहिये ।

रविवार, 1 मई 2022

बिजली कब आएगी

 एक छोटी सी हास्य नाटिका कुछ यूँ हो सकती है न ---


दृश्य - एक डाक्टर का क्लिनिल है
बिजली कब आएगी

एक परिवार डाक्टर उसमे प्रवेश करता है और सभी बस एक ही बात रट रहे है --
बिजली कब आएगी ? बिजली कब आएगी ?
डाक्टर पूछता है की क्या बींमारी है
पर कोई जवाब नहीं मिलता है
तब डाक्टर कहता है - कंपाउंडर जरा इनकी नब्ज देखो
कंपाउंडर ने एक की नब्ज पकड़ा ही था की वो भी बोलने लगा की
बिजली कब आएगी बिजली कब आयेगी
तब डाक्टर उठता है और वो कंपाउडर की नब्ज पकड़ता है की इसे क्या हो गया
और फिर वो भी बोलने लगता है की बिजली कब आएगी बिजली कब आएगी
और यही बोलते बोलते सब दृश्य से बाहर चले जाते है
{ यह किसी भी चीज पर बन सकता है ,मसलन १५ लाख कब आयेंगे अच्छे दिन कब आएँगी ,सामान सस्ता कब मिलेगा इत्यादि }

मंगलवार, 1 मार्च 2022

गुट निरपेक्ष आंदोलन की प्रासंगिकता

गुट निरपेक्ष आंदोलन की सार्थकता ।

आज जब उक्रेन मे मौत तांडव कर रही है और सिर्फ उक्रेन की जनता ही नही बल्कि सम्पूर्ण विश्व उसके साथ अमरीका सहित नाटो के देश के न खडे होने से हतप्रभ है कि इन बड़ो के चक्कर मे क्या मिला सिवाय बर्बादी के । आज तक हजारो सौनिक तथा आम नागरिक जिसमे मासूम बच्चे भी है ,उसमे एक भारत का छात्र भी हौ शहीद हो चुके है तब फिर से ये सवाल उठ खड़ा हुआ है की क्या विकासशील या कम विक्सित और छोटे देशो को बड़े देशो की आपसी लड़ाई और प्रतिस्पर्धा का हिस्सा बनने के बजाय फिर से गुटनिरपेक्ष आंदोलन जैसा कुछ बना लेना चाहिये इसकी बुनियाद पंचशील सिद्धांत और पुराने इस आन्दोलन के मकसद के साथ युद्ध विहीन ,शोषण विहीन और मानवता पर केन्द्रित सिद्धांत हो और आपसी सभी जरूरतो के लिये परस्पर पूर्ण सहयोग का उद्देश्य हो । आपसी गठबंधन से बाहर तभी जाये जब वो चीज चाहिये हो जो इनके पास नही हो और इस संगठन के आदर्श महात्मा गाँधी को जो दुनिया मे स्वीकार्य है ।
आज के हालात मे जब प्रधानमंत्री मोदी अलोचना के केन्द्र मे है तब उनको आगे बढ़ कर इस उद्देश्य को आगे बढ़ाना चाहिये वरना पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को आगे रख कर और सभी दलो के अनुभवीं नेताओं को जोड़ कर राजनीतिक और दलीय रूप से कांग्रेस को इस मुद्दे पर तत्काल लीड लेनी चाहिये और पूर्व गुट निरपेक्ष आंदोलन के सभी देशो से सम्पर्क कर एक बैठक बुला कर युद्द की निन्दा का प्रस्ताव करना चाहिये और मानव की सहयता के लिये डाक्टरो की टीम दवाईया , खाद्द्य सामग्री इत्यादि से मदद करने की शुरुवात करना चाहिये ।
हो सकता है की ये आन्दोलन तत्काल सत्ताधीशो को न समझ मे आये पर दुनिया की जनता इससे जरूर जुड़ेगी । जो रूस आक्रमण कर रहा है उसकी जनता वहा तानाशाही व्यवस्था के बावजूद सडक पर युद्ध का विरोध कर रही है और उक्रेन के राष्ट्रपति के आगे खडे रहने पर बड़ी संख्या जहा लोग पलायन कर रहे है वही  हजारो मौतो के बाद भी वहा के आम नागरिक जिसमे बच्चे बच्चियाँ और हर उम्र की महिलाओ तक ने हथियार उठा लिया है ।एक बात याद रखना चाहिये की कोई सत्ता हार सकती है ,कोई देश हार सकता है पर अगर जनता खडी हो गयी है तो जनता कभी नही हारती और ऐसा इतिहास मे दर्ज है ।अगर इस आन्दोलन के पक्ष मे दुनिया के लोग खडे होते है तो यद्द्पि याद तो जवाहर लाल नेहरू आएँगे पर मान भारत का बढ़ेगा और स्थापित होगा की भारत ने हमेशा सही रास्ता चुना ।साथ हो हम नारो ,हथियारो से तो बिश्वगुरु नही बन सके पर मानवता के अलमबरदार बन कर वो दर्जा हासिल कर सकते है ।
अब देखना ये है की इसकी अगुवाई प्रधानमंत्री मोदी करते है जिसमे शक इसलिये है की वैचारिक रूप से उनका मूल संगठन शायद इसे स्वीकार नही करेगा या फिर जिसका मूल स्वभाव ही यही है वो कांग्रस करती है ।
कोई बडा और ताकतवर देश सिर्फ कमजोर देशो पर हमला करता है द्वितीय विश्वयुद्ध को छोड दे तो यही हुआ है अमरीका प्रतिबंध प्रतिबंध खेलता रहता है जो उसका प्रिय खेल है 
अमरीका के झांसे मे आने वाले देशो का सदा नुक्सान ही हुआ है ।
चीन बडा व्यापारी देश बन चुका है और वो उतना ही सुरक्षा का इन्तजाम कर रहा है जो उसके लिये और दुनिया की बड़ी ताकतो से निपटने के लिये जरूरी है  और रूस तथा चीन दोनो 100 साल आगे की कल्पना कर अपनी तैयारी मे लगे है जबकि कुछ देश मंदिर मस्जिद बुर्का हिजाब जैसी चीजो को ही भविश्य मान बैठे है ।
छोटे देश लाख कोशिश कर भी बड़ी ताकतो के हमलो को झेल नही सकते है हा बर्बाद होकर भी लड़ सकते है ।
दुनिया तेजी से बदली है और इसके युद्ध के नियम तथा हथियार भी बदले है ।
जीतने के लिये जरूरी है मजबूत होना और मजबूत होने की पहली शर्त है देश का अन्दरूनी विवादो से ऊपर होना , देश मे एकता होना , आपसी सद्भाव तथा विश्वास होना ,सरकार पर विश्वास होना तथा इसकी शर्त है सरकार का पारदर्शी होना ,समझदार और दूरदर्शी होना और सम्पूर्ण जनता मे ये विश्वास पैदा करना की वो सब कुछ सबके लिये कर रहे है तथा सबके भविश्य और सुरक्षा के लिये कर रहे है।
अन्दर से टूटा हुआ देश आर्थिक प्रगति नही कर सकता तथा यदि अंदर झगडे है और कभी भी हालात बिगड़ने का अवसर है तो कही का भी इन्वेस्टर नही आयेगा और अन्दरूनी व्यापार भी प्रभावित होगा जबकि देश की मजबूती के लिये जरूरी है की देश आर्थिक रूप से बहुत मजबूत हो ,शैक्षणिक स्तर उच्च हो और स्वास्थ्य की गुणवत्ता भी उच्च कोटि की हो , बेरोजगारी ना के बराबर हो ,कृषि से लेकर व्यापार तक सब सम्पन्न हो और वैज्ञानिक आत्मनिर्भरता हो सभी क्षेत्रो मे स्वाथ्य ,भविश्य की आवश्यकताओ तथा सैन्य जरूरतो के क्षेत्र मे तथा भविश्य मे आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस से लेकर पृकृति संरक्षण और आवश्यक चीजो के असम्भव निर्माण तक ।
इन सब चीजो के लिये वातावरण तभी बन सकता है जब नेतृत्व करने वाले सभी लोग दूरदर्शी हो और अपने ,अपनी पार्टी तथा सत्ता नही बल्कि आने वाली पीढियो के लिये सपने देखे ,सिधांत गढ़े और सन्कल्पित हो ।
वरना स्वस्थ लोकतांत्रिक प्रतिस्पर्धा और भविश्य की पीढियो के लिये सपनो की पतिस्पर्धा के बजाय तू तू मैं मैं तो किसी भी देश को पीछे ही ले जाता है ।
इतिहास के सपनो मे जीना या इतिहास की नफरत को ढोना और भविश्य की पीढियो को भी देकर जाने का इरादा सिर्फ और सिर्फ बर्बादी ही लाने वाला होता है ।इराक हो ,सीरिया हो ,उक्रेन या अन्य ऐसे कोई भी देश वो कितना भी फौजी साजो सामान इकट्ठा कर ले पर अगर वो किसी बड़े को खटक गये तो उसकी बर्बादी तय है और इस गलतफहमी मे रहना की उसको हथियार बेचने और अपने हितो के लिये इस्तेमाल करने वाला कोई दूसरा देश उसके लिये लड़ने आयेगा गलतफहमी ही साबित होता रहेगा क्यो कोई भी देश खुद को दूसरे के लिये बर्बाद नही करता क्योकी युद्ध बहुत महंगा शौक है । इसलिये छोटे , आर्थिक ,जनसांख्यिकी से कमजोर और विकासशील देशो के लिये सबसे अच्छा है की वो किसी बड़े की कठपुतली न बने और अपने हित अहित के साथ सबसे सम्बंध रखे और किसी बड़े के राजनीति का मैदान न बने ,चुनौती ही दे ।पहले और दूसरे विश्व युद्ध की विभिषीका कोई भी अभी भूला नही है ।
किसी भी देश का अपना निर्माण खास माहौल और ऐतिहासिक परिस्थितयो और कारको से होता है और उन्ही हालातो मे सुखी होता है तथा तरक्की करता है ।कुछ समाज हमेशा से तानाशाही व्यवस्था मे रहे और उसके आदी है तो वहा उसी फ्रेम मे कोई भी व्यवस्था हो जनता को फर्क नही पडेगा जब तक की लोकतंत्र की हवा का एहसास उसके अन्दर घर न कर जाये और वो तब होता है जब पूरी जनता उसका खुद अनुभव करती है या उसे सहज जानकारी होती है । भारत उन्मुक्त वातावरण का समाज रहा है यहा का समाज थोडे कम मे भी जी लेता है और संतुष्ट रहता है पर उसका उन्मुक्त वातावरण और उन्मुक्त हंसी उससे नही छिननी चाहिये इसलिये तानाशाही जैसा कोई कदम या सोच भारत के लिये आत्मघाती होगी । भारत को धर्म और जातीय झगड़ो वाले समाजो और देशो से सबक लेने की जरूरत है और जितनी जल्दी समझ लेगा उतना ही देश मजबूत हो जायेगा तथा वैज्ञानिक दृष्टिकोण और तरक्की भारत को दुनिया के सामने शान्ती तथा सद्भाव की चुनौती देने लायक हो जायेगी तथा ये दुनिया मे शान्ती का सन्देश देने लायक हो जायेगा महात्मा गांधी को सामने रख कर ।
ये वक्त फिर से विचार करने का है कि जवाहर लाल नेहरू द्वारा शुरु किया गया गुट निरपेक्ष आंदोलन कितना सार्थक था और वो खुद मे तीसरी धुरी था जी बाकी दो को बैलेंस करता था ।
पहले अमरीकी स्वार्थो ने काफी देशो को बर्बाद किया है और अब उक्रेन पूरी दुनिया के छोटे और कम बिकसित या विकासशील देशो के लिये नये सिरे से एक्जुट होकर नई रणनीति बनाने का वक्त है और भारत इन सबकी अगुवाई कर सकता है पर उसके लिये पहले भारत मे पूर्ण एकता और विश्वास जरूरी है ।
उक्रेन तो एक हफ्ते मे निपट जायेगा परंतु ये अन्तिम साबित नही होगा बल्कि ये नये तरह के युद्ध का प्रारंभ है ।
चीन की चुनौती भारत के लिये कम नही है और वो चुनौती खुद की वैचारिक और रणनीतिक गल्तियो से पैदा हुयी है ।इन गल्तियो को तुरंत स्वीकार कर उसका परिमार्जन और अनुभव का उपयोग करते हुये उससे बाहर निकलना वक्त की मांग है चाहे वह राजनीतिक विरोधी के  पास ही क्यो न हो ।
युद्ध से बचना है तो युद्ध को महंगा करना होगा और बंटा हुआ देश तथा अज्ञानी नेत्रत्व नही कर सकता ।

उक्रेन और गुट निरपेक्ष आंदोलन

उक्रेन का सबक और गुट निरपेक्ष आंदोलन की सार्थकता ।

आज जब उक्रेन मे मौत तांडव कर रही है और सिर्फ उक्रेन की जनता ही नही बल्कि सम्पूर्ण विश्व उसके साथ अमरीका सहित नाटो के देश के न खडे होने से हतप्रभ है कि इन बड़ो के चक्कर मे क्या मिला सिवाय बर्बादी के । आज तक हजारो सौनिक तथा आम नागरिक जिसमे मासूम बच्चे भी है ,उसमे एक भारत का छात्र भी हौ शहीद हो चुके है तब फिर से ये सवाल उठ खड़ा हुआ है की क्या विकासशील या कम विक्सित और छोटे देशो को बड़े देशो की आपसी लड़ाई और प्रतिस्पर्धा का हिस्सा बनने के बजाय फिर से गुटनिरपेक्ष आंदोलन जैसा कुछ बना लेना चाहिये इसकी बुनियाद पंचशील सिद्धांत और पुराने इस आन्दोलन के मकसद के साथ युद्ध विहीन ,शोषण विहीन और मानवता पर केन्द्रित सिद्धांत हो और आपसी सभी जरूरतो के लिये परस्पर पूर्ण सहयोग का उद्देश्य हो । आपसी गठबंधन से बाहर तभी जाये जब वो चीज चाहिये हो जो इनके पास नही हो और इस संगठन के आदर्श महात्मा गाँधी को जो दुनिया मे स्वीकार्य है ।
आज के हालात मे जब प्रधानमंत्री मोदी अलोचना के केन्द्र मे है तब उनको आगे बढ़ कर इस उद्देश्य को आगे बढ़ाना चाहिये वरना पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को आगे रख कर और सभी दलो के अनुभवीं नेताओं को जोड़ कर राजनीतिक और दलीय रूप से कांग्रेस को इस मुद्दे पर तत्काल लीड लेनी चाहिये और पूर्व गुट निरपेक्ष आंदोलन के सभी देशो से सम्पर्क कर एक बैठक बुला कर युद्द की निन्दा का प्रस्ताव करना चाहिये और मानव की सहयता के लिये डाक्टरो की टीम दवाईया , खाद्द्य सामग्री इत्यादि से मदद करने की शुरुवात करना चाहिये ।
हो सकता है की ये आन्दोलन तत्काल सत्ताधीशो को न समझ मे आये पर दुनिया की जनता इससे जरूर जुड़ेगी । जो रूस आक्रमण कर रहा है उसकी जनता वहा तानाशाही व्यवस्था के बावजूद सडक पर युद्ध का विरोध कर रही है और उक्रेन के राष्ट्रपति के आगे खडे रहने पर बड़ी संख्या जहा लोग पलायन कर रहे है वही  हजारो मौतो के बाद भी वहा के आम नागरिक जिसमे बच्चे बच्चियाँ और हर उम्र की महिलाओ तक ने हथियार उठा लिया है ।एक बात याद रखना चाहिये की कोई सत्ता हार सकती है ,कोई देश हार सकता है पर अगर जनता खडी हो गयी है तो जनता कभी नही हारती और ऐसा इतिहास मे दर्ज है ।अगर इस आन्दोलन के पक्ष मे दुनिया के लोग खडे होते है तो यद्द्पि याद तो जवाहर लाल नेहरू आएँगे पर मान भारत का बढ़ेगा और स्थापित होगा की भारत ने हमेशा सही रास्ता चुना ।साथ हो हम नारो ,हथियारो से तो बिश्वगुरु नही बन सके पर मानवता के अलमबरदार बन कर वो दर्जा हासिल कर सकते है ।
अब देखना ये है की इसकी अगुवाई प्रधानमंत्री मोदी करते है जिसमे शक इसलिये है की वैचारिक रूप से उनका मूल संगठन शायद इसे स्वीकार नही करेगा या फिर जिसका मूल स्वभाव ही यही है वो कांग्रस करती है ।
कोई बडा और ताकतवर देश सिर्फ कमजोर देशो पर हमला करता है द्वितीय विश्वयुद्ध को छोड दे तो यही हुआ है अमरीका प्रतिबंध प्रतिबंध खेलता रहता है जो उसका प्रिय खेल है 
अमरीका के झांसे मे आने वाले देशो का सदा नुक्सान ही हुआ है ।
चीन बडा व्यापारी देश बन चुका है और वो उतना ही सुरक्षा का इन्तजाम कर रहा है जो उसके लिये और दुनिया की बड़ी ताकतो से निपटने के लिये जरूरी है  और रुस तथा चीन दोनो 100 साल आगे की कल्पना कर अपनी तैयारी मे लगे है जबकि कुछ देश मंदिर मस्जिद बुर्का हिजाब जैसी चीजो को ही भविश्य मान बैठे है ।
छोटे देश लाख कोशिश कर भी बड़ी ताकतो के हमलो को झेल नही सकते है हा बर्बाद होकर भी लड़ सकते है ।
दुनिया तेजी से बदली है और इसके युद्ध के नियम तथा हथियार भी बदले है ।
जीतने के लिये जरूरी है मजबूत होना और मजबूत होने की पहली शर्त है देश का अन्दरूनी विवादो से ऊपर होना , देश मे एकता होना , आपसी सद्भाव तथा विश्वास होना ,सरकार पर विश्वास होना तथा इसकी शर्त है सरकार का पारदर्शी होना ,समझदार और दूरदर्शी होना और सम्पूर्ण जनता मे ये विश्वास पैदा करना की वो सब कुछ सबके लिये कर रहे है तथा सबके भविश्य और सुरक्षा के लिये कर रहे है।
अन्दर से टूटा हुआ देश आर्थिक प्रगति नही कर सकता तथा यदि अंदर झगडे है और कभी भी हालात बिगड़ने का अवसर है तो अर्थवयवस्था बर्बाद होगी ही जबकि देश की मजबूती के लिये जरूरी है की देश आर्थिक रूप से बहुत मजबूत हो ,शैक्षणिक स्तर उच्च हो और स्वास्थ्य की गुणवत्ता भी उच्च कोटि की हो , बेरोजगारी ना के बराबर हो ,कृषि से लेकर व्यापार तक सब सम्पन्न हो और वैज्ञानिक आत्मनिर्भरता हो सभी क्षेत्रो मे स्वाथ्य ,भविश्य की आवश्यकताओ तथा सैन्य जरूरतो के क्षेत्र मे तथा भविश्य मे आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस से लेकर पृकृति संरक्षण और आवश्यक चीजो के असम्भव निर्माण तक ।
इन सब चीजो के लिये वातावरण तभी बन सकता है जब नेतृत्व करने वाले सभी लोग दूरदर्शी हो और अपने ,अपनी पार्टी तथा सत्ता नही बल्कि आने वाली पीढियो के लिये सपने देखे ,सिधांत गढ़े और सन्कल्पित हो ।
वरना स्वस्थ लोकतांत्रिक प्रतिस्पर्धा और भविश्य की पीढियो के लिये सपनो की पतिस्पर्धा के बजाय तू तू मैं मैं तो किसी भी देश को पीछे ही ले जाता है ।
इतिहास के सपनो मे जीना या इतिहास की नफरत को ढोना और भविश्य की पीढियो को भी देकर जाने का इरादा सिर्फ और सिर्फ बर्बादी ही लाने वाला होता है ।इराक हो ,सीरिया हो ,उक्रेन या अन्य ऐसे कोई भी देश वो कितना भी फौजी साजो सामान इकट्ठा कर ले पर अगर वो किसी बड़े को खटक गये तो उसकी बर्बादी तय है और इस गलतफहमी मे रहना की उसको हथियार बेचने और अपने हितो के लिये इस्तेमाल करने वाला कोई दूसरा देश उसके लिये लड़ने आयेगा गलतफहमी ही साबित होता रहेगा क्यो कोई भी देश खुद को दूसरे के लिये बर्बाद नही करता क्योकी युद्ध बहुत महंगा शौक है । इसलिये छोटे , आर्थिक ,जनसांख्यिकी से कमजोर और विकासशील देशो के लिये सबसे अच्छा है की वो किसी बड़े की कठपुतली न बने और अपने हित अहित के साथ सबसे सम्बंध रखे और किसी बड़े के राजनीति का मैदान न बने ,चुनौती ही दे ।पहले और दूसरे विश्व युद्ध की विभिषीका कोई भी अभी भूला नही है ।
किसी भी देश का अपना निर्माण खास माहौल और ऐतिहासिक परिस्थितयो और कारको से होता है और उन्ही हालातो मे सुखी होता है तथा तरक्की करता है ।कुछ समाज हमेशा से तानाशाही व्यवस्था मे रहे और उसके आदी है तो वहा उसी फ्रेम मे कोई भी व्यवस्था हो जनता को फर्क नही पडेगा जब तक की लोकतंत्र की हवा का एहसास उसके अन्दर घर न कर जाये और वो तब होता है जब पूरी जनता उसका खुद अनुभव करती है या उसे सहज जानकारी होती है । भारत उन्मुक्त वातावरण का समाज रहा है यहा का समाज थोडे कम मे भी जी लेता है और संतुष्ट रहता है पर उसका उन्मुक्त वातावरण और उन्मुक्त हंसी उससे नही छिननी चाहिये इसलिये तानाशाही जैसा कोई कदम या सोच भारत के लिये आत्मघाती होगी । भारत को धर्म और जातीय झगड़ो वाले समाजो और देशो से सबक लेने की जरूरत है और जितनी जल्दी समझ लेगा उतना ही देश मजबूत हो जायेगा तथा वैज्ञानिक दृष्टिकोण और तरक्की भारत को दुनिया के सामने शान्ती तथा सद्भाव की चुनौती देने लायक हो जायेगी तथा ये दुनिया मे शान्ती का सन्देश देने लायक हो जायेगा महात्मा गांधी को सामने रख कर ।
ये वक्त फिर से विचार करने का है कि जवाहर लाल नेहरू द्वारा शुरु किया गया गुट निरपेक्ष आंदोलन कितना सार्थक था और वो खुद मे तीसरी धुरी था जी बाकी दो को बैलेंस करता था ।
पहले अमरीकी स्वार्थो ने काफी देशो को बर्बाद किया है और अब उक्रेन पूरी दुनिया के छोटे और कम बिकसित या विकासशील देशो के लिये नये सिरे से एक्जुट होकर नई रणनीति बनाने का वक्त है और भारत इन सबकी अगुवाई कर सकता है पर उसके लिये पहले भारत मे पूर्ण एकता और विश्वास जरूरी है ।
उक्रेन तो एक हफ्ते मे निपट जायेगा परंतु ये अन्तिम साबित नही होगा बल्कि ये नये तरह के युद्ध का प्रारंभ है ।
चीन की चुनौती भारत के लिये कम नही है और वो चुनौती खुद की वैचारिक और रणनीतिक गल्तियो से पैदा हुयी है ।इन गल्तियो को तुरंत स्वीकार कर उसका परिमार्जन और अनुभव का उपयोग करते हुये उससे बाहर निकलना वक्त की मांग है चाहे वह राजनीतिक विरोधी के  पास ही क्यो न हो ।
युद्ध से बचना है तो युद्ध को महंगा करना होगा और बंटा हुआ देश तथा अज्ञानी नेत्रत्व नही कर सकता ।
डा सी पी राय
स्वतंत्र राजनीतिक चिंतक एवं वरिष्ठ पत्रकार