गुरुवार, 9 दिसंबर 2021

₹जिन्दगी_के_झरोखे_से। राजीव_गांधी_जिन्दाबाद_बोलते_हुए_आयेऔर #मुलायम_सिंह_जिन्दाबाद_करते_हुये_निकले

#जिन्दगी_के_झरोखे_से-
जब वो #राजीव_गांधी_जिन्दाबाद_बोलते_हुए_आये
और #मुलायम_सिंह_जिन्दाबाद_करते_हुये_निकले
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ये 1993 के विधान सभा चुनाव की बात है ।मैं समाजवादी पार्टी का महामंत्री और प्रवक्ता था ।आगरा मे जातिगत कारणो से पार्टी का कोई बहुत मजबूत आधार नही था पर मेरी अति सक्रियता और सतत संघर्ष से पार्टी कुछ ज्यादा ही नजर आती थी सड़क से समाचारो तक और चूंकि आगरा तीन मध्यप्रदेश और राजस्थान से भी जुड़ा है और आगरा मंडल ही नही इटावा तक के मीडिया का मुख्य केन्द्र है तथा आरएसएस का भी पच्चिमी उत्तर प्रदेश का मुख्यालय है और इस बड़े क्षेत्र का शिक्षा और चिकत्सा का तथा  बुद्धिजीवियो का भी केन्द्र रहा है और  मुलायम सिंह यादव जी की शिक्षा भी यही से हुई है तो उनकी भी आगरा मे ज्यादा रुचि रही और एक टोटका भी शायद उनके दिमाग मे लगातार रहा कि आगरा मे मैने पार्टी का एक तीन दिवसीय कार्यक्रम रखा और उसके बाद ही पार्टी की सरकार बन गई जो 2017 से पहले भी हुआ तो आगरा पार्टी की सक्रियता और प्रचार का केन्द्र था ।
चौ चरण सिंह के समय लोक दल को छोड दे जिसमे वो तीन विधान सभा सीट जीत जाते थे वर्ना 1977 से पहले जब पुरानी समाजवादी पार्टी जीतती थी कुछ सीटे और 1977 मे भी शहर की तीनो सीट कांग्रेस ही जीत गई 

आज उत्तर प्रदेश की राजनीति की दशा और दिशा --

आज उत्तर प्रदेश की राजनीति की दशा और दिशा --


उत्तर प्रदेश का आने वाला चुनाव मील का पत्थर साबित होने वाला है ।बंगाल ने लम्बे समय बाद एक चुनौती को स्वीकार भी किया और चुनौती दिया भी और इबारत लिख दिया राजनीति के पन्ने पर की इरादा हो, संकल्प हो और आत्मबल हो तो कितनी भी बड़ी ताकते सामने हो उन्हे परास्त किया जा सकता है ।

अब बारी उत्तर प्रदेश की है तय करने की कि देश की राजनीति की दशा और दिशा क्या होगी । जो विभिन्न कोनो से आवाज उठती है कि लोकतंत्र खत्म हो जायेगा और संविधान संघविधान मे बदल जायेगा तथा एक संगठन को छोड बाकी सब कैद मे जीवन काटेंगे ,क्या सचमुच वैसा कुछ होगा या ये सब एक भ्रम मात्र है ।तय तो ये भी होना है की जो चल रहा है वही चलेगा या बदलाव आयेगा और खुली बयार फिर से बहेगी ।तय होना है की उत्तर प्रदेश सिर्फ ठोको , मुकदमे लगाओ और जेले भरो पर ही चलेगा या रोटी रोजगार और सचमुच के विकास जिसका लोग सपना देखते है उसपर चलेगा ।

तय ये भी होना है कि 1989 से हर चुनाव मे सत्ता परिवर्तन की बयार इस बार भी बहेगी या कांग्रेस युग की वापसी होगी और सत्ता फिर वापस आयेगी ।

इस युद्द के मुख्य रूप से चार योद्धा है जिसमे भाजपा तथा आरएसएस और समाजवादी पार्टी फिलहाल आमने सामने दिखलाई पड़ रहे है । भाजपा के ऊपर जहा सरकार असफलताओ का बोझ है वही अपने ही विधायको नेताओ और कार्यकर्ताओ की नाराजगी का जोखिम भी ,जहा सभी चीजो की महंगाई का विराट प्रश्न सामने मुह बाये खड़ा है तो किसान आन्दोलन की आंच भी जलाने को तत्पर है ,बेरोजगार नौजवान हुंकार भर रहा है तो कुछ को छोडकर कर पूर प्रशासन तंत्र मे एक कसमसाहट है , या यूँ कहे की चुनावी जमीन भाजपा को निगलने को आतुर दिख रही है ।नागपुर से लेकर दिल्ली और लखनऊ तक भगवा खेमे जबर्दस्त बेचैनी दिखलाई पड़ रही है और साम दाम दंड भेद सब कुछ इस्तेमाल कर किला बचाने की जद्दो-जहद भी साफ नज़र आ रही है तभी राष्ट्रीय अध्यक्ष जे पी नड्डा केवल पूर्वी उत्तर प्रदेश तो राजनाथ सिंह मध्य उत्तर प्रदेश और अमित शाह पच्चिमी उत्तर प्रदेश मे चुनाव सम्हालने जा रहे है और प्रधानमंत्री मोदी का अब हर हफ्ते कार्यक्रम लग रहा है । आरएसएस तथा उसके प्रशिक्षित लोग हिन्दू मुसलमान मुद्दा बना देने को कमर कसते नज़र आ रहे है तभी तो केशव मौर्य से मथुरा काशी का राग छिड़वा दिया गया है  भगवा खेमे के योद्धा चाहे उसकी आंच मे प्रदेश बर्बाद क्यो न हो जाये पर चुनाव बड़ी चीज है ।

दूसरी तरफ समाजवादी खेमा लम्बी नीद से उठ कर अपनी अंगडाई लेता हुआ दिख रहा है पर अभी भी जमीनी हकीकत और अपनी कमजोरियो से आंखे मूदे हुये लगता है ।जहा भाजपा सैकड़ो चेहरे और संगठनो के साथ उछल कूद कर रही है वही समाजवादी पार्टी वन मैंन शो के साथ वन मैन आर्मी ही नजर आ रही है । अखिलेश यादव द्वारा मुलायम सिंह यादव को बेइज्जत कर अध्यक्ष पद से हटाने के बाद पार्टी सभी चुनावो मे खेत रही है ।पार्टी का दो मुख्य मजबूत वोट था जिसमे से पिछले विधान सभा चुनाव और लोक सभा चुनाव मे इसमे से यादव लोगो का भाजपा खेमे को काफी समर्थन मिला हिन्दू और मंदिर के नाम पर और अभी भी ये दावा नही किया जा सकता कि 100% यादव वोट पुरानी वाली ताकत तथा जज्बे से सपा के लिये लडेगा और वोट देगा ।दूसरा अडिग वोट मुसलमान का रहा जो 1989 और फिर 1993 से पूरी ताकत के साथ सपा के साथ खड़ा रहा पर इस बार वो विचलित दिखलाई पड़ रहा है और आज़म खान के मामले मे अखिलेश यादव की तब तक की गई बेरुखी जब तक वोवैसी से आज़म से मिलने की इच्छा व्यक्त नही किया और कांग्रेस की तरफ से भी उनके प्रति सहानुभूती नही दर्शाई गई ने भी पूरे मुस्लिम समाज को विचलित कर दिया है साथ मे कभी विष्णू के मंदिर तथा कभी परशुराम के मंदिर की बात कर अखिलेश यादव ने पाया कुछ नही बल्कि भाजपा की नीतियो का पिछलग्गू बनने का काम किया है ।ऐसे मे यदि मुस्लमान को कोई और विकल्प नही मिला तो उसका वोट तो मिल सकता है पर 1991की तरह ही जोश रहित और कम संख्या मे होगा ।पता नही क्यो अखिलेश यादव पर अति जातिवादी होने का ठप्पा भी लग गया है और बडी जातियो के प्रति बेरुखी वाला भाव भी ।ये गलती तो सपा ने प्रारंभ से ही किया कि वो अन्य पिछडी जातियो और अति पिछडी जातियो को ये एहसास नही करा पायी की पार्टी तथा सत्ता उनकी भी है ।मुलायम सिंह के उलट अखिलेश का सुलभ न होना तथा पुराने लोगो के प्रति उपेक्षा भाव और अनुभवी वरिष्ठ लोगो से दूरी भी उनको भारी पड़ती दिख रही है और वो अपना ही राजनीतिक कुनबा ही पूरी तरह समेट नही पा रहे है ।पर अब वो भी सडक पर आ चुके है ।जहा सिर्फ 30या 35 सीट की लडाई मे अपने चाचा शिवपाल यादव और मुलायम सिंह यादव को बाहर का रस्ता दिखा दिया वही कांग्रेस को 125 सीट दे दिया । यद्द्पि भाजपा के सामने आज तक सपा ही है पर अभी तक सपा और उनके सहयोगी 125/130 सीट से ज्यादा पर बढते हुये नज़र नही आ रहे है पर थोडा व्यव्हार और रणनीति बदल कर उछाल लेने से भी इंकार नही किया जा सकता है । कितना ये उनके व्यहार और रणनीति परिवर्तन पर निर्भर है 

तीसरी  पार्टी बसपा है जिसकी नेता मायावती यदि पैसे की भूखी नही होती और धन वैभव तथा अहंकार से दूर रही होती और अपने मिशन के साथियो को दूर नही किया होता तथा काशीराम के रास्ते पर चलती रही होती तो आज देश की सबसे बडी ताकतवर नेता होती या सबसे बड़े 3/4 मे होती ।पर उनकी कमजोरियों और कर्मो ने उनकी लम्बे अर्से से भाजपा की सत्ता के सामने शरणागत कर दिया और लम्बे समय से दिल्ली मे बैठी वो केवल राजनीति की औपचारिकता निभाती हुयी दिख रही है । उनके कर्मो से उनका वोट ठगा हुआ मह्सूस कर रहा है ,फिर भी उनका वोट है ।इस चुनाव मे भी वो पुराने हथकंडो के साथ मिश्रा जी के कन्धे पर चढ़ कर चुनाव को बस जीवित रहने लायक लड़ना चाह्ती है या भाजपा की बैसाखी बन अपनी सुरक्षा और अपने भतीजे की राजनीति मे स्थापना तक के ही इरादे से उतरना चाह्ती है ये वक्त बतायेगा ।  फिर भी मायावती यदि इस चुनाव मे पैसे का लालच छोड कर और क्षेत्रो के सम्मानित लोगो को ढूढ कर टिकेट देती है और अपने खजाने का कुछ अंश लोगो के चुनाव लड़ने पर खर्च करती है तो वो 40 से ज्यादा सीट जीत सकती है और यदि ढर्रा पुराना ही रहता है तो 19 से भी नीचे ही जायेंगी और कितना नीचे इसकी समीक्षा कुछ समय बाद हो सकेगी ।

चौथी पार्टी कांग्रेस है जिसके लिये इस बार सबसे अच्छा अवसर था क्योकी वो 1989 से ही उत्तर प्रदेश सरकार से बाहर है और प्रियंका के रूप मे ये नया चेहरा उनके पास था पर या तो कांग्रेस का नेतृत्व किसी दबाव मे है या फिर मन से हार चुका है और इतना कुण्ठित हो गया है कि नये विचार और कार्यक्रम सोच ही नही पा रहा है । लोगो को जोडने मे कांग्रेस का विश्वास नही नही है बल्कि स्थापित काग्रेसी इस चक्कर मे रह्ते है की जो है उनको भी कैसे निकाला जाये की उनका एकछत्र राज रहे चाहे बंजर जमीन पर ही सही ।खुद राहुल गांधी पूरे परिवार की पूरी ताकत लगाने के बावजूद अपनी पारम्परिक सीट अमेठी हार चुके है और जब सोनिया जी या राहुल जीतते भी है तो अपने जिले की विधान सभा नही जीता पाते पर अभी ये परिवार स्वीकार नही कर पा रहा है की राजनीति कहा जा चुकी और आप करिश्मा करने वाले नही रहे । वैसे भी इधर कांग्रेस सिर्फ उन प्रदेशो मे चुनाव जीती जहा किसी दल से सीधी टक्कर हो और उस प्रदेश मे कांग्रेस का मजबूत नेता हो जिसने अपने प्रदेश मे अपनी साख कायम रखी हो । बंगाल मे शून्य पर आकर और तमिलनाडु केरल तथा असम मे पूरी ताकत और समय लगाकर भी दोनो कूछ हासिल नही कर सके पर अभी भी अपनी कमजोरियो दूर करने और जमीन की हकीकत समझने का कोई इरादा नही दिखता है ।शायद भाजपा और आरएसएस पर ही निगाह रखते तो कुछ तो कमजोरिया दूर कर सकते थे । सिंधिया छोड सकते है महीनो से पता था पर क्यो नही रोक पाये ,सचिन पाइलट ने 5 साल मेहनत की पर उनकी उपेक्षा क्यो और क्यो कुछ फैसला नही ।मध्य प्रदेश में 28 सीटो का चुनाव था और सत्ता का फैसला होना था पर भाई बहन सहित पूरी पार्टी ने कमल नाथ को अकेला छोड दिया ।इतिहास ही याद कर लेते की 1978 मे सिर्फ एक सीट पर इन्दिरा जी ने कैसे गाव गाव पैदल नापा था और जिस गाव मे जहा जगह मिली रुक गई । सांकेतिक राजनीति का तजुर्बा तो हो चुका भट्टा और परसौल मे । जरा पन्ना पलट कर देख लेना चाहिए कि वो सब कर के कितना वोट मिला दोनो जगह । उत्तर प्रदेश में मे भी कही कांग्रेस इसी तरह चलती रही तो कही बंगाल ही न दोहरा दे और अब भी अपने रंगीन चश्मे उतार दे और राजनीतिक पर्यटन को छोडकर कर डट जाते पूर्णकालिक तौर पर और व्यवहारिक राजनीति कर ले तो शायद कुछ साख बच जाये ।वो सत्ता की तरफ जाने वाला रास्ता और समय तो पीछे छूट गया पर सम्मान बचा सकती है और 2024 के लिये बुनियाद रख सकती है ।पर प्रियंका गांधी ने आकर्षण पैदा किया है और संगठन को धार देने की कोशिश की है जिसका परिणाम है की उनकी बड़ी रैलिया हो रही है ।वो नया एजेन्डा भी सेट कर रही है पर जातिवाद के अति का शिकार उत्तर प्रदेश जाती का तड़का भी चाहता है ।अगर कुछ जातिगत छत्रप साथ हो जाते तो कांग्रस कमाल भी कर सकती है ।

कुल मिलाकर पूरा माहौल भाजपा और योगी विरोधी होने के बावजूद आज की तारीख तक विरोध की अकर्मण्यता,सिद्धांतो से विचलन और धारदार राजनीति का अभाव तथा सुविचारित रणनीति का अभाव भाजपा को फिर मुकुट पहना सकता है ।ऊपर लोगो की जिन आशंकाओ का जिक्र किया गया है उनका जवाब देने और फैसलाकुन युद्द छेड़ने की जिम्मेदारी तो विपक्ष के नेताओ की है ।देखते है की 1989 का सिलसिला जारी रहता है और सत्ता बदलती है या 80 के दशक का कांग्रेस का इतिहास भाजपा दोहरा देती है । यदि विपक्ष रणनीतिक साझेदारी के साथ आरएसएस और भाजपा के धार्मिक और जातीय ट्रैप से बच कर फैसलाकुन लडाई लडने उतर सका तो भाजपा को 100 सीट भी नही मिलेगी और सत्ता परिवर्तन होगा और यदि यही ढर्रा रहा तो भाजपा 160 से 210 तक सीट जीतने मे कामयाब हो जाएगी सारी विपरीत स्थितियो के बावजूद भी । सवालो के जवाबो की प्रतीक्षा जनता को भी है और भविष्य के इतिहास को भी ।


शनिवार, 6 नवंबर 2021

पता नही अब कौन सी मुसीबत आ गयी कालोनी मे कोरोना काल

पता नही अब कौन सी मुसीबत आ गयी कालोनी मे 

कालोनी मे एम्बुलेंस आई 
किसी को कहा पता है 
कि 
कौन गम्भीर बीमार हो गया 
या 
किसी की लाश आई 
क्योकी खुद के लिये जीना और खुद तक रहना नई सभ्यता है 
पडोसी पडोसी को ही नही जानता 
तो कालौनी वाले क्या जानेंगे 
कल कोई सार्वजनिक सूचना आयेगी कालोनी के पार्क मे शोकसभा की 
तो कोशिश करेंगे की पहचान ले कि किसके घर हुआ है 
अरे हा 
ये तो रोज सामने पडते थे घर से निकलते ही 
शायद सामने वाला दरवाजा इन्ही का है 
फिर 
मुह लटका कर पूछना अरे क्या हो गया था 
आप ने बताया ही नही 
कोई बात थी तो दरवाजा खटखटा देते 
बहुत अच्छे थे या थी 
उधर घड़ी पर निगाह है की कही जाना है और ये मुसीबत 
अरे वो देखो कई लोग  तो अब अंतिम मिनट मे आ रहे है 
हम ही कौन से सगे थे की आकर बैठ गये शुरू से 
कुछ काम ही निपटा लिया होता इतनी देर मे 
अभी वो सीरियल आ रहा था 
और वो फिल्म भी 
पर दिमाग खराब था भागे आ गये 
ओह चलो शोक सभा खत्म तो हुयी 
तो 
हम आप लोगो के घर का क्या नंबर है ।
क्या नाम लिखते है अपना 
हा वो तो घर के सामने ही है 
अंदर से -
ये अपने धर्म या जाती के तो है नही 
अच्छा चल रहे है कोई बात हो तो बता दीजिएगा 
पर उन्होने भी नही पूछा न नाम और न घर का नंबर 
एक और एम्बुलेंस आ गयी 
चलो जल्दी कही रुकना न पड़ जाये 
पता नही अब कौन सी मुसीबत आ गयी कालौनी मे ।

बुधवार, 27 अक्टूबर 2021

जिंदगी के झरोखे से गांव से निकल वो आज भी जिंदा है

आज ही यानी 27 अक्टूबर की रात और 28 की सुबह उत्तर प्रदेश के एक जिले के एक पिछड़े गाव के उस घर के एक अंधरे कमरे मे जन्म हो गया था एक इन्सान का , न डाक्टर ,न नर्स ,न दवाईया ,न साफ सफाई पर वो जी गया और चल भी गया इतने साल अपने तमाम संघर्षो लोगो के छल और धोखे पर आंख बंद कर विश्वास करते हुये ।
आज उसकी जिंदगी के अनुभव मे एक साल और जुड़ गया ।
लिखना चाहता है वो अपनी जीवन गाथा पर वो एक नितांत साधारण व्यक्ति है और साधारण लोगो की जीवन गाथा नही होती है बस उनके हिस्से मे संघर्ष होते है , उपेक्षा और अपमान होते है ,दुख होता है और तिरस्कार होता है ,और लिखे भी तो क्या लिखे ? गरीबी ,अभाव चार  चम्मच दूध के लिये झगड़ा ,गेहू की रोटी या पूड़ी का वर्णन और ये कि गेहू का आटा कही से आता था विशेष कारण से ,वो बाढ़ जो दरवाजे तक आ गयी थी और सब फसल लील गयी थी और उसके बाद की जिन्दगी ,कहा से शुरू करे वो और कहा खत्म ।इतना ज्यादा है की कई दिन चाहिए लिखने को या कई महीने ।पर क्या होगा लिख कर वो लड़का तो वापस नही आयेगा जो अभाव के कारन अपराधी बन गया था और किसी पडोसी विरोधी से सुपारी लेकर बहाने से बुला कर पुलिस ने गाँव मे ही गोली मार दिया था उसे जिसकी शादी अभी चंद दिन पहले ही हुयी थी और वो लड़कियां भी कहा वापस आ पायेंगी जो एक के बाद एक ब्याह कर लायी गयी थी पड़ोस के घर मे और घर के सामने की पोखरी मे डूबी और मरी पायी गयी थी और पडोसी मुसकराता हुआ फिर दूल्हा बनने को तत्पर दिखा था और उसका परिवार दहेज के लिये ।
क्या क्या लिखे वो सब गडमड हो रहा है और बिखर रहा है यादो मे ।
पर याद है भैस चराने जाना ,फिर उसको तालाब मे नहलाना और उसकी पीठ पर तालाब मे घुमना ,याद तो वो भी है जब डूब ही गया था तालाब मे दो बार पर किसी ने देख लिया तो बच गया और वो जब कुये से पानी निकालते हुये पैर फिसल गया था गिर ही गया होता कूये मे और कहानी खत्म हो गयी होती पर बगल की दीवार मे लगी हुयी खूटी हाथ मे आ गयी थी और बच गया था । याद है खुरपी से खोदना ,फावड़े चलाना ,हल जोतना , कोल्हू हो या रहट बैल के पीछे चलना तो ढेकूल से पानी निकाल कर सिचाइ करना ,थाला से हाथा से पानी खेत मे फेंकना तो चारा काटना पर ये सब लिख कर क्या होगा । बैल भैंस गाय सबको सानी पानी करना तो गुड बनाने के लिये कड़ाह मे झोकना ,भेली बनाना तो आखिर मे बचे कडाहे मे पानी उबाल कर औटी पीना । खेत ने धान रोपना ,तो खेत के मचान पर रखवाली करना ,उसी मे लगा फूट खाना तो खेत से सर पर लाद कर फसल लाना ।खलिहान मे फसल की दवाई ओसाई और फिर सर पर लाद कर घर पहुचाना ।क्या क्या लिखे वो ।वो गिट्टी फोड ,वो लाखन पाती ,कबड्डी ,कुश्ती ।
उस दिन वो एक गरीब की बीबी के स्त्री अंग मे किसी के द्वारा डाल दी गयी लाठी और उसी तरह उसको 7 किलोमीटर दूर थाने ले जाना क्या क्या लिखे 
 ,वो पड़ोस के गुप्ता चाचा पिता के दोस्त जो किसी बहाने अपना पुरुष अंग शरीर ने कही छुला देते थे ,वो मिट्टी के बर्तन बनाने वाले की बहुत बड़ी उम्र की लडकी जो 4 साल के बच्चे के अंग से खेल कर पता नही क्या पाती थी ,  वो स्कूल के मुन्शी जी जो बच्चो से अपने पुरुष अंग पर कोई क्रीम लगवाते थे भरी क्लास मे तो क्या करते होंगे वो जिन बच्चो को विशेष रूप से शिक्षित करने को रात को भी बुलाते थे स्कूल और परिवार समझता था की बच्चा पढाई मे मजबूत हो रहा है ।बम्बई से आई बचपन के दोस्त की लाश पर लिखे जो कमाने गया था पर उत्तर भरतीय होने के कारन शिव सैनिको द्वारा मार दिया गया था ।अच्छा सब बुरा ही नही जांघिया नाच पर तो लिख ही सकता है जिसमे घुघरु लगे जांघिया (अन्डर वियर ) पहन कर कितना अच्छा लगाता था वो नाचता हुआ लोग और तिलैया तो क्या शानदार नाचता था ।दुलारे हर चीज का इलाज थे कुये से पानी भरना , बाल और नाखून काटना ,गाँव और आसपास के गाँव ही नही दूर दूर रिश्तेदारी मे सूचना देना ,न्योता पहुचाना और शादी पता लगाना और उनकी औरत घर अन्दर का सब सम्हाल लेती थी। 
बहुत है लिखने को लगता है कि लिख लेगा वो अगर कोशिश करेगा तो ।
आगे कोशिश जरूर करेगा क्योकी वो सब संघर्ष और तकलीफ के बाद भी आज भी जिन्दा है ।

सपने और आन्दोलन तब से

हमें याद है युवा आंदोलन और उसकी आवाजे क्योकि हम उसका हिस्सा रहे है ।
1967/68 अंग्रेजी हटाओ आंदोलन ( बहुत दिनों तक नारा लगता रहा - अंग्रेजी में काम न होगा फिर से देश गुलाम न होगा )
परिणाम ?????% अंग्रेजी बढती गयी और आंदोलन करने वाला छात्र और नौजवान छला गया ।
1975 जयप्रकाश आंदोलन , कुर्सी खाली करो की जनता आती है , संघर्ष हमारा नारा है ,भावी इतिहास हमारा है , और सत्ता नही व्यवस्था परिवर्तन करना है ।
परिणाम- बस सत्ता बदली और नौजवान फिर छला गया । पढाई और रोजगार का नुकसान हुआ ।
1989 राजा नहीं फ़कीर है देश की तकदीर है ।
परिणाम - एक और सत्ता परिवर्तन और नौजवान से बस छलावा ।
से लेकर 2014 - अच्छे दिन ,2 करोड़ रोजगार ,15 लाख ,गुजरात मॉडल तक 
कब तक नौजवान केवल लोगो को सत्ता दिलवाने का हथियार बनता रहेगा ? इस उम्मीद में की शायद अब उसके लिए अच्छे दिन आएंगे ।
नौजवान भावना में बह कर केवल अपनी जिंदगियां ख़राब करता रहा है ।
नौजवानों कब चेतोगे और एक फैसलकुन फैसला करोगे सचमुच के व्यवस्था परिवर्तन के लिए ,समाज परिवर्तन के लिए ,गैर बराबरी ,भ्र्ष्टाचार और धोखे से मुक्ति के लिए ।
नहीं चेते तो बस किसी न किसी के नारे लगाते रहोगे और अपनी जिंदगी में हारते रहोगे उन लाखो की तरह जो तुमसे पहले हार कर बूढा गए है भरी जवानी में ।
और तुम्हारी जगह फिर नए नौजवानो की फ़ौज तैयार हो जायेगी किसी का आंख बंद कर और जूनून के साथ नारा लगाने को और वो कुर्सियों पर बैठते रहेंगे ।
पर व्यवस्था कभी नहीं बदलेगी ,समाज कभी नहीँ बदलेगा और तुम भी कभी नहीं बदलोगे ।
या फिर खूब चिंतन कर एक बार खड़े हो जाओ और आने वाली पीढ़ियों को मुक्त कर दो इस छल से और उसका रास्ता सुगम बना दो ।
( एक  सफर का चिंतन पर पता नहीं क्यों और कितनी भृकुटियां तन जाएँगी मुझपर जिसकी मैंने कभी चिंता नहीं किया क्योंकि सच जिन्दा रहना चाहिए --- क्योकि मेरी आँखों में कुछ सपने है )
जय हिंद
#मैं_भी_सोचूँ_तू_भी_सोच