सोमवार, 16 नवंबर 2020

रोज_सीमा_पर_जवान_शहीद_क्यो_हो_रहे_है

#रोज_सीमा_पर_जवान_शहीद_क्यो_हो_रहे_है ?
दो सवाल है -
पहला कि नोटबंदी और सर्जिकल स्ट्राइक से आतंकवाद तो खत्म हो गया था और फिर 56 इंच और लाल आंख का डर फिर रोज हमारे जवान शहीद क्यो हो रहे है 
दूसरा मरते तो उधर के जवान भी है फिर इस मौत के खेल का मकसद क्या है ? कुछ जीत हार होती ,जमीन छीन लेता कोई तो समझ मे भी आता 
वर्ना बिला वजह दोनो तरफ के घर क्यो सूने हो रहे है ?

रविवार, 15 नवंबर 2020

सत्ता में हो या विपक्ष में पर —

राजनीती में अगर विरोध में है तो संघर्ष और खुद के जनता के लिए कार्यक्रम और वादों को लोगो तक पहुंचना तथा सत्ता की हर बुराई और कमजोरी पर हमला करना और जनता के साथ हर पल खड़ा होना होता है ।
पर -----
अगर खुद सत्ता में है तो जितना जरूरी वादों को पूरा करना तथा विकास करना है उतना ही जरूरी वो काम तथा विकास बिना बाधा और भेद भाव के लोगो तक पहुंचे ये भी है ।
उससे भी ज्यादा जरूरी उसका सम्पूर्ण और आखिरी व्यक्ति तक प्रभावशाली प्रचार करना है ताकि लोग जहा अपने हक़ पर निगाह रखे तथा विकास की निगरानी करे वही उनके मनो में ये बैठे की आप क्या क्या कर रहे है ।
और -----
उससे भी ज्यादा जरूरी आखिरी कार्यकर्ता को भी सत्ता तथा संगठन दोनों से जोड़े रखना और उसे ये एहसास करवाना की वो भी सत्ता का बराबर का भागिदार है तथा उसके सुख और दुःख से पार्टी तथा सत्ता जुडी हुयी है ।
और ----
उससे साथ ही बहुत महत्वपूर्ण है केवल तन्त्र के बजे पार्टी तथा सरकार दोनों स्तरों पर समाज के मुद्दों से जुड़ना और सामाजिक मुद्दों पर भी सतत कार्यक्रम चलाना ।
और----
जरूरी है की विरोधी के हर राजनीतिक दांव पेंच को तुरंत भोथरा करते रहना ।विरोधी किसी चीज का श्रेय ले उसके पहले अपने ही संगठन से उठवा कर उसे श्रेय देना ।
विरोधी हमला करे उसके पहले उसके खेमे और उसके पाले में घुस कर उस पर सार्थक और धारदार राजनैतिक और सैधांतिक हमला कर देना और उसे उसके पाले में ही घेर कर उस पर हमला करते रहना ।
फिर जीत पर जीत आप की होगी क्योंकि जनता का और कार्यकर्ताओ का दिल जीत लेंगे आप ।विरोधी के हर वार को भोथरा और नाकाम कर देंगे आप ।

शुक्रवार, 6 नवंबर 2020

ये कहा आ गये हम ?

ये कहा आ गये हम 

आज़ादी के बाद आज़ादी की लडाई की सूत्रधार , कर्ता धर्ता कांग्रेस थी जिसने कुर्बानिया दिया था और बस एक सपना लेकर चली थी की मुल्क को सैकड़ो साल की गुलामी से आजाद करवाना है और तानाशाही शासन से लडते वक्त कहा पता होता है की एक दिन अचानक तानाशाह हार कर चल देगा । ये भी तो हो सकता था की लडाई के सारे नायक एक दिन जेलो मे फाँसी चढा दिये जाते या गोलियो से भून दिये जाते ।
आज़ादी मिलने की आहट के साथ कांग्रेस के नेताओ ने सोचना शुरू किया की आजाद देश कैसा बनाना है और चूंकि अन्ग्रेज लूट ले गया था इसलिए संसाधन का भी अभाव था और उसी मे प्राथमिकता तय करनी थी । जवाहर लाल नेहरु ने और साथियो ने तय किया की पहली प्राथमिकता देश को देश की शक्ल देना , शान्ती स्थापित करना और जनता को विश्वास दिलाना है की अब मुल्क हम सबका है और सबको मिल कर बनाना और बढ़ाना है । इसीलिए उन्होने बाँध ,सिचाई के साधन नहरे , बिजली , हर स्तर की और हर तरह की शिक्षा , चिकत्सा इत्यादि को प्राथमिकता दिया तो भविष्यदृष्टा होने के कारण आई आई टी , आई आई एम बनाया तो जमीन से लेकर आसमान तक के अनुसंधान की तरफ भी कदम बढाया ।
वो नही चाहते थे की भारत व्यर्थ की चीजो मे पैसा खर्च करे इसिलिए पंचशील सिद्धांत द्वारा पडोसियों को संदेश दिया की लडाइ के बजाय सह अस्तित्व ही विकास की कुन्जी है और इसमे वो चीन से धोखा खा गये जिस गम मे दुनिया से चले भी गये परंतु जाने से पहले प्राथमिकता मे परिवर्तन कर सैन्य क्षेत्र के लिए भी ऐसी नीव रख गये की फिर 1965 से लेकर बंगला देश होते हुये अब तक उस क्षेत्र मे भी भारत दुनिया की चार ताकतो मे शुमार है ।
आज़ादी की लडाई मे देश के साथ नही रहने वाले या गद्दारी तक करने वालो ने आज़ादी से 22 साल पहले एक संगठन बनाया जिसको कुछ लोग रायल सीक्रेट सर्विस भी कहते है और उनका लगातार यह मानना था की अंग्रेज उनके दुश्मन नही है बल्की मुस्लमान और साम्यवादी उनके बड़े दुश्मन है और इस सोच ने अन्ततः ऐसा जहर पैदा किया की आज़ादी के बाद मुल्क ठीक से सम्हला भी नही था कि अहिंसा से इतनी बडी लडाई जीतने वाले बापू की ह्त्या कर दिया इस विचार ने ।
यह विचार देश ही नही दुनिया की निगाह मे अछूत हो गया तो इन लोगो ने नया पैतरा चला और अपना एक राजनीतिक संगठन बनाया और उसका नाम रखा जनसंघ । काफी दिनो तक इस संगठन को भी लोगो ने भाव नही दिया क्योकी एक तरफ आज़ादी की लडाई मे बडी भूमिका निभाने वाले अलग तरह सोचने वाले ज्ञानी लोगो ने सोशलिस्ट पार्टी बना लिया था जो बहुत प्रभावशाली थी तो राजाओ ने स्वतंत्र पार्टी और कार्ल मार्क्स के विचार भी रुस की क्रांती से दुनिया मे फैल गये थे तो भारत मे भी साम्यवादी पार्टी स्थापित हो चुकी थी ।
राजाओ की स्वतंत्र पार्टी ने आगे चल कर जब विभिन्न दलो के विलय से लोक दल बना था तो उसमे विलय कर लिया था महारानी गायत्री देवी , पीलू मोदी के नेतृत्व मे ।
साम्यवादी पार्टी ने बंगाल और केरल के साथ अन्य स्थानो पर भी मजबूत पैठ बनायी जो काफी दिन तक रही पर भारत की जमीन और भारत की भाषा और सपने से न जुड़ पाने के कारण और लम्बे समय तक रुस और चीन का पिछ्लग्गू दिखने के कारण उसका क्षरण होता गया ।
सोशलिश्ट पार्टी के नेता डा राममनोहर लोहिया जो जवाहर लाल नेहरु के मित्र थे और महात्मा गांधी के भी प्रिय थे अज्ञात कारणो या काल्पनिक भविष्य की परिकल्पनाओ के कारण उसी नेहरु के इतने विरोधी हो गये जो हमेशा चाहते थे की आचार्य नरेंद्र देव ,लोहिया और जयप्रकाश इत्यादि कांग्रेस मे ही रहे और नया भारत बनाने मे सत्ता मे शामिल होकर योगदान दे और गांधी जी भी यही चाहते थे पर बापू की आकस्मिक हत्या के कारण यह नही हो पाया और डा लोहिया इतनी दूर निकल गये की कांग्रेस के सामने अपने को असहाय समझने वाले लोगो को उन्होने एक संजीवनी दे दिया "गैर कांग्रेसवाद "की और अलग अलग विचार के तथा विचारहीन लोग भी एक नाव पर सवार हो गये ।कहा सोशलिश्ट, कहा जनसंघ ,कहा साम्यवादी तो मुस्लिम लीग तक सब एक नाव पर सवार हो गये यद्दपि पूर्व मे भी श्यामाप्रसाद मुखर्जी मुस्लिम लीग के साथ सरकार बना चुके और इस समय काफी जगहो पर कांग्रेस के ही दल बदलुवो के साथ कुछ ही दिनॉ के लिए सरकार बना लिया जिसने यह संदेश भी दिया और इन लोगो मे आत्मविश्वास भी जगाया की इस फार्मूले से सरकार बनायी जा सकती है और फिर इसी तरह बेमेल खिचड़ी सरकारे बनती रही और गिरती रही ।
इस बीच पहले ताकत को केन्द्रित करने के चक्कर मे कांग्रेस ने प्रदेशो मे अपने को कमजोर किया तो आपात्काल लगा कर आज़ादी की लडाई की पूंजी को गंवा दिया ।फिर भी बाद मे उसके लिए प्रायश्चित किया और देश को इस स्थिति तक ला खड़ा किया की देश दुनिया की 5 बडी अर्थिक और सामरिक ताकतो मे शामिल हो गया लेकिन मजबूत और व्यवहारिक नेतृत्व के अभाव मे अपने को सहेज तथा समेट कर नही रख पाने के कारण कांग्रेस कमजोर होती गई और समझौते करते करते क्षेत्रीय दलो का पिछ्लग्गू भी होती गई काफी बड़े क्षेत्र मे और दूसरी तरफ व्यवहारिक और लचीली राजनीती के अभाव मे अपने मजबूत लोगो को खोती चली गई ।
लोकदल और समाजवादी परिवार वाद को ,ऊच नीच की खाई को और 10%बनाम 90%को मुद्दा बना कर चले थे जबकी चौ चरण सिंह जब तक जिन्दा रहे उन्होने किसान को राजनीती के केन्द्र मे रखा पर प्रधानमंत्री तक पहुच कर भी खुद अपने कृषी अर्थशास्त्र को फैसलाकुन तरीके से लागू नही कर पाये । परिवार वाद के खिलाफ राजनीती मे आगे बढे हुये सभी सिर्फ परिवार नही बल्की खानदान वाद और जातिवाद के कीचड़ मे धंस गये आगे चल कर और 90 %की लडाई की बस बात करते रहे और खुद खानदान समेत 10% मे शामिल हो गये और जब इसपर कभी सवाल हुआ तो बेशर्म जवाब था की समता के साथ संपन्नता की लडाई लड़ रहे है वो और अभी कुछ लोगो अंबानी अडानी के साथ बैठे है कभी न कभी सब बैठ जायेंगे ।
बापू की हत्या के बाद पूरी दुनिया मे बदनाम हो गये लोगो ने नई रणनीति पर काम किया और भाषा तथा चेहरे पर प्रगतिशीलता का मुखौटा लगा लिया ,यहा तक की अपने संविधान मे गांधीवाद और समाजवाद को भी जोड़ लिया । जनसंघ की स्थापना के बाद के कई अध्यक्षो का नाम तो आज उनके नेताओ को भी नही याद है पर पहले दीन दयाल उपाध्याय के समय मे अन्त्योदय जैसी बातो से लोगो का ध्यान खीचा ।फिर लोहिया जी और उपाध्याय जी की मुलाकातो ने और साथ ने इनकी कालिख को कम कर समाज मे स्वीकार्यता बढाई तो आपातकाल के बाद जनता पार्टी मे शामिल हो और मंत्री बन कर चेहरे गढ़ने मे कामयाबी मिली ।जहा अटल बिहारी वाजपेयी के रूप मे रणनीतिक तौर पर एक उदारवादी चेहरा गढा गया और भारत के लिए स्वीकार्य बनाया गया वही अडवाणी जी ने 1977 मे ही सूचना प्रसारण मंत्री बनते ही अखबारो मे संघ के लोगो को भरना शुरू किया और आरएसएस की इच्छानुसार काम शुरू हो गया ।आगे चलकर विश्वनाथ प्रताप सिंह के रूप मे इन लोगो को एक और मोहर मिल गया और उन्हे राजा नही फकीर बना कर खुद को थोडा और मजबूत कर लिया ।अटल बिहारी वाजपेयी के चेहरे का फायदा उठा जहा केन्द्र से प्रदेश तक सत्ता पायी वही अपना संघी एजेन्डा भी जारी रखा ।
अन्ततः अन्ना ,विनोद राय जैसो का इस्तेमाल तो गुजरात मे हिन्दू अस्मिता का प्रतीक और फिर मॉडल से लेकर अच्छे दिन तक ने आरएसएस को भारी बहुमत की सत्ता तक पहुचा दिया ।
पर किसने किया क्या ? जो कांग्रेज़ सम्पूर्ण भारत को ही नही बल्की गुट निरपेक्ष आंदोलन के नाम पर 100 से ज्यादा देशो को समेट कर चलती थी वो अपने को भी समेटने मे असफल रही पर देश के प्रति समर्पण , दृष्टी , सपनो और संकल्प के कारण उसने जब और जितना मौका मिला देश के लिए सर्वश्रेस्ठ करने की कोशिश किया ।लेकिन साम्यवादियो ने तो जगह जगह कारखाने बंद करवा कर मजदूरो को बेकार ही किया और सही मायने मे मार्क्सवाद का विस्तार करने मे क्या अपने दल को भारतीय परिपेक्ष्य मे ढाल कर मजबूत करने मे पूरी तरह असफल रहे और अब नजर ही नही आ रहे है केरल के अलावा ।
समाजवादी आन्दोलन और लोहिया के विचार कही दफन हो गये और यह अन्दोलन पूंजीपतियो तथा भ्रष्टाचार की चेरी बन खानदान और जाति के मकडजाल मे फड़फड़ा रहा है और अन्तिम सांसे गिन रहा है ।
आरएसएस ने जरूर अपने को बहुत मजबूत बना लिया है और अपना विस्तार पूंजी से सत्ता के हर तंत्र तक कर लिया है ।चुनाव भाजपा लड़ती है और सामने वो दिखती है पर सत्ता का संचालन और फौसले आरएसएस के होते है ।बिना किसी जवाबदेही के सत्ता का पूरा उपभोग कर रहा है ये संगठन और अपने व्यक्तियो की पार्टी के संगठंन पर हर जगह तथा सत्ता और उसके संस्थनो मे हर जगह बैठता जा रहा है और इसके सभी लोग जिन चीजो की बदनामी होती है उन आरोपो से अछूते नही हौ 
है यद्दपि इसका कहना है कि ये संस्कृतिक संगठन है पर वह संस्कृतिक और समाजिक काम कही दिखता नही सिर्फ फोटो सेशन के अलावा न हिन्दू समाज के दुख दर्द मे ही कही भागीदारी दिखती है । हा भाजपा और उसके नेत्रत्व का चेहरा जरूर इन 6 सालो मे बदरंग हुआ है अज्ञानता और असफलता के कारण , अव्यव्हारिक फौसलो के कारण ।आज जहा देश अर्थिक इतिहास की सबसे बड़ी आर्थिक बदहाली का शिकार है तो सबसे बडी बेरोजगारी का भी ।विदेश नीति के हर मोर्चे पर फ़ेल है तो सारे पडोसियो से सम्बंध खराब किया बैठा है ।चीन ने इतने बड़े हिस्से पर कब्जा कर लिया है तो नेपाल , भूटान और बंगला देश भी आंख दिखा रहे है । जनसंघ का नारा था हर हाथ को काम हर खेत को पानी दोनो पता नही कहा विलुप्त हो गये ,हिन्दी सिसक रही है तो देश की बर्बादी मे हिन्दू भी बर्बाद है और हिन्दुस्तन आईने मे खुद को पहचानने की असम्भव कोशिश कर रहा है ।दीन दयाल उपाध्याय का अन्त्योदय आखिरी पायदान पर बैठे अंबानी और अडानी की चौकीदारी कर रहा है ।
लिखने को तो बहुत कुछ है पर सोचने को सिर्फ इतना है कि क्या इसी के लिए इतनी लम्बी आज़ादी की लडाई चली ? क्या इसी के लिए लाखो ने कुर्बानी दिया ? क्या बापू ,भगत ,सुभाष से नेहरु तक के ख्वाब इसी तरह चकनाचूर हो जायेंगे ? क्या राजनीतक दल ऐसे ही अपनी स्वीकार्यता खोते रहेंगे अपने कर्मो से और विचलन से ? क्या भारत  आरएसएस और उसके गुरु गोल्वल्कर के सपनो का हिटलर वाला भारत बन जायेगा जहा सिर्फ और सिर्फ मौत का तांडव और बर्बादी ही बर्बादी होगी ।
और ये भी कि---ये कहा आ गये हम ? 
डा सी पी राय 
स्वतंत्र राजनीतिक चिंतक और वरिष्ठ पत्रकार 
फो -9412254400

गुरुवार, 5 नवंबर 2020

जातिवाद का दौगल चारित्र

जातिवाद को लेकर दोगले चरित्र होते 
कैसे खत्म होगा जातिवाद ?
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तमाम लोगो सहित मैं भी जातिवाद के आतंक से पीड़ित हूँ और उसके ख़त्म होने की कामना करता हूँ पर कैसे ख़त्म होगा जातिवाद ?  मैं ५५ के दशक  में गँव में पैदा हुआ और गाँव से जुडा हूँ और वो भी पूर्वांचल के पर मैंने अपने बचपन में भी जातिवाद का इतना उफान और इतनी घृणा नहीं  देखा था जब लोग पढ़े लिखे नहीं थे ,जितना अब पढ़े लिखो में देश रहा हूँ और वो भी जो तब पैदा हुए जब जातिवाद ख़त्म हो जाना  चाहिए था और कम से कम कही जातिवाद का जहर था भी तो स्कूलों कालेजो में सामान ड्रेस ,समान शिक्षा { उस स्कूल और कालेज में } के कारन ख़त्म हो जाना चाहिए था ,,उस वक्त जातियां थी पर एक दूसरे की पूरक थी और पूरा गाँव एक परिवार था ,किसी का कोई कम नही  रुकता था ,सब सब पर आश्रित थे और सब सबका ध्यान रखते थे और सम्मान करते थे 
किसी भी जाति के व्यक्ति के साथ अकेले बैठ जाइये और उसकी जाती का इतिहास भूगोल पूछ लीजिये फिर देखिये उसकी गौरव गाथा  और साथ उसकी जाती में कौन कौन आता है देश भर में उनमे कौन उच्च है और कौन नीच ,उसकी कितनी धाराये होती है और किनकी किससे शादी नहीं होती ,कौन किसके यहाँ उसी जाती में भी खाना क्या पानी भी नहीं पीता इत्यादि सब सुनने को मिलेगा 
इस पर पूरा लेख बाद में लिखूंगा अभी केवल अपने आसपास के चेहरों का बिना नाम लिखे चरित्र उजागर कर आहा हूँ बड़ा सन्देश देने को काफी लोगो को जिनमे इतनी घृणा भरी है की लगता है कोई बड़ा युद्ध छेड़ने की तैयारी में है जाती के नाम पर समाज में और वो भी आरपार की मार काट वालीं 
मेरे साथ सभी वर्गों के लोग जुड़े है और खुद को समाजवादी भी कहते है पर जैसे मैं उन्हें समाजवाद नहीं पढ़ा पाया सचमुच में इतने सालो में वैसे ही उनमे संस्कार भी नहीं डाल पाया समाजवाद का ,कह सकते है की मेरी असफलता है पर वो सभी मेरे साथ तो कभी कभी कुछ घंटे रहते है बाकि सारा समय तो अपने परिवार और अपनी जाती के साथ रहते है सारी शिक्षा उर संस्कार तो वहा का भरा पड़ा है खून के कतरे कतरे में 
जो साथी प्रमुख पिछड़े वर्ग के है वो बताते है की की हमारा फला धारा से तो शादी ब्याह का रिश्ता ही नहीं पर कुछ लोग महत्वपूर्ण हो गए तो कुछ लोग करने लगे पर हम तो अभी भी नहीं करते है 
जब कभी मैं किसी दलित या मुसलमान के यहाँ किसी अवसर पर जाता हूँ तो ये कन्नी काटने की कोशिश करते है और चले गए तो तबियत कुछ खराब  होती है और वहा खाना पानी कुछ नहीं
जो साथी बघेल जाती के है क्या मजाल की उनकी आप दलित या मुसलमान के घर पानी भी पिला दे ,जो दलित जाती के है उनको बाल्मीकी के घर आप खला पिला नहीं सकते है ;बेचारे देखते रहते है मन मसोस कर और हम खाते पीते रहते है
कौन बड़ा जातिवादी है और जाती के नाम पर भीतर तक घृणा रखता है ?
कुछ ऐसा ही चरित्र है समाज का सम्पुर्ण ,ब्राह्मण सरयूपारी ,कान्यकुब्ज इत्यादि में फंसा है तो क्षत्रिय भी अपने अलग अलग धाराओं में ,बनिया  हो या अन्य सभी का यही हाल है ,पिछड़े और दलित भी इसी चरित्र के साथ जी रहे है तो मुसलमानो से भी सुनता हूँ की फला तो फला है और ऐसा होता है
कौन ख़त्म करेगा जातिवाद ?
और ऐसे चरित्र वाले जब उपदेश देते है और घृणा का हद दर्जे का प्रदर्शन करते है तो आइना दिखाना ही पड़ता है

दगाबाजो_के_देवता

#जिन्दगी_के_झरोखे_से

#दगाबाजो_के_देवता --

क्यों कुछ लोग ऐसे होते है की उन पर विश्वास करें या नहीं करें कुछ समझ में नहीं आता है । पर इसके लिए जिम्मेदार भी तो वही होते है, अपने अनिर्णय के कारण और कभी कह कर मुकरने के कारण । क्यों कुछ लोग होते है जिनके लिए कभी बहुत सम्मान पैदा होता है मन में पर दूसरे ही पल घृणा होने लगती है उनसे । जब कोई ऐसी स्थिति से लगातार गुजर रहा हो तो कैसी उथल पुथल भरी होती है उसकी जन्दगी में ,उसके मन में और उसके खून के कतरे कतरे में ।

कुछ लोग बहुत बड़े हो जाते है लोगो को इस्तेमाल कर और सीढियां बना कर ,तमाम लोगो के साथ फरेब कर ,तमाम लोगो के साथ कसाई बन कर उसकी उम्मीदों उसके भविष्य और उसके दिल पर छुरियां चला कर बार बार । न जाने कितनो की क़ुरबानी होने और उनकी जिंदगियों को मिटा कर और उन्हें पावडे बना कर उसे खूबसूरत कालीन समझ उस पर चल कर बुलंदियां पाते है ये लोग । घायल कितने पड़े है पीछे उन्हें वैसे ही भूल जाते जाते है जैसे चलते हाथी को पता ही नहीं होता की कितने कीड़े मकोड़े शहीद हो गए उसके पैरों के नीचे । सच है ऐसे लोगो को लोग कीड़े मकोड़े से ज्यादा महसूस ही नहीं होते कभी भी ।

ये किसकी कहानी है क्या बताऊ । ऐसी तमाम कहानियां बिखरी पड़ी है चारो तरफ और ऐसे चरित्र कोई कहानी के काल्पनिक पात्र नहीं बल्कि चारो तरफ फैले हुए । इनके शिकार भी भरे हुए है चारो तरफ । नाम लेना जरूरी नहीं है और ऐसे लोग नाम नही बस बड़े होते है और हजारो साल पहले ही किसी ने कह दिया था की ; समरथ को नहीं दोष गुसाई ;। बाकी लोगो के भी नाम नहीं बस वे इस्तेमाल होने और गर्त में खो जाने वाले कीड़े मकोड़े है ।

ऐसा मंथन सचमुच समुद्र मंथन से कम नहीं होता है । समुद्र मंथन में तो विष निकला था तो अमृत के साथ बहुत सी अच्छी चीजें भी निकली थी ,पर इस समुद्र मंथन में तो केवल विष ही निकलना है और निकल भी रहा है ।

इस विष की कहानी से दूर बड़े मस्त है अपने वैभव ,अपनी आभा ,अपनी सत्ता और अपने गुरूर में । उन्हें परवाह ही नहीं  है की कोई जीए या मरे । कोई  रहे या न रहे । कोई अपमानित हो या सम्मानित । उन्हें तो बस अपनी और अपनों की चिंता है और चिंता है लाखो साल आगे तक की सत्ता और वैभव की । पता नहीं इन्हें राम ,कृष्ण ,बुद्ध ,महावीर ,नानक ,ईशा ,रावण ,कंस ,जदीज और तमाम राजाओं ,नवाबो की उठती और डूबती जिंदगियो से कुछ सीखने को मिला है या नहीं । पता नहीं दुनिया के सिद्धांतो से ऊपर उठकर इन्हें अमरत्व मिल गया है क्या ? क्या इन्हें कोई वरदान मिल गया है की ये और इनके अपने लाखो साल तक सत्ता और वैभव भोगेंगे ,बिना किसी बीमारी के ,बिना किसी पतन के । इन्हें ये अमरत्व मुबारक ,इन्हें ये वैभव मुबारक ,इन्हें ये सत्ता मुबारक ,इन्हें लोगो की हत्या मुबारक ,इन्हें लोगो को दिए धोखे मुबारक ,इन्हें आगे भी इनके हाथ से चलने वाली छुरियां मुबारक ,इन्हें इनकी चालबाजियां मुबारक । ये कौन है ---- ये मै क्यों बताऊँ ? आप सभी आँखें खोलिए और देख लीजिये ऐसे किसी एक को या बहुतों को । आप को ये ज्ञान मुबारक जो आप को ऐसे लोगो से बचा सके ।