गुरुवार, 7 दिसंबर 2017

6 दिसंबर

कल ६ दिसंबर था  | कल ही बीजेपी ने संविधान को रौंदा था ,कल ही संविधान की शपथ को पैरो तले कुचला था ,कल ही देश के सर्वोच्च नयायालय को दिए गए हलफनामे को पैरो के नीचे कुचला था कल्याण सिंह ने जो आज राज्यपाल है | 
जी हाँ कल ही किया था ये सब बीजेपी ,आर एस एस और विश्व हिन्दू परिसद ने जो सभी मिल कर आज देश को उपदेश देकर उस दिन तक के लिए भ्रमित कर रहे है जब तक ये संविधान की किताब को फाड़ने लायक न हो जाए और गुरु गोलवलकर के सपने यानी हिटलर की राज्य व्यवस्था को कायम न कर सके | 
बस याद दिला रहा हूँ क्योकि जो समाज और देश कल को भूल जाता है या याद नहीं रखता उसे उसी कल के साथ बहुत बुरे समय से गुजरना होता है | 
बाकि जो है वो तो है ही |

गुरुवार, 2 नवंबर 2017

जातिवाद का दोगला चारित्र

जातिवाद को लेकर दोगले चरित्र होते कैसे खत्म होगा जातिवाद ?
-------------------------------------------------------------------------


तमाम लोगो सहित मैं भी जातिवाद के आतंक से पीड़ित हूँ और उसके ख़त्म होने की कामना करता हूँ पर कैसे ख़त्म होगा जातिवाद ?  मैं ५५ के दशक  में गँव में पैदा हुआ और गाँव से जुडा हूँ और वो भी पूर्वांचल के पर मैंने अपने बचपन में भी जातिवाद का इतना उफान और इतनी घृणा नहीं  देखा था जब लोग पढ़े लिखे नहीं थे ,जितना अब पढ़े लिखो में देश रहा हूँ और वो भी जो तब पैदा हुए जब जातिवाद ख़त्म हो जाना  चाहिए था और कम से कम कही जातिवाद का जहर था भी तो स्कूलों कालेजो में सामान ड्रेस ,समान शिक्षा { उस स्कूल और कालेज में } के कारन ख़त्म हो जाना चाहिए था ,,उस वक्त जातियां थी पर एक दूसरे की पूरक थी और पूरा गाँव एक परिवार था ,किसी का कोई कम नही  रुकता था ,सब सब पर आश्रित थे और सब सबका ध्यान रखते थे और सम्मान करते थे
किसी भी जाति के व्यक्ति के साथ अकेले बैठ जाइये और उसकी जाती का इतिहास भूगोल पूछ लीजिये फिर देखिये उसकी गौरव गाथा  और साथ उसकी जाती में कौन कौन आता है देश भर में उनमे कौन उच्च है और कौन नीच ,उसकी कितनी धाराये होती है और किनकी किससे शादी नहीं होती ,कौन किसके यहाँ उसी जाती में भी खाना क्या पानी भी नहीं पीता इत्यादि सब सुनने को मिलेगा
इस पर पूरा लेख बाद में लिखूंगा अभी केवल अपने आसपास के चेहरों का बिना नाम लिखे चरित्र उजागर कर आहा हूँ बड़ा सन्देश देने को काफी लोगो को जिनमे इतनी घृणा भरी है की लगता है कोई बड़ा युद्ध छेड़ने की तैयारी में है जाती के नाम पर समाज में और वो भी आरपार की मार काट वालीं
मेरे साथ सभी वर्गों के लोग जुड़े है और खुद को समाजवादी भी कहते है पर जैसे मैं उन्हें समाजवाद नहीं पढ़ा पाया सचमुच में इतने सालो में वैसे ही उनमे संस्कार भी नहीं डाल पाया समाजवाद का ,कह सकते है की मेरी असफलता है पर वो सभी मेरे साथ तो कभी कभी कुछ घंटे रहते है बाकि सारा समय तो अपने परिवार और अपनी जाती के साथ रहते है सारी शिक्षा उर संस्कार तो वहा का भरा पड़ा है खून के कतरे कतरे में
जो साथी प्रमुख पिछड़े वर्ग के है वो बताते है की की हमारा फला धारा से तो शादी ब्याह का रिश्ता ही नहीं पर कुछ लोग महत्वपूर्ण हो गए तो कुछ लोग करने लगे पर हम तो अभी भी नहीं करते है
जब कभी मैं किसी दलित या मुसलमान के यहाँ किसी अवसर पर जाता हूँ तो ये कन्नी काटने की कोशिश करते है और चले गए तो तबियत कुछ खराब  होती है और वहा खाना पानी कुछ नहीं
जो साथी बघेल जाती के है क्या मजाल की उनकी आप दलित या मुसलमान के घर पानी भी पिला दे ,जो दलित जाती के है उनको बाल्मीकी के घर आप खला पिला नहीं सकते है ;बेचारे देखते रहते है मन मसोस कर और हम खाते पीते रहते है
कौन बड़ा जातिवादी है और जाती के नाम पर भीतर तक घृणा रखता है ?
कुछ ऐसा ही चरित्र है समाज का सम्पुर्ण ,ब्राह्मण सरयूपारी ,कान्यकुब्ज इत्यादि में फंसा है तो क्षत्रिय भी अपने अलग अलग धाराओं में ,बनिया  हो या अन्य सभी का यही हाल है ,पिछड़े और दलित भी इसी चरित्र के साथ जी रहे है तो मुसलमानो से भी सुनता हूँ की फला तो फला है और ऐसा होता है
कौन ख़त्म करेगा जातिवाद ?
और ऐसे चरित्र वाले जब उपदेश देते है और घृणा का हद दर्जे का प्रदर्शन करते है तो आइना दिखाना ही पड़ता है

सोमवार, 24 जुलाई 2017

शिख्ंडी

आज की राजनीती में खासकर सत्ता को महाभारत का केवल शिखंडी आदर्श भा गया है 

जब चाहते है किसी भी चीज को शिखंडी बना आगे कर देते हैं 

रविवार, 23 जुलाई 2017

इंतजार करता हूँ किसी समापन का संघर्ष या जीवन में


काफी दिनों से कुछ नहीं लिखा न विचार और न  कविता | लगता है विचार ही सूखा गए है या कलम की स्याही सूख गयी है या उँगलियाँ ही नहीं चलती अब की बोर्ड पर| कभी लिखा था की मन होता है की किताबे जला दूँ ,डिग्रियां और पुरष्कार जला दूँ ,कही उसी का असर तो नहीं ? या हालत ने बना दिया है मुझे ऐसा | संघर्ष तो किया है पूरी जिंदगी पर अब शायद जिदगी ही संघर्ष हो गयी है इसलिए जब तक संघर्ष करता रहा तब तक तो कलम दौड़ती रही पन्नो पर लेकिन जिन्दगी ही जब संघर्ष बन जाये तो क्या और कैसे दौड़े ,न दिमाग ही चलता हिया और न दिल ही हिलोरे लेता है न दुःख की ,न सुख की ,न चाहत की ,न संकल्प की न संबल की न संभावनाओ की और जब दिल ही मौन हो गया हो इस कदर तो भाव आये भी तो कहा से और कलम हो या कीबोर्ड चले भी तो कैसे |
पता नहीं कब जिन्दगी भवर से निकलेगी और संघर्ष अंतिम विराम लगाएगा जिंदगी में या जिन्दगी को | राजनीती तो मेरे खून के कतरे कतरे में थी पर वो भी सन्यास ले गयी है लगता है |
तो अभी वरम ही देता हूँ
और इंतजार करता हूँ किसी समापन का संघर्ष या जीवन में | 

मंगलवार, 4 जुलाई 2017

असंम में फिर बढ़ से तबाही

असंम में फिर बढ़ और लाखो लोग परेशानी में | हर वर्ष ही करेब करीब देश का बड़ा हिस्सा बाढ़ की चपेट में आता है वो चाहे बंगला देश की नदियों के कारन हो या अपने देश की नदियों के कारन ,वो भरी बारिश के कारन हो या बांधो के पानी छोड़ने के कारन पर तबाह तो हर साल vaइ लोग होते हैं |
कितने करोड़ लोग कुछ फिन बेघर हो जाते है तो कितने बंधो ,ऊचैयियो और सड़को पर प्लास्टिक के टेंट लगाकर कर तब तक की जिंदगी गिअरते है जब तक बाढ़ ख़त्म नहीं हो जाती है | बढ़ के बाढ़ यही लोग महामारियो और बीमारियों के शिकस होते है |
कभी कोइं जाकर तो देखे की कितनी मुश्किल और तबाह जिंदगी जीती है देश की ही बड़ी आबादी और इसमें बड़ी संख्या हिन्दू की ही होती है | ये अलग बात है की बाढ ही,आगजनी हो या कोई और आपदा मरता तो देश का गरीब ही है और ये आपदाए जाति और धर्म देख कर भी नही आती पर जाती और धर्म के गौरव का एहसास कर जबी वोट मिल जाता हो और पांच साल की सरकार बन जाती हो तो उनकी समस्याओ और जिंदगी के लिये कुछ करने की जरूरत भी क्या है |
आज़ादी के इतने साल बाद भी हम इन आपदाओ से अपनी जा नता को बचाने का रास्ता नहीं तलाश कर सके है | हमें फुर्सत ही नहीं है बड़े शहरो को और संवारने से और बड़ो को बनाने तथा बचने और बढाने से |
वक्त बहुत ध्यान से देख रहा है की ये उंच नीच की खाई ,उनसे ये दोहरा व्यवहार ,सत्तावो का ये दोहरा चरित्र ,कब तक चलेगा और देश सम्पूर्ण रूप से करवट कब लेगा जब उंच नीच की खाई कुछ कम हो सके और न्याय तथा सत्ता और सम्पत्ति तथा संसधानो बटवारा समानता से होगा |
फिलहाल तो मैं उन करोडो के प्रति संवेदना उअर दुःख ही व्यक्त कर सकता हूँ |
जय हिन्द |