सोमवार, 8 अगस्त 2011

क्या ये हो सकता है ?

दोस्तों १- यदि वायदा कारोबार आज रात से सरकार बंद कर दे तो सुबह होते ही सभी चीजों के दाम २०% से ४०% तक कम हो जायेंगे |२- यदि ये आदेश जारी हो जाये की किसान के खेत से जिस भाव आया है या जिस लागत पर कारखाने में बना है उससे कितना ज्यादा भाव पर बिक सकता है यानि हर सामान का दाम और मुनाफा निर्धारित होने का कड़ा कानून बनाना चाहिए |३ - सभी सामानों का रेट प्रकाशित होना चाहिए | ४ मुनाफाखोरी,जमाखोरी,कड़े दंड वाले अपराध होने चाहिए और मिलावटखोरी तथा नकली दावा या कोई सामान बनाना देशद्रोह की श्रेणी में आना चाहिए |५ - जिस भी किसी चीज का निर्माण हो सड़क ,पुल या कोई भी बिल्डिंग उसकी उम्र तय होनी चाहिए मानकों के अनुसार ,यदि उसके पहले ख़राब हो जाये तो बनाए वाला उस उम्र तक बनाने को जिम्मेदार हो तथा उसे और उस काम में शामिल अधिकारी हो ,अभियंता हो या कोई भी हो वे सभी दंड के भागीदार हो |६- सरकारी दफ्तरों की संख्या घटाई जाये | ७ - ऐसी व्यवस्थाएं बने की जनता को दफ्तरों में जाने की जरूरत न पड़े और यदि सरकारी शुल्क जमा करना हो तो आप स्वयं जमा कर रसीद रख ले यह पर्याप्त हो | ७- मकानों के नक़्शे सही है या नहीं इसके लिए आप का आर्किटेक्ट और आप जिम्मेदार हो |८-एक निश्चित समय पर बढ़ने वाली चीजो का समय १० से २० साल तक बढाया जाये तथा उसका शुल्क जमा कर आप रसीद रख लें यही पर्याप्त हो|९- हथियार का लाइसेंस या पासपोर्ट पाना आप का अधिकार हो | १०- जब सचमुच आप गलत पाए जाये तथा सिद्ध हो जाये तभी आप को किसी दफ्तर जाना हो या निश्चित दंड की धनराशी जमा कर आप सरकारी लोगो की शक्ल देखने और शोषण से बच जाये|यदि ऐसा हो जाये तो भारत की जनता कितनी सुखी हो जाये ?और सरकारी दफ्तरों तथा कर्मचारियों की फ़ौज भी घट जाये |११- जैसे लोग फ्लैट या छोटे घर में रहते है वैसे ही प्रधानमंत्री ,राट्रपति ,उप राष्ट्रपति इत्यादि को छोड़ कर बाकि सभी नेता हो या अधिकारी सबके पद के अनुसार एक ही परिसर में जिले से दिल्ली तक लोगो को फ्लैट और घर मिले | ऐसे बहुत से तरीके हो सकते है सुधार के ,सरलीकरण के ,जनतंत्रीकरण के |
क्या विचार है दोस्तों ?क्या कोई सुझाव आप अच्छा लगा और भी आप लोगो के विचार हो सकते है |विचार शुरू होता है तो कभी पूरा भी होता है |












रविवार, 7 अगस्त 2011

                                       जब अन्ना देश पर राज करेंगे                                                                                                                                                                                      अन्ना हजारे और उनके लोगो का कहना है की पूरा देश उनके साथ है | वे लोग जो भी आदेश देश को दे रहे है वो देश के १२० करोड़ लोगो की सहमति से दे रहे है | मै सोचता हूँ की इतने बड़े जन समर्थन के साथ यदि अन्ना देश का चुनाव लड़ ले तो सभी की जमानत जब्त हो जाएगी | पूरे ५४३ संसद अन्ना के होंगे ,सभी विधानसभाओं के सारे विधायक अन्ना के होंगे | सारी सरकारें ही नहीं बल्कि इन सब के वोट से राष्ट्रपति ,उप राष्ट्रपति सभी अन्ना के होंगे | फिर क्यों अनशन करना ? क्यों कभी लोकपाल ,कभी किसी और चीज का सवाल उठाना ? 
दिल्ली के रामलीला मैदान में बैठ कर पूरा संविधान बदल देगे अन्ना जी और अपनी और अपने साथियों की विद्वानता से नया संविधान ,नयी व्यवस्था ,सब कुछ बदल देंगे अन्ना | पूरा देश सभी बुराइयाँ छोड़ देगा अन्ना की आभा से प्रभावित होकर | कोई न घूस लेगा न देगा | आदर्श व्यवस्था कायम हो जाएगी देश में | किरण बेदी के नेतृत्व में पुलिस जन सेवक बन जाएगी | प्रशांत के कारण देश के सारे मुक़दमे ख़त्म हो जायेंगे अदालतों  की जरूरत ख़त्म हो जाएगी | जिस दिन अन्ना चुनाव जीतेंगे उसी दिन दुनिया के सभी देश जहाजों में भर भर कर सारा कला धन भारत भेज देंगे ,दिक्कत ये होगी की रखे कहा ? बड़े बड़े मैदानों में टेंट लगाने पड़ेंगे पर अगर खुले में भी छोड़ दिया जाये तो कोई उस दौलत को छूएगा भी नहीं | देश में भी जिसके पास भी एक भी रूपया कला धन होगा वो कही भी हो किसी के घर में या मंदिर में सब देश को समर्पित कर देंगे | कही कुछ भी बुरा नहीं होगा ,बस आदर्श ही आदर्श | 
अन्ना को छोटी छोटी लड़ाइयाँ छोड़ कर बस इस दिशा में कदम बढ़ा देना चाहिए १२० करोड़ लोग पूरी तरह अन्ना के साथ है | अन्ना को पूरे देश पर एक क्षत्र साम्राज्य के लिए और दुनिया की एक मात्र आदर्श व्यवस्था  बनाने के लिए अग्रिम बधाई | सचमुच हम और हमारी आने वाली पीढियां कितनी खुशनसीब है की आने वाले समय में अन्ना के नेतृत्व में हमारा देश चलेगा |
              


मंगलवार, 19 जुलाई 2011

आगरा बोलता है

मेरा शहर है आगरा | आगरा मेरा क्यों सारे प्रेम में विश्वास करने वालो शहर कहा जाता है ,चाहे आगरा वालो के दिल में कोई प्यार हो या नहीं हो | आगरा में है ताजमहल इससे आगरा का नाम अंतररास्ट्रीय क्षितिज पर भी जाना जाता है | पता नहीं ताजमहल बनवाना शाहजहाँ की कोई सनक थी या सचमुच मुमताज से उसका प्यार इतना गहरा था | कुछ लोग कहते है की यदि मुमताज से इतना प्यार था तो और कई पत्नियाँ क्यों थी ? मुमताज की मृत्यु के तुरंत बाद शाहजहाँ ने तुरंत उसकी छोटी बहन से निकाह क्यों कर लिया ?खैर ये सवाल ऐतिहासिक बहस के सवाल है ,इससे आगरा के लोगो को और ताजमहल को प्रेम का प्रतीक मान चुके लोगो को कुछ भी लेना देना नहीं है | उन्हें तो सिर्फ प्यार जताने का बहाना चाहिए वो सच्चा हो या बनावटी | पूरी दुनिया से जो भी भारत आता है, वो कोई आम आदमी हो या रास्त्रपति ,प्रधानमंत्री या राजा वो ताजमहल देखने जरूर आता है | ताजमहल का अभूतपूर्व सौन्दर्य और स्थापत्य कला देखने या प्रेम की प्रेरणा लेने | आगरा गौरव से सर उठा कर कहता है ताजमहल उसका है पर कही मन के अन्दर से एक टीस भी सर उठा कर उसे कचोटने लगाती है और वो सोचने लगता है की ताजमहल उसे दिया क्या ? ताजमहल उसे दिया ज्यादा है या छीना ज्यादा है |
आगरा में बहुत से उद्योग थे | यहाँ का ढलाई का कारोबार पूरे देश में ही नहीं पूरी दुनिया में अपना लोहा मनवा चूका था | लाखों के पास रोजगार था इस व्यवसाय के कारण पर ताजमहल की तथकथित तौर पर खूबसूरती बचने के लिए सारे कारखाने बंद कर दिए गए | अचानक एक झटके से आगरा बेरोजगार हो गया आगरा को चौबीस घंटे बिजली देने वाला बिजलीघर भी बंद हो गया  | बजाज स्कूटर का कारखाना लगाने वाला था पर नेताओं ने लगाने नहीं दिया | उषा पंखे का कारखाना भी तथकथित मजदूर आन्दोलन की भेंट चढ़ गया | वादा किया गया था की आगरा को इलेक्ट्रोनिक शहर बनाया जायेगा | अब यहाँ सोफ्टवेयर पार्क बनेगा ,एस इ जेड 
यानि स्पेशल इकनोमिक ज़ोन बनेगा | यदि ऐसा होता तो नॉएडा और गुडगाँव की तरह आज आगरा भी नौकरियों का शहर होता ,सचमुच अंतर रास्ट्रीय शहर बन बन गया होता | पर इस जिम्मेदारी को निभाने की जिन पर जिम्मेदारी थी वे सभी अपनी जिम्मेदारी से मुहं मोड़े रहे | इस शहर की पता नहीं सहनशीलता या तटस्थता का और केवल अपने मतलब में डूबे रहने का स्वाभाव ,जागते रहने का आभाव की जो भी सम्बंधित अफसर आये वे भी आये एक थैला लेकर और लौटे कई ट्रक भर कर और जिन नेताओं को जनता ने चुना उन सबकी गरीबी ही दूर नहीं हो गयी बल्कि पीढ़ियों का इंतजाम हो गया वो चाहे किसी भी दल को हो किसी भी विचारधारा के हो पर मेरा आगरा गरीब ही  रह गया | 
मेरा आगरा लगातार छला गया और लगातार छला जा रहा है | पर आगरा बहुत सहनशील है और इसकी सहनशीलता का कोई कितना भी इम्तहान ले ले आगरा अपना इम्तहान देता रहेगा ,आगरा अंगड़ाई नहीं लेगा | ये जाना बूझा सच है की जो अपनी लड़ाई अपने पूरे मन से लड़ता वही अपना हक़ हासिल करता है और जो लडेगा नहीं वो कुछ पायेगा नहीं ,इच्छित या अनिच्छित | जब तक राजा लड़ते थे और उनके लिए उनकी जनता भी लड़ती थी तब तक राजा जीतते थे राजा ही हारते थे | जब जनता ने लड़ाई अपने हाथ में ले लिया ,जहा भी अपने हाथ में ले लिया वहा जनता जीती यह दुनिया का इतिहास है | पर मेरा आगरा लड़ाई झगड़े में विश्वास नहीं करता ,हा थोडा बहुत करता है ,अफवाहों की लड़ाई में ,जातियों की लड़ाई में ,धर्म की लड़ाई में भी, कभी कभी सड़क पर छोटी बातो  की लड़ाई में | पर मेरा आगरा अन्दर बहुत दुखियो भी है .पर ये अपना दुःख दिखने में विश्वास नहीं करता है ना |
लोग यहाँ आते है ये सोच कर की एक अंतर रास्ट्रीय शहर में जा रहे है पर आकर देखते है गन्दगी ,विकास का आभाव ,गन्दा पानी ,गन्दी जमुना ,हर जगह दलाली करने वाले रोजगार के समुचित अवसर नहीं होने के कारण धोखा देने वाले ,एक का सामान सौ में बेचने की कोशिश करने वाले या नक़ली सामान बेचने वाले | पर सच मानिये मेरा आगरा सचमुच ऐसा नहीं करना चाहता मजबूरी में कर बैठता है | \
मेरा आगरा बोलता है तो खूब बोलता है ,कोई सुने या नहीं सुने, कोई बुरा मने या अच्छा पर ;भैये ,गुरु इत्यादि ऊंची आवाज में आप को हर जगह सुनने को मिल जाएगी | पानी नहीं देगा प्रशासन तो अपना जेट पम्प लगाव लेते है ,बिजली नहीं आती तो अपना जेनरेटर खरीद लेते है ,सुरक्षा के लिए कानूनी ना सही गैर कानूनी हथियार रख लेते है ,चौकीदार रख लेते है और दीवारे तथा दरवाजे बहुत ऊंचा बना लेते है | देखा है कोई इतना सहनशील शहर ?मेरे शहर की मिसाल तो पूरी दुनिया में नहीं मिलेगी |पर मेरा आगरा जब चीखेगा नहीं ,जब तक सड़क पर फैसलाकुन लड़ाई के लिए उतरेगा नहीं क्या उसे इसी तरह छला जाता रहेगा सभी द्वारा ?क्या मेरे आगरा को उसका दर्जा और उसका हक़ नहीं मिलेगा | आज नॉएडा और गुडगाँव करीब करीब स्लम बन गए है | आगरा से नॉएडा जोड़ने वाली सड़क किसी भी दिन चल पड़ेगी और जीतनी देर में लोग दिल्ली में एक जगह से दूसरी जगह पहुंचते है उतनी देर में आगरा पहुचेंगे | नया रेल ट्रैक तैयार हो रहा है दो घंटे से कम समय में लोग दिल्ली से आगरा पहुचेंगे | क्या ऐसा नहीं हो सकता की बिल्डरों को जमीन देने के स्थान पर प्राधिकरण पहले एस इ जेड को जमीन दे और बिना किसी बाधा के सारे विभाग कम कर दे तथा दुनिया के उन तमाम संस्थानों को सन्देश भेजे की आइये आगरा और स्थानों से ज्यादा सुविधा देने को तैयार है ,आइये कोई परेशान नहीं करेगा ,कोई घूस नहीं मागेगा ,कोई चौथ नहीं मागेगा ,कोई नेता आप के विकास और रोजगार के  कम में आड़े नहीं आयेगा |क्या ऐसा हो सकता है ? जब दूसरे प्रदेशो के अलग अलग दल के नेता आपसी विवाद भुला कर देश के प्रधानमंत्री और दूसरे मंत्रियों के पास जा सकते है अपने प्रदेश और क्षेत्र के विकास के लिए तो आगरा और आगरा परिक्षेत्र के नेता ,संपादक ,लेखक ,शिक्षक ,सामाजिक कार्यकर्त्ता और सभी क्षेत्रों के लोग मिल कर ये प्रयास क्यों नहीं कर सकते ? अपने स्वार्थ को पीछे रख कर ये सभी कुछ समय क्यों नहीं निकल सकता मेरे आगरा के सार्थक विकास के लिए | केवल अपना पेट तो सड़क का कुत्ता भी भर लेता है | कुछ तो फर्क होना चाहिए उसमे और हममे |
क्या आगरा उठ खड़ा होने को तैयार है | क्या आगरा साफ़ पानी कभी पिएगा ? क्या आगरा बेईमानी पूर्ण बिजली व्यवस्था से और इसकी आंख मिचौली से कभी मुक्ति पायेगा ?क्या आगरा अंतर रास्ट्रीय हवाई अड्डा पायेगा ? क्या आगरा में एस इ जेड स्थापित कर आगरा का नाम सचमुच अंतर रास्ट्रीय शहरों की तर्ज पर विकसित हो पायेगा ? क्या आगरा अधिकारीयों की केवल चापलूसी करने से ऊपर उठ कर उनसे वो काम करवा पायेगा जो उसका काम है ? क्या नेताओं के लिए केवल वोट डालने के स्थान पर सही चुनाव कर उनसे हिसाब मांग पायेगा ? क्या आगरा लड़ना सीख पायेगा अपने हकों के लिए अपने भविष्य के लिए अपनी आने वाली पीढ़ियों के भविष्य के लिए ? 
दोस्तों मेरे आगरा के बहुत से  सवाल है पर मेरा आगरा कब बोलेगा ?क्या सचमुच आगरा बोलता है और नहीं बोलता तो अब कब बोलेगा ? आइये मेरे आगरा को मिल कर जगाये ,इसे कुम्भकर्णी नीद से जगाएं और आगरा को महान आगरा बनाये | आगरा का नाम सचमुच अंतर रास्ट्रीय क्षितिज पर चमकाएं | आइये दोस्तों इस ब्लॉग को आगरा का ब्लॉग बनायें और आगरा के जो भी लोग जहा भी रहते है उनको इससे जोड़े | मै भी जोडूं आप सब भी जोड़े और जो जहा है ,जिस भी हैसियत में है उसे आगरा के लिए कुछ जो वो कर सकता है करने के लिए मनाएं | आइये आगरा के लिए चिंता करने वालो की एक फ़ौज बनाये और इसकी चिंता भी करे और चिंतन भी | खुद भी खड़े हो और लोगो को भी खड़े होने को मजबूर करे |
      आइये जोर से आवाज लगाइए और बोलिए की " आगरा बोलता है" 

गुरुवार, 30 जून 2011

                                       [ लोकतंत्र में पार्टी बड़ी या सरकार  ]               डॉ ० सी ० पी ० राय                                                                                              [स्वतंत्र राजनैतिक चिन्तक एवं स्तंभकार]                      भारतीय लोकतंत्र में तरह तरह की बहसें चल रही है | इस समय  एक बहस की बहुत जरूरत है कि लोकतंत्र में पार्टी बड़ी है या सरकार ? सरकार पर पार्टी का अंकुश होना चाहिए ,पार्टी को सरकार के लिए नकेल कि तरह काम करना चाहिए ? क्योकि चुनाव पार्टी लड़ती है और फिर अपने में से कुछ लोगो को सरकार चलाने कि जिम्मेदारी देती है | पर जवाब तो पार्टी को ही देना पड़ता है ,अगले चुनाव में जनता के सामने फिर पार्टी को ही जाना होता है | पार्टी लगातार जनता से जुडी होती है जबकि  सरकार अपने दायित्वों के कारण दूर हो जाती है | जनता का रुझान कब क्या है ये पार्टी ज्यादा जानती है जबकि अधिकारियों पर आश्रित सरकार उससे बहुत दूर होती है | या फिर सरकार का पिछलग्गू यानि धकेल संगठन केवल होना चाहिए पार्टी को | पार्टी को सरकार को निर्देश देने का हक़ है या सरकार को पार्टी को निर्देश देने का हक़ है |
                                         कुछ समाजवादी लेखको ने लिखा है कि पंडित जवाहर लाल नेहरू नहीं चाहते थे कि डॉ लोहिया जो उनके बहुत अच्छे दोस्त भी थे और आजादी कि लड़ाई वाली कांग्रेस में विदेश विभाग के प्रभारी भी थे ,जयप्रकाश नारायण जो आजादी से पहले बड़े समय तक कांग्रेस के महामन्त्री रहे थे और आचार्य नरेन्द्र देव जैसे चिन्तक और नेता आजादी के बाद बनने वाली सरकार से दूर रहे | नेहरू जी बहुत बड़े इन्सान और बड़े नेता थे ,वे बड़े दिल वाले व्यक्ति थे ,वे सभी को शामिल कर देश चलाना चाहते थे | पर बात बनी नहीं क्योकि डॉ लोहिया चाहते थे कि पंडित जी खुद प्रधानमंत्री नहीं बल्कि पार्टी के अध्यक्ष बने रहे  और लोकतंत्र की  मजबूती के लिए पार्टी को निर्देशित करे | इस स्थिति में लोहिया जी भी नेहरू जी के साथ सरकार में नहीं बल्कि पार्टी में काम करना चाहते थे | बात टूट गयी और दोनों के रस्ते अलग हो गए | पर लोहिया जी ने जो  बात कहा था वह बहस तो कभी चली ही नहीं | उस पर चर्चा हो ही नहीं पाई | 
                                            ये अलग बात है कि केरल कि सरकार को सोशलिस्ट पार्टी के संगठन के आदेश पर इसलिए जाना पड़ा क्योकि थानू पिल्लै कि सरकार ने जनता पर गोली चलवा दिया था | ये आजादी कि लड़ाई से निकले नेताओ के आदर्श थे कि अपनी ही सरकार और अपनी ही पुलिस जिस जनता के वोट से चुनी गयी और जिस जनता से तनख्वाह पाती है उनपर लाठी गोली न चलवाए | उसके बाद जब ज्योति बासु को तीसरी ताकतों ने प्रधानमंत्री चुन  दिया तब यह देखने को मिला कि पार्टी ने आदेश दे दिया तो ज्योति बासु जैसे बड़े नेता ने भारत के प्रधानमंत्री जैसा बड़ा पद छोड़ दिया | इसके आलावा शायद कोई मौका नहीं दीखता कि पार्टी सरकार के ऊपर दिखे | वर्त्तमान में जरूर पार्टी सत्ता से बड़ी दिखलाई पड़ती है तो राजनीति शास्त्र और लोकतंत्र के प्रति अज्ञानी लोग इसे लोकतंत्र का सच्चा स्वरुप नहीं बल्कि कठपुतली और न जाने क्या क्या विशेषण से नवाजते है | क्या ये उचित है कि सरकारों को पूजीपतियों कि जमात ,दलाल या कोई और ताकतें संचालित करे ? क्या ये उचित है कि कुछ संगठन जो अपने को केवल गैर सरकारी और सांस्कृतिक संगठन कहते है और जिन लोगो को जनता का विश्वास नहीं हासिल होता है वे सरकार को कठपुतली कि तरह नचायें ? ये बहस बहुत गंभीर है और इसे बुद्धि के उपयोग से और अध्ययन से चलाने कि जरूरत है |
                                                सरकार चलाने वाले अगर खुद मालिक हो जायेंगे या दोनों शक्तियां किसी एक आदमी में समाहित हो जाएँगी तो तानशाह बन जाने का डर ही नहीं बना रहेगा बल्कि ऐसा तमाम देश में हो चुका है | इसीलिए कई खम्भों पर खड़ा किया जाता है लोकतंत्र कि बुनियाद को | फिर भी देखा गया है कि ये खम्भे भी इतिहास में मुख्य शक्ति के तानाशाह बन जाने पर अपने कर्तव्यों पर खरे उतरने में नाकामयाब साबित हुए है | फ़ौज को भी इसीलिए टुकड़ो टुकड़ो में रखा जाता है कि उसका हथियार कभी देशवासियों कि तरफ न मुड़ जाये और उन्ही देशो में फ़ौज सिर्फ अपने कम तक सीमित रहती है  | लेकिन जहा सरकार पर पार्टी के वर्चस्व कि व्यवस्था होती है वहा सरकार का तानाशाह बनना मुश्किल होता है और जनता के प्रति जवाबदेह और हर वक्त जनता से जुडी पार्टी उसे उन रास्तो पर चलने को मजबूर करती रहती है जो जनता को पसंद है या जो जनता के लिए जरूरी वो करने को मजबूर करती रहती है सरकार को | उचित तो यह भी होता है लोकतंत्र में कि जब भी सरकार कोई जन विरोधी कार्य करती नजर आये तो चाहे उसी पार्टी कि सरकार क्यों न हो पार्टी सरकार के खिलाफ जनता के साथ खड़ी नजर आये चाहे आन्दोलन ही क्यों न करना पड़े |
                                                 देश फिर एक ऐसी जगह खड़ा है जहा ये बहस बहुत जरूरी है कि लोकतंत्र उसमे भाग लेने वाले ,उसके लिए सैद्धांतिक आधार पर जनता के सामने जाने वाले दलों के द्वारा चलाया जायेगा या मौका पाकर सरकार में बैठ गए उसी दल के महज कुछ लोगो द्वारा या दोनों के द्वारा अपने अपने दायरे और जिम्मेदारियों के परिपेक्ष में |यह एक राजनीति शास्त्र कि बहस है | यह लोकतंत्र कि मजबूती कि बहस है | यह जनता के प्रति जवाबदेही कि बहस है | इस बहस में वे ही लोग शामिल हो सकते है जिन्हें राजनीति शास्त्र के सिद्धांतों और लोकतंत्र कि परिकल्पनाओं का ज्ञान हो | इसमें वे ही लोग शामिल हो सकते है जिन्हें खुले दिल दिमाग से सोचने कि आदत हो | बहस शुरू हुयी है अब जारी रहेगी जब तक कोई फैसलाकुन निष्कर्ष नहीं निकलता | देश के भविष्य ,लोकतंत्र के भविष्य और लोकतंत्र की संस्थाओं के भविष्य पर लगातार पैनी निगाह रखने वालों की निश्चित ही दिलचस्पी इस बहस में भी होगी और इस बहस के परिणाम में भी और वे भी इस बहस पर निगाह जरूर रखेंगे जो राजनीति में रूचि रखते है |


रविवार, 26 जून 2011

आज कई दिनों की चुप्पी के बाद गैंग से सलाह करने के बाद रामदेव यादव बोले पर बोले क्या खूब चीखे खूब गुस्साए | ये कैसा योगी ? रामदेव के अनुसार १- ३०००० लोगो के बीच उनकी हत्या की आशंका थी मीडिया भी था वहा फिर भी | लगता है की रामदेव ने भारत को कोई और देश समझ लिया | २- रामदेव यादव को आपातकाल लगा दिख रहा है, पर ये बहुत बहादुर है की फिर भी जो चाहे खूब झूठ बोल ले रहा है ये अलग बात है की पत्रकारों का जवाब देने को तैयार नहीं हुआ | ३- ये कायर की मौत नहीं मरना चाहता था ,उनके अनुसार उनके सामने बच्चो को घसीट कर मारा जा रहा था ,महलाओ के साथ बलात्कार का प्रयास किया जा रहा था ,इससे बड़ी कायरता और कायर की मौत क्या हो सकती है ? की कोई अपने समर्थन में आये लोगो को छोड़ कर भाग जाये | 
                            उन सवालो का जवाब आज भी नहीं दिया की १ - औरत का वेश का भेष धारण कर भगा क्यों २- पीटने वालो के सामने खुद को क्यों नहीं खड़ा कर दिया जानकी जिन नेताओ को ये गली दे रहा है वो अपने समर्थको को छोड़ कर भागते नहीं बल्कि खुद सामने खड़े हो जाते है २- ६ दिन में ही तथाकथित योगी मरणासन्न कैसे हो गया ? उसके दो महीने तक भूखे रहने के दावे का क्या हुआ ? ३ - दुनिया को अंग्रेजी इलाज छोड़कर अपना इलाज स्वीकार करने का उपदेश देने वाला रामदेव यादव खुद अंग्रेजी और बड़े अस्पताल में क्यों भारती हुआ ? अपने इलाज से खुद को ठीक करने की जिद क्यों नहीं किया | ४ - रामदेव की कितनी कम्पनियाँ है और किस किस चीज की है और उनमे कितना पैसा है ? पत्रकारों के इस सवाल पर अपनी पत्रकार वार्ता ख़त्म कर भाग क्यों जाता है ? 
                               रामदेव यादव अब तमाम सवालों के घेरे में आ गए है ,जिनका जवाब उनके पास नहीं है | अब वो जितना ज्यादा बोलेगा और बौखालायेगा उतने सवाल उठते जायेंगे | पहले भी लाखो लोग हुए है जो सरकारों के खिलाफ बोलते रहे सस्ते प्रचार की बाते करते रहे ,कम्पूटर इत्यादी का विरोध करते रहे ,पर जब उन लोगो को खुद सरकार में शामिल होने का मौका मिला तो वे सभी सारे भ्रस्ताचार का रिकार्ड तोड़ते दिखलाई पड़े और जो बड़ी बड़ी बातें करते थे सब भूल गए और निहायत अयोग्य साबित हुए | सत्ता से बाहर रह कर कुछ भी बोलना और सत्ता में होने हकीकत जान कर कारवाही करना अलग बात होती है | रामदेव यादव को भी अमर सिंह वाली बीमारी लग गयी है की उनके बिना दुनिया नहीं चलती और अगर किसी दिन मीडिया में नहीं आये तो बीमार पद जाना | जब मीडिया समाचारों के आभाव में ऐसे लोगो को कुछ ज्यादा जगह दे देता है तो सत्ता से भी बड़ा नशा चढाने लगता है ; पुरानी कहावत है की अधजल गगरी छलकत जाये |