मंगलवार, 19 जुलाई 2011

आगरा बोलता है

मेरा शहर है आगरा | आगरा मेरा क्यों सारे प्रेम में विश्वास करने वालो शहर कहा जाता है ,चाहे आगरा वालो के दिल में कोई प्यार हो या नहीं हो | आगरा में है ताजमहल इससे आगरा का नाम अंतररास्ट्रीय क्षितिज पर भी जाना जाता है | पता नहीं ताजमहल बनवाना शाहजहाँ की कोई सनक थी या सचमुच मुमताज से उसका प्यार इतना गहरा था | कुछ लोग कहते है की यदि मुमताज से इतना प्यार था तो और कई पत्नियाँ क्यों थी ? मुमताज की मृत्यु के तुरंत बाद शाहजहाँ ने तुरंत उसकी छोटी बहन से निकाह क्यों कर लिया ?खैर ये सवाल ऐतिहासिक बहस के सवाल है ,इससे आगरा के लोगो को और ताजमहल को प्रेम का प्रतीक मान चुके लोगो को कुछ भी लेना देना नहीं है | उन्हें तो सिर्फ प्यार जताने का बहाना चाहिए वो सच्चा हो या बनावटी | पूरी दुनिया से जो भी भारत आता है, वो कोई आम आदमी हो या रास्त्रपति ,प्रधानमंत्री या राजा वो ताजमहल देखने जरूर आता है | ताजमहल का अभूतपूर्व सौन्दर्य और स्थापत्य कला देखने या प्रेम की प्रेरणा लेने | आगरा गौरव से सर उठा कर कहता है ताजमहल उसका है पर कही मन के अन्दर से एक टीस भी सर उठा कर उसे कचोटने लगाती है और वो सोचने लगता है की ताजमहल उसे दिया क्या ? ताजमहल उसे दिया ज्यादा है या छीना ज्यादा है |
आगरा में बहुत से उद्योग थे | यहाँ का ढलाई का कारोबार पूरे देश में ही नहीं पूरी दुनिया में अपना लोहा मनवा चूका था | लाखों के पास रोजगार था इस व्यवसाय के कारण पर ताजमहल की तथकथित तौर पर खूबसूरती बचने के लिए सारे कारखाने बंद कर दिए गए | अचानक एक झटके से आगरा बेरोजगार हो गया आगरा को चौबीस घंटे बिजली देने वाला बिजलीघर भी बंद हो गया  | बजाज स्कूटर का कारखाना लगाने वाला था पर नेताओं ने लगाने नहीं दिया | उषा पंखे का कारखाना भी तथकथित मजदूर आन्दोलन की भेंट चढ़ गया | वादा किया गया था की आगरा को इलेक्ट्रोनिक शहर बनाया जायेगा | अब यहाँ सोफ्टवेयर पार्क बनेगा ,एस इ जेड 
यानि स्पेशल इकनोमिक ज़ोन बनेगा | यदि ऐसा होता तो नॉएडा और गुडगाँव की तरह आज आगरा भी नौकरियों का शहर होता ,सचमुच अंतर रास्ट्रीय शहर बन बन गया होता | पर इस जिम्मेदारी को निभाने की जिन पर जिम्मेदारी थी वे सभी अपनी जिम्मेदारी से मुहं मोड़े रहे | इस शहर की पता नहीं सहनशीलता या तटस्थता का और केवल अपने मतलब में डूबे रहने का स्वाभाव ,जागते रहने का आभाव की जो भी सम्बंधित अफसर आये वे भी आये एक थैला लेकर और लौटे कई ट्रक भर कर और जिन नेताओं को जनता ने चुना उन सबकी गरीबी ही दूर नहीं हो गयी बल्कि पीढ़ियों का इंतजाम हो गया वो चाहे किसी भी दल को हो किसी भी विचारधारा के हो पर मेरा आगरा गरीब ही  रह गया | 
मेरा आगरा लगातार छला गया और लगातार छला जा रहा है | पर आगरा बहुत सहनशील है और इसकी सहनशीलता का कोई कितना भी इम्तहान ले ले आगरा अपना इम्तहान देता रहेगा ,आगरा अंगड़ाई नहीं लेगा | ये जाना बूझा सच है की जो अपनी लड़ाई अपने पूरे मन से लड़ता वही अपना हक़ हासिल करता है और जो लडेगा नहीं वो कुछ पायेगा नहीं ,इच्छित या अनिच्छित | जब तक राजा लड़ते थे और उनके लिए उनकी जनता भी लड़ती थी तब तक राजा जीतते थे राजा ही हारते थे | जब जनता ने लड़ाई अपने हाथ में ले लिया ,जहा भी अपने हाथ में ले लिया वहा जनता जीती यह दुनिया का इतिहास है | पर मेरा आगरा लड़ाई झगड़े में विश्वास नहीं करता ,हा थोडा बहुत करता है ,अफवाहों की लड़ाई में ,जातियों की लड़ाई में ,धर्म की लड़ाई में भी, कभी कभी सड़क पर छोटी बातो  की लड़ाई में | पर मेरा आगरा अन्दर बहुत दुखियो भी है .पर ये अपना दुःख दिखने में विश्वास नहीं करता है ना |
लोग यहाँ आते है ये सोच कर की एक अंतर रास्ट्रीय शहर में जा रहे है पर आकर देखते है गन्दगी ,विकास का आभाव ,गन्दा पानी ,गन्दी जमुना ,हर जगह दलाली करने वाले रोजगार के समुचित अवसर नहीं होने के कारण धोखा देने वाले ,एक का सामान सौ में बेचने की कोशिश करने वाले या नक़ली सामान बेचने वाले | पर सच मानिये मेरा आगरा सचमुच ऐसा नहीं करना चाहता मजबूरी में कर बैठता है | \
मेरा आगरा बोलता है तो खूब बोलता है ,कोई सुने या नहीं सुने, कोई बुरा मने या अच्छा पर ;भैये ,गुरु इत्यादि ऊंची आवाज में आप को हर जगह सुनने को मिल जाएगी | पानी नहीं देगा प्रशासन तो अपना जेट पम्प लगाव लेते है ,बिजली नहीं आती तो अपना जेनरेटर खरीद लेते है ,सुरक्षा के लिए कानूनी ना सही गैर कानूनी हथियार रख लेते है ,चौकीदार रख लेते है और दीवारे तथा दरवाजे बहुत ऊंचा बना लेते है | देखा है कोई इतना सहनशील शहर ?मेरे शहर की मिसाल तो पूरी दुनिया में नहीं मिलेगी |पर मेरा आगरा जब चीखेगा नहीं ,जब तक सड़क पर फैसलाकुन लड़ाई के लिए उतरेगा नहीं क्या उसे इसी तरह छला जाता रहेगा सभी द्वारा ?क्या मेरे आगरा को उसका दर्जा और उसका हक़ नहीं मिलेगा | आज नॉएडा और गुडगाँव करीब करीब स्लम बन गए है | आगरा से नॉएडा जोड़ने वाली सड़क किसी भी दिन चल पड़ेगी और जीतनी देर में लोग दिल्ली में एक जगह से दूसरी जगह पहुंचते है उतनी देर में आगरा पहुचेंगे | नया रेल ट्रैक तैयार हो रहा है दो घंटे से कम समय में लोग दिल्ली से आगरा पहुचेंगे | क्या ऐसा नहीं हो सकता की बिल्डरों को जमीन देने के स्थान पर प्राधिकरण पहले एस इ जेड को जमीन दे और बिना किसी बाधा के सारे विभाग कम कर दे तथा दुनिया के उन तमाम संस्थानों को सन्देश भेजे की आइये आगरा और स्थानों से ज्यादा सुविधा देने को तैयार है ,आइये कोई परेशान नहीं करेगा ,कोई घूस नहीं मागेगा ,कोई चौथ नहीं मागेगा ,कोई नेता आप के विकास और रोजगार के  कम में आड़े नहीं आयेगा |क्या ऐसा हो सकता है ? जब दूसरे प्रदेशो के अलग अलग दल के नेता आपसी विवाद भुला कर देश के प्रधानमंत्री और दूसरे मंत्रियों के पास जा सकते है अपने प्रदेश और क्षेत्र के विकास के लिए तो आगरा और आगरा परिक्षेत्र के नेता ,संपादक ,लेखक ,शिक्षक ,सामाजिक कार्यकर्त्ता और सभी क्षेत्रों के लोग मिल कर ये प्रयास क्यों नहीं कर सकते ? अपने स्वार्थ को पीछे रख कर ये सभी कुछ समय क्यों नहीं निकल सकता मेरे आगरा के सार्थक विकास के लिए | केवल अपना पेट तो सड़क का कुत्ता भी भर लेता है | कुछ तो फर्क होना चाहिए उसमे और हममे |
क्या आगरा उठ खड़ा होने को तैयार है | क्या आगरा साफ़ पानी कभी पिएगा ? क्या आगरा बेईमानी पूर्ण बिजली व्यवस्था से और इसकी आंख मिचौली से कभी मुक्ति पायेगा ?क्या आगरा अंतर रास्ट्रीय हवाई अड्डा पायेगा ? क्या आगरा में एस इ जेड स्थापित कर आगरा का नाम सचमुच अंतर रास्ट्रीय शहरों की तर्ज पर विकसित हो पायेगा ? क्या आगरा अधिकारीयों की केवल चापलूसी करने से ऊपर उठ कर उनसे वो काम करवा पायेगा जो उसका काम है ? क्या नेताओं के लिए केवल वोट डालने के स्थान पर सही चुनाव कर उनसे हिसाब मांग पायेगा ? क्या आगरा लड़ना सीख पायेगा अपने हकों के लिए अपने भविष्य के लिए अपनी आने वाली पीढ़ियों के भविष्य के लिए ? 
दोस्तों मेरे आगरा के बहुत से  सवाल है पर मेरा आगरा कब बोलेगा ?क्या सचमुच आगरा बोलता है और नहीं बोलता तो अब कब बोलेगा ? आइये मेरे आगरा को मिल कर जगाये ,इसे कुम्भकर्णी नीद से जगाएं और आगरा को महान आगरा बनाये | आगरा का नाम सचमुच अंतर रास्ट्रीय क्षितिज पर चमकाएं | आइये दोस्तों इस ब्लॉग को आगरा का ब्लॉग बनायें और आगरा के जो भी लोग जहा भी रहते है उनको इससे जोड़े | मै भी जोडूं आप सब भी जोड़े और जो जहा है ,जिस भी हैसियत में है उसे आगरा के लिए कुछ जो वो कर सकता है करने के लिए मनाएं | आइये आगरा के लिए चिंता करने वालो की एक फ़ौज बनाये और इसकी चिंता भी करे और चिंतन भी | खुद भी खड़े हो और लोगो को भी खड़े होने को मजबूर करे |
      आइये जोर से आवाज लगाइए और बोलिए की " आगरा बोलता है" 

गुरुवार, 30 जून 2011

                                       [ लोकतंत्र में पार्टी बड़ी या सरकार  ]               डॉ ० सी ० पी ० राय                                                                                              [स्वतंत्र राजनैतिक चिन्तक एवं स्तंभकार]                      भारतीय लोकतंत्र में तरह तरह की बहसें चल रही है | इस समय  एक बहस की बहुत जरूरत है कि लोकतंत्र में पार्टी बड़ी है या सरकार ? सरकार पर पार्टी का अंकुश होना चाहिए ,पार्टी को सरकार के लिए नकेल कि तरह काम करना चाहिए ? क्योकि चुनाव पार्टी लड़ती है और फिर अपने में से कुछ लोगो को सरकार चलाने कि जिम्मेदारी देती है | पर जवाब तो पार्टी को ही देना पड़ता है ,अगले चुनाव में जनता के सामने फिर पार्टी को ही जाना होता है | पार्टी लगातार जनता से जुडी होती है जबकि  सरकार अपने दायित्वों के कारण दूर हो जाती है | जनता का रुझान कब क्या है ये पार्टी ज्यादा जानती है जबकि अधिकारियों पर आश्रित सरकार उससे बहुत दूर होती है | या फिर सरकार का पिछलग्गू यानि धकेल संगठन केवल होना चाहिए पार्टी को | पार्टी को सरकार को निर्देश देने का हक़ है या सरकार को पार्टी को निर्देश देने का हक़ है |
                                         कुछ समाजवादी लेखको ने लिखा है कि पंडित जवाहर लाल नेहरू नहीं चाहते थे कि डॉ लोहिया जो उनके बहुत अच्छे दोस्त भी थे और आजादी कि लड़ाई वाली कांग्रेस में विदेश विभाग के प्रभारी भी थे ,जयप्रकाश नारायण जो आजादी से पहले बड़े समय तक कांग्रेस के महामन्त्री रहे थे और आचार्य नरेन्द्र देव जैसे चिन्तक और नेता आजादी के बाद बनने वाली सरकार से दूर रहे | नेहरू जी बहुत बड़े इन्सान और बड़े नेता थे ,वे बड़े दिल वाले व्यक्ति थे ,वे सभी को शामिल कर देश चलाना चाहते थे | पर बात बनी नहीं क्योकि डॉ लोहिया चाहते थे कि पंडित जी खुद प्रधानमंत्री नहीं बल्कि पार्टी के अध्यक्ष बने रहे  और लोकतंत्र की  मजबूती के लिए पार्टी को निर्देशित करे | इस स्थिति में लोहिया जी भी नेहरू जी के साथ सरकार में नहीं बल्कि पार्टी में काम करना चाहते थे | बात टूट गयी और दोनों के रस्ते अलग हो गए | पर लोहिया जी ने जो  बात कहा था वह बहस तो कभी चली ही नहीं | उस पर चर्चा हो ही नहीं पाई | 
                                            ये अलग बात है कि केरल कि सरकार को सोशलिस्ट पार्टी के संगठन के आदेश पर इसलिए जाना पड़ा क्योकि थानू पिल्लै कि सरकार ने जनता पर गोली चलवा दिया था | ये आजादी कि लड़ाई से निकले नेताओ के आदर्श थे कि अपनी ही सरकार और अपनी ही पुलिस जिस जनता के वोट से चुनी गयी और जिस जनता से तनख्वाह पाती है उनपर लाठी गोली न चलवाए | उसके बाद जब ज्योति बासु को तीसरी ताकतों ने प्रधानमंत्री चुन  दिया तब यह देखने को मिला कि पार्टी ने आदेश दे दिया तो ज्योति बासु जैसे बड़े नेता ने भारत के प्रधानमंत्री जैसा बड़ा पद छोड़ दिया | इसके आलावा शायद कोई मौका नहीं दीखता कि पार्टी सरकार के ऊपर दिखे | वर्त्तमान में जरूर पार्टी सत्ता से बड़ी दिखलाई पड़ती है तो राजनीति शास्त्र और लोकतंत्र के प्रति अज्ञानी लोग इसे लोकतंत्र का सच्चा स्वरुप नहीं बल्कि कठपुतली और न जाने क्या क्या विशेषण से नवाजते है | क्या ये उचित है कि सरकारों को पूजीपतियों कि जमात ,दलाल या कोई और ताकतें संचालित करे ? क्या ये उचित है कि कुछ संगठन जो अपने को केवल गैर सरकारी और सांस्कृतिक संगठन कहते है और जिन लोगो को जनता का विश्वास नहीं हासिल होता है वे सरकार को कठपुतली कि तरह नचायें ? ये बहस बहुत गंभीर है और इसे बुद्धि के उपयोग से और अध्ययन से चलाने कि जरूरत है |
                                                सरकार चलाने वाले अगर खुद मालिक हो जायेंगे या दोनों शक्तियां किसी एक आदमी में समाहित हो जाएँगी तो तानशाह बन जाने का डर ही नहीं बना रहेगा बल्कि ऐसा तमाम देश में हो चुका है | इसीलिए कई खम्भों पर खड़ा किया जाता है लोकतंत्र कि बुनियाद को | फिर भी देखा गया है कि ये खम्भे भी इतिहास में मुख्य शक्ति के तानाशाह बन जाने पर अपने कर्तव्यों पर खरे उतरने में नाकामयाब साबित हुए है | फ़ौज को भी इसीलिए टुकड़ो टुकड़ो में रखा जाता है कि उसका हथियार कभी देशवासियों कि तरफ न मुड़ जाये और उन्ही देशो में फ़ौज सिर्फ अपने कम तक सीमित रहती है  | लेकिन जहा सरकार पर पार्टी के वर्चस्व कि व्यवस्था होती है वहा सरकार का तानाशाह बनना मुश्किल होता है और जनता के प्रति जवाबदेह और हर वक्त जनता से जुडी पार्टी उसे उन रास्तो पर चलने को मजबूर करती रहती है जो जनता को पसंद है या जो जनता के लिए जरूरी वो करने को मजबूर करती रहती है सरकार को | उचित तो यह भी होता है लोकतंत्र में कि जब भी सरकार कोई जन विरोधी कार्य करती नजर आये तो चाहे उसी पार्टी कि सरकार क्यों न हो पार्टी सरकार के खिलाफ जनता के साथ खड़ी नजर आये चाहे आन्दोलन ही क्यों न करना पड़े |
                                                 देश फिर एक ऐसी जगह खड़ा है जहा ये बहस बहुत जरूरी है कि लोकतंत्र उसमे भाग लेने वाले ,उसके लिए सैद्धांतिक आधार पर जनता के सामने जाने वाले दलों के द्वारा चलाया जायेगा या मौका पाकर सरकार में बैठ गए उसी दल के महज कुछ लोगो द्वारा या दोनों के द्वारा अपने अपने दायरे और जिम्मेदारियों के परिपेक्ष में |यह एक राजनीति शास्त्र कि बहस है | यह लोकतंत्र कि मजबूती कि बहस है | यह जनता के प्रति जवाबदेही कि बहस है | इस बहस में वे ही लोग शामिल हो सकते है जिन्हें राजनीति शास्त्र के सिद्धांतों और लोकतंत्र कि परिकल्पनाओं का ज्ञान हो | इसमें वे ही लोग शामिल हो सकते है जिन्हें खुले दिल दिमाग से सोचने कि आदत हो | बहस शुरू हुयी है अब जारी रहेगी जब तक कोई फैसलाकुन निष्कर्ष नहीं निकलता | देश के भविष्य ,लोकतंत्र के भविष्य और लोकतंत्र की संस्थाओं के भविष्य पर लगातार पैनी निगाह रखने वालों की निश्चित ही दिलचस्पी इस बहस में भी होगी और इस बहस के परिणाम में भी और वे भी इस बहस पर निगाह जरूर रखेंगे जो राजनीति में रूचि रखते है |


रविवार, 26 जून 2011

आज कई दिनों की चुप्पी के बाद गैंग से सलाह करने के बाद रामदेव यादव बोले पर बोले क्या खूब चीखे खूब गुस्साए | ये कैसा योगी ? रामदेव के अनुसार १- ३०००० लोगो के बीच उनकी हत्या की आशंका थी मीडिया भी था वहा फिर भी | लगता है की रामदेव ने भारत को कोई और देश समझ लिया | २- रामदेव यादव को आपातकाल लगा दिख रहा है, पर ये बहुत बहादुर है की फिर भी जो चाहे खूब झूठ बोल ले रहा है ये अलग बात है की पत्रकारों का जवाब देने को तैयार नहीं हुआ | ३- ये कायर की मौत नहीं मरना चाहता था ,उनके अनुसार उनके सामने बच्चो को घसीट कर मारा जा रहा था ,महलाओ के साथ बलात्कार का प्रयास किया जा रहा था ,इससे बड़ी कायरता और कायर की मौत क्या हो सकती है ? की कोई अपने समर्थन में आये लोगो को छोड़ कर भाग जाये | 
                            उन सवालो का जवाब आज भी नहीं दिया की १ - औरत का वेश का भेष धारण कर भगा क्यों २- पीटने वालो के सामने खुद को क्यों नहीं खड़ा कर दिया जानकी जिन नेताओ को ये गली दे रहा है वो अपने समर्थको को छोड़ कर भागते नहीं बल्कि खुद सामने खड़े हो जाते है २- ६ दिन में ही तथाकथित योगी मरणासन्न कैसे हो गया ? उसके दो महीने तक भूखे रहने के दावे का क्या हुआ ? ३ - दुनिया को अंग्रेजी इलाज छोड़कर अपना इलाज स्वीकार करने का उपदेश देने वाला रामदेव यादव खुद अंग्रेजी और बड़े अस्पताल में क्यों भारती हुआ ? अपने इलाज से खुद को ठीक करने की जिद क्यों नहीं किया | ४ - रामदेव की कितनी कम्पनियाँ है और किस किस चीज की है और उनमे कितना पैसा है ? पत्रकारों के इस सवाल पर अपनी पत्रकार वार्ता ख़त्म कर भाग क्यों जाता है ? 
                               रामदेव यादव अब तमाम सवालों के घेरे में आ गए है ,जिनका जवाब उनके पास नहीं है | अब वो जितना ज्यादा बोलेगा और बौखालायेगा उतने सवाल उठते जायेंगे | पहले भी लाखो लोग हुए है जो सरकारों के खिलाफ बोलते रहे सस्ते प्रचार की बाते करते रहे ,कम्पूटर इत्यादी का विरोध करते रहे ,पर जब उन लोगो को खुद सरकार में शामिल होने का मौका मिला तो वे सभी सारे भ्रस्ताचार का रिकार्ड तोड़ते दिखलाई पड़े और जो बड़ी बड़ी बातें करते थे सब भूल गए और निहायत अयोग्य साबित हुए | सत्ता से बाहर रह कर कुछ भी बोलना और सत्ता में होने हकीकत जान कर कारवाही करना अलग बात होती है | रामदेव यादव को भी अमर सिंह वाली बीमारी लग गयी है की उनके बिना दुनिया नहीं चलती और अगर किसी दिन मीडिया में नहीं आये तो बीमार पद जाना | जब मीडिया समाचारों के आभाव में ऐसे लोगो को कुछ ज्यादा जगह दे देता है तो सत्ता से भी बड़ा नशा चढाने लगता है ; पुरानी कहावत है की अधजल गगरी छलकत जाये |


शनिवार, 18 जून 2011

ना संसद ना संविधान अब अन्ना विधान

                                                 ना संसद ना संविधान से अब देश चलेगा अन्ना के विधान से और देश में केवल नकारात्मक बात करने वाले और भोजपुरी में कहे तो गलचौरी करने वाले इस विधान के लागू होने से पहले तक ताली बजायेंगें ,लेख लिखेंगे ,फेसबुक सहित सभी ऐसे स्थानों पर नयी आजादी की कहानियां लिखेंगे | ऐसा लगेगा कि महात्मा गाँधी ,सुभाष चन्द्र बोस,तिलक ,भगत सिंह ,आजाद सभी ये लोग ही है | सीमाओ पर कुर्बानियां इन्होने या इनके परिवारों ने ही दिया है और अब जीत का जश्न मना रहे है | इनकी बातो से ऐसा भी लगता है कि भारत के लिए कुर्बानियां देने वाले आजादी कि लड़ाई लड़ने वाले निहायत नासमझ थे | ऐसा भी लगता है कि संविधान सभा में जो लोग बैठे थे वे देशद्रोही ,बिना पढ़े लिखे ,और गैर जिम्मेदार लोग थे | बाबा साहब आंबेडकर से लेकर डॉ राजेंद्र प्रसाद हो या एच एन कुंजरू तक सभी को इस सूरमाओ से राय लिए बिना संविधान कि रचना नहीं करना चाहिए था |
                                                इस वक्त देश में जिस तरह कि बहसे चलाई जा रही है उससे दो बाते प्रचारित करने कि पूरी कोशिश कुछ लोगो द्वारा कि जा रही है १ - ६३ सालो में इस देश में कुछ हुआ ही नहीं ,देश बर्बाद हो गया और बहुत पिछड़ गया | २ - भारत में केवल भ्स्ताचार होता है ,काला धन का कारोबार होता है और कुछ होता ही नहीं है | ये लोग ये बताना चाहते है कि भारत ना तो विज्ञानं में आगे बढ़ा ,ना शिक्षा में ,ना चिकित्सा में ,ना शक्ति में और किसी भी क्षेत्र में नहीं  | इन्हें भारतियों के मिलने वाले नोबल पुरष्कारों से नफरत है ,इन्हें भारत कि एकता से नफरत है ,इन्हें ६५ ,७१ ,कारगिल कि जीत से नफरत है ,इन्हें असमान में छोड़े जा रहे केवल अपने नहीं दुनिया के दूसरे देशो के भी उपग्रहों कि सफलता से नफ़रत है | इन्हें दुनिया के चंद प्रगतिशील देशो में भारत के शामिल हो जाने से नफरत है | इन्हें दुनिया कि पहली या दूसरी ताकत बनते हुए भारत से नफरत है |तभी तो आत्मविश्वाश से लबरेज होते भारत में विश्वाश का बड़ा संकट खड़ा करने का प्रयास बड़े सोचे समझे तरीके से किया जा रहा है | किसी देश के जीवन में ६० साल ६० सेकण्ड के बराबर होता है और दुनिया के तथाकथित बड़े और विकसित देशो के मुकाबले हमारे महान भारत ने ज्यादा तेजी से तरक्की भी किया ,अपनी कमियों पर विजय भी पाया और जहा जो कमजोरियां दिखी उनको दूर भी किया | जहा दूसरे  एक बोली ,एक भाषा ,एक धर्म वाले देशो को भी एक साथ रखने में कामयाबी  नहीं  मिल पा रही है और गृहयुद्ध तथा आतंकवाद और विभिन्न समस्याओ के शिकार है और फ़ौज तथा तानाशाही से भी काबू में नहीं कर पा रहे है वहीँ तमाम भाषाओ,बोलियों ,संस्कृतियों ,जातियों और धर्मो वाले इस देश कि मजबूत एकता और दुनिया का सिद्ध हो चूका सबसे मजबूत लोकतंत्र कुछ लोगो को चुभ रहा है | कुछ तथाकथित बुद्धिजीवी भी पता नहीं कैसे बिना इतिहास और वर्तमान कि समीक्षा किये इस अभियान में शामिल हो जाते है तो जो अभी तक नासमझ है या देश और नागरिकता का अर्थ ही नहीं समझना चाहते है उनको क्या कहा जाये ?जनसंख्या १२० करोड़ से ज्यादा है पर नागरिक कितने है ?यह बहस का विषय है | जब जो धर्म अपने उपदेशो के द्वारा समाज को सही दिशा और त्याग कि शिक्षा देता था वही अनाप शनाप धन दौलत और तमाम बुराइयों का शिकार दिखलाई पड़ रहा है तो उस चर्च और राजा के सौ साल से ज्यादा चले युद्ध कि याद आ ही जाती है | किसी ने लिखा था कि ; बादशाहों से फकीरों का बड़ा था मर्तबा ,जब तक सियासत से उनका कोई मतलब ना था ;| 
                                                                  देश के चिंतनशील और जिम्मेदार लोग समझ ही नहीं पा रहे है कि ज्यो ही अमरीका के राष्ट्रपति ओबामा भारत आये और संसद को संबोधित कर भारत को महान स्वीकार किया तथा हर भारतीय सीना चौड़ा कर चलने लगा ,दुनिया के लोग भारत में आकर पैसा लगाने को तैयार होने लगे ,देश के विरुद्ध सोचने वाले और षड़यंत्र करने वाले ठिठक कर खड़े हो गए ,अचानक ऐसा क्या हुआ कि उस स्थित को भारत के लिए प्रयोग होने से पहले ही भारतं को बुरा रास्त्र घोषित करने कि मुहीम देश के अंदर से ही शुरू हो गयी | इतिहास इसकी समीक्षा करेगा जरूर और वे ताकतें  बेनकाब भी होगी | आजादी कि लड़ाई में भी तो इस देश कि बहुत सी ताकतें  या तो फिरंगियों के साथ सीधे सीधे खड़ी थी या स्वतंत्रता सेनानियों के खिलाफ मुखबिरी कर रही थी | कुछ वैसी ही ताकतें आज भी देश के खिलाफ खड़ी है | इनकी संख्या हजारों या लाखों में होती है और ये १२० करोड़ से ज्यादा के देश को आदेशित करना और तानाशाही पूर्ण तरीके संचालित करना चाहते है | 
                                            इस बात से किसे एतराज है कि देश से बुराइयाँ मिटनी चाहिए ,भ्रस्ताचार ख़त्म होना चाहिए ,काला धन  का कारोबार बंद होना चाहिए इत्यादि | बहुत सी बाते है जिनपर देश में चिता भी है और चिन्तन भी | यदि चिंतन नहीं होता तो सूचना का अधिकार बना ही नहीं होता | जो भी हजारो करोड़ कला धन वापस आया है वो आया ही नहीं होता | सत्ता में भागीदार लोग जेल में गए ही नहीं होते और जेल जाने वाले यदि कोई और भी उनके कामो में शामिल है तो अब तक मुह खोल चुके होते | कम से कम पूर्व की सरकारों की तरह ये सरकार जिन पर भ्स्ताचार प्रमाणित हो जा रहा है उन्हें बचा नहीं रही है बल्कि कानून को मजबूती से काम करने को प्रोत्साहित कर रही है | किसी का पैसा खो जाता है या चोरी हो जाता है तो हमारी अपनी व्यवस्था हमें तुरंत नहीं दिलवा पाती है बल्कि कानूनी प्रक्रिया पूरी होने पर वो काफी दिन में मिल पाता है | यहाँ तो काला धन उन देशो में है जिनकी अर्थव्यवस्था ही उसी पर निर्भर है | अन्तेर्रस्त्रीय कानूनों के अंतर्गत प्रावधानों से ही वह वापस आयेगा और उसमे लगने वाला समय लगेगा  या फिर इतनी हिम्मत हो कि हमारी सेनाएं उन देशो पर हमला कर धन वापस ले आये | अगर मनमोहन सिंह और सोनिया गाँधी इमानदार नहीं है तो किसी के इमानदार होने की कल्पना ही नहीं की जा सकती है |
                                                   देश को भ्रमित करने वालो का कहना है की ८० % लोग चोर है इन्हें छोड़ कर, चुनाव में जनता पैसे और शराब लेकर वोट देती है इन्हें छोड़ कर ,सारे लोग काला धन रखते है इन्हें छोड़ कर ,संसद और विधान सभाओ में अयोग्य लोग है और कोई भी कानून बनाना नहीं जनता है इन्हें छोड़ कर | देश में कोई भी देश के बारे ने नहीं सोचता और न देश भक्त है इन्हें छोड़ कर | ये देश चलने का जो तरीका चाहते है उसमे देश की राजधानी हो या प्रदेश की ,जिला मुख्यालय हो या कोई और इनका कहना है की जहा भी कुछ लोग इकट्ठे हो जाये और ये ऐलान कर दे की वही देश के मालिक या प्रतिनिधि है तो उस वक्त वे जो भी आदेश देते जाये वही संविधान और कानून मान लिया जाये तथा उनके आदेशो का पालन तुरंत हो वर्ना वे जो चाहेंगे करेंगे |इस अन्ना विधान में फ़ौज के दफ्तर में इकट्ठे लोग फ़ौज की नीति और युद्ध की योजना तैयार करेंगे ,जो साईकिल नहीं चलाना जानते वे एयर फ़ोर्स को कौन सा जहाज खरीदना चाहिए या कौन सी मिसाइल लेनी चाहिए ये बताएँगे | जिन्होंने तालाब नहीं देखा वे नेवी की नीति तैयार करंगे | १० डकैत या चोर मिल कर पुलिस को कानून बताएँगे | जब भी कुछ लोग किसी अदालत में इकट्ठे हो  जायेंगे वो निचली अदालत हो या सर्वोच्च न्यायलय उनसे पूछ कर ही फैसले होंगे | जब भी कोई भीड़ अखबार के या टी वी के दफ्तर को घेर लेगी वह तय करेगी की अख़बार में क्या छपे या टी वी में क्या दिखाया जाये | इसी तरह भीड़ या यूँ कहे कि कुछ लोगो कि भीड़ देश कि नयी व्यवस्था चलाएगी | यदि लाखो लोगो कि क़ुरबानी से आजाद हुए और बड़ी कुरबानियों से कायम रहते हुए तरक्की करते देश को ऐसे ही चलना है तो इन मुट्ठी भर लोगो तथा इन के चंद समर्थको को ये व्यवस्था मुबारक | पर ऐसा लगता  नहीं है कि महान हिंदुस्तान इतना कमजोर हो गया है कि कुछ लोगो कि साजिश कामयाब हो पायेगी ,वे उसी गति को प्राप्त होंगे जिसको आजादी कि लड़ाई में गद्दारी कर प्राप्त हुए थे | ये देश १२० करोड़ कि इच्छा और उनके द्वारा बनाये संविधान से चलेगा न कि किसी और विधान से |
                                                    
                                                                                                                               
                                                                                                                  डॉ सी पी राय
                                                                                                 
                                                                                              स्वतंत्र राजनैतिक चिन्तक और स्तंभकार





                                                   

 


शुक्रवार, 17 जून 2011

दोस्तों मै चाहता हूँ कि सरकार मुझसे तथा आप में से भी जो लोग राय देना चाहे उन सभी से लोकपाल , भ्स्ताचार, कालाधन तथा अन्य जो भी विषय है जिनसे देश कि जनता दुखी है पर सरकार बात करे ! क्योकि नागरिक के रूप में वे जिनसे सरकार बात कर रही और हम आप सब बराबर है | लोकपाल ,बाबा ,स्वामी ,धर्मस्थल ,एन जी ओ ,सभी व्यापारियों कि जांचा करने को भी एक सुपर लोकपाल कि जरूरत है | हमारे इस विचार के लिए सरकार हमसे बात करे ,हम लोगो को भी समिति में शामिल करे वरना क्या हम लोगो को भी दिल्ली में अनशन पर बैठने  को मजबूर होना पड़ेगा ? पर हम सब भारत के आम आदमी है इसलिए हमारे पास उतना तामझाम नहीं है और न इतना पैसा है ,न संघ या किसी संगठन का समर्थन है तो क्या मीडिया और सभी लोग ,सत्ता और विपक्ष में बैठे लोग हम लोगो पर ध्यान देंगे ? कही ऐसा तो नहीं होगा कि चमक दमक और बड़े घरानों तथा बड़े लोगो या संगठनो का हाथ नहीं होने के कारन मेरा और आप का भी हाल निगमानंद जैसा हो जाये और दिल्ली में हम ;लावारिश मौत मर जाये ? यदि ऐसा हुआ तो हमारे बच्चे तो लावारिश हो जायेंगे ! आप दोस्तों से दो सवाल है १ - क्या मै जिन लोगो के बारे में लिखा है उनकी जाँच करने को भी एक सुपर लोकपाल होना चाहिए जिसका चुनाव सीधे देश के १२० करोड़ लोग करे ? २- क्या आप दिल्ली में अनशन के लिये मेरा साथ देने को तैयार है ? क्या यदि सरकार न सुने तो हमें सर्वोच्च अदालत से अपना अधिकार मांगना चाहिए कि हम भी अन्ना से समान जागरूक नागरिक है इसलिए हमें भी समिति में शामिल किया जाये ? दोस्तों यदि आप लोगो का नैतिक और वास्तविक समर्थन मुझे मिला तो आप लोगो कि राय देश कि सरकार के पास पहुँचाने के लिए मै दिल्ली में अनशन पर बैठूँगा | अन्ना और रामदेव के लिए इतने लोगो ने साथ दिया तो उनसे भी आगे कि मांग के लिए मुझ साधारण आदमी के साथ कितने लोग आते है ? वर्ना वह शेर सही साबित हो जायेगा   ;सब लोग ही समझे बूझे है ,सब लोग ही देखे भाले है .बिगड़े का बहनोई कोई नहीं धनवान के लाखो साले है |